10 Jan 2014

खतरे में हैं आदिम युग की कलाकृतियां


लालदीप गोप पेशे से वैज्ञानिक हैं। मगर साथ ही एक प्रतिबद्ध संस्कृति और कलाधर्मी भी हैं। कविताएं लिखते हैं और बराबर दौरे पर रहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने हजारीबाग जिले के हेसालौंग गांव का दौरा किया है। वहां कुछ कलाकृतियों को उन्होंने खोजा है। लालदीप का मानना है कि ये कलाकृतियां आदिम युग की हैं। सच्चाई जो भी हो इतना तो तय है कि ये कीमती अक्श हमारी धरोहर है। इनकी रक्षा होनी चाहिए। मगर ये नहीं हो रहा है। हमारे लिए चिंतित होने का यही कारण काफी है  -
 जेब अख्तर 

आश्विन का महीना बीतने को है। धान के दाने अब गोलाई ले रहे हैं। कहीं-कहीं तो खेत में धान फूट कर झार हो गया है। बारिश के बाद खुले आसमान में सिमटे है बगुले की तरह सफेद बादल। आसमान का नीलापन जंगल की हरियाली के साथ एकाकार हो रहा है। दूर-दूर तक चीजें बहुत साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। सूरज की किरणें कोमल पत्तों पर सोने की आभा भर रही हैं। जंगल के आखिरी छोर पर टेढ़ी-मेढ़ी मरेंगगडा नदी बह रही है। जिसके किनारे कहीं-कहीं कोयले की खुदाई भी हो रही है। यह नदी जहां करवट लेती है, वहीं विशाल चटटानों में दर्ज है कुछ कलाकृतियां  जो आदि मानव के होने की सबूत बयां करती हैं। जिसे यहां् के ग्रामीण ‘लिखनी‘ के नाम से पुकारते हैं।
इसी स्थान पर लुरंगा पहाड़ से निकलती है मरेंगगडा नदी। यह नदी हजारीबाग जिले के डाडी प्रखंड में पड़ती हैं। कुर्रा, खपिया, रिकवा, अमडेलवा, मिश्राइल, मोढा, डाडी, होसिर सतकडिया (नदी टोला) होते हुए हेसालौंग में मिलती हैं। आगे बढ़ते हुए यह दुमुहान (रेलीगड़ा) में दामोदर से जा मिलती है। उस नदी में कुछ सहायक और नाले की तरह छोटी-छोटी सहायक नदियां भी मिलती हैं। भलवाही टोंगरी से बहते हुए एक नाले के आकार की नदी होसिर में मिलती है। वहीं नापो नदी जो हेसालौंग (केंदयालेढ) से निकलकर गांव के आखिरी सीमाने पर धोर धोरवा होते हुए मरेंगगडा में मिलती हैं। आज भी अगरिया और असुर जनजाति के पोटा मोढा टोला एवं मरेंगगदा नदी के किनारे सतकडिया (नदी टोला) के टांड में मिलते हैं। हेसालौंग में मेगालिथ पत्थर जहां-तहां खड़े होकर गांव की पहरेदारी करते दिखाई देते हैं। अब इन पर राज्य के पथ निर्माण विभाग के की ओर से निशान लग चुका है। इसका अर्थ हुआ अब इन्हें यहां से कभी भी तोड़ कर हटाया जा सकता है। मरेंगगड़ा नदी में ही गर्म जलकुण्ड भी है जो गंद्यवनिया में है। जहां हर साल मकर संक्राति का भव्य मेला भी लगता है।
गांव के बुजुर्ग जगदीश महतो जो अब 84 साल के हैं बताते हैं कि कभी थड़पखना के अगल-बगल में हल चलाने पर कभी-कभी लोहे से बने चिल्ही, चटुआ निकलते थे, वहीं ‘लिखनी‘ के संदर्भ में कहते हैं कि उनका जोड़ीदार और लोकगायक कोल्हा महतो लिखनी के ‘दह‘ में अपने भैंसो को पानी पिलाने के लिए ले जाया करते थे। और वहीं चट्टान के उपर बैठकर सोहराय और चॉचर गाया करते थे। तब बहुत जंगल बहुत घना हुआ करता था।
एक बार बाघ को अपनी लाठी के बल पर कोल्हा महतो ने खदेड़ दिया था। सतकडिया (नदी टोला) के बाबूलाल मांझी जो 102 साल के हैं, उन चित्रों को ‘झझरा‘ जैसा बोलते हैं। वह भी कहते हैं कि कोल्हा महतो यहाँ गीत गाता था। दंत कथाओ के अनुसार जब बिरवा ‘उढार‘ करता था तो वह अपनी प्रेमिका को इसी गुफा में रखता था। जिस पर कुछ कलाकृतियां ‘कोहबर‘ के रूप में भी हंै। इसलिए इसे लिखनी कोहबर के नाम से भी जाना जाता है। कुछ चित्र में मानव को जानवरों का शिाकार करते हुए दिखाया गया है। उससे पता चलता है कि आदि मानव यहां शिकार किए गए पशुओं को यहां खाते रहे होंगे क्योंकि नदी यहीं पर मुड़ती हैं, इसलिए पानी दूर तक फैला रहता है। शायद चांदनी रात में या आराम के पलों में मानव ने इन पत्थरों पर अपना इतिहास इन कलाकृतियों के माध्यम से दर्ज किया हंै। मनुष्य की भूख जब मिटती है तो वह सृजन की तरफ अग्रसित होता है। अपने समय और संस्कृति को अपनी रचनाओं में दर्ज करता है।
यहां उकेरे गए कुछ चित्र तो घड़ी के आकार में भी हैं। ठीक ऐसी ही आकृति ग्रीक में पायी गयी है। जिससे तारों और ग्रहों की गति की गणना की जाती थी। अब ये नहीं कहा जा सकता कि इन दोनों में से सर्वाधिक पुरानी कलाकृति कहां की है।
यह चट्टान बलुई पत्थर से बने हैं। इसलिए नदी के तेज बहाव और पानी भरने के कारण बहुत सारी कलाकृतियां मिट चुकी है। बाकी कोर कसर आसपास फैले गिद्दी ‘सी‘ परियोजना की कोयला खदानों ने पूरा कर दिया है। इसी स्थान पर बारूद की स्टोरिंग भी की जा रही है। आए दिन होने वाले कोयला खदानों में विस्फोट ने तो इन चट्टानो का सीना झकझोरा ही है। और बाकि ओबी (ओवर बर्डन, के रूप में पत्थर, मिट्टी, कोयला) को लाकर इन चट्टानों के ऊपर डाल दिया गया है। जिससे नदी का रास्ता भी संकरा हो गया है। ऐसे में बारूदी विस्फोट, ओबी और पानी के तेज बहाव में इन बचे- खुचे चित्रों के भी समाप्त हो जाने का खतरा हैं। नदी टोला (सतकडिय़ा) को विस्थापित किया जा रहा है, गिद्दी ‘सी‘ की कोयला खदाने फैलते-फैलते नदी टोले बनते जा रहे हैं।
यह गांव संताल बहुल है। मगर जिस तरह से गांव के अस्तित्व पर खतरा मंडरा है लगता है अब देश के मानचित्र पर इसका वजूद चंद सालों के लिए ही है। पास ही के विनोबा भावे विश्वविद्यालय से शोधार्थी आते हैं और इन कलाकृतियों को देखकर चले जाते हैं। लेकिन किसी ने इसे बचाने की गुहार नही की है। इस अद्भुत कलाकृति, मानव सभ्यता के इतिहास एवं विरासत को बचाने के लिए कुछ स्थानीय कृष्णा गोप, शिावनंदन एवं उसके जैसे युवा प्रयासरत हैं। लेकिन निजी स्तर पर किए जाने वाले ये प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। अब तो खबर यह भी आ रही है कि इन कलाकृतियों को कुछ शातिर बेचने में भी मशगूल हो गए हैं।







परिचय
जन्म तिथि   -  05/01/1980
शिक्षा            -  एमएससी एवं पोस्ट ग्रेजुएट डिपलोमा इन हूमन राइटस
प्रकाशित रचनाएँ  -  ‘‘तीसरी दुनिया के देश और मानवाधिकार‘‘
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता कहानी एवं आलेख    प्रकाशित
संप्रति एवं पता    -   डिपार्टमेंट ऑफ पेट्रोलियम इंजिनियरिंग
आई0 एस0 एम0 धनबाद झारखण्ड
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