स्व. भगवत रावत की कविता

  ‘वे इसी पृथ्वी पर हैं’

 ‘‘कहीं न कहीं कुछ लोग हैं ज़रूर
जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर
कच्छपों की तरह धारण किये हुए हैं
बचाये हुए हैं उसे
अपने ही नरक में डूबने से
वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं

इतने नामालूम कि कोई उनका पता ठीक-ठीक नहीं बता सकता
उनके अपने नाम हैं लेकिन वे

इतने साधारण और इतने आमफहम हैं
कि किसी को उनके नाम याद नहीं रहते
उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे

एक दूसरे में इतने घुले मिले रहते हैं
कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता
वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं

और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है
और सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हें रत्ती भर यह अंदेशा नहीं/कि उन्हीं की पीठ पर
टिकी हुई है यह पृथ्वी।’’