10 Feb 2017

निदा फाजली ... हमारे समय के कबीर का जाना

पिछले साल, इसी फरवरी महीने की आठ तारीख को निदा फाजली हमें छोड़कर चले गए। उनकी बरसी पर, उन पर लिखा ये याद आया। उनसे बेहद छोटी मगर बेहद आत्मीय मुलाकात, बहुद अदब के साथ
 


निदा फाजली से मेरी दो मुलाकातें हैं। एक मुलाकात इतनी छोटी है कि उसे याद करना बेमानी होगा। जो बाकी है उसे भी मुलाकात कहना बहुत वाजिब नहीं होगा। तब मेरी उम्र वहीं थी जब हर जवान होता मुसलिम किशोर शायर होता है। हिंदी माध्यम स्कूल और सोहबत के बावजूद उर्दू की चाश्नी उन दिनों नया-नया असर डाल रही थी। उपर से मरहूम वालिद साहब का शायर होना और शहर में एक स्थापित उर्दू शायर (खुर्शीद तलब)  का प्रभाव,  बंदा कहां तक अदब से परहेज और गुस्ताखी कर सकता था। लफ्जों की आड़ी-तिरछी लकीरें खींची जाने लगीं। गजले पर गजलें। बाद में पता चला कि गजल कहना कितनी कठिन विधा है। और जब पता चला तो ऐसा पता चला कि शायरी को छोड़कर अफसाने को गले लगा दिया। जिसके साथ आज तक निबाह हो रहा है।
निदा फाजली से मुलाकात शायरी और अफसाने के बीच पशोपेश के इसी आलम में हुई थी। शायरी का खुमार उतरा ही चाहता था। वे गिरिडीह (झारखंड) एक मुशायरे में गाहे-ब-गाहे आते थे। शहर के हम चार-पांच लोग हर बार उनको सुनने पहुंचते। और कहिए उनकी शायरी कम और उनका अंदाज-ए-सुखन, उनका वाल्हाना मोहब्बत, एक बेहद जुनियर से भी अधिक खींचता था। उन दिनों उनकी एक मशहूर गजल का ये शेर काफी चर्चे में था-
यहां कोई किसी को रास्ता नहीं देता
मुझे गिराकर चलना है तो चलो 
मुझे उस जमाने में पूरी गजल याद थी। ये शेर तो खास तौर पर। क्योंकि इसमें जिंदगी की जद्दोजहद झांकती थी। मैंने दौर (मुशायरे के बाद का खास दौर)  के बीच में अपनी डायरी बढ़ाई और उनसे ये शेर लिखने की गुजारिश की। उन्होंने गिलास एक तरफ रखा और लगभग झूमते हुए कहा, लिख देता हूं, लेकिन है बड़ा मुश्किल दोस्त। फिर बड़ी बेबाकी से पूछा, और शुरूआत हुई कि नहीं---
मैंने झिझकते हुए कहा, जी अभी नहीं
उन्होंने मेरे जवाब पर लाहौल पढ़ते हुए कहा, अरे बिस्मिल्लाह के लिए यही तो खास उम्र है। फिर दुनियादारी सीख जाओगो और तरह-तरह के लॉजिक देने लगोगे। और खुदा की इस खास नेमत से महरूम हो जाओगे। फिर धीरे से कान में कहा, और शायरी करनी है तो ----
मुझे कशमकश में देखकर उन्होंने खुद से मेरे लिए गिलास तैयार किया और मुझे थमा दिया। उस वक्त वहां मुनव्वर राणा, वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी, सागर आजमी के साथ और कई बड़े शायर मौजूद थे। बाकियों का नाम याद नहीं आ रहा है। एक शायरा भी थीं, जिसे लुभाने की पुरजोर कोशिशें चल रही थीं। बहरहाल निदा साहब मुझसे छूटे और और उस कोने की तरफ मुड़ गए जिस तरफ जदीद शायरी (उन दिनों की शायरी की नई धारा)  पर बहस की जा रही थी।  निदा साहब की मौजूदगी और सलीके से उनके बात कहने के ढंग के सभी कायल थे। मैंने इस्मत चुगतई के बारे में पढ़ा है कि जब वे सियासत, फिल्म या किसी और मौजूं पर बोलती थीं, तो वहां मौजूद मर्दों को कई दिनों तक अपनी मर्दानगी पर शक होता रहता था। जदीद शायरी पर निदा साहब ने बोलना शुरू किया तो वहां मौजूद कई लोगों पर,  मेरे ख्याल से यही कैफियत तारी होने लगी थी। इस्मत चुगतई की महफिल में मर्दानगी खतरे में होती थी, यहां शायर और उनकी शायरी ही खतरे में पड़ रही थी। भला हो शराब के नशे कि सब गुस्ताखियां उसी में घुल-घुल कर बही जा रही थीं,  नहीं तो ऐसी महफिलों में अखाड़ा जमते भी देर नहीं लगती। ये मेरा अपना जाती तजुर्बा है।
बहरहाल भोर हो रहा था, और हमारी बस का वक्त भी। निदा साहब की मोहब्बत ही थी कि उनके पास से उठने का जी नहीं होता था। वो छोटे से छोटे से अदीब को ये अहसास करा देते थे,  उसकी भी कोई हैसियत और अहमीयत है। उर्दू शायरी के उस्तादों की अकड़ और ठसक को वे हराम समझते थे। बहुत देर के बाद उन्होंने मेरी भरी पड़ी गिलास को देखा और एक शेर कहा, 
देख कर शर्म आई खंजर की उरयानी मुझे
मैंने अपना जामा-ए-हश्ती हवाले कर दिया
ये शेर किसी और का है। लेकिन उस घड़ी के लिए मौजूं था। ये कहते हुए निदा साहब ने मेरा गिलास भी उठा लिया। इसके बाद पर्चों में उनको पढ़ता रहा औऱ् टीवी पर सुनता रहा। निदा साहब ने जिस बेबाकी से इस्लाम के कूपमंडूकों की ऐसी तैसी की है, वैसी बेबाकी शायद ही कहीं मिलती है। किसी ठीक ही कहा है कि वे हमारे समय के कबीर थे। और कबीर हमारे समाज में आज भी वर्जित हैं। निदा साहब में कबीर बनने की हिम्मत थी। शायद यही वजह है कि उर्दू अदब और शायरी में उनको वो मुकाम नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। बनी बनाई लीक पर चलने वाले शायरों के लिए वे चैलेंज और चिढ की तरह थे। मुझे जब भी कहीं मौका मिलता है मैं उनका ये कलाम पढ़कर खूब वाहवाही लूटता हूं-

घर से मस्जिद है  बहुत दूर, चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
या फिर उनका ये दोहा-

बेटा रोया परदेस में भींगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्‌ठी, बिन तार

... और उनकी कम मशहूर गजल


देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ

धुँधली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ


9 Feb 2017

बजट पच्चीसी

संजय झा मस्तान फिल्मों में .....नहीं फिल्मों में नहीं, फिल्मों को हिड़ (एक झारखंडी देहाती शब्द जो मथना शब्द का तत्सम हो सकता है,  इसका अर्थ और ज्यादा सही नहीं बता सकता. बस समझ लिजिए कि भैंस जब गुस्सा होकर गीली मिट्टी पर चक्कर लगाती है तो उसे कीचड़ बना डालती है, भैंसे की कीचड़ बनाने की इस जिद को हिड़ना कहते हैं) रहे हैं। फिल्म बनाने से लेकर लेखन, एक्टिंग, निर्देशन, टिचिंग और न जाने का का करते हैं इ मस्तान। लेकिन जो करते हैं मस्ती से करते हैं। और सबसे ज्यादा जिससे मोहते हैं, वो हैं इनका लेखन। वह व्यंग्य जैसी कठिन विधा में। अाज जब कि व्यंग्य लिखने वाले, जो कि सचमुच व्यग्य लिखते हों, उंगलियों पर गिने जाने लाएक भी नहीं। हिंदी में हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के बाद ज्ञान चतुर्वेदी और केपी सक्सेना का नाम ही इस कमजहीन को याद आता है। हां, व्यंग्य के नाम पर चुटकुले लिखने वालों की लंबी फहरिस्त है। इस रेगिस्तानी ऐहसास गुजरते हुए पिछले दिनों संजय के एक व्यग्य को पढ़ने का मौका मिला। फेसबुक पर। मन ऐसा बाग-बगीचा हुआ कि फोन न ढुंढने लगा। मिल भी गया। बात करने पर उन्होंने सीथे अपने ब्लाग का रास्ता दिखा दिया। वहां जो डुबकी लगाई तो एक से बढ़कर एक व्यंग्य। बिल्कुल नया लहजा। नई शैली। और धार  ऐसी कि सोच और चिंतन-मनन सब धराशायी। बस संजय और इनका लतियाना, जुतियाना और थप्पड़ ही याद रह जाएगा। और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि संजय अगर  अपने व्यंग्य लेखन को  गंभीरता से लें तो मुझे उनमें परसाई की झलक दिखाई पड़ती है। यहां उनका जो व्यंग्य मैंने उनके वेबसाइट से लिया है, इसे पढ़ते हुए शुरुआत में लगा कि कहीं संजय ने परसाई की किसी व्यग्य की पैरोडी तो नहीं लिख दी है। लेकिन जैसे जैसे इसे पढ़ता गया इसने अलग से झिंझोड़ा।  अब आगे अाप और आपकी राय - 


१.
मैं बजट हूँ !
समझौता के जादू को बजट कहते हैं ! मैं पत्नी के सहयोग से बनता हूँ ! दिन में घर का बजट ही रात में पति बन जाता है ! समय पर बिल भुगतान करना, कर्जों का सही समय पर निपटारा करना और अपने बचत, निवेश लक्ष्यों को हासिल करना भी मेरे ही अंतर्गत आता है ! घर का बजट बनाने का अर्थ है कि आप मुझे बना रहे हैं !
२.
मेरी बजट राशि !
जैसे घूमती हुई पृथ्वी घूमती हुई दिखाई नहीं देती, वैसे ही बजट भी हमारे इर्द गिर्द घूमता है पर मुझे कहीं घूमता हुआ दिखाई नहीं देता ! ऐसा जान पड़ता है कि मैं धन का नहीं, धन मेरा चक्कर लगा रहा है ! मेरे साथ चन्द्रमा और सूर्य भी मेरी धन राशि वृत्त पर चल रहे हैं ! मैं वृत्त में नहीं वित्त में पड़नेवाले विशिष्ट असंख्य तारा समूह में एक हूँ और सबके साथ मेरी राशि भी वित्त है !
३.
बजट का हनीमून !
मुझे अच्छी तरह पता है, बजट बनाने का मतलब है कि आप शादी के फंदे में फंस गए हैं ! मेरी गृहस्थी में बजट की शुरुआत हनीमून से ही हो गयी थी ! हनीमून पैकेज के साथ मेरे अंदर बजट शब्द की गंभीर यात्रा शुरू हो गयी ! शादी के तुरंत बाद मुझे पता चल गया था बजट का हनीमून से नाता है ! जितना बड़ा बजट उतना बड़ा हनीमून पैकेज ! बड़ा पैकेज मतलब बड़ा हनीमून, छोटा बजट मतलब छोटे पैकेज का छोटा हनीमून !
४.
भारतीय बजट !
फ्रांस में धन के आय और उसके व्यय की सूची को बजट कहते हैं ! फ्रांसीसी भाषा के शब्द से जन्मे इस बहुमंजिले शब्द से ही दुनिया लाभ में रहना सीखी है ! फ्रांस में आज बजट के साथ जो भी हो रहा हो, भारतीय बजट में अपनी आय और व्यय की भावना को मुझे बैंक खाते में रखना पड़ता है ! बहुमंजिला बजट को समझने की प्रतिभा मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी में है !
५.
चालू खाता !
खाते ! खाते, खाते, खाते और खाते ! खाते – पीते फिर खाते ! खाते – खाते, पीते – पीते ! बैंक और खाते ! खाते – खाते, बैंक – बैंक ! खाते – बैंक, पीते – बैंक ! बैंक – बैंक ! खाते – खाते ! मेरा खाता , मेरा बैंक ! मेरा खाता मेरी खता ! खाता – खता, बैंक बैंक !
६.
बैलेंस बजट !
बजट ब्रह्म है ! वर्ष / केंद्रीय / कोष  / वित्त / मंत्री / आयोग / सरकार / योजना / ग्रामीण / बदलाव / संसद / प्रदर्शन / बिजली / सड़क / गैस / चर्चा / केंद्र / इत्यादि, इत्यादि ! मैं किसी भी शब्द से बजट पर कोई भी वाक्य पूरा कर सकता हूँ ! मेरा बजट मेरा ब्रह्म है ! मेरे बजट का बैलेंस हर शब्द में बना रहता है !
७.
पॉकेट मनी !
मेरे बजट में चार पॉकेट हैं ! दो पैंट के और दो शर्ट के ! मेरे पॉकेट मेरी पत्नी का ही कहा मानते हैं ! मैं सिर्फ उनको धोता और ढोता हूँ ! अपने साल की योजना का इरादा मैं अपने पॉकेट में ही रखता हूँ ! न जाने क्यों जब कभी बजट शब्‍द सुनाई देता है, मेरे हाथ पॉकेट में घुस जाते हैं !
८.
इकोनॉमिक्स !
दिन के, रात के, हफ़्ते के, महीने के, साल के, बजट को पहचानता हूँ ! जैसे घर में मैं अपनी पत्नी को सुनता हूँ वैसे ही टेलीविजन पर सचमुच में वित्त मंत्री को सुनता हूँ ! सिर्फ आलोचना नहीं करता ! मेरे बजट के इकोनॉमिक्स में रुपयों को छोड़ कर फिजिक्स, केमिस्ट्री, हिस्ट्री, जॉग्राफी, बायोलॉजी, स्पोर्ट्स, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण, व्यापार, आकाश, पाताल, जंगल, पहाड़, सब है !
९.
मेरी लाइफ !
मेरी लाइफ इस साल भी स्टायलिश लुक के साथ मॉर्डन फीचर्स वाली इंटीरियर की होगी ! मेरे लिए कम बजट में फैमिली कार के बेहतर विकल्प इस साल भी आएंगे ! मार्किट में मल्टी साइज़ के ऑल्टो बजट से मैं इस साल भी बच नहीं पाउँगा ! बेहतर परफॉर्मेंस के साथ-साथ ज्यादा माइलेज के मामले में इस साल भी मेरी लाइफ आगे जाएगी ! किसी भी बजट में मुझे मेरे गंतव्य तक मेरी सरकार पहुँचा ही देगी !
१०.
मेरा हिसाब किताब !
पैसा कैसे काम करता है, इस बात को समझना ही बजट नहीं है ! शादी के कई साल बाद मुझे विश्वास हो गया है कि रोज़ सुबह पूरब में जो उगता है वो बजट है ! दोपहर को दिन भर का बजट आधा हो जाता है ! घरेलू काम की हिस्सेदारी की शेयरिंग ही असली बजट है ! गृहस्थी एक संयुक्त खाता है, बजट का हिसाब किताब दोनों प्राणी को रखना पड़ता है !
११.
बजट का बच्चा !
मेरे बजट के बारह दाढ़ हैं ! इन दांतों के बीच मेरे चार ज्ञान के दाँत हैं जो बजट के नाम पर लोहे का चना चबाते हैं ! दूध के दाँत टूटने तक माता पिता ही बच्चों का बजट हैं ! किशोरावस्था तक जैसे छुप छुप के मैंने इन्टरनेट पर सेक्स समझ लिया था वैसे ही भारतीय बच्चे यू – ट्यूब पर वित्त मंत्रियों को सुन सुन के बजट भी समझ लेंगे !
१२.
बजट पर ज़ुल्म !
बजट के इस पैकेज में हम नए दो हज़ार पांच सौ को विभिन्न स्तर पर भावनात्मक और शारीरिक रूप में ज्यादा जान जायेंगे ! नोटबंदी के नाम पर पिछले ढाई महिने में मुझ पर ना जाने क्या क्या जुल्म हुए, मेरे हज़ार पाँच सौ मेरे नहीं रहे ! लेकिन मैं बजट के साथ रहा किसी के आगे झुका नहीं !
१३.
हास्य बजट !
मुझे अपने बजट को पाने के लिए शेमलेस होना चाहिए था मैं कैश लेस हो गया ! मेरे इस बजट में हास्य बारह परसेंट से पंद्रह परसेंट पर पहुँच गया है ! वर वधु को इस साल भी लिफाफा टिकाया जायेगा ! मैंने सुना है बजट के दिव्यांगों के लिए नए बजट में हेल्पिंग किट्स सस्ते हो गए हैं ! व्यंग – आंगों को मेरा हास्य बजट सुनने पर भाषण के बजट पर लाभांश मिलेगा !
१४.
सबका रुपया एक है !
बजट में पत्नी माँग है और मैं पूर्ती हूँ ! प्रत्येक माह अपने आप को अनुशाशन में रखना होता है तब बजट में लाभ होता है ! मेरी अर्थपूर्ण चाहतों और अनावश्यक इच्छाओं को मुझसे अलग करने को मेरी पत्नी बजट मानती है ! जैसे मेरी आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया एक है, वैसे ही बजट में अपनी अपनी अठ्ठनी होते हुए भी सबका रुपया एक है !
१५.
लाभ – लाइफ !
लव में लाभ को भी बजट कहते हैं, जैसे प्रेम में हानि को लाभ कहते हैं !
१६ .
स्मार्ट बजट !
मेरा स्मार्टफोन इस बजट में और स्मार्ट होगा ! इस बजट में स्मार्ट शहरों की तरह स्मार्टफोन के सोल्ड आउट होने की जानकारी मुझे फिर मिलेगी ! डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन दिये जाने के साथ – साथ फसलों में प्रचुरता भी इसी साल आएगी ! हेल्थ, एजुकेशन पर इस साल फिर फोकस होगा !
१७.
बजट का श्रृंगार !
बजट का बहिष्कार ही बजट का श्रृंगार है ! जिनके लिए बजट बनता है वही बजट का बहिष्कार करते हैं ! जो आज बनाते हैं वही कल उसकी चुटकी लेते हैं !  बजट एक ऐसा यूनिवर्सल चुटकुला है जो सबको पूरे साल याद रहता है और जिसे सब समझते हैं ! रहमत की बारिश के कीचड़ में इस साल फिर कमल का फूल खिलेगा !
१८.
एक साल की वॉरंटी वाला बजट !
नए बजट में अपने आप को अपग्रेड करने का ऑफर मुझे इस साल भी मिलेगा ! सारे एक्‍सचेंज ऑफर मुझे फिर से पेश किये जायेंगे ! फ्री रजिस्‍ट्रशन और एक साल की वॉरंटी वाला फेस्टिव ऑफर, फेस्टिवल सीजन में कैश डिस्‍काउंट के साथ मुझे इस बजट में फिर मिलेगा ! सोना जीतने का मौका मुझे नया बजट इस साल फिर देगा !
१९.
बजट के बड़े एलान !
‘ बजट इस साल घर का चौका – बर्तन, झाड़ू – पोछा नहीं करेगा ! मशीन से निकाल के कपडे भी नहीं फैलाएगा ! दुकान से राशन भी नहीं लाएगा ! सब्ज़ी खरीदने बाज़ार नहीं जायेगा ! मोबाइल का बिल नहीं भरेगा ! बजट अपना सर – चार्ज करेगा ! ‘ये मैं क्या बड़बड़ा रहा हूँ ! ‘ मुझे किसी बैंक में ले चलो, मुझे डिजिटल साक्षरता की ज़रूरत है !’
२०.
ग्रामीण कम – इन !
ग्रामीण तुम हमें आज ज़मीन दो हम तुम्हे कल घर देंगे ! गाँव में ऋण वसूली बजट के पीठ पीछे होगा ! तीसरा पूर्ण बजट तुम ले लो ! ग्रामीण तुमसे मुझे और कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए ! कम – इन ग्रामीण !
२१.
बजट का दर्ज़ी !
बजट का दर्ज़ी मेरा साइज़ जानता है ! बजट में मेरे मोबाइल, पर्स, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड के नाप से मेरी इज़्ज़त काटी जाती है ! इस साल युवाओं को अपने साइज़ का पासवर्ड बजट के दर्ज़ी को देना होगा जिससे बचने के लिए युवा अपने कपड़े खुद फाड़ेंगे जिसे सरकार अगले बजट में सिल देगी !
२२.
अच्छा बजट ही एक अच्छा पति है !
कुछ लोग कहते हैं बजट काम नहीं करते ! बजट के साथ यही समस्या है ! बजट का काम किसी को दिखता नहीं है ! अच्छे बजट के पास पैसा होता है, पैसा सबको दिखता है ! ख़राब बजट के पास दिल होता है जिसको अब प्रेमिका भी तोड़ देती है ! कोई ख़ाली जेब को बजट कहता है, एक्सपेंडीचर सेक्रेटरी मेरी पत्नी बचे हुए पैसों को बजट कहती है !
२३.
बजट छुक छुक !
बजट बुद्धिमान ! बजट शक्तिमान ! बजट सुपरमैन ! बजट लक्ष्मी ! बजट शक्ति ! बजट – बुद्धि उत्सुक होता है, बजट अपनी खुशियों की कॉस्मैटिक पटरी पर छुक – छुक होता है !
२४.
बजट पास !
बजट एक बार संसद में पास हो गया तो फिर साल भर तक मेरे पास नहीं आता ! बजट पास होने के बाद बजट को फेल करने की जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर होती है !
२५.
बजट पच्चीसी !
बजट को होना था समृद्धि का बजट सिंहासन बत्तीसी ! ड्रग्स ने बजट को बना दिया बजट बेताल पच्चीसी ! घर का पति मैं, बजट में एक्स व्यक्ति ! इति रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स, इति बजट पच्चीसी !!

संजय झा मस्तान 
संपर्क - http://sanjayuvaach.com