29 Jan 2013

गुलजार की एक कविता

रोज़गार के सौदों में जब भाव-ताव करता हूँ
गानों की कीमत मांगता हूँ -
सब नज्में आँख चुराती हैं
और करवट लेकर शेर मेरे
मूंह ढांप लिया करते हैं  सब
वो शर्मिंदा होते हैं मुझसे
मैं उनसे लजाता हूँ
बिकनेवाली चीज़ नहीं पर
सोना भी तुलता है तोले-माशों में
और हीरे भी 'कैरट' से तोले जाते हैं .
मैं तो उन लम्हों की कीमत मांग रहा था
जो
मैं अपनी उम्र उधेड़ के,साँसें तोड़ के देता हूँ
नज्में क्यों नाराज़ होती हैं ?

ps:गुलज़ार साहब की  किताब
छैंया-छैंया के बेक कवर से

28 Jan 2013

फैज अहमद फैज की दो कविताएं


बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले, सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले



अब कहाँ रस्म घर लुटाने की

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की
बरकतें थीं शराबख़ाने की
कौन है जिससे गुफ़्तगू कीजे
जान देने की दिल लगाने की
बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िल
उनसे जो बात थी बताने की

साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिल
रह गई आरज़ू सुनाने की
चाँद फिर आज भी नहीं निकला
कितनी हसरत थी उनके आने की

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की दो कविताएं

कितना अच्छा होता है

एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं ।

शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं ।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है ।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना ।

 सब कुछ कह लेने के बाद

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नए लोक, नई सृष्टि, नए स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना ।

श्रीकांत वर्मा की दो कविताएं


एक और ढंग 
भागगर अकेलेपन से अपने
      तुममें मैं गया।
            सुविधा के कई वर्ष
                 तुमने व्यतीत किए।
                       कैसे?
                            कुछ स्मरण नहीं।
                मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
                पृष्ठ पर
                      अंकित थे
                              एक संयुक्ताक्षर!
क्या कहूँ! लिपि को नियति
केवल लिपि की नियति
थी -
      तुममें से होकर भी,
      बसकर भी
           संग-संग रहकर भी
                 बिलकुल असंग हूँ।
सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है
      - लेकिन! क्यों लगता है मुझे
             प्रेम
                  अकेले होने का ही
                        एक और ढंग है।
हस्तक्षेप 


कोई छींकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाय,
मगध को बनाए रखना है, तो,
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए
मगध है, तो शांति है
कोई चीखता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाय
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए
मगध में न रही
तो कहाँ रहेगी?
क्या कहेंगे लोग?
लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है,
रहने को नहीं
कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज न बन जाय
एक बार शुरू होने पर
कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप -
वैसे तो मगधनिवासियो
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से -
जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुजरता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है -
मनुष्य क्यों मरता है?
 


गोरख पांडेय की दो कविताएं


समाजवाद
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई

नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई

गांधी से आई, आँधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई

कांगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई

डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई

वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई

लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अहिंसा कहाई

महँगी ले आई, गरीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई

परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई


उनका डर
वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे

 

21 Jan 2013

सांप्रदायिकता की जुबान

शिंदे के बयान पर खुश होने वालों के लिए



गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की जानिब से आरएसएस पर दिए गए बयान में कितनी सच्चाई है यह तो अलग विषय है। लेकिन इस बयान पर जिस तरह से लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा जैसे पाकिस्तानी  संगठनों की बांछें खिल गई हैं्, वह इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है। शिंदे के बयान का स्वागत करते हुए इन दोनों ही संगठनों ने आरएसएस और बीजेपी पर बैन लगाने की वकालत की है। बता दें कि जमात-उद-दावा पर पहले से बैन लगा हुआ है लश्कर अपनी हकरतों के कारण दुनिया भर में बदनाम है। पाकिस्तान का  मजबूत हिमायती मुल्क अमेरिका इस पर बैन लगाने की लगाने की तैयारी कर रहा है। बहरहाल, पाकिस्तान में पल-बढ़ रहे ऐसे दर्जनों संगठनों को पहले अपने गिरेबान झांकना चाहिए कि ये खुद अपने मुल्क और अपने पड़ोसी मुल्क हिंदुस्तान में क्या कर रहे हैं। क्या ये संगठन आरएसएस के पाकिस्तानी संस्करण नहीं हैं? भारतीय सैनिक का सिर काट कर ले जाने की शह पाकिस्तानी सैनिकों को कहां से मिलती है। अफजल गुरु और कसाब जैसे दहशतगर्द कहां से पैदा किए जा रहे हैं। पार्लियामेंट पर हमले के लिए कहां से पैसा और प्लान आता है। और भारत में भी विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस, शिव सेना जैसी ताकतों के पनपने, परवान चढऩे के पीछे आखिर कौन सी वजहें काम कर रही होती हैं। पाकिस्तान से बहने वाली फिरकापरस्त हवा कैसे इनके लिए भारत में ऑक्सीजन का काम करती है। इन सवालों के जवाब भी इन संगठनों को देने चाहिए। दरअसल आरएएसएस हो या तैयबा या जमात-उद-दावा वगैरह। सभी अपने-अपने मुल्कों में अमन और आम आदमी के दुश्मन हैं। इन्हें न भूख से बिलबिलाती अवाम दिखाई देती है न ही करप्शन का मकडज़ाल। आखिर यह कितना हैरत करने वाला है कि पाक सुप्रीम कोर्ट देश के प्रधानमंत्री परवेज अशरफ को गिरफ्तर करने का हुक्म जारी करता है और ऐसे संगठनों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं होता। कनाडा से आकर तहीरुल कादिरी पाकिस्तान में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हैं और उनकी एक आवाज पर लाहौर की सडक़ों पर साढ़े तीन लाख युवा उतर आते हैं। ये भीड़ भी इनको नहीं चौकाती। इनका मुद्दा बनता है दूसरे और पराये मुल्क का आरएसएस। हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान, इनका एक ही मकसद होता है पॉवर, सियासत और सत्ता की कुरसी। और इसके लिए या तो ये राजनीतिक पार्टियों का इस्तेमाल करते हंै या राजनीतिक पार्टियां इनका इस्तेमाल करती हैं। ये दुकानदारी देश के बंटवारे के साथ चल रही है। और हर जगह इनकी जुबान, भाषा भी एक ही होती है। दहशत और खौफ फैलाना। पाकिस्तान चाहे कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए कितनी भी बातें कर ले, लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि  इस्लामाबाद में कोई भी ऐसी सरकार नहीं बन सकती जो कश्मीर के मुद्दे पर भारत को सहयोग करे। या जो कश्मीर को अपना हिस्सा नहीं मानती हो। कम से कम भारत में ऐसी हालत नहीं है। अपने तमाम राष्ट्रवादी, हिंदुवादी लटकों-झटकों के बावजूद आएसएसएस की अलमबरदार पार्टियां दिल्ली की सत्ता पर बैठने के लिए दशकों से हाथपैर मार रही हैं। जनता ने इन्हें एक मौका देकर इसका हस्र भी देख भी लिया। दरअसल यह हिंदुस्तानी सेकुलरिज्म की ताकत है। जो कितनी भी बदशक्ल हो, कमजोर नहीं हो सकती। हिदुस्तानियों ने (जिसमें हिंदू भी हैं और मुसलिम भी) ने ये साबित करके दिखाया है। बार-बार। अनगिनत मौकों पर।
इसलिए आरएसएस पर बैन की वकालत बुलंद करके जमात-उद-दावा और तैयबा ने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। 
- जेब अख्तर

20 Jan 2013

स्व. भगवत रावत की कविता

  ‘वे इसी पृथ्वी पर हैं’

 ‘‘कहीं न कहीं कुछ लोग हैं ज़रूर
जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर
कच्छपों की तरह धारण किये हुए हैं
बचाये हुए हैं उसे
अपने ही नरक में डूबने से
वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं

इतने नामालूम कि कोई उनका पता ठीक-ठीक नहीं बता सकता
उनके अपने नाम हैं लेकिन वे

इतने साधारण और इतने आमफहम हैं
कि किसी को उनके नाम याद नहीं रहते
उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे

एक दूसरे में इतने घुले मिले रहते हैं
कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता
वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं

और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है
और सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हें रत्ती भर यह अंदेशा नहीं/कि उन्हीं की पीठ पर
टिकी हुई है यह पृथ्वी।’’

8 Jan 2013

सबसे खतरनाक होता है


पाश की ये कविता न जाने कितनी अंधेरी रातों में दीया बनकर साहस और रौशनी फैलाती रही है। इस एक कविता के सामने बड़े-बड़े कथित मोटिवेशन गुरु और कामयाबी हासिल करने के तरीकों पर लिखी गई अनगिनत किताबें कितनी फीकी जान पड़ती हैं :


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठि सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना
बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढऩा
मुट्ठियां भींचकर बस वक़्त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नजऱ में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नजऱ दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

नसरीन सबा खान की पांच गजलें



नसरीन सबा खान की गजलों में जो बागी तेवर है उससे कभी-कभी डर भी लगता है। उनसे जब भी बात होती है एक खनखनाहट के साथ कुछ न कुछ टूटने की आवाज आती है। शायद यही वजह है कि पत्रिकाओं और खासकर उर्दू वालों ने उन्हें अभी तक अपनाया नहीं है। बहरहाल कंप्यटर, किताबें और फेसबुक के बीच उनकी एक अलग दुनिया है। 
 
 हम तो हरचंद नजरें चुराते रहे
और वो बारहा मुस्कराते रहे

एक पड़ोसी के घर का न चूल्हा जला

उम्र भर हम जकात लुटाते रहे

अपने मां-बाप से बदसलूकी की

और जन्नत के सपने सजाते रहे

क्यूं जरूरी तेरी बंदगी ऐ खुद

ये सवालात हमको सताते रहे

उनकी नजरों में थी प्यार की रोशनी

हम हवस जान नजरें चुराते रहे

था सफर भी कठिन, पांव में आबले

हौसले थे, जो हमको चलाते रहे

हमने रश्मों को तोड़ा, बगावत भी की

और तुम बस हमें आजमाते रहे
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गम से है सरशार दिल ये मेहरबानी आपकी

फिर भी है हमदम ये मेरी जिंदगानी आपकी

जाइए अन्ना जी अब खामोश ही रहिए आप

सुन के जनता थक गई लनतरानी आपकी

खून है जोश और ना वलवला है जहन में

बेसबब और बेवजह है नौजवानी आपकी

मुफलिसी में किस तरह रुख फेरते अहबाब हैं

अब ये जाना किस लिए है बदगुमानी आपकी
आपने देखी कहां है मुल्क की बदहालियां
आप तो खुश हैं कि चमकी राजधानी आपकी

हर जगह जिल्लत, हिकारत और रुसवाइयां मिलीं

और अब करवाएगी क्या हक बयानी आपकी
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मेरी कलम ने लिखा है जो हक बयान में है

इसी लिए तो ये तल्खी मेरी जबान में है

न जाने कितनी रुतें बीत गईं और अब भी

कि बेटा आएगा बुढिय़ा इसी गुमान में है

चलो ये माना मुझे तुम से हो गई उलफत

मगर समाज तेरे मेरे दरम्यान में है

खिजा रसीदा है मौसम कि अब चले आओ

कोई खुशी नहीं बिन तेरे इस जहान में है

हुई जो शाम तेरी यादों के दरीचे खुले

तेरा ख्याल फकत दिल के इस मकान में है

सबा जो रूठ गई, क्या चमन पे गुजरेगी

ये खदशा हमेशा गुलसितान में है
खदशा - शंका
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कुछ नहीं होगा मगर आस लगाते जाओ
इस सियासत से फकत धोखे खाते जाओ

हम नवाई के लिए हाथ में ले कर कंदील

ऐसे जलसों में चलो, भीड़ बढ़ाते जाओ

झोंपड़ों में है अंधेरे की सियाही गहरी

बेवजह जलसों में कंदीलें गलाते जाओ

अदल और हक की करो बात कटा के गरदन

बेहिसों को भी तुम आइना दिखाते जाओ

वो तो जालिम है सबा समझे न अफसाना तेरा

बेमुरव्वत से किसी तरह निभाते जाओ

हम नवाई- आवाज मिलाने के लिए

कंदील - मोमबत्ती 

-----------------

तफरके मजहबी हवालों में
मंदिरों में भी और शिवालों में

एक लमहे में टूटे सारे भरम

जो बनाए थे कितने सालों में

ये सियासत और यहां लोगों

चोरियां होती हैं उजालों में

लोकपाल आएगा ये सुनकर भी

आस क्यूं् कर है इन दलालों में

वस्ल की दिल में आरजू ही रही

तुमको पाया फकत ख्यालों में

ऐ सबा दिल की बात भी सुन लो

वरना उलझी रहो सवालों में



6 Jan 2013

जीन्स वाली लडक़ी


कहानी
जेब अख्तर
 सामने से एक तेज बाइक गुजरी और सडक़ पर के गडढे का ढेर सारा कचरा कल्लन खाला खाला को नहा गया। कल्लन खाला ने उठते हुए फुफकारा, नाश हो इन शैतानपीटो का---फटफटिया देखावत फिरे हैं----और चलावे नहीं आवत तो मां-बाप ख्ररीद के काहे दे दिहिन है इन बंदरवन के हाथ में---अब कहां से लावे फिर से नहाने का पानी---हरामी सब---
मोटरसाइकिल वालों को कोसते-कोसते कल्लन खाला हांफने लगी तो दोबारा वहीं बैठ गई। वह अभी-अभी आकर सहन पर बैठी थी. सहन क्या था...दो कमरों के बाद बची हुई थोड़ी-सी जमीन। जो बमुश्किल दो-डेढ़ फिट चौड़ी होगी। लंबाई कमरों जैसी ही। उस पर किसी तरह दो बांस खड़ा कर टीन की बाड़ ड़ाल दी गई थी। ताकि बहू-बेटियों की लाज बची रहे। क्योंकि इसके बाद सडक़ शुरू हो जाती थी। और सडक़ से पहले मोटी-सी नाली। जिसे म्यूनिसपैलिटी वाले जितना साफ करते, वह उतनी ही तेजी से बदबू फैलाती।
बहरहाल, बिजली कटने पर यह सहन जन्नत की तरह महसूस होती थी। यहां से आसमान देखा जा सकता था। खुली हवा में सांस ली जा सकती थी। और मोहल्ले भर की आती-जाती औरतों से खैर-खबर पूछी जा सकती थी। जहां तक नजर जा सके,  नजर रखी जा सकती थी।
लेकिन अब यह सहन भी बेपरदा हो गया था। कल रात की तेज बारिश इसकी बाड़ उड़ा ले गई थी। कल्लन खाला अपने-आप से बड़बड़ाई, आने दे इस बार सादिक को। पिछले साल से कह रही हूं कि यहां दो ईटों की एक चहारदीवारी खड़ी कर दे। कैसी बेपरदगी होती है। घर में नई नवेली दुल्हन है। उसका फूल सा बेटा हामिद है। हालांकि तसमीना को इस घर में ब्याह कर आए तीन साल हो चुके हैं। लेकिन कल्लन खाला के लिए अब तक वह नई ही है।  वजह है सादिक उनका इकलौता बेटा है। सारा प्यार उमड़ता है, सादिक पर। उसके बेटे पर..और उसकी दुल्हन पर भी। बड़ी मुश्किल से मनाया था उसने सादिक को इस शादी के लिए। वरना सादिक तो डाल-ड़ा़ल उडऩे वाला परिंदा था। उसका काम ही ऐसा था। ड्राइवरी की नौकरी थी। जंगल से लकडिय़ा लाकर शहर के लकड़ी मीलों में देता था।
सादिक महीने-बीस दिन में सूरत दिखा जाया करता था। दो-एक दिन के लिए। कल्लन खाला घर में अकेली रहती थी। सादिक के अब्बा के बाद यह अकेलापन और बढ़ गया था। दुआ करती। मन्नतें मांगती कि किसी तरह सादिक के सर सेहरा बंधे। सूना घर फिर से आबाद हो। दूर की बहन कुलसूम तब आई थी, सादिक के लिए तसनीमा का रिश्ता लेकर। कल्लन खाला बाग-बाग हो गई थी। तसनीमा थी ही ऐसी। न सूरत में कोई कमी न सीरत में कोई खोट। ऊंचा कद। गोरा रंग। गुरबत के साए में पली। मगर बोली में नफासत। स्कूल का तो पता नहीं मगर शामपुरा के मदरसे में चार बार कलाम पाक खत्म कर चुकी थी।  शगुन लेकर आए थे तसनीमा के अब्बा तो बड़े गर्व से कहा था, अपनी लंबी सफेद दाढिय़ों को उंगली से कंघी करते हुए, 
अठारह की हो गई है, तसनीमा,,,मगर क्या मजाल की आज तक कभी सिनेमा हाल का रस्ता तक देखा हो। कभी जरूरी काम से निकली भी तो बुरके के बिना नहीं। दीन की पाबंद इतनी कि खुद वो नहीं देख पाते तसनीमा का चेहरा हफ्तों।
उसी तसनीमा का पैगाम आया था सादिक के लिए। दुल्हन बन कर जब आई तो देखनेवालों का तांता दो-तीन दिनों तक जारी रहा। सभी ने कल्लन खाला को बधाई दी। कुछ ने इतनी नेक और खूबसूरत दुल्हन मिलने पर उसकी किस्मत पर रश्क भी किया। मोहल्ले की औरतें आती। घूंघट उठाकर चांद से चेहरे का दीदार करती। नेग देती। और इधर कल्लन खाला का दिल धडक़ता रहता। कोई कुछ जादू-टोटका न कर दे। बलइयां लेती। और दुआएं खैर पढ़ती। आसमान की ओर देख कर कल्लन के खालू से कहती, देख  लो वहीं से----लाखों में एक बहू लाई हूं। दुआ दो कि घर की खुशिया सलामत रहे। मुझे बस एक पोता चाहिए...और मन न माने तो आ जाया करना तुम भी...लेकिन हाथ न लगाने दूंगी पोते को ---दूर से चाहे जितना देख लो---.
और देखते-देखते घर सचमुच खुशियों से भर गया। गाहे-ब-गाहे घर आकर दूसरे दिन ही भागने वाला सादिक अब आता तो हफ्तों रुकता। तसनीमा ने उसे माला माल कर दिया था। सलीके से उठने बैठने लगा था सादिक। रोज नहाता। बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी की जगह अब पानों से भरे गाल चमकते रहते। जुम्मे के दिन घर में होता तो नमाज भी पढऩे चला जाया करता। नहीं तो तसनीमा घर में घुसने ही न देती।
अब कभी कल्लन खाला आसमान की तरफ देखती तो आंखों में आंसू भर आते। मगर इन्हें रोकना खूब जानती थी कल्लन खाला। वो कहते हैं न कि मरने वाले के लिए आंसू न बहाओ। यह खुदा को नापसंद है। लिखा है कि एक-एक आंसू एक-एक दरिया बन जाता है। जिसे मरने वाले को पार करना पड़ता है। वहिशत तक पहुंचने के लिए। ऊपर से आंसू आदमी को कमजोर बनाते हैं सो अलग। कल्लन के अब्बा के इंतेकाल को सात-आठ साल से ज्याद हो चुके थे। लेकिन आज तक किसी ने कल्लन खाला की आंखों को नम होते नहीं देखा था। उनकी हिम्मत और सब्र की मिसाल देते थे सभी।
 तसनीमा की गोद भरी और कल्लन खाला की एक आखिरी मुराद भी पूरी हो गई। हामिद अब डेढ़ साल का होने चला था। माशाअल्ला सेहतमंद और गोलमटोल। गोद में एक बार ले लो तो उतारने को दिल न करे। लेकिन सादिक इधर अब फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने लगा था। घर आने के दिनों का अंतराल फिर से लंबा होने लगा था। हफ्ता, दिन और महीनों बाद सूरत दिखाई देने लगी उसकी। आता भी तो एक दो दिन के लिए। जेब में जो होता घर के खर्च के लिए देता और फिर गायब।
तसनीमा राह देखा करती। जब कोई ट्रक गुजरता दौड़ कर सहन तक आ जाती। फिर भारी कदमो से लौट पड़ती. हामिद बहुत सारा वक्त ले लेता। लेकिन जब रात होती तो बिस्तर सून-सूना जान पड़ता। इस सूनेपन को न तो हामिद की किलकारियां भर पाती न कल्लन खाला की तेज बड़बड़ाने वाली आदत। नमाजें पढ़ती और मौलवी साहब से दुआ के लिए मिन्नत करती।
पिछले कुछ दिनों तसनीमा का मन किसी अनहोनी की आशंका में धडक़ने लगा था। लगने लगा था कहीं कुछ अनहोनी जरूर हो रही है। कहीं किसी कोल्हीन के चक्कर में तो नहीं पड़ गए। काम भी तो ऐसा ही है। ट्रक लेकर जाता है सादिक बीच घने जंगलों मे कहीं। वहां लकड़ी कटवाता है। और फिर ट्रक  पर लोड होती है लकडिय़ां। इस में कई-कई दिन लग जाते हैं। मनमाफिक लकड़ी की तलाश होती है। सागवान, महुआ, आम, शीशम, पलाश, सखुआ---
फिर उन्हें काटनेवालों को खोजना पड़ता है। बड़ी और मोटी-मोटी तनों को काटने के बाद उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में करना होता है। तब जाकर उसे लारी पर चढ़ाते हैं। इस दरम्यान वहीं किसी गांव में ठिकाना होता था। जो मिल गया खा लिया। जहां जगह मिली सो लिया। सुनते हैं आदिवासियों के गांव हैं उस इलाके में। और आदिवासि लडकियां बड़ी आसानी से किसी की बातों में आ जाती है। थोड़ा सा स्नो पाउडर कर दो बस। सीधी होती हैं बेचारी। इसी का फायदा उठाते हैं गैरआदिवासी मरद।
नौशाद भाभी कहती थी, मरद जात का कोई भरोसा नहीं। जहां बोटी दिखी नहीं कि लगा लार टपकने। और खूबसूरत औरत मिल जाए तो कुत्तों जैसी हो जाती है इनकी हालत---लात जितनी मारो---सह लेंगे---कि  शायद गोश्त नहीं तो हड्डी का ही एक टुकड़ा ही मिल जाए---चूसने के लिए---तू सावधान रहा कर ---इतने इतने दिन घर से गायब रहना कोई अच्छी अलामत नहीं तेरे मरद की ---झाड़ जंगल में क्या हो रहा है ---किसी को क्या पता---रख लेगा किसी कोल्हिन को ---और तुझे खबर तक नहीं लगेगी। खबर तब लगेगी जब उसके बाल बच्चे आ जाए्ंगे---बाप के जायदाद में हिस्सा मांगने---किरिस्तान बना लेती हैं मरदों को फंसा कर ---
नौशाद भाभी बेवा थी। कोई ज्यादा उमर नहीं। कोई बाल बच्चा नहीं। शौहर के इंतेकाल के  बाद बच्चों को संदल कुरान और अमपारा पढ़ाकर गुजारा कर रह थीं। दो कमरों का मकान शौहर छोडक़र गए थे। एक कमरा किराये पर लगा दिया था। सो जिंदगी गाड़ी मजे से चल रही थी- यह कहा जा सकता था। जहां जाती चांदी के ढक्कन वाला पनबट्टा साथ दबाए चलती। आंखों पर सुनहले फ्रेम वाला चश्मा। 
अल्लाह---ऐसा मत कहो---भाभी---तसनीमा ने सर पर से सरकते दो पट्टे को संभालने का जतन करते हुए कहा था। उसे याद आ गयी सादिक की बात। खुद सादिक ने उसे बताया था। उस दिन उसने कुछ ज्यादा ही शरारत की थी। फिर भी उसका मन भरा नहीं था। तसनीमा थक कर हाथ जोडऩे लगी थी। पूरे बदन मे दर्द ऐसा होने लगा था कि सांस लेना भी भारी ---तकिये पर औंधे मुंह लेटी उखड़ी-उखड़ी सांसों को जोडऩे के संयत कर रही थी---
तब सादिक ने गुस्सा होकर कहा था---तुम से अच्छी तो वो होती हैं---थकने का नाम नहीं लेती---बल्कि थका देती हैं----यहां---तो ----जैसे बदन नहीं झीना कागज है---जरा सा पानी पड़ा नहीं लगा भरभराने---रिरयाने---हुंह----फुलकुमारी
वह अपना मोबाइल उठाकर बिस्तर पर से उठ गया था। कैसी-कैसी फिल्में थीं सादिक मोबाईल में। तसनीमा ने एक ही देखा था। लजाते-शरमातेे। सादिक के बहुत इसरार करने पर। सादिक ने बताया था सब पैसे देने पर मिल जाती हैं। जितना चाहे मस्ती करो। 
लेकिन वह अभी गुस्से से कांप रहा था। सिगरेट न मिला तो बीड़ी निकाल कर सुलगाने लगा था। बिस्तर पर ही अपने छोर में सिमट में सिमट गई थी तसमनीम। नहीं दुबक गई थी। सहम गई थी उस रात। पराई औरत का जिक्र और सादिक वह रूप डरा गया था उसे। मगर सादिक बीड़ी सुलगाते हुए चौक पर चला गया था। जहां यारों का अड्डा जमा रहता था रात भर।
नौशाद भाभी की बातें सुनकर सोच में पड़ गई थी तसनीमा। 
वो तसनीमा को और भी बहुत कुछ बताती रहती थी। गोया, किसके यहां क्या चल रहा है सब पता रहता था उसे। किसकी बेटी कहां पढ रही है। किस के बेटे का चक्कर किस से चल रहा है। कौन किस डॉक्टर से किस चीज का ईलाज करवा रहा है---यह भी पता रहता था उसे। अपनी जानकारी पर इतराते हुए एक दिन नौशाद भाभी ने कहा था, मेरी नजर कुछ छिप न सके है---तसनीमा---कोई कितना भी जतन कर ले---
तसनीमा ने उसे छेड़ते हुए पूछा था, सडक़ की तरफ इशारा करते हुए --- अच्छा बताइए---इस औरत ने किस रंग का सूट पहन रखा है---
कुछ दूरी पर काले बुरके में एक काया चली आ रही थी। सर से पांव ढंकी काया। कुछ नजदीक आने पर नौशाद भाभी ने बताया था---बड़े ही शांत लहजे में, यह जरीन है जानेमन---जीन्स और टी शर्ट पहन रखा है इसने बुरके के नीचे---मेन मारकेट जाएगी और बुरका उतार कर मजे से घूमेगी---पूरा मारकेट---
चौक पड़ी थी तसमीमा। भाभी की जानकारी पर नहीं---इस नायाब तर्जुबे पर। हैरत से उसकी आंखे फैल गई थी---बुरके के नीचे जीन्स---
हां---नीचे और भी बहुत कुछ है जानेमन---
क्यों करती है यह भला ऐसा----
मरदों को लुभाने के लिए ----
मरदो को लुभाने के लिए ----तसनीमा की समझ में कुछ न आया था।
तू बड़ी भोली है---मासूम है---तसनीम ---खुदा तेरी इस मासू्मियत को बचाए रखे---
तब नौशाद भाभी ने आगे कहा था---पता है ये लडक़ी कहां जाती है---
कहां---
अजीब-अजीब जगहों का नाम लिया था भाभी ने। तसनीमा उन जगहों के बारे में कुछ खास नहीं जानती थी। यही समझती थी कि इन जगहों पर बड़ी-बड़ी दुकानें हैं। महंगी चीजों के। आज एक दूसरी दुनिया की परते खुल रही थी उसके आगे जैसे---जहां सब कुछ नया-नया और चौंकाने वाला था। फिर नौशाद भाभी ने आगे कहा था,
घर में कोई मरद कमाने वाला नहीं हो तो ---रोकटोक करने वाला नहीं तो मन उड़ेेगा ही---किसे नहीं चाहिए बढिया और कीमती मोबाईल---महंगे कपड़े और लजीज खाना---
संकोच के मारे उसने आगे कुछ नहीं पूछा था। लेकिन वह और भी बहुत कुछ जानना चाहती थी उस बुरके वाली के बारे में। दो-चार दिनों में वह एक बार जरूर दिखाई दे जाती थी।  इतना तो अंदाजा लगाती थी कि वो घनी और बहुत बड़ी आबादी वाले मोहल्ले के दूसरे छोर पर रहती थी। क्योंकि तसनीमा के घर तक यानी सडक़ तक पहुंचते-पहुचते उसकी चाल धीमी पड़ जाती थी।  कभी-कभी वो रिक्शे पर होती। तसनीमा ने बहुत बार देखना चाहा था उसका चेहरा, मगर नहीं देख सकी थी। बुरके में सिर्फ उसका चप्पल ही दिखाई पड़ता था। और उसके ऊपर  थोड़ा सा जीन्स का हिस्सा। मुशिक्ल से दो या तीन उंगली भर। जिसका रंग बदलता रहता था। मोहरी की साइज बदलती रहती। उनके कंपन का अंदाज बदलता रहता। कभी वो चुस्त होती तो कभी बड़े घेरेवाली। कभी उनमें जरी का काम होता तो कभी पायल जैसा कुछ उसके साथ टंका होता।
तसनीमा ने कभी जीन्स नहीं पहना था। बस देखा था। मायके यानी उसके कस्बे में भी लड़कियां जीन्स पहनती थी। लेकिन उसके लिए तो इसकी कल्पना भी गुनाह थी। हालांकि सादिक कई  बार बता चुका था कि वह तसनीमा को जीन्स में देखना चाहता था। मगर सुबह-सुबह होते कई बातों के साथ जीन्स वाली बात वह भूल जाता। तसनीमा को पता था उसकी इस आदत के बारे में। सो उसे बहुत मलाल भी नहीं होता था। तीन ईद कर चुकी थी वह ससुराल में। बड़ी मुश्किल से ईद में एक सूट खरीद पाती थी। राशन के पैसे से कुछ बच-बचाकर। कल्लन खाला के लिए साड़ी सादिक ले आता था। अब तो साज-सिंगार भी भूलती जा रही थी। एक नाइसिल का पाउडर और नारियल का तेल ही होता था उसके कमरे में श्रंगार के लिए। पाउडर हामिद के लिए आया था। और तेल कल्लन खाला भी लगा लेती थीं। मगर इससे क्या होता है। नौशाद भाभी कहती हैं - सादगी में भी कयामत की अदा होती है। आइना देखने लगी थी वह। सचमुच, वह अभी तक कयामत थी। बिना किसी बाहरी दिखावे के। ऊपर से नीचे तक उसकी बनावट में कोई फर्क, कोई ढीलापन नहीं आया था। फिर भी वह नकाब में छिपी उस लडक़ी या औरत को, जो भी थी, उसे देखना चाहती थी। 
एक दिन न जाने क्यों जीन्स के वे घेरे उसके सहन के पास आ कर रुक गए थे। बुरके के अंदर से दो आंखों ने तसनीमा को भरपुर नजरों से देखा था। जैसे कुछ कहना चाहती हो। तसनीमा को हैरत हुई थी। घबरा गई थी वह। कुछ ही मिनटों में उसकी पेशानी पर पसीने की बंदें चमकने लगी थी।  वह हामिद को उठाकर, जल्दी से अपने कमरे में चली गई थी।
कुछ और बातें सुनी थी उसने उसके बारे में। यह कि बडे-बड़े रसूखदारों तक पहुंच है इस लडक़ी की। शायद इसीलिए अड़ोस-पड़ोस के लोग इससे कुछ कहने से परहेज करते थे। दामन बचा कर निकल जाने में ही अपनी खैर सझते थे। इसी तरह की कितनी बातें।  
यह भी अजब संयोग था। ठीक उसी दिन मसजिद में खास दुआ रखी गई थी। ऊंची मीनार तसनीमा के घर से ही दिखाई पड़ती थी। सूरज जब अलगनी पर टंगा होता तो इस मीनार की छाया घर पर पड़ती थी। उसी की माइक से आवाज आ रही थी मौलवी अतीक की। दुआ के दरम्यान उनकी रोती हुई आवाज खुद सुनी थी उसने---ऐ अल्लाह हमें माफ करना---हम अपनी औरतों को परदे में नहीं रख सकें---बेलगाम, बेपरदा और बेहया हुई जाती हैं हमारी मां - बहनें---हमें इनको काबू में रखने की तौफीक और ताकत अता फरमा दे खुदा---
तसनीमा ने उंगलियों पर गिना था। वह दूसरे महीने की पच्च्चीस तारीख थी, जब सादिक नहीं आया था। कैसा-कैसा तो मन होने लगा था तसनीमा का।
लेकिन सादिक आया था। बदला - बदला-सा। लहजा, चेहरा, आवाज---सबकुछ---
कुछ कहना चाहता था। मगर कह नहीं पा रहा था। दूध पीते बच्चे को एक बार भी नहीं प्यार नहीं किया था उसने।
खुद कल्लन खाला भी अंदेशे में थी। बहुत पूछने पर भी सादिक ने उसे कुछ नहीं बताया।
सादिक की हालत देख कर कुछ पूछने की हिम्मत न कल्लन खाला कर पा रही थी न तसनीमा। बस दोनों चुपचाप इंतेजार करने लगी थीं। सादिक चेेहरे को पढऩे की नाकाम कोशिश के बाद। अब यही रास्ता बचा था।
और जब सादिक ने बोला तो तसनीमा की चीख निकल गई। कल्लन खाला सकते में पड़ गई। और नौशाद भाभी ने उचककर नाली में थूक दिया। 
फिर सादिक ने ही कहा था---वो यहीं रहेगी---भाभी---नहीं तो मैं मर जाऊंगा---तसनीमा भी रहेगी---इसमें बहुत ज्यादा  शोरगुल करने की जरूरत क्या है
सब देखने लगे थे उसकी तरफ। कहां से आई थी उसमें इतनी ताकत, इतनी हिम्मत?
यह कोई पहली बार तो नहीं है---मोहल्ले में कितन लोग हैं जिन्होंने दो शादिया की हैं---शरीयत में है---
हिचकते-हिचकते सादिक ने कह ही दिया था।
शरीयत अब जैसे इसी लिए है---हवस पूरी करने का लाइसेंस-----------नौशाद भाभी ने कहा था। फिर वो तसनीमा की ओर मुड़ी थी, तू क्या कहती है---बोल---
मैं यह हरगिज नहीं बर्दाश्त करूंगी---पंचायत बैठाऊंगी---
उससे क्या होगा---
पहले क्या लोग नहीं गए हैं पंचायत में----
फिर सादिक सख्त हो गया था, मोहल्ले में तमाशा कराना है तो कराओ इज्जत तेरी मां की---कल्लन खाला और नौशाद भाभी के लिहाज में शायद उसकी जुबान बंद हो गई थी लेकिन फिर दूसरे ही पल उसने नरम होने की कोशिश करते हुए कहा था, वैसे खर्चे पानी में कोई कमी नहीं होगी----
मौलवी अतीक आए थे।  सफेद टोपी और सफेद कुरता पायजामा और मुंह में ढेर सारा पान भरा हुआ। मोटे होंट और लंबी दाढ़ी। अजीब सी नजरों से उन्होंने देखा था तसनीमा को। साथ में हाजी हलीम और सदर महमूद मिया। सभी को बुलाया था सादिक ने। पांच सौ रुपये की प ंचायती फीस चुका कर।
सब सुनने के बाद मौलवी अतीक ने पान के साथ ढेर सारी सफेदी उंगलियों से चाटते हुए कहा, लडक़ी अगर इस्लाम कबूल कर लेती है तो शरीयतन इस शादी में कोई उज्र नहीं है।
सुन कर फुफकार पड़ी थी तसमीना, मुझे यह मंजूर नहीं है.---लगा था उसकी आंखे बाहर निकल आएंगी, घर में मैं रहती हूं क्या पकता है---कैसे घर चलता है---अपने बच्चे के लिए दूध तक के पैसे नहीं दे सकता यह----ऊपर से रातदिन इसकी मां के ताने कि मैं ही सादिक को घर में टिकने नहीं देती---मैं ही इसे संभाल नहीं पाई----क्या - क्या संभालती फिरूं --- मैं ही जानती हूं---कैसे गुजारा हो रहा है---ऊपर से एक सैौत---मैं जान दे दूंगी मगर यह नहीं होने दूंगी----
मगर मौलवी अतीक उतने ही शांत थे। तजुर्बे, उम्र और शरीयत की जानकारी के बोझ से लदे। खुद तीन बीवियों के मालिक थे वे। एक गांव में दो यहां। 24-25 साल की उम्र में जब इस मोहल्ले में आए थे तो साइकिल का पंक्चर बनाने का काम करते थे। मसजिद से लगे मुसाफिर खाने में रहते थे। पांचों वक्त नमाज पढ़ते थे। मुसाफिर खाने में रहने की एक शर्त यह भी थी। धीरे-धीरे दीन की तरफ ध्यान लगने लगा। फिर एक दिन इल्हाम हुआ कि ये दुनिया तो फानी है। गैर सबाती है। खत्म हो जाने वाही चीज है। कहां फंसा तू। इससे निकल और दीन की खिदमत में लग जा।
और फिर अतीक लग गए दीन के काम में। पंक्चर टायरों को गंदे पानी में डालकर उनके छेद ढूंढने और पंप से उनमें हवा भरने रहने से निजात तो मिली ही, मोहल्ले में रुतबा भी बढऩे लगा। हालांकि अभी मसजिद में सिर्फ अजान देने का काम मिला था। इमामत का जिम्मा यूपी, सहारनपुर के मौलवी असद पर था। वे 70 पार कर रहे थे।  दीन के साथ उनकी खिदमत में भी लग गए अतीक मियां।  वे यूपी लौटने लगे तो मोहल्ले वालों को इस बात पर राजी कर गए कि उनके बाद अतीक ही इमामत की जिम्मेदारी भी संभालेंगे। फिर देखते-देखते सब हुआ। चार कमरों का खुला मकान, फ्रीज, कपड़ा धोने की मशीन, दो रंगीन टिवी, तीन बीवियां और पांच बच्चों का सुख।
तो एक तब के दिन थे। एक आज का दिन। तो मौलवी अतीक इस वक्त बेहद शांत और संजीदा थे। जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।
वे  हैरत से देखने लगे थे, तसमीमा और उसकी ऊंची आवाज को।
फिर कल्लन खाला की तरफ देखते हुए कहा था,
लगता है बहू-बेटियों को तमीज नहीं सिखाया तुमने---बड़ों के साथ पेश आने का।
कल्लन खाला ने तसनीमा को इशारा किया था। तसमीना ने सर पर से दोपट्टा चेहरे तक गिरा लिया। मगर उसकी ऊंची आवाज बंद नहीं हुई थी,
मेरे साथ नाइंसाफी हो रही है। खुदा का कहर टूटेगा सब पर। यह एकतरफा फैसला मुझे मंजूर नहीं है----तसनीमा अब लगभग चीखने लगी थी। नौशाद भाभी और कल्लन खाला उसे जबरने उठाकर अंदर के कमरे की तरफ ले गई थीं। तसमीना छटपटाती रह गई थी। जैसे जबह होने से पहले बकरा तडफ़ड़ाता है।
बहुत देर की जोर-बहस के बाद सभी चले गए थे। फैसला वही हुआ था जो होना था।
सादिक पंचों को छोडऩे गया हुआ था। सफेद एम्बेस्डर कार की पिछली सीट पर बैठते हुए हाजी हलीम ने कहा था, तौफीक साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि तसनीमा के मन में कुछ और चल रहा है---
मतलब---
आपने देखा नहीं उसका गुस्सा---फिर उसकी खामोशी---
आगे की सीट पर बैठे सादिक ने पीछे मुडक़र कहा था, ज्यादा से ज्यादा तलाक मांग सकती है और क्या---मैं इसके लिए भी तैयार हूं----क्यों अतीक साहब..
नउजबिल्लाह---ऐसी मनहूस बातें नहीं करते बेटे---जानते हो खुदा ने इसे जायज जरूर करार दिया है मगर जायज होते हो हुए भी खुदा की नजर में यह इंसान का सबसे गिरा हुआ अमल हैै---सबसे ज्यादा नापसंद चीजों में से एक है तलाक---
लेकिन अगर तसनीमा नहीं मानी तो----
आपने करार निकाह के बारे में सुना है----? सदर महमूद साहब जो टाउन हाइ स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते थे, ने विषय बदलते हुए तब पूछा था। 
नहीं तो---? यह क्या है---मौलवी अतीक को अपनी न इल्मिी पर हैरत हुई।
बाहर से हिंदुस्तान आने वाले गैरमुल्की रईस मुसलमान आज कल यही कर रहे हैं---यहां शादियां करते हैं और निकाह के वक्त ही लड़कियों से तलाकनामे पर साइन करवा लेते हैं ताकि जब जी चाहे इस निकाह से छुटकारा पा जाए---
और लडक़ी वाले मान भी जाते हैं---
कुछ पैसे-वैसे का मामला होता है---फिर सब मान जाते हैं---लडक़ी के घरवालों से लेकर काजी तक---
यह तो तलाक की आड़ में लड़कियों की खरोद-बिक्री है एक तरह से ---
हां गरीबी जो न करा दे---मौलवी अतीक ने ही कहा था। फिर उन्होने ही आसमान की तरफ देखते हुए कहा था,

या मौला---किस तरफ जा रहा है दीन---
महमूद साहब ने आगे कहा था, दरअसल इस तरह के निकाह का तरीका अरब से आया है----
अरब से ---मैं कुछ समझा नहीं---यह हाजी हलीम थे।
सऊदी अरब में इन दिनों मिस्यार का चलन है। इसके तहत औरत और मर्द बिना निकाह किए साथ रह सकते हैं और जिस्मानी संबंध भी बना सकते हैं---
अच्छा---हैरत से खुली रह गई थी सबकी आंखे। सदर साहब ने आगे कहा था, मर्द चाहे तो अपनी मिस्यार बीवी को कुछ खर्च दे सकता है या नहीं भी दे सकता  है---साथ रह सकता है या नहीं भी रह सकता है --- सब उसकी मर्जी पर है। यही नहीं एक मर्द एक साथ चार मिस्यार बीवियों के साथ संबंध रख सकता है। और बदलते जमाने में ऐसी औरतों की कमी नहीं जो मिस्यार को तरजीह दे रही हैं---वजह जो भी हो
सुनकर अवाक रह गए थे सभी। सादि ध्यान से यह सब सुन रहा था। उसका आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था। कुछ लफ्ज उसके गले में अटक रहे थे। मगर बड़े लोगों के बीच बोलना हिमाकत है, जानता था वो। कहीं बनता मामला बगड़ न जाए। महमूद साहब जारी थे, असल में कुछ साल पहले जब दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में थी, तब इसका असर अरब पर भी पड़ा। ऐसे में  निकाह का खर्च मरदों पर भारी पडऩे लगा। .तब इस खर्च से बचने के लिए उलेमा ने यह रास्ता निकाला---
फिर भी क्या ये जायज है---शरीयतन?
---अरब के उलेमाओं ने इसे जायज करार दिया है। कहते है जब शुरुआती दिनों में मुसलमान जिहाद पर जाते थे, तब अपनी जरूरतें मिटाने के लिए  मिस्यार का सहारा लेते थे। बाद में यह रिवाज खत्म कर दिया गया। लेकिन हुकूमत ने चार-पांच सालों से इसे फिर से मंजूरी दे दी।
इसके बाद खामोश पड़ गए थे सभी। लगा था सदी का सबसे बड़ा मगर सबसे घिनौना सच उनके सामने खोल कर रख दिया गया हो। उबकाई आने लगी थी हाजी हलीम को। कैसा-कैसा तो मन हो आया था। उल्टी जैसा।  तभी, कार एक झटके से रुक गई थी। हाजी साहब का घर आ गया था। वो सब को छोड़ कर घर की जानिब चल दिए थे।
दूसरे दिन चला गया था सादिक।
जाते हुए उसने कल्लन खाला से कहा था, तसनीमा को सुनाते हुए, अगली बार आएगा तो अकेला नहीं होगा।
कल्लन खाला ने हमेशा की तरह सर पीट लिया था। तसनीमा अपने कमरे में हामिद को सुलाने की कोशिश कर रही हामिद जाग कर चिल्लाने लगा था। तसमीना ने दूघ का बोटल उसके मुंह से लगा दिया था। जिसे छिटक वह फिर रोने लगा था। वह  खाली बोटल से ही उसे बहलाने की कोशिश कर रही थी। जिसे अब शायद वह समझ चुका था। तसमीना ने परदा सरका कर अपनी छातियों को टटोलने लगी थी। शायद वहां ही दूध हो। तीन दिन से लगातार भूखे रहने से छातियां भी सूखने लगी थीं। हामिद ने वहां से भी मुंह झटक लिया था। रोते हामिद को उसने पीटना शुरू कर दिया था। कल्लन खाला ने हामिद को उससे छीनते हुए कहा था, पागल हुई जा रही हो---गुस्से पर काबू रखना सीखो---खुदा के लिए ---यह मरदों की दुनिया है। इनसे पार पाना मुश्किल है। ---शौहर तो हाथ से गया अब बच्चे की भी जान ले लोगी क्या---बड़बड़ाते हुए वो हामिद को लेकर अपने कमरे में चली गई थी।
तसनीमा लेटी की लेटी रही। मगरिब की नमाज का संक्षिप्त वक्त निकलता रहा। आज नमाज  के लिए उठने का जी नही हुआ। लेटे-लेटे उसकी नजर बेहिश्त जेवर पर पड़ी। विदाई के वक्त मां ने दिया था। कहा था खास इहतेमाम करने को। यह भी कहा था मन कभी मचले तो इसे पढऩा। एक मुसलमान बीवी की सारी मुश्किलों का हल है इसमें। सभी सवालों के जवाब। यह किताब नहीं जेवर है लड़कियों के लिए। घर की जीनत है। लेटे-लेटे वह उसी के पन्ने के पलटने लगी। इन शब्दों पर उसकी नजर अटक गई, बीवी की जाएज ख्वाहिशों का एहतेराम शौहर के लिए जरूरी है, मगर उससे भी ज्यादा जरूरी है एक बीवी को शौहर की जरूरत को पूरी करना। शौहर तुम्हारे लिए मिजाजी खुदा है।
सोचने लगी थी तसनीमा तो क्या ऐसे ही होते हैं खुदा?
उसकी अक्ल ने मानने से इनकार कर दिया। कहा तो गया है खुदा सत्तर मांओं से ज्यादा प्यार करने वाला है। तो फिर उसी के साथ ऐसा क्यों हो रहा है। बहुत कुछ उसके अंदर घुमडऩे, बनने-बिगडऩे लगा था। जैसे एक शीशी से सभी रंगों को मिला कर मिक्स कर दिया गया हो। फिर उससे एक रंग निकालने को कहा जाए। तसनीमा का सर दुखने लगा था। इसी कैफियत में पता नहीं कब नींद आ गई। आंख खुली तो सुबह हो चुकी थी। नौशाद भाभी हामिद को गोद में ले कर उसे झिंझोड़ रही थी। वो खाने के लिए बड़े का गोश्त और चावल और कुछ चपातियां लेकर आई थी।
सादिक को पंद्रह दिन हो गए थे, उस सांवली सी लडक़ी को लेकर आए। तसनीमा को अपना कमरा छोडऩा पड़ा था। वो कल्लन खाला के कमरे में सोने लगी तिपाई बिछा कर। नौशाद भाभी के गले से लिपट कर सिसकने लगी थी। कल्लन खाला पानी लाने के लिए गई म्यूनिसपैलिटी के नल पर गई हुई थी।
नौशाद भाभी ने बड़े प्यार से उसकी पीठ सहलाती रही थी। देर तक। पीठ के सहारे बहुत सारा दर्द रिसता रहा था। किसी को पता नहीं था, मगर सादिक ने उसे कल रात फिर पीटा था।
मुझे यहां से ले चलो---अब मैं इस घर में नहीं रहना चाहती----
इतनी कमजोर हो तुम---इतनी जल्दी हिम्मत हार गई----चल मार्केट हो कर आते हैं---मन बहल जाएगा----
अनमनी-सी तसनीमा तैयार हो गई थी। वह शहर का सबसे शादनार मार्केट था। जहां ईट की जगह रंगबिरंगे कांच झिलमिला रहे थे। फर्श की जगह दूध सी चिकनी और चमकदार टाइल्स लगे थे। नौशाद भाभी शायद यहां पहले भी आ चुकी थी। इसलिए कांप्लेक्स की परादर्शी सीढियां वह बिना किसी कौतुहल के, लापरवाही के साथ चढ़ रही थी। चार मंजिला इस कांप्लेक्स की हर मंजिल पर धीमे बजते संगीत ने अलग समा बांध रखा था। फिर हवा में तैरती गुलाब-की सी खुशबू। एक गारमेंट शॉप के सामने आकर रुकी थी वह। शोकेस में सजे कपड़े किसी को भी बेचैन और गरीब बना सकते थे। देर तक देखती रही थी तसनीमा यह सब। नौशाद भाभी के साथ घिसटती हुई सी वह भी शाप के अंदर दाखिल हो गई थी।
यहा क्यो लाई हो भाभी ---मेरे पास तो पैसे भी नहीं हैं कुछ लेने के लिए --
जो लेना हो ले लो----बाद में मन होगा तो लौटा देना नहीं तो कोई बात नहीं----
तसनीमा की नजर वहां सजे एक जीन्स पर टिक गई। पीली जरी का काम किया हुआ जीन्स। नौशाद भाभी ने तभी उसे भरपूर  और नशे भरी नजरों से देखा।
ऐसे क्या देख रही हैं आप---लजा गई थी तसनीमा।
तुम्हारी साइज---फिर फुसफुसाते हुए कहा,
कोई कह नहीं सकता तुम एक बच्चे की मां हो, बहुत ताकतवर हो तुम---तुम्हें एक ट्रक ड्राइवर से पिटने की जरूरन नहीं---देख तो जरा इसे पहन कर कैसी लगती है मेरीजान---
हैंगर से जीन्स निकालकर उसने तसनीमा को धकियाते हुए ट्रायल रूम के अंदर बंद कर दिया था। आदमकद शीशे के सामने।
बाहर, एक कोने में वही बुरके वाली लडक़ी खड़ी थी। बिना बुरके के। नौशाद भाभी पास के फरवाले दुधिया सोफे में धंसकर पान बनाने लगी थी। एक नहीं तीन।
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3 Jan 2013

दिल्ली में हुए रेप के बाद उठते कुछ जरूरी सवाल -

दिल्ली में हुए रेप पर जिस तरह से शोर बरपा है और जिस तरह से मीडिया इसे स्पेस दे रहा है, यह सब जरूरी है। इस घटना की निंदा की जाए कम है। लेकिन इस मीडिया प्रसंग पर कुछ सवाल उठ रहे हैं, जिनके जवाब ढूंढने का सही समय यही है। कुछ सवाल :
- क्या मीडिया ने उन बलात्कारों को स्पेस देना कभी जरूरी समझा जो लगभग हर रोज दिल्ली, चंडीगढ़ वगैरह जगहों पर रोजगार के लिए गर्इंं आदिवासियों लड़कियों के साथ हो रहा है? हमारे झारखंड के सिमडेगा जिले में एक गांव है जिसे कुंआरी मांओं का गांव कहा जाता है। इन मांओं में ज्यादातर बलात्कार की शिकार हैं।
- कुछ दिन पहले बिहार में एक लडक़ी के साथ रेप हुआ और उसकी वीडियो फिल्म बनाई गई। कई-कई बार। उसके परिजन पुलिस और अदालत के पास गुुहार लगाते-लगाते थक गए लेकिन एक भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी। अंत में लडक़ी ने आत्महत्या कर ली। उसने सोसाइट नोट में लिखा कि कैसे आरोपियों को बचाने के लिए समाज के अलमबरदार से लेकर नेता और पुलिस तक गोलबंद हो गए। यह नोट कई अखबारों में छपा। और अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई।
-इसके अलावा उन झुगगी झोपडिय़ों और महानगरों की फुटपाथ हर दिन होने वाले उन अनगिनत बलात्कारों की खबर कौन लेता हैं जो अखबार में सिंगल या बमुश्किल दो कॉलम की जगह पाती हैं। इनका टीवी पर आना तो खैर दूर की बात है।
इसलिए --
बहुत सही है अरुंधती राय का कहना है कि -"विरोध होना चाहिए लेकिन चुन चुन के विरोध नहीं होना चाहिए. हर औरत के रेप का विरोध होना चाहिए. ये दोहरी मानसिकता है कि आप दिल्ली के रेप के लिए आवाज़ उठाएंगे लेकिन मणिपुर की औरतों के लिए, कश्मीर की औरतों के लिए और खैरलांजी की दलितों के लिए आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते हैं.

इन मासुमों को भला कौन समझाए---?



बहुत सारे लोग शोर कर रहे हैं कि दिल्ली में हुए सामूहिक रेप कांड को जितना स्पेस मीडिया में मिल रहा है, उतना क्या दूसरी जगहों पर बारहों महीने होते रहने वाले बलात्कार को स्पेस मिल पाता है? अब ऐसे मासूमों को कौन समझाए कि ओबी वैन को दूसरी जगह ले जाना कितना खर्चीला होता है। न ही बलात्कार की शिकार हर लडक़ी मेडिकल की छात्रा होती है। और न ही दिल्ली की तरह किसी और जगह स्टूडियो में बैठे-बिठाए इतने बड़ी-बड़ी शख्सियतें बलात्कार पर बहस करने के लिए सस्ते और सहज उपलब्ध हो सकती हैं। इसके अलावे दिल्ली दिल्ली है। देश की राजधानी है। ये हम सब का लोकतांत्रिक दायित्व बनता है कि पहले अपने देश की राजधानी के बारे में सोचें। फिर अपने छोटे-मोटे शहरों और गांव, देहात या कस्बों के बारे में होने वाले बलात्कार के बारे में सोचें। मीडिया के इस चरित्र पर उंगली उठाने वाले ये भी नहीं जानते कि न्यूज चैनलों की टीआरपी में ६० से लेकर ७० प्रतिशत तक की भागीदारी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता वगैरह महानगरों से ही तय होती है। यानी मीडिया की रोजी-रोटी का बंदोबस्त ये ही महानगर करते हैं। तो भैया पहले अपनी रोजीरोटी देखेेंगे या जमाने के और दर्द। ऐसे लोगों को मीडिया की यह मजबूरी भी नहीं दिखती कि इसने चुनाव में हैट्रिक लगाने वाले मोदी का मोह तक त्याग दिया है, जिसे मीडिया ने अब तक प्रधानमंत्री तक के रूप में स्थापित कर दिया होता। मगर मोदी का सम्मोहन और गलैमर भी दिल्ली के आगे पानी भर रहा है। और तो और सचिन का संन्यास भी मीडिया के इस चरित्र को नहीं हिला पाया।