27 Jul 2013

आमिर खान का सेंस ऑफ बिजनेस- आमिर से गजेंद्र सिंह भाटी की बातचीत

उस वक्त उन्होंने सत्यमेव जयते(तब नाम तय न हुआ था) और अपने टेलीविजन में आखिरकार प्रवेश करने के बारे में पहली घोषणा की थी। कम्युनिकेशन या सम्प्रेषण की कला में तो वह माहिरों के माहिर हैं ही। इसलिए बात करने में मिलनसार, मृदुभाषी, मुस्काते हुए और चतुर लगने ही थे। लगे भी। हालांकि इस आभा में कितना अभिनय था और कितनी असलियत ये जानता था। पर इतना भीतर तक व्यक्तित्व विश्लेषण में जाने की कोई वजह नहीं थी। हालांकि जाना। पर ये विश्लेषण बातें करने या लिखने में यहां थोपूंगा नहीं। तो इस दौरान उन्होंने सामूहिक सवालों के चतुराई से जवाब दिए और बाद में मार्केटिंग को लेकर अपनी समझ शायद पहली बार इतने विस्तार से बताई। (जो शायद आप सिर्फ यहीं पढ़ पाएंगे)। मैं नहीं समझता कि जो लोग फिल्में बनाना चाह रहे हैं, या बना रहे हैं या फिल्म लेखन के लिहाज से हैं, उन्हें प्रचार करने की मानसिकता पर इतनी बेहतरीन सीख मिल पाएगी। क्योंकि आमिर ने अपनी हर फिल्म के साथ दर्शक खींचकर दिखाए हैं। चाहे उन्हें बरगलाकर या चाहे ईमानदारी से।


लोगों नेथ्री ईडियट्स देखी।गजनीके वक्त पहली बार मार्केटिंग में फिजीकल प्रयास होते देखे। सिर मुंडाए गजनी के पुतले तो थे ही, साथ ही सिर मुंडाए लड़के भी मल्टीप्लेक्सेज में खड़े किए गए। आमिर खुद इसी लुक में जगह-जगह गए।डेल्ही बैली में उनका पैसा लगा था। उन्हें पता था कि लगान, सरफरोश और थ्री इडियट्सजैसी फिल्मों से उन्होंने एक संदेश देने वाले सामाजिक स्टार की जो छवि इतने वक्त में बनाई है, वो ‘डेल्ही बैली’ में इस्तेमाल हुई अभद्र भाषा और इशारों की वजह से रिसेगी। पर उसमें भी उन्होंने दिमाग लगाया। टीवी पर ट्रैलर्स के साथ ऐसे प्रोमो आने शुरू हुए जिनमें वह सीन में आते हैं और सोफे पर बैठ अपने दर्शकों को संबोधित करना शुरू करते हैं। वह करते हैं कि मैंने इतने साल में जो इज्जत कमाई है वो ये लड़के (इमरान, वीर, कुणाल) डुबोने वाले हैं। क्योंकि इस फिल्म में ऐसे बहुत से शब्द और सीन हैं जो बच्चों और फैमिली के देखने लायक नहीं हैं। बाद में तीनों एक्टर उनके पास आकर बैठते हैं। उनसे बात करते हैं कि आमिर भी चिढ़कर गाली देने लगते हैं। फिर कहते हैं सॉरी।

... तो ये उनका फंडा बड़ा चला। जनता की अदालत में बरी भी हो गए फिल्म की अश्लीलता को स्वीकार करके और फिल्म चल गई तो प्रॉड्यूसर के तौर पर खूब पैसे भी बना लिए। ये नमूना है उनके प्रचार करने के अनूठे तरीकों का। पीपली लाइव के वक्त फिल्म में एक किरदार पान-चिप्स की दुकान के आगे खड़ा होकर आमिर खान को मार्केटिंग और फिल्में चलाने का ज्ञान दे रहा होता है। लोगों को ये अनूठा लगा कि देखो जिसकी फिल्म है, उसी की इतनी खुलकर टांग कोई फिल्म में खींच रहा है। इस दौरान अपनी व्यक्तिगत रणनीति के तहत वो गुम हो गए। बोले ढूंढ के दिखाओ कंपीटिशन है। कोई खोजे तो सही। वो इंडिया के अलग-अलग हिस्सों में भेष बदलकर घूमते रहे और वीडियो वेब पर अपलोड करते रहे। इस तरह के किस्से खूब हैं। उनका मार्केटिंग मिजाज कयामत से कयामत तक के वक्त से है। जब वह पैदल भागकर ऑटो, टैक्सी, बस स्टैंड और मुंबई में जगह-जगह पोस्टर लगा रहे थे और लोगों से उनकी फिल्म देखने आने के लिए कह रहे थे।

अब जब बारी टीवी की आई तो उन्होंने बड़ी पूर्व स्थिति में ही लोगों को अवगत करवा दिया कि मैं टीवी पर आ रहा हूं, और इस स्ट्रॉन्ग और पावरफुल मीडियम का मुझे सही और अच्छा इस्तेमाल करना है। उनके ये कहने के कुछ महीने बाद कल अप्रैल की दो तारीख को प्रमोशन के दूसरे चरण के तहत तीन स्मार्ट वीडियो ‘सत्यमेव जयते’ की वेबसाइट (कुछ घंटे पहले ही) बनाकर अपलोड कर दिये गए।

पहले प्रोमो में वह घर में बालकनी सी किसी जगह में बैठे थाली में कुछ निवाले लिए, खाना खाते हुए, कह रहे हैं, आजकल इतना कियोस है. इतने चैनल्स, इतने टीवी चैनल्स, मीडिया। हम लोग एक दिन देखते हैं, दूसरे दिन भूल जाते हैं। आंखों से मत देखो, दिल से देखकर देखो। शो का नाम होना चहिए, दिल से देखकर देखो (आखिर में अंगुलियां चाटते हुए गुनगुनाते हैं, दिल देके देखो, दिल देके देखो...) इस पहले प्रोमो को उन्होंने बड़ा हल्का और गैर-प्रोमो जैसा रखा है। वह किससे बात कर रहे हैं ये नहीं दिखाया गया है। वह जनता को बोल रहे हैं, पर अप्रत्यक्ष तौर पर। उनकी थाली स्टील की है। आमतौर पर स्टार लोग स्टील की थाली में यूं ही घर में कहीं भी बैठकर खाना खाते होंगे, ये धारणा बन नहीं पाई है। यहां इस चीज को भुनाया गया है। दूसरा, थाली खाली ही है। दो निवाले हैं बस। खैर, इस पर दर्शक की नजर भी कहां जाती है। प्रोमो की स्क्रिप्ट बड़ी सीधी, सरल और छोटी है। मीडिया के जरिए ही प्रचार कर रहे हैं। कह रह हैं, हर दूसरे दिन जनता पहले को भूल जाती है। इसी भूल जाने – न भूल जाने के क्रम में ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि उनके प्रोग्रैम का प्रोमो लोगों को याद रहे। आखिर में लाइन तो ये आ रही थी कि दिल से देखो। जो अब एक महा घिसीपिटी लाइन फिल्मों में हो चुकी है। कि दिल से करो, दिल से देखो, दिल से सोचो, दिल से फैसला लो, दिल की सुनो। न जाने क्या-क्या। यहां ये किया गया कि दिल से देखो की बजाय आमिर कहते हैं दिल से देखकर देखो। फिर कहते हैं प्रोग्रैम का नाम भी यही होना चाहिए था। हो सकता था, बिल्कुल, किसने रोका था। आप ही बनाने वाले, पैसा लगाने वाले। पर ये तो बातें हैं साहब।
दूसरा प्रोमो कुछ यूं है कि यहां वो संभवतः अपने दोस्तों के साथ (या सत्यमेव जयते बनाने वाली टीम के सा, जिसमेंजॉकोमॉनके डायरेक्टर सत्यजीत भट्कल भी हैं, जिनसे मैं मिला था और तब उन्होंने प्रोग्रैम के बारे में कुछ भी बताने से मना कर दिया था। और, दोपहर के खाने की प्लेट थामे वहडेल्ही बैलीपर मेरे ख्याल जान रहे थे। उन्हें पसंद आई ये फिल्म, मुझे जिन आचार संहिता वाली वजहों से नापसंद आई उनपर टिप्पणी देते हुए खाना खा रहे थे। मैंने कहा फैमिली नहीं देख सकती साथ, वो बोले तो क्या हुआ। फैमिलीज को बदलना चाहिए मैंने कुछ गुस्से में कहा, भारत को किस तरह बदलना चाहिए या क्या करना चाहिए या उसका मनोरंजन कैसा हो ये मुंबई क्यों तय करे जाहिर है, वो जरा खफा हुए।) घर के किसी कमरे में बैठे हैं। उनका एक दोस्त कहता है, अरे आमिर, यार इतना रुलाएंगे क्या पब्लिक को?” आमिर कहते हैं, उल्टा बोल रहा है तू, रोने दे पब्लिक को, गुस्सा आने दे। (यहां कॉफी या ब्लैक टी का सिप लेते हुए..) एंटरटेनमेंट का मतलब ये थोड़े ही है कि बस हंसाते रहो। दिल पे लगनी चहिए। दिल पे लगेगी ना, तो बात बनेगी। अंत मैं चलते-चलते अपनी पिछली तमाम बातों से बेपरवाह होने के अभिनय के साथ (लोगों यहीं आप लोग बनते हो) वह बड़बड़ाते हैं, शक्कर नहीं डाला इसमें (मग में देखते हुए)। तो बड़ा सिंपल है इसका विश्लेषण करना। ‘सत्यमेव जयते’ में अपनी कहानियों के साथ आमिर के सामने बैठने वाले लोग खूब रोने वाले हैं, साथ में हरसंभव है कि आमिर भी आंसू बहाएंगे। सच्चे-झूठे का नहीं कह सकता है, पर एक एक्टर अपने भीतर के एक्टर को नहीं निकाल सकता। दूसरा मानव मन भी तो वैसा ही है न, सामने वाले के मन की बात निकलवाने के लिए पटाकर उसके दिल में घुसता है। कुछ अपनी गम भरी कहानी सुनाता है। सामने वाला आश्वस्त हो, उसे खुद सा समझ अपनी निजी जिंदगी उसके सामने उघाड़कर रख देता है। आसुंओं का सैलाब आता है। एंकर आमिर ये सैलाब निकलवाएंगे भी और उन्हें इसके संभालना भी होगा।
तीसरा वीडियो भी घर में शूट हुआ है। इसमें भी टीशर्ट पहने वह घर में कहीं सोफे पर बैठे हैं। अपनी बिल्ली के माथे पर अंगुलियां फिरा रहे हैं। कह रहे हैं, मैं क्या चाह रहा हूं कि अम्मी और जो हमारे घर में काम करती हैं , फरजाना, वो दोनों साथ में बैठकर ये शो देखे। मेरे रिश्तेदार बनारस में, किरण के पैरेंट्स अम्मा-अप्पा बैंगलोर में (यहां उनकी आंखें तीनों प्रोमो में से पहली बार कैमरे के लेंस में सीधा देखती है, यानी हमारी तरफ) एक साथ बैठ कर देखें। हाथ में चाय के पारदर्शी कप को होठों के करीब लाते हैं, फूंक मारकर सिप को कुछ ठंडा करते हैं, तभी मुट्ठी बांधकर ऊपर लाकर कह उठते हैं, सबका अपना शो हो। हर जिंदगी से टकराए। इस प्रोमो के पीछे के संकेत ये भी हैं कि चूंकि स्टार ग्रुप के तमाम चैनलों पर (कम से कम आठ) ‘सत्यमेव जयते’ एक वक्त पर एक साथ टेलीकास्ट होगा। जाहिराना तौर पर प्राइम टाइम में ही, ताकि सब लोग साथ देखें। तो यहां उन्होंने विज्ञापन की शक्ल में लोगों को ये घुट्टी पिलाई है कि मेरी अम्मी, घर में काम करने वाली फरजाना, किरण (डायरेक्टर धोबी घाट, आमिर की दूसरी बीवी) के बैंगलोर में बैठे अम्मा और अप्पा सब साथ बैठकर ये शो देखेंगे और ये हर तरह के आदमी की जिदंगी को कहीं न कहीं छूएगा। तो जरूर देखें।
तीनों प्रोमो इतने हल्के और गैरइरादतन अंदाज में बनाए गए हैं कि लोगों को भनक भी नही लगेगी कि कितनी आसानी से इस प्रोग्रैम सत्यमेव जयते को देखने का मन आपमें अबूझे ही बन चुका होगा। ये सारी बातें इस कार्यक्रम या आमिर पर कोई टिप्पणी नहीं हैं, बल्कि मार्केटिंग के गर्भ को समझने की कोशिश है। आप लोग समझें। समझेंगे तो कोई आपके मनोरंजन के टेस्ट के साथ खेल नहीं सकेगा। चूंकि ये प्रोग्रैम टीवी पर जब जून में आना शुरू होगा तो बहुत भीड़ खींचेगा। और उस दौरान होता यही है कि दुनिया की भेड़चाल शुरू हो जाती है। सब की देखादेखी आप भी कोलावेरी डी चबाने लगोगे, वो भी स्वेच्छा से नहीं, अप्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक आंधी के बहाव में। तो विश्लेषण करिए।

मुंबई में आमिर से मिलने के दौरान वहां मौजूद स्टार इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ उदय शंकर ने एक टिप्पणी की जो नई बात बताती है। उन्होंने आमिर के साथ काम करने के अनुभव पर कहा, मैं अपनी पूरी लाइफ में इतना चैलेंज्ड नहीं हुआ जितना आमिर के साथ काम करते हुए। मैंने मीडिया में एक ट्रैनी की तरह काम शुरू किया था। डरते हुए हर दिन मीटिंग में घुसता था, अभी आमिर के साथ मीटिंग करनी हो तो वैसे ही डरते हुए घुसता हूं। क्योंकि जिन चीजों के लिए मैं लगातार आश्वस्त रहा हूं कि ये तो ऐसे ही होता है, आमिर के साथ मीटिंग में पांच-पंद्रह मिनट में ही लगता है कि नहीं ये ऐसे नहीं होता है। मेरे सारे पूर्वानुमान और धारणाएं ध्वस्त हो जाती। उदय मीडिया की दुनिया में आगंतुकों और महत्वाकांक्षियों के लिए आदर्श हैं। कैसे स्टार न्यूज से होते हुए वो मार्केटिंग और बेचने की कला में सिद्धस्त हुए और बड़े ओहदे पर पहुंचे।
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खैर, इन तमाम बातों के बाद हम पहुंच गए हैं, उस बातचीत पर जो सबसे खास है। आलोचनात्मक होने के बाद अब समझने के नजरिए में घुसे तो बड़ी रोचक फिलॉसफी आमिर खान की है, प्रचार करने के तरीकों को लेकर। अपनी फिल्मों को आर्ट और कमर्शियल कहे जाने को लेकर। गौर से पढ़िए और एक सिद्ध फिल्मकार-एक्टर के वाकिफ होइए। उनके बातचीत के कुछ अंश:

आपकी मार्केटिंग शैलियों की बड़ी बातें होती हैं। विस्तार से बताएंगे कि प्रचार पर आपकी समझ क्या है, हर बार नया आइडिया कैसे ले आते हैं, जो चल भी पड़ता है?
....जब आप मुझे कहें कि अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा वाकया सुनाओ, और यहां समझो पार्टी चल रही है, और हम लोग म्यूजिक सुन रहे हैं, खाना-वाना खा रहे हैं और आपको मैं बोलता हूं कि “यार कोई अपनी जिंदगी की कोई अच्छी कहानी बताएं”। तो आप सोचेंगे कि क्या बताऊं और फाइनली आप कहेंगे कि “यार हां, एक दफा मैं कैलकटा में था और वहां ये ये ये ये हुआ”। और आप अपनी कहानी ऐसे सुना देंगे। अब जरा कुछ अलग सिचुएशन की कल्पना कीजिए। कल्पना करिए कि वही पार्टी चल रही है, म्यूजिक चल रहा है, लोग खाना खा रहे हैं, वही जगह है। घंटी बजती है, एंड यू एंटर! मैं गेट खोलता हूं और आप आते हैं, कहते हैं “आमिर यू वोन्ट बिलीव वॉट हैपन्ड (तुम यकीन नहीं करोगे मेरे साथ क्या हुआ)! ऐसी अविश्वसनीय चीज मेरे साथ हुई। अरे, म्यूजिक बंद करो यार, मेरी बात सुनो तुम लोग”। .. वॉट योर डूंइग ऐट दैट टाइम इज मार्केटिंग (इस वक्त आप जो कर रहे होते है वही मार्केटिंग है)।

लोग मुझे हमेशा पूछते हैं कि आप नए डरेक्टरों के साथ काम करते हैं। या उन डरेक्टरों के साथ काम करते हैं जिनकी फिल्में अब तक कामयाब नहीं हुई हैं। और, आपके साथ वो इतनी कामयाब हो जाती हैं। तो क्या आप घोस्ट डायरेक्ट करते हैं? बिल्कुल, मैं घोस्ट डायरेक्ट नहीं करता हूं। मैं अपने काम का क्रेडिट किसी को नहीं दूंगा, बड़ा क्लियर हूं इस बारे में। तो कैसे वो फिल्में अच्छी बनती हैं, उसकी ये वजह है।

यहां मैंने दो चीजें कही हैं आपको।

एक ये कि डायरेक्टर वो होता है.. काम तो बहुत लोग जानते हैं, कैमरा कहां रखना है? एडिटिंग कैसे करनी है?.. टेक्नीकल चीजें बहुत सारे लोग जानते हैं और मैं आपको दस दिन में सिखा दूंगा। लेकिन क्या आपके पेट के अंदर कहानी है जो बाहर निकलने के लिए उछल रही है। वो आपको अच्छा डायरेक्टर बनाती है। तो जब आप दरवाजे से अंदर आते हैं और बोलते हैं “यार (ताली पीटते हुए), क्या मेरे साथ हुआ है, आप लोग बिलीव नहीं करोगे!” तो आपके अंदर एक कहानी है जो आप बोलना चाह रहे हो और वो आप अच्छी तरह बोलोगे। आप तरीका निकालोगे कि किस तरह अच्छी बोलूं। और जब लोग आपकी कहानी नहीं सुनेंगे और अपना खाना खाएंगे और म्यूजिक सुनेंगे तो आप सबसे बोलोगे, अरे म्यूजिक बंद करो यार! अरे नितिन मेरी बात सुन यार! सुन मेरे को। तो आप जो लोगों का ध्यान अपनी तरफ करोगे, वो क्या है, वही तो मार्केटिंग है।

तो ये मैंने बड़ा सिम्प्लीफाई करके बोला है। तो मैं फिल्में वही करता हूं जिसमें लगता है कि यार मजा आएगा करके। और, डायरेक्टर वो होता है, जिसकी कहानी होती है, जो कहानी बोलने के लिए तड़प रहा है, उसको मैं चुनता हूं। और जब तैयार होती है तो हम सब एक्साइटेड हैं और सबको बोलते हैं कि यार म्यूजिक बंद करो हमारे पास अच्छी कहानी है। वो ही तो मार्केटिंग है, और क्या मार्केटिंग है? आप समझे। तो वो एक्साइटमेंट हममें है, क्योंकि वो चीज हमनें बनाई है जो हम बनाना चाहते थे, और अब जो प्लेटफॉर्म अवेलेबल है उसका मैं इस्तेमाल कर रहा हूं। सब लोग कर रहे हैं मैं भी कर रहा हूं।

लेकिन फर्क क्या है? फर्क ये है कि मैंने कुछ बनाया है जिसके बारे में मैं एक्साइटेड हूं। अब आप ये सवाल जब ‘थ्री इडियट्स’ से पहले मुझे पूछते हैं तो कहते हैं यार ये क्लेवर जवाब दे रहा है। लेकिन अब आप सोचिए। ‘थ्री इडियट्स’ मैं बना चुका हूं। मैंने फिल्म देख ली। मैंने क्या बनाया मुझे मालूम है। हम सब ने एज अ टीम क्या बनाया है हमको मालूम है। अब हम उसको मार्केट करते हैं। तो हमारी एक्साइटमेंट लेवल जाहिर है एक लेवल की होगी और आप तक पहुंचेगी ही पहुंचेगी। और उसका और कुछ हो नहीं सकता।

इसमें स्ट्रैटजी...
स्ट्रैटजी इसमें कहां है भैया। यू गो विद योर हार्ट। जब मैंने और मेरी टीम ने ‘तारे जमीं पर’ बनाई है तो हम जानते हैं कि हमने क्या बनाया है। वी आर एक्साइटेड अबाउट इट। हां, हम नर्वस भी हैं क्योंकि कोई नहीं जानता आखिर में फिल्म कैसी होगी? लेकिन हम जानते हैं कि हमने जो बनाया है वो बहुत अच्छा मटीरियल है। जिस तरीके से आप मार्केट करते हैं वो आपको फील होता है, चाहे वो प्रोमो के थ्रू हो, चाहे वो गाने के थ्रू हो, चाहे वो इंटरव्यू के थ्रू हो। हर बार इनटेंजिबल कोई चीज है जो आपको टच करेगी।रंग दे बसंती आप ले लीजिए, लगान आप ले लीजिए। ये सब अलग-अलग वक्त थे। ‘लगान’ तो... मैं अब 12 साल की बात कर रहा हूं। मैं तो अपनी फिल्मों को शुरू से मार्केट करता आ रहा हूं। तब कोई टेलीविजन नहीं था, हम इसे छायागीत पर दिखाते थे। छायागीत पे हमने दिखाया था कयामत से कयामत तकका गाना। तब कोई एंटरटेनमेंट चैनल नहीं था तो हम कैसे बताएं लोगों को? अंततः हम एक्साइटेड हैं और वो हमारी एक्साइटमेंट आप तक पहुंच रही है। देखिए, हर फिल्म का प्रोमो आता है। ऐसी तो कोई फिल्म नहीं है जो हमने ताले में बंद करके रिलीज की है। या किसी भी प्रोड्यूसर ने। हर फिल्म का प्रोमो आता है, हर फिल्म का प्रेस कॉन्फ्रेंस होता है, हर फिल्म म्यूजिक रिलीज करती है। जो नॉर्मल मार्केटिंग जिसको कहते हैं वो हर आदमी करता है वो मैं भी करता हूं। क्यों लोग एक फिल्म को देखते हैं और एक फिल्म को नहीं देखते?

जिस तरीके से आप मार्केट करते हैं...
इट्स नॉट द वे यू मार्केट द फिल्म। आप गलत बोल रहे हैं। आप मुझे क्रेडिट मत दो, आप गलत आदमी को क्रेडिट दे रहे हो। मैं बोल रहा हूं, उस मटीरियल में एक चीज है जिसकी वजह से मैं इंस्पायर हो रहा हूं। अब मैं उछल रहा हूं, मैं क्या करूं। मैं इतना एक्साइट हो रहा हूं कि वो आप तक पहुंच रहा है। इसमें (फिल्म या कंटेंट) अगर पावर नहीं है न, तो वो मुझमें नहीं आएगा। तो मैं भी बुझा-बुझा सा रहूंगा और आपको भी लगेगा कि यार इस दफा कुछ एक्साइटेड नहीं लग रहा है। अभी जिस शो में काम कर रहा हूं, मैं एक्साइटेड हूं इस शो के बारे में। क्योंकि इस दफा मैं कुछ अलग कर रहा हूं, हो सकता है मैं फेल हो जाऊं। पर मैं एक्साइटेड हूं इसके बारे में इसी लिए तो कर रहा हूं।
तो मैं ये कह रहा हूं कि अगर अच्छी मार्केटिंग कर रहा हूं तो इसका मतलब ये नहीं है कि मैं क्लेवर हूं। आपको गलतफहमी हो रही है अगर आप ये सोचते हैं कि मैं क्लेवर हूं। आपको गलतफहमी हो रही है। मैं वही कर रहा हूं जो मुझे लगता है कि उस खास प्रॉडक्ट के लिए जरूरी है। ‘तारे जमीं पर’ की स्टोरी ही बिल्कुल अलग थी। मैं ‘तारे जमीं पर’ को वैसे मार्केट नहीं कर सकता था जैसे मैंने ‘गजनी’ को किया। ‘गजनी’ इज अ फिजीकल फिल्म। मेरे लिए मटीरियल हमेशा डिक्टेट करता है कि मैं कैसे मार्केट करूंगा फिल्म को। और, मटीरियल मुझसे खुद कहता है। मुझे उसके बाद सोचने की जरूरत नहीं पड़ती।

मौजूदा समाज को कैसे देखते हैं और ये कार्यक्रम उसमें कितना बदलाव लाएगा?
ज्यादा तो मैं क्या कह सकता हूं, पर ये जरूर है कि लाइफ में बदलाव आ रहा है। जब मैं लोगों से मिलता हूं तो मुझे लगता है कि खास किस्म का आइडियलिज्म लौट रहा है। ज्यादा से ज्यादा लोग ऊंचे लेवल की इंटेग्रिटी की लाइफ जीना चाहते हैं। और मैं यकीन भी करना चाहूंगा कि ऐसा हो रहा है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैं ही कोई बड़ा बदलाव ले आउंगा, पर बदलाव हो रहा है। मैं अपने स्तर पर कुछ करता हूं, हो सकता है उससे लोगों की जिदंगी में कुछ चेंज आता है, कुछ नहीं आता। पर मैं इसकी घोषणा नहीं करना चाहूंगा।

किस किस्म का काम करते हैं, परिभाषित कर सकते हैं? आर्ट, कमर्शियल, प्रायोगिक?
मेरे काम को एक शब्द में डिफाइन कर पाना बड़ा मुश्किल काम होता है। लोग पूछते हैं कि आपकी फिल्म आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल फिल्म। अब आप बताइए कि ‘तारे जमीं पर’ आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल फिल्म। अगर आर्ट फिल्म बोलूंगा तो डिस्ट्रीब्यूटर बोलेंगे किनहीं साहब! हमने तो बहुत बनाए हैं"। कमर्शियल फिल्म बोलूंगा तो क्रिटीक्स बोलेंगे कि नहीं साब! बड़ी आर्टिस्टिक फिल्म है"। अब रंग दे बसंती’... पोस्टर में आप देखिए कि घोड़े पे आ रहा हूं मैं, अब ये बताइए कि आर्ट फिल्म है कि कमर्शियल। जब मैंने ये फिल्म साइन की तो मेरी छोटी बहन का फोन आया। और उस वक्त भगत सिंह की कहानी चार बार आ चुकी थी, फिल्मों में। तो फरहत मेरी छोटी बहन है जो उसका फोन आया, कि क्या हो रहा है आजकल। तो मैंने बोलायार मैंने एक फिल्म साइन की है। तो मेरी फैमिली में काफी सेलिब्रेशन होता है जब मैं फिल्म साइन करता हूं। अरे, आमिर ने फिल्म साइन कर ली, मुबारक हो मुबारक हो! उन्हें बहुत कम दफा सुनने को मिलती है ये न्यूज। तो मेरी बहन ने बोला,अच्छा फिल्म साइन कर ली, कौन सी फिल्म साइन की। मैंने कहा, फिफ्ट रीमेक ऑफ भगत सिंह। तो वो बोली, नहीं नहीं हाउ कुड यू मेक फिफ्थ रीमेक ऑफ भगत सिंह। मैंने कहा नहीं, मैं तो कर रहा हूं। तो मैं कैसे डिस्क्राइब करूं।

टेलीविजन पर आजकल वही शो चलता है जिसमें तड़का लगा हो?
पता नहीं यार, पकवान भी अलग-अलग तरह के होते हैं। और, मैं तो बनाता ही अंदाजे से हूं। मेरी कोशिश ये रहती है कि उसका एक अलग डिसटिंक्ट स्वाद बरकरार रहे। अलग महक आए। वरना ये होता है कि हम जब कभी-कभी रेस्टोरेंट में जाते हैं, तो वहां हमको मसाला सेम मिलता है, हर डिश में वही मसाला है। यानी चाहे में बैंगन का भर्ता ऑर्डर करूं या कबाब, मसाला मुझे वही मिलना है। इसलिए मैं जो भी बनाता हूं कोशिश करता हूं कि उसमें अलग स्वाद आए, अलग महक आए। इस शो में भी वही कोशिश है करने की। आशा है लोगों को पसंद भी आएगा।

सत्यमेव जयते में क्या अलग है?
आज तक जितनी भी फिल्में मैंने की हैं, उनमें अलग-अलग किरदार निभाए हैं। और कुछ हद तक हर किरदार में आपको मैं भी कहीं न कहीं नजर आया होउंगा, पर ये पहली बार होगा कि मैं जो हूं, मैं जिस किस्म का इंसान हूं वैसा दिखूंगा, किसी टीवी शो के कैरेक्टर की तरह नहीं। पहली बार आपको आमिर खान यानी मेर पर्सनैलिटी देखने को मिलेगी।

खुद होस्ट बने हैं, आपका फेवरेट होस्ट कौन है?
बहुत सी चार्मिंग पर्सनैलिटी वाले लोग हैं। अमित जी, शाहरुख, रितिक, सलमान। मैं एक टाइम में सिद्धार्थ बासु के क्विज शो देखता था। खूब एंजॉय करता था। एक स्पोट्र्स होस्ट थे एस.आर. तलियाज, ऐसा ही कुछ नाम था उनका, जिन्हें मैं रियली एंजॉय किया करता था। वो अमेजिंग टेलीविजन होस्ट थे।

                                                                                  (फिलम सिनेमा ब्लाग से कॉपी पेस्ट)

‘मैं अपने जीवन के लिए लड़ी और जीती ’


सोहेला अब्दुलाली

जानी-मानी अंग्रेजी लेखिका सोहेला अब्दुलाली का यह लेख तीस वर्ष पहले 1983 में मानुसी में प्रकाशित हुआ था। उनके दो उपन्यास - द मैडमैन आफ जोगारे और ईयर आफ द टाईगर - प्रकाशित हैं। इनके अतिरिक्त बाल पुस्तकें, कहानियां, लेख, रिपोर्ट, ब्लॉग तथा स्तंभ भी लिखती रही हैं


तीन वर्ष पूर्व, जब मैं 17 वर्ष की थी, मेरे साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।

मैं, बंबई में बड़ी हुई, और वर्तमान में यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं। मैं बलात्कार पर एक शोधपत्र लिख रही हूं और कोई दो हफ्ते पहले ही मैंने सोच लिया कि शोध करना है। तीन वर्ष पूर्व उस दिन के पश्चात से ही मैं लोगों की भ्रांतियों को गहराई से समझ चुकी हूं जो बलात्कार से जुड़ी हैं, उन लोगों से जुड़ी हैं जो बलात्कार करते हैं, और वे जो बलात्कार होने के बाद जीवित बच जाते हैं। मैं इस कलंक को भी समझ चुकी हूं जो बलात्कार के जीवित बचे शिकार से जुड़ जाता है। समय-समय पर लोग कहते रहे हैं कि उस बहुमूल्य ‘कौमार्य’ को खोने से कहीं बेहतर होती है मौत। मैं इसे मानने को तैयार नहीं हूं। मेरे जीवन का अर्थ मेरे लिए इससे कहीं बहुत अधिक है।
मुझे लगता है कि कई स्त्रियां इस कलंक से बचने के लिए चुप रहती रही हैं, लेकिन अपनी इस चुप्पी के कारण बहुत अधिक संताप भोगती हैं। कई वजहों से पुरूष पीडि़ता को ही दोषी ठहराते हैं, और अंतर्निहित पुरूषसत्तात्मक मूल्यों के कारण, शायद एक भयानक संभावना से स्वयं को सुरक्षित रख सकने के एक तरीके के रूप में।
यह एक गर्म जुलाई की शाम को घटित हुआ। यह वह वर्ष था जब विभिन्न महिला संगठन बलात्कार के संबंध में बेहतर कानून की मांग कर रहे थे। मैं अपने मित्र राशिद के साथ थी। हम लोग पैदल घूमने चले गए थे और बंबई के चेंबूर, जो कि बंबई का एक उपनगरीय इलाका है, में घर से कोई डेढ़ मील की दूरी पर एक पहाड़ के किनारे बैठे थे। हम लोगों पर चार लोगों ने, जिनके पास एक हंसिया था, हमला किया था। उन्होंने हमें पीटा, हमें जबरदस्ती पहाड़ के ऊपर ले गए, और हमें दो घंटे तक वहां रोके रखा। हमें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से प्रताडि़त किया गया, और अंधेरा घिरने पर, हमें अलग किया गया, चीखते हुए, और, राशिद को बंधक बनाते हुए, उन्होने मेरे साथ बलात्कार किया। यदि हम दोनों में से कोई एक प्रतिरोध करता, तो दूसरा चोट सहता। यह एक प्रभावी तिकड़म थी।
वे यह निश्चय नहीं कर सके कि हमें मार डालें या नहीं। हमने जीवित रहने के लिए अपनी पूरी ताकत से सब कुछ किया। मेरा उद्देश्य था जीवित रहना और मेरे लिए किसी भी अन्य चीज से यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण था। मैं हमलावरों से पहले तो शारीरिक रूप से लड़ती रही, और घिर जाने के बाद शब्दों से। गुस्सा और चीख का कोई असर नहीं पड़ा, तब मैंने एकदम पागल तरीके से प्रेम और सहानुभूति के बारे में बोलना शुरू किया; मैने मानवता के बारे में और इस हकीकत के बारे में बोला कि मैं एक मानव हूं, और अपने गहरे में वे लोग भी मानव ही हैं। इसके बाद वे थोड़ा नरम पड़े, कम से कम वे जो उस क्षण मेरा बलात्कार नहीं कर रहे थे। मैने उनमें से एक से कहा कि यदि वह पक्का कहे कि न तो मुझे और न ही राशिद का कत्ल किया जाएगा, तो मैं अगले दिन उससे, बलात्कारी से, मिलने आऊंगी। मेरी इस बात का मुझे इतना दु:ख है कि मैं कह नहीं सकती, किंतु तब दो जिंदगियां दांव पर थीं। अगर किसी तरीके से मैं दूबारा वहां गई होती तो मैं ऐसा बहुत धारदार हथियार लेकर जाती जिससे कि वह फिर मेरे साथ बलात्कार न कर सके।
उसके बाद, जो प्रताडऩा के कई वर्ष जैसा लगा (मुझे लगता है मेरे साथ दस बार बलात्कार किया गया लेकिन मैं इतनी अधिक पीड़ा में थी कि कुछ ही समय बाद मैं यह समझने लायक नहीं रही कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया, एक अंतिम प्रवचन के साथ कि मैं कितनी गंदी वेश्या जैसी हूं कि मैं एक लड़के के साथ अकेली घूम रही हूं। इस एक चीज से वे ज्यादा भड़के हुए थे। पूरे समय वे ऐसा व्यवहार करते रहे जैसे कि मेरे ऊपर कोई एहसान कर रहे हों, मुझे कोई शिक्षा दे रहे हों। यह उनका सर्वाधिक उन्मादी स्वयंभूपन था। वे हमें पहाड़ से नीचे ले गए और हम उस अंधेरी सड़क पर लडख़ड़ाते रहे, एक दूसरे को पकड़े और बेतरतीब चलते हुए। थोड़ी देर तक वे हमारा पीछा करते रहे, हंसिया दिखाते हुए, और शायद वह सबसे खराब हिस्सा था – जीवित बच निकलना इतना पास था और तब भी मृत्यु हमारे ऊपर लटकी हुई थी। आखिरकार हम बच गए, टूटे, घायल, और बिखरे हुए। कितना अविश्वसनीय था हमारा बच जाना, अपनी जिंदगी के लिए सौदेबाजी करना और हर एक शब्द का तौलना क्योंकि हम जानते थे कि उन्हें नाराज करने का मतलब था एक हंसिये का हमारे पेट में घुसेड़ दिया जाना। राहत की सांस हमारी हड्डियों के अंदर और हमारी आंख से बाहर बहने लगी और हम सचमुच पागलपन के एक दौरे में चिल्लाने लगे।
मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं किसी को नहीं बताऊंगी परंतु ठीक जिस क्षण में घर पहुंची, मैंने अपने पिता से पुलिस को बुलाने के लिए कहा। वह उन्हें पकड़वाने के लिए उतने ही व्यग्र थे जितना मैं। इसको रोकने के लिए कि जो मेरे साथ हुआ वह किसी और के साथ न हो, मैं कुछ भी करने को तैयार थी। पुलिस का व्यवहार संवेदनहीन, अपमानजनक था और जैसे भी हो उन्होंने इसकी तैयारी कर ली थी कि मुझे ही दोषी पक्ष बना दिया जाय। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या हुआ था तो मैने उन्हें एकदम सीधे बता दिया, और वे स्तब्ध थे कि मैं एक लजाती, शर्माती शिकार नहीं थी। जब उन्होंने कहा कि इसके बारे में सब को पता चल जाएगा, तो मैने कहा कि ठीक है। अपनी पूरी ईमानदारी से मुझे यह ख्याल कभी आया ही नहीं था कि मुझे या राशिद को दोषी ठहराया जा सकता है, फिर उन्होंने कहा कि मेरी ‘सुरक्षा’ के लिए मुझे बाल अपराधी गृह में जाना होगा। अपने हमलावारों को सजा दिलाने लायक होने के लिए मैं वेश्या के दलालों और बलात्कारियों के साथ रहने को तैयार थी।
जल्द ही मैंने समझ लिया कि कानूनी तंत्र में औरतों के लिए न्याय का कोई अस्तित्व नहीं है। जब उन्होंने हम से पूछा कि हम लोग उस पहाड़ पर क्या कर रहे थे तो मुझे गुस्सा आने लगा। जब उन्होंने राशिद से पूछ कि तुम ‘शांत’ क्यों रहे गए, तो मैं चिल्लाने लगी। क्या वे यह नहीं समझते थे कि उसके प्रतिरोध का मतलब था मेरी और अधिक यातना, जब उन्होंने इसके बारे में सवाल पूछे कि मैं किस तरह के कपड़़े पहने हुई थी, और यह कि राशिद के शरीर पर चोट के कोई निशान क्यों नहीं दीख रहे हैं (हंसिये के हत्थे से बार-बार पेट में मारे जाने के कारण उसको अंदरूनी रक्तस्राव हो रहा था) तब मैं पूरे दुख: और भय से रोने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें ठीक-ठीक वही बताते हुए जो उनके बारे में उनकी सोच थी उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। यह वह संबल था, जो पुलिस ने मुझे दिया। कोई दोष निर्धारित नहीं हुआ। पुलिस ने एक बयान दर्ज किया कि हम लोग टहलने गए थे और लौटते हुए हमें ‘देर’ हो गई थी।
इस घटना के अब लगभग तीन साल हो गए हैं, लेकिन इस दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं रहा है जब मैं उस घटना की प्रेतछाया से मुक्त रही होऊं। असुरक्षा, कमजोरी, भय, गुस्सा, निस्साहयता – मैं इनसे लगातार लड़ती रही हूं। कभी-कभी जब मैं सड़क पर चल रही होती हूं और अपने पीछे मुझे कोई पदचाप सुनाई देती है तो पसीने छूटने लगते हैं और खुद को चीखने से रोकने के लिए मुझे अपने होंठ भीचनें पड़ते हैं। मैं मित्रतापूर्ण स्पर्शों पर भी सिहर जाती हूं, मैं कसे स्कार्फ सहन नहीं कर सकती क्योंकि वे मुझे मेरे गर्दन के चारों ओर कसे हाथों की तरह लगते हैं, मैं पुरुषों की आंखों में आए एक खास भाव से सिहर जाती हूं – यह भाव वहां प्राय: दिखते हैं।
इस पर भी कई तरह से मुझे लगता है कि अब मैं कहीं ज्यादा मजबूत हूं। किसी भी समय से अधिक मैं अपने जीवन की प्रशंसा करती हूं। प्रत्येक दिन एक उपहार है। मैं जीवन के लिए लड़ी और जीती। कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया मुझे ऐसा महसूस करने से नहीं रोक सकती कि यह सकारात्मक है।
मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती। ऐसा करना बहुत आसान है, और कई पुरुष भी विभिन्न प्रकार के अत्याचारों के शिकार होते हैं। मैं जिससे घृणा करती हूं वह है पुरूषसत्तात्मकता, और झूठों का वह पुलिंदा जिसके अनुसार पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं, पुरुषों के पास जो अधिकार हैं वे स्त्रियों के पास नहीं होने चाहिए, पुरुषों के पास हमारे ऊपर शासन करने का अधिकार है।
मेरे नारीसमर्थकवादी मित्र सोचते हैं कि स्त्रियों के मुद्दों को लेकर मैं इसलिए सजग हूं क्योंकि मेरे साथ बलात्कार हुआ है। ऐसा नहीं है। मैं जिन कारणों से नारीसमर्थकवादी हूं, बलात्कार उन कारणों की एक अभिव्यक्ति मात्र था। बलात्कार को टुकड़ों-टुकडों में क्यों देखा जाए? क्यों माना जाए कि बलात्कार एक अनिच्छुक संभोग मात्र है? क्या हमारे साथ रोज ही बलात्कार नहीं होता जब हम रास्ते पर चलते हैं और हमें कामुक नजरों से घूरा जाता है? क्या हमारे साथ बलात्कार नहीं होता जब हमारे साथ सेक्स की एक वस्तु जैसा व्यवहार किया जाता है, हमारे अधिकार निषिद्ध कर दिए जाते हैं, कई तरीकों से हमें प्रताडि़त किया जाता है? औरतों पर होने वाले अत्याचार का विश्लेषण किसी एक ही रेखा में नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ, किसी एक वर्ग का विश्लेषण महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इससे इसकी व्याख्या नहीं हो पाती कि ज्यादातर बलात्कार किसी के अपने ही वर्ग में क्यों होते हैं?
जब तक कि औरतों पर नाना प्रकार के अत्याचार होते रहेगें, सभी औरतें बलात्कार की संभावित शिकार बनी रहेगीं। हमें बलात्कार को रहस्यात्मक बनाना बंद करना होगा। हमें अपने चारों ओर इसके होते रहने को, और इसके अनकों प्रकार को स्वीकार करना होगा। हमें इसे राज के अन्ंदर छुपाना बंद करना होगा, और उसे उसी रूप में देखना होगा जैसा कि वह है – हिंसा का एक अपराध जिसमें बलात्कारी ही अपराधी है।
अपने जीवित रहने पर मैं अत्यंत हर्षित हूं। बलात्कार होने की भयावहता शब्दातीत है, लेकिन मुझे लगता है कि जीवित रह जाना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। जब एक औरत से ऐसा सोचने का अधिकार छीन लिया जाता है तो इसका अर्थ है कि हमारी मूल्य व्यवस्था में कुछ गहरे गलत है। जब किसी पर सार्वजनिक रूप से हमला होता है और जीवित बचे रहने के लिए वह स्वंय को पिटने देती है, तो कोई नहीं सोचता कि वह पीटे जाने की स्वेच्छिक सहमति की दोषी है। बलात्कार के मामले में एक स्त्री से पूछा जाता है कि उसने उन्हें यह क्यों करने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, क्या उसने इसका मजा लिया।
बलात्कार किसी समूह विशेष की औरतों से नहीं जुडा है, न ही बलात्कारी किसी समूह विषेष के पुरूष होते हैं। एक बलात्कारी कोई क्रूर खतरनाक आदमी या पड़ोस का लड़का या बहुत अच्छे दोस्त जैसे अंकल हो सकते हैं। हम बलात्कार को किसी और स्त्री की समस्या के रूप में देखना बंद करें। हम उसकी सर्वसंभाव्यता को स्वीकार करें और उसको एक बेहतर ढंग से समझें।
जब तक कि इस संसार में शक्ति के संबंधों का आधार बदलेगा नहीं, जबतक कि औरतों को पुरुषों की संपत्ति के रूप में समझा जाना नहीं रुकेगा, हम लोगों को हमारी स्वच्छंदता पर हमले के एक निरंतर भय में जीना पड़ेगा। मैं एक ऐसी हूं जो बच निकली। मैंने बलात्कार करने के लिए नहीं कहा और न ही मैंने उसका आनंद लिया। मेरी जानकारी में वह सबसे बुरी यातना थी। बलात्कार उस औरत की गलती नहीं है, कभी नहीं जो इसका शिकार होती है। यह लेख चुप्पी को तोडऩे और उन आरामदायक विश्वासों को तोडऩे की ओर एक योगदान है जिन्हें हम स्वयं को यह आश्वस्त करने के लिए गढ़ते हैं कि हम उसके प्रबल शिकार नहीं हैं, और इस प्रकार उसके वास्तविक शिकार को किसी मनुष्य के लिए सर्वाधिक संत्रास भरे अकेलेपन में धकेल देते हैं।

                                                                                                                          ( समयांतर से )

21 Jul 2013

मुसलमानों के हक में एक फर्जी लड़ाई

सत्येंद्र रंजन 
  

हालांकि यह बेहद देर से हुई पहल है, फिर भी अगर अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री रहमान खान के सुझाव पर केंद्र सरकार ने कदम उठाया तो उससे उस मर्ज की रोकथाम की राह निकल सकती है, जो अब नासूर बन चुका है। वैसे यह ध्यान में रखने की बात है कि रहमान खान के पास सिर्फ रोकथाम का फॉर्मूला है। उससे उन जख्मों का इलाज नहीं होगा, जो देश की मुस्लिम आबादी एक बड़े हिस्से में पीड़ा और आक्रोश की वजह बने हुए हैं। फिर यह अहम सवाल भी है कि प्रस्तावित उपाय सचमुच समस्या के किसी गहरे विश्लेषण और अब उसका समाधान ढूंढने के ईमानदार प्रयास का परिणाम है, या यह अगले आम चुनाव से पहले अल्पसंख्यक वोटरो को लुभाने के लिए उछाला गया शिगूफा है?

       रहमान खान चाहते हैं कि सरकार एक शक्तिशाली कार्यदल बनाए, जो अनेक मुसलमानों पर चल रहे आंतकवाद के मामलों की निगरानी और समीक्षा करेगा। केंद्रीय मंत्री ने यह माना है कि "निर्दोष मुस्लिम युवाओं" को आतंकवाद के आरोपों में गलत ढंग से फंसाया गया है और उन्हें इंसाफ दिलाना जरूरी है। खान चाहते हैं कि इस कार्यदल की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करें, ताकि इस व्यवस्था को आवश्यक राजनीतिक वजन मिल सके। लेकिन यह अभी महज एक मंत्री के मन में आया विचार भर है, जिसके बारे में वे प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने का इरादा रखते हैं। इस दिशा में कोई पहल होगी, इसकी उम्मीद रखने का फिलहाल कोई ठोस आधार नहीं है। वैसे एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में रहमान खान ने अपने इस प्रस्ताव के साथ इस मसले से जुड़ा एक बुनियादी सवाल जरूर उठा दिया। कहा- "अगर लोग लंबे समय तक हिरासत में रहने के बाद बरी होते हैं तो उन्हें इंसाफ कहां मिलता है? खासकर तब अगर उन्हें मुआवजा नहीं मिलता। जेल में लंबे समय तक रहने का मतलब है कि उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।"
इस संदर्भ में हैदराबाद की मक्का मस्जिद में मई 2007 में हुए विस्फोट का मामला एक मिसाल बना था। जैसाकि पहले अक्सर होता रहा है, विस्फोट होते ही पुलिस ने धड़ाधड़ 20 मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया। न्यायिक कार्यवाही से साबित हुआ कि वे निर्दोष थे। उन्हें बरी कर दिया गया। इसके बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने उन्हें आर्थिक मुआवजा दिया। यह रकम 20 हजार से तीन लाख रुपए तक थी। साथ ही आतंकवाद के लगे धब्बे को धोने के लिए पीड़ितों को निर्दोष होने का प्रमाणपत्र दिया गया। तब से यह मुद्दा नागरिक अधिकार आंदोलन के एजेंडे पर है। दिल्ली में मोहम्मद आमिर जब 14 साल जेल में रहने के बाद आतंकवाद के आरोप से बरी हुए, तब भी यह प्रश्न उठा कि क्या एक निर्दोष को सिर्फ बरी कर दिया जाना काफी है? लेकिन यह सवाल भी पूरा नहीं है। इसके साथ महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या किसी की जिंदगी को लगभग बर्बाद कर देने के बाद सिर्फ आर्थिक मुआवजा देना काफी है? क्या यह भी अहम मुद्दा नहीं है कि जिन पुलिसकर्मियों या खुफिया एजेंसियों की वजह से बिना ठोस और पर्याप्त साक्ष्य के किसी को सिर्फ उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर पकड़ कर मानसिक या शारीरिक यातना दी गई और फिर वर्षों जेल में रखा गया, उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए? क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर किस आधार पर उन्होंने गिरफ्तारी की थी? अगर वे संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे तो क्या उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? अगर अभी भारतीय दंड संहिता में ऐसे मुकदमे का प्रावधान नहीं है तो क्या नया कानून बनाने का वक्त अब नहीं आ गया है? इस संदर्भ में रहमान खान से विनम्र प्रश्न है कि क्या वे इस बहस को इस तार्किक मुकाम तक ले जाने को तैयार हैं?
       मामले अगर इक्का-दुक्का होते तो शायद समस्या के एकांगी हल की कोशिश को राहत की बात माना जाता। लेकिन ऐसी घटनाओं का एक अटूट सिलसिला बन गया है। बल्कि यह एक रुझान बन गया है। मक्का मस्जिद की घटना का ऊपर जिक्र हुआ। अब मालेगांव विस्फोट कांड पर गौर कीजिए। यहां जांच और कार्रवाई इतनी बेतुकी है कि किसी न्यायप्रिय व्यक्ति को वह दहला सकती है। 2006 में यह घटना होते ही 13 मुस्लिम नौजवान गिरफ्तार किए गए। लेकिन मक्का मस्जिद की तरह यहां भी आगे की जांच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि इस कांड को हिंदू चरमपंथियों ने अंजाम दिया था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) एक हिंदू उग्रवादी समूह से जुड़े चार लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश कर चुकी है। लेकिन हैरतअंगेज है कि उन 13 मुस्लिम युवकों को बरी नहीं किया गया है। क्या यह मुमकिन है कि मालेगांव में विस्फोट हिंदू और मुस्लिम चरमपंथियों ने मिलजुल कर किया हो? अगर उनमें से किसी एक ने किया तो दूसरे समूह के लोगों को (अगर वे किसी गुट से संबंधित हों तब भी) किस आधार पर आरोपी बनाए कर रखा गया है? अपनी जांच एजेंसियां आम नागरिक की पीड़ा के प्रति इतनी असंवेदनशील हैं कि उन्हें ऐसी विसंगतियों और उसके परिणामों से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन ये सवाल अहम है कि उन दोनों गुटों में से जिसके भी सदस्य अंततः बरी हो जाएंगे, उन्हें हुए माली और प्रतिष्ठा के नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी और क्या इसके लिए जिम्मेदार जांचकर्मियों की जवाबदेही तय होगी?
      अगर उत्तर प्रदेश के मामलों पर गौर करें तो प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। मसलन, खालिद मुजाहिद की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने राज्य के स्पेशल टास्क फोर्स को जनमत के कठघरे में खड़ा रखा है। यह मौत तब हुई जब यह खबर चर्चा में थी कि  2007 के बम धमाकों के आरोप में खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए बने निमेश आयोग ने गिरफ्तारी के हालात को संदेहजनक बताया है। गिरफ्तारी और मौत दोनों की संदिग्ध परिस्थितियों ने न सिर्फ राज्य के आतंकवाद विरोधी स्पेशल टास्क फोर्स और पुलिस बल के कार्य-व्यवहार पर सवाल खड़े किए, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व के रुख को भी संदिग्ध बनाया है। निमेश आयोग की रिपोर्ट अगर समय पर स्वीकार कर उसके मुताबिक कार्रवाई की गई होती तो शायद खालिद के जिंदा रहते इस मामले की सही तस्वीर सामने आ सकती थी। राज्य सरकार इतने गंभीर मामले कितनी अगंभीर है, इसकी मिसाल इसी साल अप्रैल में देखने को मिली, जब उसने बिना पूरी तैयारी के खालिद और उसी मामले में गिरफ्तार तारिक कासमी पर से मुकदमे वापस लेने की याचिका बहराइच कोर्ट में पेश की। अन्याय के शिकार आरोपियों को न्याय दिलाने का यह विचित्र तरीका था। कोर्ट ने उचित ही सरकार की याचिका को ठुकरा दिया। अगर सरकार गंभीर होती तो वह संबंधित मामले की तीव्र सुनवाई की व्यवस्था करती। इससे उन सबूतों की न्यायिक जांच होती, जिनके आधार पर दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। अगर सबूत नहीं ठहरते तो दोनों बरी हो जाते। उसके बाद यह दायित्व सरकार पर आता कि वह उनकी क्षतिपूर्ति करती और उन्हें हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय कर उनके लिए उचित दंड का प्रावधान करती। मगर सरकार ने शॉर्टकट अपनाने की कोशिश की, जो ना तो उचित है और ना ही संभवतः कानून-सम्मत है।
दरअसल, आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में बिना पर्याप्त साक्ष्य के गिरफ्तारी और सुस्त अदालती कार्यवाही के कारण अनगिनत लोग बिना सजा हुए जेलों में पड़े हुए हैं। इन प्रकरणों के निहितार्थ अत्यंत गंभीर हैं। अगर निर्दोष लोगों को पकड़ा जाता है तो उनके साथ जो होता है वह तो अपनी जगह है, लेकिन उससे यह भी होता है कि असली आतंकवादी तक जांच एजेंसियां नहीं पहुंच पातीं। मतलब, ऐसे गुट और लोग मौजूद हो सकते हैं जो आतंकवादी वारदात को अंजाम देने के बाद बेखौफ घूम रहे हों और उनके कारनामों की सजा वैसे नौजवान भुगत रहे हों, जो मनोगत कारणों से खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के शक के दायरे में आ गए, या कुछ करते दिखाने का भ्रम पैदा करने के लिए पुलिस ने जानबूझ कर जिन्हें फंसा दिया। हैदराबाद और मालेगांव की मिसालों, निमेश आयोग के निष्कर्ष, मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों और अब केंद्रीय मंत्री रहमान खान की स्वीकारोक्ति सिर्फ इसी तरह इशारा करती है कि अब ये समस्या विकट रूप ले चुकी है। 
       लेकिन राष्ट्रीय राजनीति और मीडिया के एक हिस्से में बढ़ते दक्षिणपंथी/सांप्रदायिक झुकाव के कारण इस सवाल पर ना तो खुल कर चर्चा होती है और ना ही इसके समाधानों पर गंभीरता से सोचा जाता है। बल्कि तथ्यों को धुंधला करन की कोशिश होती है, जैसी मिसाल हमने इशरत जहां के मामले में देखी। अहमदाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई को दिए आदेश में साफ कर दिया कि जांच का असली मुद्दा यह है कि क्या इशरत और उसके साथ मारे गए अन्य लोग फर्जी मुठभेड़ में मारे गए? इसके बावजूद चर्चा पर इशरत के आतंकवादी होने या ना होने के प्रश्न को बार-बार उछाला गया है। खुफिया ब्यूरो (आईबी) के बचाव में जैसी मुहिम चलती दिखी, उससे यह सवाल खड़ा होता है कि कानून के राज और नागरिक अधिकारों की मूल धारणा पर आधारित संविधान के लागू होने के तकरीबन साढ़े छह दशक बाद भी क्या इस देश में संवैधानिक मूल्यों की कोई कद्र है? क्या अदालत में साक्ष्यों के आधार पर तय हुए बिना किसी को सार्वजनिक विमर्श में बार-बार आतंकवादी बताया जा सकता है? और अगर मान लें कि कोई आतंकवादी है तब भी उसे सजा आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रावधानों के तहत  मिलेगी या खुफिया और पुलिस बल तुरंत इंसाफ के सिद्धांत पर उसे निपटा देंगे?
       जब आतंकवाद को धार्मिक चश्मे से देखने का चलन मजबूत होता गया हो, उपरोक्त प्रश्न देश एवं संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के आगे गहरी चुनौती पेश करते दिखते हैं।  याद कीजिए कुछ समय पहले पी चिदंबरम जब गृह मंत्री थे, भगवा आतंकवाद की अपनी टिप्पणी को लेकर कैसे भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार के दूसरे संगठनों और मीडिया के एक हिस्से के निशाने पर आ गए थे। पुलिस महानिदेशकों और सुरक्षा बलों के अधिकारियों के सम्मेलन में चिदंबरम ने देश की सुरक्षा के लिए मौजूद चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्हें ‘भगवा’ आतंकवाद के खतरे से भी आगाह किया। इस पर कहा गया कि चिदंबरम ने ‘भगवा’ आतंकवाद की बात कह कर भारतीय संस्कृति का अपमान किया है, क्योंकि साधु-संत भगवा कपड़े पहनते हैं। हिंदू वोट गंवाने की चिंता ने कांग्रेस को भी बचाव की मुद्रा में डाल दिया। पार्टी ने सार्वजनिक बयान जारी कर खुद को चिदंबरम के बयान से अलग किया। वही घिसी-पिटी बात दोहराई कि किसी महजब का आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं होता। बहरहाल, मुद्दा यह नहीं है कि चिदंबरम ने जिस शब्द का इस्तेमाल किया, वह सही है या नहीं? मुद्दा यह है कि जिस संदर्भ का उन्होंने जिक्र किया, वह आज एक हकीकत है या नहीं? मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेरशरीफ दरगाह, नांदेड़ और गोवा की घटनाएं क्या उन्होंने जो कहा, उसे कहने के ठोस सबूत नहीं हैं? फिर भी भगवा आतंकवाद शब्द वर्जित है, लेकिन इस्लामी आतंकवाद उतना ही प्रचलित है। आतंकवादी घटनाओं के बाद मुस्लिम नौजवानों की अंधाधुंध गिरफ्तारी या इशरत जहां जैसे मामलों में होने वाली चर्चा को इस राजनीतिक संदर्भ से अलग कर नहीं देखा जा सकता। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वामपंथी दलों को छोड़ कर देश की कोई राजनीतिक शक्ति इस संदर्भ से सीधे टकराने को तैयार नहीं है। इसीलिए रहमान खान के सुझाव भरोसा पैदा करने के बजाय महज शिगूफे का संदेह पैदा करते हैं। क्या खान, मनमोहन सिंह सरकार, कांग्रेस और यूपीए इस शक को गलत साबित कर पाएंगे? 

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.

satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है)

मोदिया लड़ी बनारस से


 
बनारस एक अनोखा शहर है, इसके घाटों पर दुनिया भर के लोग मिल जाते हैं जो निर्वाण की तलाश में कई बार गाँजे की चिलम को अपना हमराही बना लेते हैं। इन्ही घाटों को को देख कर रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि इस शहर के लोगों का हाज़मा बहुत अच्छा है, घाट पर ही निवृत्त होकर भगत लोग गंगा नहाने चले जाते थे। कुछ दिनों पहले गपागप समाचार सेवा के विशेष रिपोर्टर मार्क तेली बनारस की यात्रा पर गए, शहर घूमने के इरादे से उन्होंने एक रिक्शेवाले को दिन भर के लिए बुक कर लिया।

मोदिया लड़ी बनारस सेइन्होने सोचा की ये एक गरीब पर एहसान कर लिए हैं तो रिक्शेवाले ने बताया की अंग्रेज लोग तो हफ़्तों के लिए बुक कर लेते हैं और दू चार दिन में ही पूरा पईसा दे कर हरिद्वार निकल जाते हैं योगा सीखने। कुछ बदमाश किसिम के भी अंगरेज-अंगरेजिन आते हैं जो कई बार कम उम्र वाले रिक्शा वालन को रात के लिए भी बुक करना चाहते हैं पर साहब हम रिक्शा वालन का भी कैरेक्टर होता है कौनो नरायन दत्त तिवारी थोड़े हैं की आज उत्तर परदेश के मुख्यमंत्री बनें तो काल चले जाएँ उत्तरखण्ड में सरकार बनावे। मारकंडे गुप्ता, जिनको प्यार से मार्क तेली कहा जाता है, रिक्शे वाले के शुरुआती ज्ञान से ही प्रभावित हो गए। मार्क लिखते हैं की स्टेशन से आगे बढ़ते ही रिक्शा गच्च से पानी में हेल गया, ये चिल्लाये की रुको, मेनहोल लगता है तो रिक्शेवाले ने बताया की साहब अभी घबड़ाओ जिन, हियाँ सब होल मेने है। पार लगायेंगे, रामभरोसे, बातचीत में पता चला की मार्क के सारथी का नाम रामभरोसे है।
मार्क ने बात शुरू की -भाई यहाँ का सांसद कौन है, स्टेशन के पास की सड़क पर ही गड्ढा है, शहर की छवि ख़राब होगी कि नहीं? रामभरोसे बोले -साहब अब छेदी क्या ख़राब होगी, तुलसी दास, कबीर दास और पता नहीं कितने इसी गड़हा से पार उतर गए, न जाने का का लिख पढ़ गए कोई सुधरबे नहीं किया तो छेदी क्या चीज है जो ख़राब होगी। हाँ सांसद मतलब एमपी होत है न, त उतो मुरली मनोहर जोशी डाक्टर हैं, सुना जात है की इंटर्नेशनल लेबल के नेता हैं, कभी कभार बनारस आय जात हैं, हवाई अड्डा से अपना होटल के बीच में समस्या निपटावट हैं अउर फिर उड़ जात हैं। मार्क – तो फिर आप लोग कुछ करते क्यों नहीं ? रामभरोसे – का साहब पढ़े लिखे लगते हैं, इ का कह रहे हैं ? आपे कुछ कर लेंगे का, तनी अपने वार्ड मेंबर के खिलाफ कुछ कर के दिखाईये, लटका देंगे सब अउर अंगरेजी बुकना भुला जायेंगे। अब मार्क के स्वाभिमान को धक्का लगा और बात को बदलने के लिए बोल पड़े — सुन रहे हैं की नरेन्द्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ेंगे? रामभरोसे – हाँ साहब, हमहूँ सुन रहा हूँ। चलिए पहिले सुबह क टाईम घाट पर बैठ कर चाय पीजिये देखा जाएगा बनारस।
कुछ देर में रिक्शा किनारे लगा कर, घाट के कोने में एक चाय की दुकान पर बैठे लोकल विद्वानों के बीच ये दोनों भी बैठ गए। हाँ यार ये बताओ मोदी को वोट कौन देगा, अभी आप बता रहे हो कि भाजपा के सांसद ने कुछ किया ही नहीं,जबकि वो तो मोदी के पहले के नेता हैं, अयोध्या कांड में भी हैं और देश के मंत्री रह चुके हैं, विकास भी किया है । भोलू चाय वाले — हमहूँ सुन रहे कि अब मोदिया लड़ी बनारस से। लल्ला बजरंगी – अरे भोलुआ, इज्ज़त से नाम लियो, अगला परधान होए वाला है। इदरीस- काहें की इज्ज़त बे, भुला गए जब ऊ सोनियवा के इटली क कुत्ती बोल गवा रहा और उके बच्चवन के पिल्ला। बोले क तमीज न ह, चलें परधान बने। एसे ठीक त सरदार हौं, कम से कम चुप त रहलन। लल्ला – मियाँ देखो, मोदी जी के बोलबो त ठीक न होईये। केहू अउर के जवन मन तवन बोलो। रामभरोसे – साहब कल रेक्शा पर एक जने बैठी रहीं, ऊ कहत रहीं कि मोदी के त कंग्रेसीयन क बीबी बच्चा भी वोट दिहन। काहें से कि लगत बा कि बिकास मतलब मोदी। इदरीस- हाँ, अब बनारस में इहे होयिय्ये, मोदिये बचल रहल। आ जाव, बेटा वोट दिहो त ईहाँ बैठने वाले कौनो को फिर ईद के टाईम सेवई हमरे घर से त न जाई, जान लेवो। मार्क – अरे आप लोग ही लड़ने लगे, क्या मोदी के आने से दंगा भी हो सकता है यहाँ। इदरीस- साहब बनारस में त दंगा कमलापति तिरपाठी के साथै मर गिया। मार्क — क्या ? वो तो कांग्रेस के बड़े नेता थे, वो दंगा कराते थे ? रामभरोसे- आप कह रहे थे कि पत्तरकार हैं, इहो नहीं जानते। एक जमाना रहा की बनारस में पीएसी के जवान लोग दंगा के टाईम में आपन घर भर लेत रहें, साहब कमला गुरु के ओर से पूरा छुट रहे, बड़े नेता रहन, चाहे का न कर सकें। लेकिन मियाँ जी लोग लुटा पिटा जायं तब जा के दंगा बंद हो। कौन मुसलमानी दुकान न होय जवन सारे न लुटवाएन।
मार्क – तो क्या यहाँ के लोकल लोग दँगा नहीं करते थे क्या। भोलू — साहब, रोज़ा के टाईम में भी इदरीस मियाँ चाय के ठीहा पर रोज बैठकी लगावत हैं। गला के नीचे थूक भी नहीं जात है, इ हम लोगन क मोहब्बत है, इहाँ दुनिया भर क सरकार बना -बिगाड़ के सब हंसी -ख़ुशी घर जात हैं। हमरे बच्चन के अभिये से इंतजार हौ कि ईद में इदरीस चचा के घरे सेवई चाँपना है, मेहरारू कह रही है कि चाय में पानी बढ़ा दिओ लेकिन राशिदवा और जैबु के इदी में कटौती न करिओ। अब आपे बताओ इहाँ दंगा के करी, इदरीस क घर फूँके वालन के पहिले हमही फूँक देब।
मार्क – अजीब हैं आप लोग,फिर इदरीस जी मोदी ने भी तो शायद यही किया था, कुछ दिन बाद ही दंगे रोके फिर आप लोग क्यों … ? इदरीस- साहब,कांग्रेस सेकुलर पार्टी है और भाजपा ठीक नहीं है। बजरंगी — अबे मोदिया क भाजपा से का मतलब, अभी देख रमदेऊओ बोल रहा है की उनका सपोरट मोदी को है, भजप्पा को नहीं। अउर देखो मोदी के टीम में इहाँ भी गुजराती आया है, खबर तो इहो है कि काशी प्रान्त भजप्पा की बैठक में कई लोग बोलेन ह कि इस्तीफा दिहें, काहें से कि उमा भारती कुछ उखाड़े नहीं पायीं, उनकी टीम ने हम लोगों को भाव नहीं दिया अउर फिर बहरिये सब आय रहे हैं त लोकल कैडर का सपा क दलाली करिहे। इदरीस- लेकिन यार, बड़ा हल्ला है कि गुजरात में लाईन क हिसाब टाईट है, इहाँ बुनकर लोग क जिनगी बिज़ली बिना तबाह। अभहीं सब धरना -मोर्चा भी किये रहें, और बिरादरी में कुछ लोग भीतर कने कह रहे हैं कि अगर मोदी खाली बिज़ली भी दिवा देत ह त हर्जा का है, एक बार अजमावे के चाही। धरम कौनो खाए के त देत नाहीं, खाए के त धंधा से मिलिहे।
मार्क – और सुना है अन्नाजी भी बनारस आ रहे हैं। बिहारी मास्टर साहब — अरे आय तो रहे हैं, हमहूँ हैं आयोजन कमेटी में। भारत माता मंदिर में सभा है, साले बनारस के चोर सबसे चन्दा भी हम लोग बटोर लिए हैं। सभा के बाद इफ्तार का भी प्रोग्राम रखा रहा लेकिन बुढ़वा कह दिया की मोदी सांप्रदायिक नहीं हैं, अब का किया जाय हम लोग फोन कियेन अन्ना के घुमावे वालन के कि  भईया कौनो मियाँ इफ्तारी में न अयिहें, हलुवाई क पईसा भी डूब जाई। खंडन करवाओ,न त ओहरे रखे रहो अपने अन्ना बाबा को। अब देखिये,खंडन तो हो गया है लेकिन बाबा की तबेत खराब हो गयी है।
रामभरोसे — त अन्नवा जी के सोच समझ के बोले चाही न, पूरा देश देख रहा है। इदरीस- अबे सोच समझ के बोले आता तो रेक्सा न चलाते, ई धंधा में काहें आते। मास्टर – मियाँ, होश में बात कर। अन्नाजी देश सुधारने चले हैं, हमको जरुरत है कि उनके साथ खड़े रहें, कंधे से कन्धा मिलाएं। इदरीस– अबे अभी त तुही गरिया रहे थे की सोच समझ के बोलता नहीं, वैसे भी किसी के भी इफ्तार में पक्का मियाँ तो जायेगा नहीं, साला रोज़ा हराम हो जायेगा। अब हमको समझा रहे हो?
मास्टर — देखिये, हम ताव में बोल गए। अन्ना जी हमारे हैं, व्यवस्था परिवर्तन में हम साथ हैं।  भोलू — त मास्टर जब तक अन्नाजी क प्रोग्राम होगा चाय क पैसा आपे दिहो, कार्यकर्त्ता लोगन के खर्चा के नाम पर। अउर अब इहाँ से तनी जगह खाली करो अंग्रेजन का बैच आ रहा है। मार्क — तो अंग्रेज लोग भी आप की चाय पीते हैं ? भोलू — साहब ,खूब मन से पीते हैं, कई तो बाद में कुल्हड़वा भी चबा जाते हैं। बजरंगी — लेकिन साहब, अंग्रेजन को ऊ ठीहा की चाय अधिक पसंद आती है जो बनाते समय खाली इन सबके लिए चाय में थोड़ा सा कुछ मिला देत हैं कि हलकी मस्ती आवत है। भोलू — अबे चुप, बाहरी आदमी से भीतर की बात करता है। नहीं साहब ये लोग अच्छे ग्राहक होते हैं, खाली अंग्रेजी बोलते हैं, चाय पीकर, पैसा दिए, चलते बने।  तभी विदेशियों का ग्रुप वहाँ आकर बैठ गया। मार्क की रूचि बनारस से हट कर नीचे रामनामी लपेटे और ऊपर सैंडो गंजी पहिने अंगरेजिन में बढ़ गयी। ये बिना पूछे उसको बताने लगे कि इण्डिया में कल्चर बहुत भारी है, दुनिया में ऐसा देश कहीं नहीं है। तभी एक विदेशी महिला भीगे बदन वहां आई और कहने लगी की जब वो होली गैन्गेज में नहा रही थी तो उसका कपड़ा लेकर कौनो भाग गया। रामनामी वाली मार्क से बोलती है की अभी तुम अपनी कल्चर के बारे में बता रहे थे और आगे मेरी इस किताब में पढ़ लो की ‘इण्डिया में लोग बिना वजह महिलाओं से चिपकने की कोशिश करते हैं, वहाँ लैंड करने के बाद से वापस जहाज में बैठने तक हर जगह ठगे जाने की सम्भावना रहती है। इण्डिया के लोगों को तो आदत है पर विदेश वालों को सावधान रहना चाहिए, नहीं तो तकलीफ हो सकती है ‘
अब मार्क तेली का दिमाग झनझना गया और उनका उत्साह ख़तम हो गया। उन्होंने रामभरोसे को बोला कि भाई, अब यहाँ से चला जाय, कुछ और नहीं दिखाओगे? रामभरोसे —- साहब, अभी तो शुरुआत है। उठ जाईये, पीछे सांड मूत रहा है, चलिए चला जाय।
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