8 Jun 2013

उर्दू पूरे तौर पर हिंदुस्तान की अपनी जबान है

यह बहुत अजब है कि भारतीय सिनेमा से लेकर आम बोलचाल तक में लोगों की जुबान पर राज करने वाली उर्दू को हाशिये पर धकेल दिया गया है। आज जिस हिंदी का चलन है, उसकी कल्पना भी उर्दू के बिना नहीं की जा सकती। पिछले दो-तीन दशकों से उर्दू दानिशवरों के बीच यह बहस जेर-ए-तलब है कि उर्दू एक मरती हुई जुबान या भाषा है। सच भी है, भाषाएं तभी जिंदा रहती हैं, जब उनमें रोजगार पैदा करने की क्षमता हो। पाली, संस्कृत, फारसी के खत्म होने के पीछे यही कारण हैं। लेकिन इसके साथ उर्दू को एक और खमियाजा भुगतना पड़ा है। आजादी के बाद इसे मुसलमानों की भाषा कहकर सीमित कर दिया गया। इसमें जो राजनीति हुई, वो अलग से बहस तलब है। लेकिन फिलहाल उर्दू को वो मुकाम कैसे हासिल हो, इसकी पड़ताल होनी चाहिए। यह दौर मीडिया (चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक) के लगातार पसरने-पनपने का है। बाजार के दबाव में हर क्षेत्रीय भाषा में अखबार और चैनल शुरू किए जा रहे हैं। इसका फायदा उर्दू को भी हो रहा है। लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी है। उर्दू मीडिया के साथ जुड़ा मुसलिम प्रेस का टैग इसे हटाना होगा। और इसकी जिम्मेदारी खुद उर्दू वालों पर पहले आयद होती है। बाद में मालिकान व हुक्मरान पर। बहरहाल उर्दू के मसलों से जुड़े मुद्दों पर सहारा उर्दू डिविजन के ग्रुपर एडीटर सैयद फैसल अली के साथ आरिफ खान मंसूरी के ये अहम बातचीत यहां पेश-ए-नजर है। ये डिस्पैच हमने समाचार 4 मीडिया डॉट कॉम से उधार लिया है।


आपके पत्रकारिता कॅरियर पर एक नज़र?
मैंने अंग्रेजी सहाफत से कॅरियर की शुरुआत की। पूरे बीस साल के कॅरियर में ये तकरीबन आठ महीने निकाल दें तो मैंने केवल अंग्रेजी पत्रकारिता ही की है। मैं बीबीसी वर्ल्डवाइड के साथ जुड़ा रहा हूं जहां पर मेरा अंग्रेजी और हिंदी सर्विस से लगाव था, लेकिन उर्दू वालों से मेरी अक्सर बातचीत होती रहती थी। मैं बीबीसी के साथ मीडिया ईस्ट के जानकार के तौर पर 12 वर्ष तक कार्य करता रहा। मैंने इराक पर अमेरिकी हमले को नजदीक से देखा और कवर किया है। इस अमेरिकी हमले के बाद मैंने पूरी अरब दुनिया का अपनी गाड़ी से दौरा किया। ताकि मैं वहां की सतही सच्चाईयों को जान पाऊं। ऐसा करने वाला एकमात्र पत्रकार मैं था। मैंने जॉर्डन, सीरिया, लेबनान, टर्की और कई अन्य अरब देशों का दौरा किया। मैंने स्टोरी की थी कि सरकार क्या कह रही है और लोग क्या कह रह हैं। मैंने सच्चाई जानने की कोशिश की। मैंने इजराइल, हिजबुल्लाह जंग को कवर किया। जिसकी रिपोर्ट मैंने बीबीसी सहित दुनिया के दस बड़े मीडिया घरानों के साथ शेयर की थी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी मैंने बहुत काम किया है। मैंने यहां तक तह तक जाकर कई खबरें की हैं। इसी वजह से मुझे मध्य-पूर्व के विश्लेषक के तौर पर जाना जाता है। मैंने 17 वर्ष तक हज को कवर किया है। मैंने देखा है कि 1995 में हज के मैदान कैसा था और आज 2012 में कैसा है। मैंने उसके बदलते स्वरूप को देखा है। सउदी अरब बहुत ही संकुचित सोच वाला देश है। मैंने उस देश में बदलती चीजों को नजदीक से देखा है। बीस वर्ष बाद हिंदुस्तान पहुंचा तो मैं मध्य-पूर्व के मामले, आंतक और दहशतगर्दी के मामले और मुसलमानों से जुड़े मामलों की अच्छी-खासी जानकारी हासिल कर ली थी। मैं हिंदुस्तान के कई मीडिया घरानों में बतौर पैनेलिस्ट शामिल होता रहा हूं। मैंने हिंदुस्तान से बाहर अपना अधिकतर समय बिताया है, लेकिन मैं हिंदुस्तान और उसकी सहाफत से हमेशा जुड़ा रहा हूं।

उर्दू सहाफत की बात करें तो, आजादी के वक्त की उर्दू सहाफत और आज की उर्दू सहाफत में किस तरह के बदलाव आये हैं?
हिंदुस्तान की जंग-ए-आजादी में उर्दू सहाफत का बेमिसाल योगदान रहा है। उस वक्त जितने भी पर्चे और शूमारे निकलते थे, वो उर्दू में ही हुआ करते थे। तहरीक जितनी भी चली, वो उर्दू अखबारों के माध्यम से ही चली। हमारा नारा इंकलाब जिंदाबाद भी उर्दू जबान का है और एक उर्दू सहाफी द्वारा दिया गया है। हिंदुस्तान की आजादी में उर्दू सहाफत का अच्छा खासा योगदान रहा है। उस वक्त उर्दू जबान हिंदुस्तान की मुशक्कत तहज़ीब की जबान थी। ये वो जबान जो दिल्ली के लालकिले में पली-पढ़ी और दिल्ली से लखनऊ वाया हैदराबाद होते हुए देश के दूसरे हिस्सों में पहुंची। तब तक यह सयानी और परिपक्व हो चुकी थी। उर्दू पूरे तौर पर हिंदुस्तान की अपनी जबान है। पंडित नेहरू बात-चीत उर्दू या अंग्रेजी में करते थे लेकिन किसी ने ये आरोप नहीं लगाया कि यह किसी खास कौम या मजहब की जबान है। मुझे अफसोस तब हुआ जब हिंदुस्तान आजाद हुआ तो उर्दू मुसलमान हो गई। किसी का कहना सही ही है कि जो उर्दू जबान सेकुलर थी, ये आजादी के बाद एकाएक मुसलमान हो गई। लेकिन इसकी अहमियत में कोई कमी नहीं देखी गई। गाहे-बगाहे सरकारी तौर पर भी इसे माना जाता है। लेकिन उसके बाद के समय पर एक नज़र डाले तो उर्दू सहाफत बहुत ही बदतरीन दौर से गुजरी, लेकिन इसकी चमक बरकरार रही। उर्दू सहाफत इन सभी चीजों के बाद भी अपना काम करती रही और अभी भी कर रही है।
इतिहास को देखें तो भारतीय सहाफत की दमदार शुरुआत उर्दू में ही मानी जाती है, लेकिन अभी उर्दू अपना वजूद तलाश करती दिख रही है, इसकी क्या वजह रही हैं?
यहां पर मैं आपको थोड़ा सही करना चाहूंगा। उर्दू अपना वजूद नहीं तलाश रही है। जब मैं उर्दू सहाफत के लिए काम नहीं करता था, तो मुझे लगता था कि इसका मशतकबुल क्या है, इसको किस तरह से देखा जाता है। मेरी कई उर्दू सहाफियों से बातचीत होती थी। कहीं न कहीं लगता था कि इन लोगों में एहसास कम तरीके का जज्बा है। इनको लगता है कि वो उस जबान में सहाफत कर रहे हैं जिसको कोई देखता, सुनता और पढ़ता नहीं। लेकिन जब मैं यहां आया तो देखा कि सरकारी सतह पर इसकी खास जगह है। सरकार इसको नज़रअंदाज नहीं कर सकती। सहारा ने उर्दू सहाफत को एक नई पहचान, नई दिशा और नई उंचाईयां दी है। सहारा ने पहला ऑल इंडिया उर्दू अखबार शुरू करके उर्दू सहाफत में एक क्रांति सी ला दी है। इससे उर्दू सहाफियों की हालात में भी सुधार हुआ है। इसके बाद से, दूसरे मीडिया घरानों ने भी उर्दू सहाफत को गंभीरता से लिया है। सहारा उर्दू मीडिया में एक नया बेंचमार्क स्थापित किया है। उर्दू सहाफत में नई सोच, नई दिशा और नई संस्कृति की शुरुआत की है। मुझे लगता है कि उर्दू सहाफत पर जो बादल छा रहे थे, वो अब छंट गये हैं। बड़े-बड़े मीडिया घराने मीडिया सहाफत में आ रहे हैं। इसमें कोई ताज्जुब नहीं होगा कि अगर कई मीडिया घराने उर्दू चैनल लेकर आये तो। मैं नहीं सोचता कि उर्दू सहाफत का वजूद खत्म हो रहा है। इसका भविष्य रौशन है। मेरी लोगों और सरकार से दरख्वास्त है कि  वो उर्दू को तवज्जो दे। एक तरफ तो सरकार ने उर्दू के प्रमोशन के लिए नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज बनाई हुई है, दूसरी तरफ आप उर्दू को प्रतियोगी परिक्षाओं से हटा रहे हो। अभी सीबीएसई के मेडिकल एंट्रेस्ट टेस्ट में से उर्दू भाषा को हटा दिया गया है। अब उर्दू में उस परिक्षा के पर्चे नहीं होंगे, बाकी सभी रीजनल भाषाओं में पर्चे होंगे। आप ऐसी जबान में पर्चा छाप रहे हैं जो केवल सूबे तक ही सीमित है। लेकिन उर्दू नौ सूबों की दूसरी सरकारी जबान और जम्मू-कश्मीर की सरकारी जबान है। इसके अलावा भी पूरे हिंदुस्तान में बोली जाती है। पूरे हिंदुस्तान में उर्दू की तालिम बराबर चल रही है। सरकार को दोहरी पॉलिसी खत्म करनी होगी। सरकार को यह तय करना होगा कि सरकार इसे खत्म करना चाहती है या फिर इसके प्रचार के लिए कुछ करना चाहती है। मुझे लगता है कि उर्दू दुश्मन जहनियत के कुछ लोग सरकार की पोलिसी मेकिंग में है, वो इस तरह की चीजें करते हैं। तो ऐसी सूरते-ए-हाल से जबान नहीं मरती। दुनिया की इतनी खूबसूरत जबान है जिसका मुस्तकबिल हो ही नहीं सकता। इसको हमें और आपको तवज्जों देनी होगी। अगर, सरकार इसको ज्यादा तवज्जों नहीं दे रही है तो कम से कम हम लोग तो इस ओर ध्यान दे। उर्दू प्रेमियों को चाहिए कि उनके बच्चे बेशक अंग्रेजी स्कूल में पढ़े, लेकिन उन्हें उर्दू की तालिम जरूर दी जाए। उर्दू जबान नहीं बल्कि यह पूरी तरबियत और तहज़ीब है, और यह नहीं मर सकती।
उर्दू का अपना कोई एक सूबा नहीं है उर्दू के पाठक देश के अलग-अलग हिस्सों में फैले हुए हैं। ऐसे में उर्दू अखबार को चलाना कितना कठिन है?

देखिए, कोई मुश्किल नहीं है। मुझे बड़ा ताज्जुब होता था। जब मैं हिंदुस्तान आया और इतने बड़े अखबार का ग्रुप एडिटर बना। मुझे लगता था हिंदुस्तान की हिंदी बेल्ट में और नॉर्थ इंडिया में ही उर्दू अखबारात पढ़े जाते हैं। लेकिन मुझे तब ताज्जुब हुआ जब कर्नाटक के हुबली, धारवाड़ में मेरा एक प्रोग्राम हुआ, उसमें कई हजार लोग शरीक हुए। और मुझ पर पूरी तरह से जोर डाला गया कि मैं हुबली और धारवाड़ से भी एडिशन शुरू करूं। या फिर आंध्रप्रदेश में चले जाईये तो पूरे तौर पर उर्दू भाषी लोग हैं। कई संस्थान उर्दू फैलाने का अच्छा काम कर रहे हैं। इतना काम नॉर्थ इंडिया में नहीं हो रहा है, जितना साउथ में हो रहा है। ये भी एक तास्सुर था कि नॉर्थ इंडिया में उर्दू पनप रही है, लेकिन मेरे हिसाब से पूरे हिंदुस्तान में पनप रही है। साउथ इंडिया में देखा जाये तो वहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी उर्दू में हो रही है। ये तास्सुर उन्हीं लोगों का बनाया हुआ है, जो नहीं चाहते कि उर्दू जबान पनपे और उर्दू के लिए कुछ अच्छा हो। इससे हमें मायूस नहीं होना चाहिए। मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं कि हिंदुस्तान के हर एक राज्य में उर्दू का बोलबाला है।

नये सहाफियों की बात करे तो वो उर्दू की तरफ उतना आकर्षित नहीं हो रहे जितनी दूसरी जबान की ओर हो रहे हैं। इसकी क्या वजह हैं?
ये सारी चीजें मार्केट ही तय करता है। उर्दू का मार्केट नहीं है। इसमें देखा जाता है कि इसकी मार्केट में कितनी डिमांड है। मार्केट में बैठे लोग उसे प्रमोट करते हैं, जो मार्केट में बिकती है। अगर किसी चीज की मार्केट में डिमांड है, तो वो बिकेगी। उर्दू के प्रोडक्ट की डिमांड कम हो रही है। इसकी वजह है कि आपके और हमारे घर से उर्दू खत्म हो रही है। अगर उर्दू की डिमांड बढाएं, उर्दू के नये प्रोग्राम्स बनाये, उर्दू पढ़ने वालों को उत्साहित करें तो इसका अपने आप मार्केट बनता जायेगा और ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ते जायेंगे। बाकी भाषाओं की ब्रांड वैल्यू हो गई है, उनका मार्केट बन गया है। तो लोग उनकी ओर ही जायेंगे। लेकिन अगर देखे तो उन चैनलों में भी उर्दू भाषा के जानकारों को तरजीह दी जाती हैं। जिनका उच्चारण साफ होता है और उर्दू भाषियों को उच्चारण एकदम साफ होता है। इसको और ज्यादा मार्केट से जोड़ा जाये, तभी ये संभव है। इसके लिए सरकार को अहम भूमिका निभानी होगी। सरकार को चाहिए कि वो उर्दू के साथ सौतेला व्यवहार ना करे।
जिसको मार्केट से मान्यता मिलती है वहीं जिंदा रहता है ऐसा अक्सर कहा जाता है। क्या आपको लगता है कि उर्दू भाषा बाजार की भाषा में फिट होती है? नहीं तो क्यों?
बाजार में उर्दू फीट है और उर्दू बिकती भी है। उर्दू के साहित्य आज के समय में ट्रांसलेट हो रहे हैं। उर्दू पूरे तौर पर बाजार में है और बाजार के पूल और पूश में सफल हो रही है। अगर उर्दू का कोई मुशायरा होता है तो उसमें हजारों की संख्या में लोग एकत्र होते हैं। पूरे बाजार में इसकी स्वीकार्यता है। सिर्फ इसको रोजगार के साथ जोड़ने की जरुरत है। हमारे समाज में और बाजार में इसकी पकड़ को और ज्यादा मजबूत किया जाये। केवल यही वजह है कि मैं अंग्रेजी का पत्रकार उर्दू सहाफत में आया हूं। उर्दू सहाफत को एक नई दिशा ओर नई पहचान दी जाये। मैं अग्रेजी छोड़कर इसमें आया क्योंकि इसकी मार्केट में मांग है। उर्दू एक कॉरपोरेट हाउस है, वो चाहते है उर्दू वेंचर उनता प्रॉफिटेबल बने। इसमें संभावनाएं हैं और कुछ अच्छा किया जा सकता है, कॉरपोरेट हाउस उर्दू सहाफत में अपने हाथ अजमा रहे हैं। सहारा के उर्दू मार्केट में आने से दूसरे कॉरपोरेट भी इसमें उतर गये हैं। बाकियों को इसमें संभावना दिखी तभी तो जागरण ने नॉर्थ में इंकलाब लॉन्च किया। कलकत्ता में शारदा ग्रुप ने आजाद ए हिंद जैसे अखबार को खरीदा। उन्हे पता है कि उर्दू में कितनी क्षमता है। तो उर्दू का मार्केट भी है और उसका वजूद भी है। हां लेकिन ये उतनी मैच्योर और स्थापित नहीं हो पाई जितनी दूसरी दूसरी जबान हुई हैं। उसकी बहुत सारी वजहें हैं। उनमें से कुछ एक को हम लोग कंट्रोल कर रहे हैं, कुछ हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। लेकिन हमारी पाबंदियों के बावजूद भी हम लोग अच्छा काम कर रहे हैं। मार्केट में इसे और ज्यादा आक्रामक तरीके से बेचने और स्थापित करने की जरूरत है। उन लोगों को जो उर्दू समझते हैं, लेकिन उर्दू से दूर हैं, उन्हें उर्दू से जोड़ने की जरूरत है। कई संस्थान और लोग इसमें लगे हुए इसमें परेशानी की कोई बात नहीं हैं। सफर लंबा है, हमें दूर तक जाना है और इसे धीरे-धीरे तय करना है।
भगत सिंह का उर्दू में लिखा पत्र।   

उर्दू अखबारों को देखे तो इनकी पाठक संख्या भी बहुत कम है और इसमें कॉरपोरेट जगत के विज्ञापन भी बहुत कम संख्या में देखने को मिलते हैं, इसकी क्या वजह हैं?
नहीं, मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं। आप हैदराबाद चल जाये वहां देखो कितने अखबार प्रकाशित हो रहे हैं। हमारे अखबार के 18 एडिशन हैं और यह 10 जगहों से प्रकाशित हो रहा है। हमारा दिल्ली, लखनऊ, बिहार, बंगलोर और कलकत्ता में अच्छा सर्कुलेशन है। सोची-सझी रणनीति, संस्थागत तरीके से काम किया जाये तो सब कुछ ठीक हो सकता है। कई अखबार हैं जो 50-100 कॉपियां प्रकाशित करते हैं और इधर-उधर से इश्तिहार लेकर अपना फायदा कमा रहे हैं। ऐसे अखबार जो रिकोर्ड में तो प्रकाशित होते हैं लेकिन स्टैंड तक नहीं पहुंचते यह उर्दू सहाफत लिए एक बदनुमा दाग है। ये लोग अपने फायदा के लिए ऐसा कर तो रहे हैं लेकिन वो उर्द जबान को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। चंद अखबार हैं जो सुबाही या नेशनल हैं, उर्दू सहाफत में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
दलित विमर्श दलितों तक, स्त्री विमर्श स्त्रियों तक सीमित है। क्या उर्दू भी एक कौम तक सीमित हो गई है?
बिल्कुल नहीं, आज की तारीख में उर्दू के दस बड़े नाम लें तो उसमें से उपर के छह नाम गैर मुस्लिम हैं। गोपीचंद नारंग, गुलजार देहलवी साहब, पंडित आनंद मोहन जोशी और कृष्ण बिहारी नूर क्या मुस्लिम हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनकी टक्कर का कोई नहीं है। ये कहना गलत है कि उर्दू एक मजहब तक सीमित हो गई है। गुलजार साहब ने तो अपनी वसियत में लिखा है कि अगर मेरे बच्चे उर्दू और फारसी नहीं पढ़ते तो उन्हें मेरी जायदाद में से कोई भी हिस्सा ना मिले। इस तरह का कमिटमेंट तो किसी मुस्लिम का भी नहीं है। 1947 के बाद भले ही इसे मुसलमान कह दिया गया लेकिन आज भी गैर- मुस्लिम इसके जानकार हैं। आजादी से पहले कहा जाता था कि अगर कोई पढ़ा-लिखा है तो उसे उर्दू जरूर आती थी। जस्टिस काटजू क्या हैं, वो पूरे हिंदुस्तान में उर्दू कारवां लेकर निकले हुए हैं। पूरे हिंदुस्तान में घूम रहे हैं। ये एक गंगा-जमुनी तहजीब की जबान है।

उर्दू अखबारों में एक विशेष तरीके की खबरें ही देखने को मिलती हैं। ऐसा क्यों ?
उर्दू अखबारों की अपनी सोच और माइंडसेट है कि उन्हें इसी तरह की खबरें प्रकाशित करनी है। वो लोग एक खास किस्म के पाठकों को सामने रखकर ही अपना अखबार बनाते हैं। मैं जब से सहारा के साथ जुड़ा हूं, यहां पर तो मैंने यह तरीका पूरी तरह से खत्म कर दिया है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि किसी उर्दू अखबार में क्रिकेट की खबर फ्रंट पेज पर लीड के तौर पर प्रकाशित हो सकती है। उर्दू अखबार में बिजनेस और इकोनॉमी की खबरें नहीं होती थी। मैंने इस अखबार में पूरा पेज बिजनेस और इकोनॉमी की खबरों को दे दिया। अभी भी बाकी अखबारों में ये देखने को नहीं मिलता। उनका एक माइंडसेट है उसे बदलने के लिए मैं यहां पर हूं। मुझे कुछ नई चीजें करने के लिए यहां लाया गया है। ये संपादक पर डिपेंड करता है कि उसका क्या विजन है। मैं नई सोच के साथ काम करने की चेष्टा कर रहा हूं।
भारतीय समाज में खासकर मुस्लिम समाज में कट्टपंथी का खासा प्रभाव रहता है। तो क्या उसका असर उर्दू सहाफत में भी देखने को मिलता है?
हां, इसका बहुत ज्यादा असर पड़ता है। कट्टरपंथ, शांति व अमन को नापसंद करने वाले लोग इन अखबारों के जरिए से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। यह बहुत ही गलत बात है। कट्टरपंथी चाहे कोई भी मजहब का हो, उसके लिए कोई जगह नहीं है। कट्टपंथियों को इस तरह की बातें अखबार के जरिए या भाषणों के जरिए नहीं फैलानी चाहिए। वो ऐसा करके समाज के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, बल्कि वो समाज को तोड़ने की एक कोशिश कर रहे हैं। इसका हर लेवल पर विरोध होना चाहिए। मैं संजीदगी के साथ दावा कर रहा हूं कि जब से मैंने यहां पर कार्यभार संभाला है, मैंने इस तरह की चीजों पर रोक लगा दी है।
भाषाई पत्रकारिता, खासकर उर्दू सहाफत में किस तरह की दिक्कते हैं?
देखो, उर्दू की वो डिमांड नहीं है जो बाकी भाषाओँ की है। उर्दू के साथ सौतेला व्यवहार किया गया है। और यह सच है अगर ऐसा नहीं होता तो सरकार को इसके लिए कोई विशेष संस्थान बनाने की जरूरत नही थी। इसकी वजह से मार्केट में गुणवता वाले पत्रकारों की कमी हो रही है। जब आपको क्वालिटी वाले पत्रकार नहीं मिलेंगे तो इसका असर अखबार पर दिखेगा। जिससे उर्दू सहाफत का स्तर गिरेगा। यह दिक्कत केवल उर्दू सहाफत के साथ ही नहीं बल्कि दूसरी भाषाई सहाफत के साथ भी है। अच्छी बात यह है कि उर्दू सहाफत में उर्दू अदब और उर्दू शायरी से जुड़े लोग रहे हैं उनका अपना एक स्टैंडर्ड रहता है, जिससे इतनी गिरावट नहीं आई है। लेकिन इसके स्तर में थोड़ी बहुत गिरावट जरूर हुई है। इसको तभी दूर किया जा सकता है जब इसे रोजगार के साथ जोड़ा जाये।  

तो उर्दू को रोजगार के साथ कैसे जोड़ा जायेगा ?
देखिए, हिंदी 1947 के बाद आई। उसकी लिपि और शब्दकोश अभी तक पूरा नहीं हुआ है लेकिन उसे रोजगार के साथ जोड़ दिया गया है। यह वो जबान है जो केवल नॉर्थ में बोली जाती है। सरकार के अंदर इच्छा शक्ति थी कि वो हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाये। तो सरकार ने सुरक्षा और प्रोत्साहन दिया। तो हिंदी बाजार की भाषा बन गई। इतना ना सही लेकिन दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को इतना संरक्षण मिले कि वो अपने आप को मार्केट में बेच सके। बिकने के लिए जितने सारे गुण होने चाहिए, वो उर्दू में होने चाहिए।
इसके लिए सरकार को पहल करनी होगी या उर्दू जबान वालो कों ?
इसके दो रास्ते हैं। इसमें सरकार को भी पहल करनी होगी और जितने भी उर्दू जबान वाले हैं, उनको भी पहल करनी होगी। इसके लिए केवल सरकार की तरफ ही ना देखे बल्कि अपने घर से उर्दू की तरबियत और तालिम शुरू की जानी चाहिए। अगर हम ये सोच ले की हमारे बच्चों को उर्दू का जानकारी जरूरी है तो इससे उर्दू का मार्केट भी बढेगा। और रोजगार के साथ जुड़ने में भी सहायता मिलेगी। इसके लिए पूरी ढृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। इसको पूरी तरह से कार्यान्वित करने के लिए मार्केट में मजबूती करने के जितने भी पहलू हैं, उनको सक्रिय करने की जरूरत है।
उर्दू पत्रकारिता से ऐसी खबरों के उदाहरण देखने को नहीं मिलते, जिससे समाज पर असर पड़े।
उर्दू पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता नहीं हो पा रही है, और हम लोग अपना कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आज भी उर्दू के अखबार हैं वो एजेंसियों की खबरों पर निर्भर हैं उनके पास अपना रिपोर्टरों का कोई नेटवर्क नहीं है। एकमात्र हमारा ही अखबार है जिसका अपना रिपोर्टरों का नेटवर्क है। इसका इतना असर है कि कल मैंने एक लेख सीबीएसई की प्रतियोगी परीक्षा में से उर्दू को हटाने पर लिखा, जिस पर एचआरडी मिनिस्ट्री में हुई बैठक में उसे दिखाकर काफी हंगामा हुआ। लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता होनी चाहिए, वो नहीं हो पा रही है। अभी खोजी पत्रकारिता और नयापन की इसमें कमी है। अभी मेरे से जितना हो पा रहा है, उतना मैं कर रहा हूं। लेकिन मेरे भी संसाधनों की कमी और वैचारिक स्तर के वजह से हाथ बंधे हुए हैं। मुझे वैचारिक स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। उर्दू अखबारों के पत्रकारों के माइंडसेट को बदलना पड़ेगा।
आपने सहारा में आजतक किस तरह के बदलाव किये ? आगे किस तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे ?
जब मैं यहां आया तो देखा कि इसके फ्रंट पेज पर खबरें होती थी कि इराक में क्या हो रहा है, ईरान और अरब में क्या हो रहा है? अक्सर होता है, जिस देश का अखबार हो उस मुल्क की खबर ही फ्रंट पेज पर लगे। यहां ऐसा नहीं था। सभी उर्दू अखबारों में होता था कि मुस्लिम मुल्कों में क्या हो रहा है? उन लोगों का सोचना है कि उनके पाठकों का इंटरेस्ट मुस्लिम मुल्कों में क्या हो रहा है, में ज्यादा है। लेकिन उनका सोचना गलत है। उनको पाठकों को उनके मुल्क की भी जानकारी देनी चाहिए। मैंने यहां आने के बाद यह नियम बना दिया है कि फ्रंट पेज पर खबरें केवल हमारे मुल्क की ही होंगी। हिंदुस्तान अपने आप में एक दुनिया है, उससे छह खबरें निकालना कौन सी मुश्किल बात है। खेल से जुड़ी हुई सामग्री को उर्दू अखबारों में इतनी तवज्जों नहीं दी जाती थी। मैंने पहली बार ओलंपिक हुए तो दो पेज एक्स्ट्रा करवाये। मैंने बिजनेस और इकोनॉमी का पेज शुरू किया। मैंने शब्दों के चयन में भी बदलाव किया है। मुझे इसका बहुत अच्छा फीडबैक मिल रहा है।

विस्तार की कुछ योजनाएं ?
अभी हम लोग हमारे दैनिक अखबार को और कई जगहों से शुरू करने की योजना बना रहे हैं। इस योजना के तहत अखबार के छह नये एडिशन लॉन्च किये जायेंगे। ये एडिशन कर्नाटक के हुबली, श्रीनगर, भोपाल, राजस्थान और यूपी से शुरू होंगे। आलमी सहारा को भी क्रॉस प्रमोशन करके लॉन्च कोशिश की जायेगी। हमने जो मार्केटिंग स्ट्रेटेजी बनाई है उसमे हिंदुस्तान के करीब पचास शहर जहां पर उर्दू पढ़ने-लिखने वाले लोग हैं, वहां हर एक प्लेटफॉर्म पर चैनल को दिखाया जायेगा। आने वाले समय में देश के सभी बड़े केबल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगा। इस जरिए से जो इश्यू मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाती, हम लोग उसे वहां दिखाने की कोशिश करेंगे।