26 Sep 2013

मिट्टी, मेहनत और पसीने की गंध में गुथी कविताएं

 लालदीप गोप

पक्ष



कितना अद्भुत
और बेहतरीन होता है
शासन और कथित संर्घष का
झक ­ झूमर खेलना
दाँतो तले उँगुली दबाये
कुर्सियो के कतारों के बाद पीछे बैठे लोग
जिनका गीत संगीत
अब अपने ही लोग
परोसने लगे है भेड़िये के सुर में
लय और ताल मिलाने लगे है
गढ़ने लगे है
तुर्को ­ कुतर्को के हजार ­ हजार आवरण
जहाँ सिर्फ पहुँच सकती हैं
गामा किरणें
खींच सकती है लकीरें
भेद सकती हैं उनका कवच
तय कर सकती हैं
हमारा और उसका
पक्ष।
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तुम्हारा लौटना



मैं छत से निहारता हूँ
सड़क को
जिसपर अनगिनत शक्लें
दिनभर की आकृति लिये
लौट रहे हैं
तुम नही लौटोगे
आज की शाम
अपने घर
अब तुम लौटने लगे हो
हमारी यादों में।
मैं इंतजार में हूँ
रात की जब
सुनसान सड़क में
सुन सकूँ
तुम्हारी कदमों की आहट
शायद सुबह तक
तुम लौट आओ
रोटियों की गंध से
जैसे तुम लौट आते थे
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खूंटी पर टंगी देह   



हर सुबह
चौराहे पर आकर
खड़ी हो जाती हैं
सैकड़ो देह
बेचने के लिए
दिनभर का श्रम
कुदाल, झौड़ी, करनी के साथ
ठेकेदार, मेठ, मुंशी लगाते है दाम
कुछ लौट जाते हैं
बिन बिके
जिनके बहुत पहले
बिक चुका है
खेत टाँड़।
नगरपालिका के कूडे़दान में
कुत्तो से लड़ते बच्चे
आखिर छिन ही लेते हैं
कचड़े से सना, बासी खाना
इस छिना झपटी में
देह पर
चिपक जाती है दाल।
अंतड़ियो के बल
खींचते साइकिल में।
कोयले के बोरे में
सिमट गई है
भूख और हक का संघर्ष
बिस्तर से अधिक सिलवरें
चेहरे पर उभर आई है
जो हर रोज
जीवन मृत्यु के जंग में
इक इबारत गढ़ रही है।
ये देहें
हर रात
खूँटी पर आकर टंग जाती हैं
बस इनकी आँखें
बिस्तर पर सो रही होती हैं।
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कारवाँ

उसकी डबडबाई आँखें
बारिश के थमने की तरह
शांत नही हैं

अब भी सवाल हैं
उसके अन्दर
आधी रात तक
हमारे इंतजार में
तारों को निहारती
जुगनुओं की चमक
अपनी आँखो में समेटे
देख रही है
सुनसान सड़क को
जिसपर कारवाँ गुजर चुका है।
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भूकंप

प्रकृति पर विजय के
झुठलाते वादे
अपने उपर होते
असंख्य अत्याचार के
बोझ को, उतारती धरती
गतिशीलता के नये दौर को
लिखती
निरंतरता के नये
आयाम गढ़ती।
हमने उजाड़े वन
नदी की निर्बाध गति को
बाँधा
बमों की मार से
किया घायल
खिसकने लगी
तेरी आंतरिक परतें
घटने लगी तेरी
आकर्षण और उर्जा
समेटने लगी तू
अपनी काया
उखड़ने लगे पाँव हमारे
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शहर में मौसम

बारिश की बंूदे
चूमती हैं फूलों का बदन
मिटती है प्यास
सूखी धरती की
तुम्हारी हँसी की तरह।
उठती है
सोंधी महक
इन बूंदों से
जैसे दिन भर
खटने के बाद
तुम्हारे पसीने में
होती है
खासी खुशबु।
आधी रात के
शहर की तरह
होती है तुम्हारी खामोशी
बारिश के बाद
खुले आसमान मे
खिली नर्म, गुनगुनी धूप में
तुम लौटती हो
अपने घर
सहेजती हो
एक नया सपना/कल के लिए
नई सुबह /नये मौसम में 
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गाँव के चौराहे पर पढ़ी गई कविता


इस बार कविता
गाँव के चौराहे पर पढ़ गई
यह कविता
दस साल की बच्ची
द्वारा पढ़ी गई
जिसका बाप
अभी - अभी साइकिल से
कोयला बेंचकर
लौटा है
थककर जमीन पर लेटा है
लेकिन देह से
पसीना अब भी
बह रहा है
और नमक धरती सोख रही है।
जिसकी माँ
खदान मेें कोयला
निकालने के दरम्यान
चाल में दबकर
मर गई है
और चौराहे पर बहस
कोल ब्लॉक आबंटन पर जारी है बच्ची की कविता में
उसकी माँ है
शहर गई बहन है
और जंगल से नही लौटा
उसका भाई है।
इस बार कविता
गाँव के चौराहे पर पढ़ी गई
बच्ची की कविता में
गर्भ में मारी गई
उसकी सहेलियाँ हैं
जो उसके सपने में
खेलती हैं
झुमर कित - कित
उसकी कविता में देश और दुनिया है
जो मुनाफे के बाजार में नीलाम हुए जा रही है
और इंसान रोबोट में
तब्दील हो रहे हैं
जबकि लड़की की कविता

कहती है कि
अब रोबोट में भी
भावना और संवेदना की
प्रोग्रामिंग की जा रही है।
यह कविता अभी - अभी
गाँव के चौराहे पर पढ़ी गई है
और यह खबर
अमेरिका तक पहँुच गई है
हालाँकि बच्ची का बाप
अब भी जमीन पर
बेसुध पड़ा है।
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आखिरी बार

धरती घूमते - घूमते
बहुत दूर निकल आई है
सूरज दूर छूट गया है
पहाड़ी को पार कर
लौट आई है
छोटी बहन
स्कूल से बकरियों का लेकर
ज्ंागल से अब तक
नही लौटी है माँ
बाबूजी ढूढ़ने गये हैं
जंगल में
छोटी बहन बताती है
और बेलने लगती है
रोटी
मैं खरकन खोलता हू
होऽऽ हीऽऽ लीऽऽऽ
एक - एक कर
घुसने लगती हैं
बकरियाँ
माँ बड़बड़ाती है
कल से जंगल
नही जाँएगी बकरियाँ
मैं असमंजस में पूछता हूँ
क्यों ?
कल  से डोजरिंग होगा
खदान खुलेगा वहाँ
आखिरी बार हमदोनों
जी भरके देख रहें थे
जंगल को
और पेट भरके बकरियाँ
माँ का गला भर आया था।
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जंगल लाल हो गया है


पत्तों ने खो दी है
हरियाली
धूसरित हो गया है
ज्ंगल
पलाश, सेमर के
टह - टह लाल फूल
और पांकैर के लाल पत्तों के आगोश में
लहक रहा है जंगल।
आम, साखु और कटहल के मंजर से
महमहाता जंगल
कोरैया फूलों की सादगी समेंटे
दुधिया चांदनी रात में नहाई नदी
गाना चाहती है
अपना आदिम गीत
भूख के भय से परे।
चोट के बजाय
अंडो से चूजे
निकलना चाहते हैं
ठीक वक्त पर
अपने चोंच से फोड़कर
नदी के रेत के कणों मे
भरा रहे पानी
जैसे दूब हर बारिश के बाद
धरती को ओढ़ा देती है
अपनी चादर।
मेरे गाँव की औरतें
जा रही हैं
पहाड़ी के नीचे उतरते सूरज से
थोड़ा रसम लेने
तकि लगा सकें आग जंगल में
लपटें छू ले आसमान
और लौट जाएँ शिकारी
ताकि चुन पाएँ
वे महुआ के फूल।
परिचय

जन्म तिथि   -  05/01/1980
शिक्षा            -  एमएससी एवं पोस्ट ग्रेजुएट डिपलोमा इन हूमन राइटस
प्रकाशित रचनाएँ  -  ‘‘तीसरी दुनिया के देश और मानवाधिकार‘‘
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता कहानी एवं आलेख    प्रकाशित
संप्रति एवं पता    -   डिपार्टमेंट ऑफ पेट्रोलियम इंजिनियरिंग
आई0 एस0 एम0 धनबाद झारखण्ड
पिन न0 - 826004
मोबाईल न0 - 07677419434