30 Apr 2013

धर्म की दीवार में औरतें

चार साल पहले केरल की एक कैथोलिक नन सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा ‘आमीन’ ने कैथोलिक चर्च के दमघोंटू माहौल और धर्म के आडंबर की आड़ में जारी दुराचारों को समाज के सामने लाने का काम किया. तीन साल पहले केरल के कोल्लम जिले की एक कैथोलिक नन अनुपा मैरी की आत्महत्या ने चर्च की कार्यप्रणाली पर ढेरों सवाल खड़े कर दिये थे. इसके पहले सिस्टर अभया ने भी अनुपा मैरी वाला रास्ता चुना था और इन दोनों की लाशें कान्वेंट में ही पाई गई थीं.  

आर एल फ्रांसिस की खास रपट--- रविवार डॉट कॉम से उधार-


हर साल महिला असुरक्षा को लेकर ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर जोरदार भाषण होते हैं. वहीं महिला अस्मिता को लेकर सरकारे भी लम्बे-चौड़े वायदे कर अपनी दरयादिली दिखाने में पीछे नही रहती. तमाम कोशिशों और कानूनों के बावजूद इस बात को लेकर आशंका बनी रहती है कि घर के अंदर और बाहर महिलाओं की स्थिति में कोई बड़ा फर्क आएगा. यह सब इसलिए है क्योंकि महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा बहुत जटिल है और यह तभी हल होगा, जब हम समाज और परंपरा से लेकर कानून व्यवस्था की जड़ता को खत्म नहीं कर लेते.

यह शायद टूट भी जाए लेकिन उन करोड़ों महिलाओं का क्या होगा, जो धार्मिक रीति रिवाजों और परंपराओं की एक अटूट डोर से बंधी हुई हैं और सात पर्दों में ढके हुए उनके जीवन पर कोई चर्चा ही नही करना चाहता. ऐसी महिलाओं की संख्या दुनिया में लाखों में है. कहीं वह छोटे धार्मिक समूहों में है और कहीं कैथोलिक चर्च की विशाल व्यवस्था में. उनमें से अधिकतर के सामने गंभीर चुनौतियां हैं. ऐसी व्यवस्था में उनके लिए अंदर जाने का रास्ता तो होता है लेकिन बाहर आने के सभी दरवाजें बंद कर दिए गए हैं. इस कारण ज्यादातर मानसिक बीमारियों की जकड़न में हैं.

चार साल पहले केरल की एक कैथोलिक नन सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा ‘आमीन’ ने कैथोलिक चर्च के दमघोंटू माहौल और धर्म के आडंबर की आड़ में जारी दुराचारों को समाज के सामने लाने का काम किया. तीन साल पहले केरल के कोल्लम जिले की एक कैथोलिक नन अनुपा मैरी की आत्महत्या ने चर्च की कार्यप्रणाली पर ढेरों सवाल खड़े कर दिये थे. इसके पहले सिस्टर अभया ने भी अनुपा मैरी वाला रास्ता चुना था और इन दोनों की लाशें कान्वेंट में ही पाई गई थीं.

अनुपा मैरी ने अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा था कि उसे यह रास्ता इसलिए अपनाना पड़ा क्योंकि कान्वेंट में उसका मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा था. नन के पिता ने चर्च व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि उसकी पुत्री का यौन शोषण किया जा रहा था और उसने अपनी तकलीफ को अपनी मां और बहन के साथ साझा किया था.

केरल के कन्नूर जिले की एक और नन सिस्टर मैरी चांडी ने ‘स्वास्ति’ नामक आत्मकथा लिखकर चर्च के अंदर घुट-घुट कर मरती ननों पर बहस को आगे बढ़ाने का काम किया है. सिस्टर मैरी चांडी ने बंद दरवाजों के अंदर यौन कुंठाओं के शिकार अपने ही सहयोगी पादरियों तथा अन्य अधिकारियों के व्यवहारों की व्याख्या के साथ देह की पवित्रता बनाए रखने के नाम पर ननों के लिए गढ़े गए आडंबरों की पोल खोल दी है.

यह दोनों महिलाएं 52 साल की सिस्टर जेसमी और 67 साल की सिस्टर मैरी चांडी कोई साधारण महिलाएं नही हैं. वह पिछले तीस वर्षों से कैथोलिक चर्च के विभिन्न संस्थाओं में अवैतनिक सेवा कर रही हैं. सिस्टर जेसमी अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं और अगस्त 2008 तक वह त्रिसूर में चर्च द्वारा चलाए जाने वाले एक कालेज की प्राचार्या थीं. तीन दशक तक चर्च की सेवा करने के बाद उन्होंने चर्च के अंदर ननों के साथ होने वाले अनाचार का राज खोलने का साहस दिखाया है.

हाल ही में आयरलैंड में गर्भपात को लेकर एक बहस दुनिया भर में चली और बंद भी हो गई. क्योंकि वेटिकन- कैथोलिक चर्च ने इसमें कोई छूट देने से मना कर दिया क्योंकि चर्च नहीं चाहता कि धार्मिक कायद-कानूनों में कोई बदलाव किया जाए. जहां तक कैथोलिक ननों का सवाल है तो खुद पोप भी मानते हैं कि दस में से एक नन मानसिक रुप से परेशान होती है और उसे इलाज की जरुरत है.

व्यवस्था के विरुद्व आवाज उठाने वालों को रिट्रीट सैंटर में भेजने और पागल करार देकर इलाज के नाम पर एक अंतहीन शोषण का सिलसिला शुरु किया जाता है (इनमें पादरी और नन दोनो होते हैं), जहां उनकी मर्जी के विरुद्व जबरदस्ती उनका इलाज किया जाता है, जो एक नर्क से कम नही होता.

ऐसे मामले यह दर्शाते हैं कि धर्म की आड़ में बहुत कुछ ऐसा चल रहा है, जिसे उत्पीड़न की हद भी कहा जा सकता है लेकिन इसमें पीड़ितों की सुनवाई कहीं नहीं है. उम्मीद की जानी चाहिए कि दूसरों को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाने वाले खुद भी इन्हें अपने काम के तरीकों में अपनायेंगे. देश में केरल ही एक ऐसा राज्य है, जहां से सबसे ज्यादा नन और पादरी आते हैं. एक लाख चालीस हजार ननों में से हर तीसरी नन केरल से आती है. ऐसे ही आंकड़े पादरियों के बारे में भी मिलते हैं.

वेटिकन के एक अध्ययन के मुताबिक सैमनरियों में पादरी तथा नन बनने के दौरान दस में से केवल चार पुरुप ही इस पेशे में टिक पाते हैं तथा बाकी अपने स्वाभाविक जीवन में लौट जाते हैं जबकि महिलाएं बहुत कम संख्या में वापिस लौट पाती हैं. इसकी वजह यह है कि महिलाओं पर परिवारिक और सामाजिक दबाव बहुत ज्यादा होता है, इसलिए वह चाहकर भी वापिस नहीं लौट पातीं.

केरल के कुछ चर्च सुधार समर्थक ईसाइयों की तरफ से कुछ साल पहले राज्य महिला आयोग से मांग की गई कि नन बनने की न्यूनतम आयु तय की जाए क्योंकि विश्वासी परिवार छोटी बच्चियों को ही नन बनने के लिए भेज देते हैं, जबकि वह खुद फैसला लेने में सक्षम नहीं होतीं.

नन बन चुकी लड़कियों का परिवारिक संपत्ति में अधिकार नहीं रहता. एक तरह से वह परिवारों से बेदखल कर दी जाती हैं. आयोग ने उस समय की वाम-मोर्चा सरकार से कई सिफारिशें की. आयोग ने कहा कि जो मां-बाप अपनी बेटी को नन बनने के लिए मजबूर करते हैं, उन पर कानूनी कार्रवाही की जानी चाहिए. ननों की संपति से बेदखली रोकी जानी चाहिए, अगर कोई नन वापिस लौटना चाहें तो उसके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए.

आयोग ने सरकार से सिफारिश की कि वह एक जांच करवाये, जिसमें यह पता चल सके कि कितनी नाबालिग बच्चियों को नन बनने के लिए बाध्य किया गया और कितनी ननें ऐसी हैं, जो सामाजिक जीवन में लौटना चाहती हैं. लेकिन चर्च के दबाव में किसी भी सरकार ने इस मामले में दखल देना जरुरी नहीं समझा.

चर्च के अधिकारियों ने केरल महिला आयोग के सुझावों को गैरजरुरी तथा अपने धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप करार देते हुए कहा कि यह केवल सुझाव है और इसे मानने या न मानने के लिए हम आजाद हैं. धर्मसम्मत नियम उन ननों पर ‘दया दिखाने’ को कहता है, जो नन होने का परित्याग कर चुकी हों. अध्ययन बताते हैं कि एक चौथाई से भी ज्यादा ननें अपने धार्मिक जीवन से असंतुष्ट हैं.

कार्डिनल वार्की विथायथिल ने अपनी जीवनी ‘स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट आई’ में माना है कि ननें जिन ‘दयनीय परिस्थितियों में रहती हैं,’ अब उन्हें उससे मुक्त करने का समय आ गया है. मेरा मानना है कि हमारी ननें काफी हद तक आजाद स्त्रियां नही हैं.’ वैसे महिलाओं को न्याय देने में आनाकानी करने में केवल चर्च ही नहीं, दूसरे धार्मिक संस्थानों का रुख भी वैसा ही है और इन पर भी बात करने की जरुरत है.

14 Apr 2013

... तो अन्ना राष्ट्रपति होते



बीबीसी के वेब पोर्टल ने सोशल मीडिया और अगले आम चुनाव पर बहस चलाई है. इसमें आरआईएस नॉलेज फाउंडेशन और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडियाके सर्वे को आधार बना कर कहा गया है २०१४ के आ
म चुनाव पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले मतदाता असर डाल सकने की स्थिति में होंगे. दूसरे लफ्जों में सोशल मीडिया का असर इस चुनाव पर पड़ेगा।

इस अध्ययन में कहा गया है कि 2014 के आम चुनाव में 160 संसदीय सीटों के नतीजों पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करनेेवाले लोगों का असर हो सकता है. कहने का तात्पर्य ये कि भारत की 543 लोकसभा सीटों में से 160 सीटें ऐसी हैं जिनके नतीजों पर सोशल मीडिया का प्रभाव हो सकता है. सोशल मीडिया एंड लोकसभा इलेक्शन्स शीर्षक से प्रकाशित ये अध्ययन किया है आरआईएस नॉलेज फाउंडेशन और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने.
इस अध्ययन में सोशल मीडिया के प्रभाव के आधार पर संसदीय क्षेत्रों को उच्च, मध्यम और निम्न प्रभाव वाली श्रेणियों में बांटा गया है. अध्ययन के मुताबिक वैसे संसदीय क्षेत्र जहां फेसबुक यूज़र्स की संख्या कुल मतदाताओं की दस फीसदी से ज्यादा है, उसे उच्च प्रभाव वाला क्षेत्र माना गया है. इसी आधार पर अध्ययन में 543 में से 67 संसदीय क्षेत्रों को मध्यम और 60 सीटों को निम्न प्रभाव वाली सीटें बताया गया है.
इस मुद्दे पर नोएडा के शांतनु श्रीवास्तव की ये राय दिलचस्प है - मैं मानता हूं कि अगले लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया एक निर्णायक भूमिका निभाएगी. जो भी पार्टी इस माध्यम को अनदेखा करने की कोशिश करेगी, उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. पिछले दो तीन सालों मैं विश्व के जिन देशों ने इस माध्यम की  ताकत देखी है, वो चाहे मिस्र हो या ट्यूनीशिया या फिर और कोई देश, यहां तक कि चीन जैसे देश में भी इसकी धमक सुनाई देने लगी है जहां अभिव्यक्ति की आजादी जनता के पास तो है ही नहीं. इसलिए मेरा मानना है कि 2014 में हमें इस माध्यम की ताकत का एहसास होगा.
इस बहस को जालौन के अमित भारतीय ने ये कहते हुए खारिज कर दिया है- सोशल मीडिया की मानी जाए तो अन्ना देश के राष्ट्रपति होते, केजरीवाल/मोदी प्रधानमंत्री, सोनिया के साथ दिग्विजय को निर्वासित कर दिया जाता, कलमाड़ी/राजा को कालापानी की सज़ा मिल जाती, लोकपाल कब का आ चुका होता, देश के सभी भ्रष्ट जेल में होते, रिटेल में विदेशी निवेश को मंजूरी न मिलती. महज 11 प्रतिशत  इंटरनेट उपयोगकर्ता, सोशल मीडिया पर शांति चाहने वालों को वोट डालने में गर्मी/सर्दी लगती है. वे लंबी लाइनों में खड़े नहीं हो सकते. उनकी नजऱ में एक वोट से थोड़ी न देश बदलता है. अमित कहते हैं, 2009 के लोस चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक ने मतदान नहीं किया. जिसमें अधिकतम उच्च और मध्य वर्ग का फेसबुकी समाज था.
(पूरी रपट बीबीसी से उधार)