27 Jun 2013

हिमालय बचेगा तो हम बचेंगे

उत्तराखंड में मची तबाही की रिपोर्टिंग हम रोज ही पढ़ और देख रहे हैं। इस पर राजनीति भी होने लगी है। एक खबर आई कि बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर में फिर से पूजा शुरू हो गई है। इससे ये संदेश देने की साजिश की गई कि स्थिति सामान्य होने को ही है। लेकिन इन सबके बीच इस तबाही के कारणों पर गंभीर बहस नहीं हो सकी। हुई भी तो दबे-छिपे लहजे मे। नहीं भूलना चाहिए कि इस तबाही के वैज्ञानिक कारणों पर हम जब तक बात नहीं करेंगे, तब तक ऐसे खतरों से बचने के सारे दावे झूठे साबित होंगे। दरअसल इस तबाही की भूमिका दो-तीन दशक पहले से बन रही थी, जब हिमलाय की गोद में बिजली घरों के लिए सुरंगें खोदी गईं। पहाडों को डायनामाइट से उड़ाया गया। सरकारी आकड़े बताते हैं कि अकेले उत्तराखंड के जोशी मठ में 2006 से 2012 के बीच 20,632 किलोग्राम विस्फोटक और 1,71,235 डेटोनेटरों का प्रयोग किया गया। बांधों के लिए नदियों की दिशा मोड़ी गई। ऐसा भी नहीं है कि इन खतरों से पहले सचेत नहीं किया गया। ये भी हुआ, लेकिन इन आवाजों को अनसुना किया गया। यहां उदाहरण के लिए समयांतर के जुलाई, 2012 के अंक में छपे चारु तिवारी के लेख को फिर से पोस्ट किया जा रहा है। इस उम्मीद के साथ कि हम कुछ सबक हासिल कर सकें-

उत्तराखंड के पहाड़ों से इन दिनों खतरनाक आवाजें आ रही हैं। ये आवाजें एक ऐसे नापाक गठजोड़ की हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के बीच रहने वाली जनता के हक को लील लेना चाहती हैं। बहुत जल्दी, बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए; विकास का जो सपना सरकारें दिखाती रही हैं उसकी आड़ में एक बड़ी आबादी को उजाड़कर मुनाफाखोर अब जनता को जनता के खिलाफ ही खड़े करने की साजिशें करने लगे हैं। टिहरी की लोककथाओं में आछरियों (परियां) का बहुत जिक्र आता है। ऐसी आछरियां जो गुफाओं से निकलकर युवाओं को हर लेती थीं। अब टिहरी में इस तरह की आछरियां नहीं दिखाई देतीं। अब आछरियां नए रूप में हैं। जो पहले गुफाओं में रहती थीं अब विशालकाय सुरंगों में हैं। जो पहले कुछ युवकों को अपने रूप-सौंदर्य के छलावे में फंसाती थीं अब विकास और बिजली की चकाचैंाध से भ्रमित कर रही हैं। लोककथाओं की आछरियों को भले ही किसी ने देखा न हो लेकिन आज पूरे पहाड़ में विकास की जानलेवा आछरियों ने जलविद्युत परियोजनाओं से पूरे गांवों को लीलना शुरू कर दिया है। ये अकेली नहीं हैं इनके साथ सरकार है। बांध परियोजनाओं के बड़े कारिंदे हैं। इससे भी बढ़कर वे लोग हैं जो विकास की इस साजिश के अभियान में साथ खड़े हैं।
बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए विकास का जो सपना सरकारें दिखाती रही हैं उसकी आड़ में एक बड़ी आबादी को उजाड़कर मुनाफाखोर अब जनता को जनता के खिलाफ ही खड़े करने की साजिशें करने लगे हैं। टिहरी की लोककथाओं में आछरियों (परियां) का बहुत जिक्र आता है, जो गुफाओं से निकलकर युवाओं को हर लेती थीं। अब वे नहीं दिखाई देतीं। अब आछरियां नए रूप में हैं। गुफाओं की जगह अब वे विशालकाय सुरंगों में रहने लगी हैं।
इन लोगों का न तो लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास है न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में। इन्होंने ने ऐलान कर दिया है कि जो भी जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध करेगा उसे पहाड़ में नहीं घुसने दिया जायेगा। जैसे पहाड़ इन्हीं की बपौती हो। अपने अभियान को इन्होंने अमली जामा पहनाना भी शुरू कर दिया है। जून के मध्यमें श्रीनगर में जीडी अग्रवाल, भरत झुनझुनवाला और राजेन्द्र सिंह के साथ इन कथित बांध समर्थकों ने जो किया उससे साबित होता है कि जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन के नाम पर की जा रही यह गुंडागर्दी कोई छोटी-मोटी स्वस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि सोची-समझी रणनीति है। इसलिए समय रहते इस गठजोड़ को समझना होगा जो निहित स्वार्थों के लिए अपने मुल्क को बर्बाद करने और बेचने में भी झिझक नहीं रहे हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में पिछले चालीस वर्षों से जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर वहां की जनता आंदोलन चलाती रही है। अपने संसाधनों को बचाने के लिए वह लगातार सड़कों पर है। टिहरी बांध से लेकर फलिंडा और अब पिंडर को बचाने तक के बहुत सारे आंदोलन स्वस्फूर्त जनता के आंदोलन रहे हैं वैसे ही जैसे उत्तराखंड राज्य का आंदोलन था। एक मामले में ये आंदोलन पृथक राज्य आंदोलनों से इसलिए जुड़ थे कि जनता को उम्मीद थी कि नए राज्य के शासक जो उन्हीं में से होंगे उनके दर्द को समझेंगे और उन पर इस तथाकथित विकास को नहीं थोपेंगे। पर हुआ उल्टा ही है। अपने ही लोगों ने विकास के दैत्याकार मॉडल को उन पर थोपा है। इससे लगातार टूटते पहाड़ों की आम जनता को चिंता है। पर इस बीच कुछ अजब ही हुआ है।
इधर कुछ समय से बांध समर्थकों की एक नई जमात सामने आई है जो पूरी बेशर्मी से बड़े बांधों का समर्थन कर रही है और जन आंदोलनों को नकारने में लगी है। कवि लीलाधर जगूड़ी ने अपने हाल में प्रकाशित लेख ‘प्रगति विरोधी इस पाखंड से लडऩा जरूरी’ में लिखा है कि ”इस समय उत्तराखंड में जनता पर्यावरण को विकास के विरुद्ध एक अड़ंगे की तरह अथवा एक पाखंड की तरह देख रही है।” तथ्यों को जैसे जी में आया तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। फलिंडा और पिंडर घाटी में क्या हो रहा है? अगर कहीं कुछ है ही नहीं तो धारी देवी में मारपीट की नौबत क्यों आ रही है? यह जमात सरकार, बांध बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों के गठजोड़ की है। इनमें इस बीच सरकार से नजदीकियां रखने के इच्छुक कुछ बुद्धिजीवी भी जुड़ गये हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अचानक बांधों के समर्थन में खड़ा हो गया है। ऐसा क्यों हो रहा है, समझना मुश्किल नहीं है। बांधों के साथ अपार पैसा जुड़ा है और उसका असर अखबार से लेकर सरकार तक में नजर आ रहा है। कौन भूल सकता है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पद संभालते ही पहला काम बांधों के समर्थन का किया।
ये तर्क देते हैं कि जलविद्युत परियोजनायें यहां की आर्थिकी और रोजगार के लिए जरूरी हैं। साधु-संत गंगा की अविरलता को लेकर बांधों के खिलाफ हैं। अगर गंगा की अविरलता नहीं रहेगी तो करोड़ों की आस्था की चिंता उन्हें है। स्वयंसेवी संगठनों को लगता है कि बांध बनने से पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। इसलिए वे बांधों का विरोध कर रहे हैं। इन सबके बीच पिछले चार दशक से अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्षरत लोगों की सुनने को कोई तैयार नहीं है। उनके पूरे आंदोलन को कभी आस्था, कभी विकास तो कभी पर्यावरण के नाम पर हाशिये पर धकेला जा रहा है।
 हम बार-बार यह दोहराना चाहते हैं कि असल में जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध आस्था और पर्यावरण का नहीं है, जैसा कि जगूड़ी अपने लेख में कहते हैं; बल्कि यह हिमालय को बचाने की लड़ाई है। आस्था और पर्यावरण भी तभी तक हैं जब तक हिमालय है। यह नहीं भुलाया जाना चाहिए कि हिमालय से पूरे गंगा-यमुना के मैदान का भविष्य जुड़ा है। विकास के नाम पर जिस तरह से हिमालय को सुरंगों के हवाले किया जा रहा है वह आने वाले दिनों में पूरे देश के लिए खतरे का संकेत है।

विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझा जाना बहुत आवश्यक है। मध्य हिमालय दुनिया का सबसे कच्चा पहाड़ है। इस पर भी उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से चालीस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने एक उपाय सुझाया विशालकाय जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का। इस समझ के तहत सत्तर के दशक में टिहरी बांध परियोजना की शुरुआत की गई थी। इसके बाद तो जलविद्युत परियोजनाओं को ही सरकारों ने ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत मान लिया। इसके बावजूद जबकि टिहरी जैसी बड़ी परियोजना अपने लक्ष्य में नाकाम रही है। इससे समझ जाना चाहिए था कि जिन परियोजनाओं को विकास के लिए जरूरी माना जा रहा है वे कितनी उपुयक्त हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि बांधों के निर्माण से राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कंपनियों के हित जुड़े हैं। ये कंपनियां कई तरह की हैं – सीमेंट उत्पादकों से लेकर बिल्डरों और टरबाईन बनानेवालों तक की। यह बात प्रचारित की गई कि टिहरी बांध तो बड़ा है, बाकी बांध छोटे होंगे। सच यह है कि उत्तराखंड में इस समय जितने भी बांध बन रहे हैं वे बड़े बांधों की श्रेणी में आते हैं। (देखें समयांतर, जून, 2012)
इसे नजरअंदाज कर इन दिनों कुछ बुद्धिजीवियों ने कहना शुरू कर दिया है कि बिना जलविद्युत परियोजनाओं के यहां का विकास संभव नहीं है। वे कहते हैं कि इन परियोजनाओं से रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा और प्रदेश में विद्युत आपूर्ति के अलावा बाहर भी बिजली बेची जा सकेगी। उन्होंने जो तर्क दिए हैं वे बचकाना हैं। दुनिया की कोई भी जलविद्युत परियोजना ऐसी नहीं है जो रोजगार पैदा करती हो। इस तरह की परियोजनायें ठेकेदार और दलाल तो पैदा करती हैं लेकिन रोटी पैदा नहीं करतीं। हर परियोजना पर्यावरणीय विनाश के साथ विस्थापन और पलायन लाती है। यही वजह है कि दुनिया के तमाम देश अपने यहां बने बांधों को तोड़ रहे हैं। वे अपने यहां ऊर्जा के नए स्रोत तलाश रहे हैं। यह तथ्य हम अपने ही आसपास कोरबा, सोनभद्र या उन अनेक उदाहरणों से पा सकते हैं जहां कोयला या बांधों से बिजली बनाई जाती है। छत्तीसगढ़ के कोरबा में तो अनेक बिजली घर हैं पर उस राज्य में उद्योग क्यों नहीं हैं सिवाय खनिज उद्योगों के जो प्राकृति संसाधनों के निर्मम दोहन से जुड़े हैं? विकास का यह विनाशकारी मॉडल हिमालय के संसाधनों की अंधी लूट की साजिश है जिसे यहां के सत्ताधारी वर्ग – नेताओं, अखबारों और अब बुद्धिजीवियों – के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है।
गंगा को बचाने के लिए विकास और पर्यावरण की इस बहस के बीच उन सवालों को तलाशना जरूरी है जो वहां के निवासियों के लिए परेशानी का कारण बने हैं। उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन में कुछ बुद्धिजीवी द्वारा चलाए जा रहे सुनियोजित षडयंत्रकारी अभियान इस बात का प्रमाण हैं कि हिमालय में मुनाफाखोरों की पैठ मजबूत हो चुकी है। विशेषकर दो-तीन कथित बुद्धिजीतियों की राष्ट्रीय मीडिया में बयानबाजी गौर करने लायक है। सच यह है कि उनके पास न कोई तथ्य हैं और न ही हिमालय और वहां के जीवन के बारे में कोई आधारभूत जानकारी। है भी तो वे उन पर बात नहीं करना चाहते। सबसे ज्यादा हास्यास्पद बातें पद्मश्री सम्मान को अपने सीने से लगाये कवि लीलाधर जगूड़ी ने दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका में लिखे लेख में की हैं। उन्होंने जलविद्युत परियोजनाओं पर एक प्रवक्ता की तरह बोलना शुरू कर दिया है। इससे कई तरह की शंकाएं होती हैं। यह वही जगूड़ी हैं जिन्होंने राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को ‘उत्तराखंड पिता’ कहा था। तब पहाड़ के लोगों ने कहा था कि स्वामी जगूड़ी के पिता हो सकते हैं, उत्तराखंड का ठेका वह न लें। उत्तराखंड की उस भाजपाई सरकार में उन्हें लालबत्ती से नवाजा गया था। एक बार फिर वह बांधों का समर्थन कर उत्तराखंड के स्वयंभू ठेकेदार बनना चाहते हैं।
अपने लेख में उन्होंने जो बेहूदे तर्क दिए हैं वे मजेदार हैं (देखें बाक्स) और इस बात का संकेत हैं कि जगूड़ी न आधुनिकता का अर्थ समझते हैं, न ही प्रकृति और पर्यावरण का महत्त्व। इसके बावजूद पूरे विश्वास के साथ तथाकथित विकास का समर्थन कर रहे हैं। होशो-हवाश का कोई आदमी उनकी इन बातों से सहमत हो सकता? क्या इस तरह की अवैज्ञानिक, अतार्किक और मूर्खतापूर्ण बातों को छापा जाना चाहिए था?
प्रमाणिकता को छोड़ दें तो भी स्पष्ट है कि जगूड़ी को जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभावों की सामान्य जानकारी तक नहीं है। लगता है उन्होंने शुरुआती भूगोल भी नहीं पढ़ा है।
इन वैज्ञानिक बातों को छोडिय़े। यहां सवाल कुछ और ही है। पहली बात यह कि गंगा का सवाल पर्यावरण और आस्था का बिल्कुल नहीं है। गंगा को बचाने की बात साधु-संत कैसे करते हैं यह उनका मसला है, इससे प्राकृतिक धरोहरों को बचाने का सवाल समाप्त नहीं हो जाता। विश्व हिंदू परिषद या उनकी जैसी कोई संस्था अपने हिसाब से गंगा की बात कर रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम बांधों के समर्थक बन जाएं। असल में यह जलविद्युत परियोजनाओं और विकास के नाम पर राज्य को लूटने और लोगों को बेघर करने की साजिश है। जगूड़ी को पता नहीं कहां से इलहाम हुआ कि सुरंगों (टनलों) में जाने के बाद पानी शुद्ध हो जाता है। विद्युत परियोजनाओं के लिए जितनी भी सुरंगें बनती हैं वे पानी को शुद्ध करना तो दूर पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को भी बिगाड़ती हैं। जब कभी भी नदी के पानी के उपयोग की बात आती है तो उसे रन ऑफ द रीवर के माध्यम से उपयोग में लाया जाना ही वैज्ञानिक माना जाता है। इस तरह की परियोजनाओं से किसी को कोई ऐतराज भी नहीं है। लेकिन अभी जिन परियोजनाओं की बात हो रही है वे सभी सुरंग आधारित हैं। सभी परियोजनाओं में लंबी दूरी की सुरंगें बनायी जा रही हैं
सुरंगों में जाकर कोई पानी शुद्ध नहीं होता है। असलियत यह है कि सुरंगों से निकलने वाला पानी नए तरह के रासायनिक तत्व अपने साथ लाता है। हिमालय की भूगर्भीय स्थिति अभी रासायनिक और भूगर्भीय हलचलों की है इसलिए सुरंगों में पानी का जाना बहुत खतरनाक है। सुरंगों को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भारी मशीनों से यहां की भौगोलिक संरचना पर जो नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है वह छिपा नहीं है।
परियोजनाओं के समर्थकों का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि इन विद्युत परियोजनाओं से गांवों को बिजली मिलेगी। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। राज्य में जो बिजली बनती है वह सेंट्रल ग्रिड में जाती है वहीं से बिजली का बंटवारा होता है। पावर हाउस से लोगों के घरों में सीधे तार नहीं खींचें जाते। कुल मिला कर राज्य को उसके हिस्से की बिजली ही मिलेती है जो बहुत कम होती है। इस संदर्भ में इस वर्ष गर्मियों में उत्तराखंड में बिजली की जो किल्लत हुई उसे याद किया जा सकता है। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में जो बिजली की कुल खपत होती वह संभवत: उतनी भी नहीं है जितनी कि देहरादून में होती होगी। पहाड़ों में मुश्किल से ही पंखे चलते हैं। एसी तो शायद ही कहीं होंगे। उद्योगों की तो बात ही अर्थहीन है। दूसरी ओर आज भी उत्तराखंड में जितनी बिजली का उत्पादन होता है उसका वह पांच प्रतिशत भी शायद ही उपभोग करने की स्थिति में हो। तब पूरे पहाड़ी क्षेत्र में बिजली क्यों काटी जा रही थी?
अब आते हैं नौकरी के सवाल पर
उत्तराखंड में आजादी के बाद लगभग 37 लाख लोगों ने स्थायी रूप से पलायन किया है। राज्य बनने के इन 12 वर्षों में ही राज्य से 19 लाख लोग स्थायी रूप से पहाड़ छोड़ चुके हैं। राज्य के पौने दो लाख घरों में ताले लटके हैं। दो साल पहले आयी आपदा ने लगभग 3,500 गांवों को अपनी चपेट में लिया। पहाड़ पर जमीनों का टूटना जारी है। इससे पलायन और तेज हुआ है। पर्यावरण संबंधी परिवर्तनों ने कृषि को पूरी तरह अलाभ कारी बना दिया है। शेष जो भी छोटे-मोटे रोजगार थे सब घटे हैं। अब इन बांधों के निर्माण से पांच लाख लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। सिर्फ पंचेश्वर बांध से ही सवा लाख लोगों का विस्थापन होगा। ये स्थितियां नयी तरह के सोच और नियोजन की मांग करती हैं पर हमारे नेता सिर्फ एक बात जानते हैं और वह है बांध बनाने की। यह सवाल है आखिर ये पद्मश्री प्राप्त बुद्धिजीवी किन की लड़ाई लडऩे में लगे हैं?
दूसरा पक्ष है बांधों के विरोध करने वालों का। इनमें साधु-संतों के अलावा पर्यावरणविद हैं। साधु-संतों को गंगा अविरल चाहिए, स्वच्छ चाहिए। गंगा को वे अपनी मां मानते हैं। दुनिया और विशेषकर योरोप के देशों में नदियों को कोई अपनी मां नहीं मानता। वहां गाय और पेड़ भी पूजे नहीं जाते हैं। बावजूद इसके वहां की नदियों को साफ रखने की संस्कृति है। हर छोटे से छोटे नाले को भी उन्होंने प्रदूषण से मुक्त रखा है। वहां के लोगों ने अपने जंगलों और जैव विविधता को बनाये रखा है, उससे नदियों को मां और पेड़ों को भगवान मानने वाले संतों को सबक लेना चाहिए। संत-महात्माओं को अभी भी अपने आस्था के दरकने की चिंता है। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि जब लोग रहेंगे तभी आस्था रहेगी। वे गंगा को बचाने की बात तो करते हैं, धारीदेवी की चिंता उन्हें है लेकिन गंगा में आचमन करने और धारी देवी को पूजने वाले लोगों के बारे में वे नहीं सोचते। असल में नदियों के किनारे रहने वाले लोगों और हिमालय की जैव विविधता को बनाए रखने वाले गांवों और आबादी को बचाए रखना बहुत जरूरी है। यदि वहां के गांव खाली होते हैं तो हिमालय और गंगा को कोई नहीं बचा सकता। पिछले दो दशक से खाली होते गांवों ने इस बात को साबित भी किया है। तथ्य यह है कि कई वनस्पतियां और प्राणी ऐसे हैं जो बिना मनुष्य के नहीं रह सकते।
उत्तराखंड में मौजूदा समय में चालीस हजार से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं। ये सभी पर्यावरण संरक्षण, जंगलों को बचाने, जलस्रोतों के संरक्षण और नदियों पर काम कर रहे हैं। राज्य में सत्रह हजार गांव हैं। इस लिहाज से हर गांव में तीन एनजीओ का औसत बैठता है। इन्हें देश-विदेश से भारी पैसा मिलता है। दुर्भाग्य से जितना एनजीओ और उनके काम करने का क्षेत्र बढ़ा है उतना ही पहाड़ से पानी, जंगल और पर्यावरण गायब होता गया। इसलिए पहाड़, विकास, पर्यावरण और गंगा के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
मध्य हिमालय में बन रही सुरंगों को बनाने के लिए उपयोग की जा रही तकनीक ने पहाड़ों को हिला दिया है। प्रतिवर्ष मानवजनित आपदा से पहाड़ डरे-सहमे हैं। लगातार भूस्खलन और पहाड़ों के टूटने की घटनायें सामने आ रही हैं। उत्तराखंड में जहां भी बांध बन रहे हैं उसके चारों ओर 15 किलोमीटर की दूरी तक सारे जलस्त्रोत सूख गये हैं। टिहरी के पास प्रतापनगर का क्षेत्र प्रतिवर्ष अपने सैकड़ों जलस्त्रोतों को खोता जा रहा है। इन क्षेत्रों से पलायन लगातार जारी है। रही-सही कसर सरकारी योजनाओं ने पूरी कर दी है। अब पहाड़ इन बांधों से अपने ताबूत में अंतिम कील ठुकने के इंतजार में हैं। इसलिए गंगा और हिमालय के सवाल को यहां के लोगों की बेहतरी के साथ जोड़कर देखा जाना जरूरी है। सबको यह बात समझनी होगी कि हिमालय जब तक बसेगा नहीं वह बचेगा भी नहीं। गंगा को आचमन के लिए बचाने की लफ्फाजी, पर्यावरण की राजनीति और विकास के छलावे से बाहर निकलकर जनता के दर्द को समझते हुए गांवों को बचाने की पहल होनी चाहिए।

22 Jun 2013

अंबेदकर जयंती

जेब अख्तर

मुर्गे की बांग तो ठीक से सुनाई पड़ी पर भिन्सर हुआ कि नहीं, इसमें संदेह था। मटमैला और गमकता उजाला तो चारों ओर था पर सूरज भगवान का कहीं अता-पता नहीं था।

दुलारी पासवान खपरैल वाले ओसारे से निकल कर गोहाल घर में आ गए। गैया को हांकते हुए, गिने-चुने टिमटिमाते तारों पर नजर गई तो उनका शक और गहराने लगा। कुछ देर तक आकाश को यूं ही निहारते रहे फिर जैसे अपने आप से बड़बड़ाए, दुत, अब रात हो कि दिन... बिछौना छोड़ दिया तो छोड़ दिया। एक टोकरी काम पड़ा हुआ है करने के लिए... शुरू कर देते हैं चलकर अभिये से!
दांतों में नीम का दातुन दबाए, हाथ में लोटा लिए वह सरकारी इन्दारा (कुआं) की ओर चल पड़े। पर रास्ते में महसूस हुआ कि दिशा-फरागत की भी अभी कोई जल्दी नहीं है। तो फिर क्या किया जाए? गांधी मिडल स्कूल के पास पहुंचकर वह विचारने लगे। तभी उनका ध्यान स्कूल के प्रांगण में गया... मिट्टी के विशाल चबूतरे पर। अभी कल ही टोले के सभी बड़े-बूढ़ों ने मिलकर उसे बनाया था। आज मेहरारू लोगों को इसपर गोबर लीपना था। और आज ही तो होनी थी सभा, अंबेदकर जयंती के उपलक्ष्य में। इसी चबूतरे को तो मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाना था।

पर चबूतरे का एक कोना टूटा हुआ था। लगा किसी ने जान-बूझकर यह काम किया है। वह थोड़ा और निकट गए... जानवर का भी काम हो सकता है। सियाल-सियार भी तो आते ही रहते हैं। पास ही तो जंगल-झाड़ है। जो हो, अब इसे मरम्मत तो करना ही पड़ेगा। कहां तो उनको कोई काम नहीं सूझ रहा था। यहां... एगो नये काम धरा हुआ है। अंधे को जैसे दो आंखें मिल गईं। वह धोती को घुटने तक ऊपर ले जाकर लग गए उसे सुधारने में।

ठीक ही हुआ जो भोर से पहले आंख खुल गई। स्कूल के बरामदे में वह वुफछ तलाशने लगे। शायद कुदाल और कढ़ाई। मिट्टी काटकर लाना होगा। नहीं मिला तो निकले किसी तलाश में। शायद महर टोली वालों में कोई जागता हुआ मिल ही जाएगा। तभी सुअरों को बहराता हुआ चनेसर दिखा। उसे कुदाल-ओड़ी लाने का आदेश देकर खुद मेढ़ की ओर निकल पड़े... जहां से मिट्टी काटकर ढोना था।
लेकिन नहीं, बात महंगी पड़ी। सामान तो उन तक पीछे पहुंचा। चबूतरा टूटने वाली बात हरिजन टोला में एक-एक घर तक पहले पहुंच गई कि मंच को किसी ने तोड़ दिया है। कि वे सभा नहीं होने देना चाहते। कि हम भी पता लगाकर रहेंगे किसने की है यह बदमाशी! 
टोले के लोग झुण्ड के झुण्ड पहुंचने लगे, जहां दुलारी मिट्टी खोदने में लगे हुए थे। क्या जवान और क्या बूढ़े, मेहरारू और दूध पीते बच्चे तक... असहज होते-होते सकते में आ गए दुलारी, इतने सारे लोगों को एक साथ जमा होते देख, जबकि सभा आरंभ होने में अभी देरी है। उनके माथे पर पसीने की दो-चार बूंदें और छलक आईं। उन्हें अंगोछे से पोंछते हुए किसी अशुभ की आशंका से घिर गए। भगवान जाने अब का हुआ ससुरन को!
मामला जानने के बाद उन्होंने भीड़ को दुत्कारा, दुत, ई भी कोई बात हुआ गुस्सा आने का? और मान लो इ कोई लुच्चा बदमाश का ही काम है तो यही समय है पता लगाने का! जब जो काम जरूरी हो तभी करो। चलो-चलो दिन भर का काम पड़ा हुआ है। अभी मिट्टी कट गया है इसको ढोने का बंदोबस्त करो फिलहाल! ये कहते हुए वह बालेश्वर की ओर मुड़े- बालो, कुर्सी का प्रबंध हुआ कि नहीं? सबसे ज्यादा फिकर हमको इसी बात का है। सुनते हैं दसियों जगह मनाया जा रहा है अबकी अंबेदकर जयंती, मीना टेन्ट हाउस वाला का कुर्सी पहले से बुक है। बसंत टेन्ट वाला भी पहले ही मना कर चुका है...
हां, हम बासदेव को बोल दिए हैं... आगे चट्टी पर एक नया टेन्ट वाला दुकान खुल गया है... उ ले आवेगा साइकिल पर चर-चर गो करके।    बालेश्वर ने खैनी ठोंकते हुए कहा- टेन्ट हाउस का अब कमी रह गया है इलाका में!
तब ठीक है... और टेबुल?

हेडमास्टर साहेब वाला टेबुलवा कब काम आवेगा? उसी पर सब माइक और गुलदस्ता रखा जाएगा। निकलवा लेंगे उसी को।
निकलवा का लेंगे अभी चल के निकलवा लो। अब का फिर से दिन घुरेगा इ सब काम के लिए? ये बोलते-बतियाते वह वापस स्कूल पहुंच गए। उसी चबूतरे के पास चनेसर सधे हाथों से उस पर परत-दर-परत मिट्ट्टी चढ़ा रहा था। गीली मिट्ट्टी को थपथपाते हुए उसने पूछा, सुनते हैं हमनी के  विधायक कामता बाबू मंत्राी भी बन गए हैं।
हां रे... सच्चे सुना है तू... कामता सिंह मंत्राी हो गए हैं। ग्रामीण विकास मंत्राी। गांव तो गांव जिला भर के लिए इ गर्व की बात है। चनेसर के सिर पर ओड़ी अलगाते हुए उन्होंने दर्प से कहा- उनका उपकार है कि सभा में आने के लिए राजी हो गए। नहीं तो ऐसा-ऐसा कितना प्रोग्राम उनखर पाकिट में रखल रहता है।

चनेसर ने काम रोक दिया और उनकी ओर लालायित होकर देखने लगा, जैसे वह अभी से अनुग्रहित हो रहा है। पर चनेसर का यह हाल देखकर दुलारी पासवान बिगड़ उठे, अब इतना भी खुश होने का जरूरत नहीं है... समझा! इ प्रजातंत्र है, उ मंत्राी बने हैं तो हमरा वोट के बल पर ही। अब हमरे लिए इतना भी नहीं करेंगे... हुंह!
सो तो ठीक है बड़े भैया... मगर हैं तो बड़े लोग ही न... मालिक! का भुला गए तुम भी?
मालिक-वालिक कुछ नहीं... बस्स मंत्राी है ऊ जनता के सेवक, और हम जनता हैं। घुसा तेरे दिमाग में वुफछ!
विपरीत दिशाओं वाला यह समीकरण चनेसर के लिए अनसुलझा ही रहा। अनमना-सा वह फिर से अपने काम में जुट गया। अब दुलारी भैया कह रहे हैं तो ठीक कह रहे होंगे। इस निष्कर्ष तक पहुंचते-पहुंचते कुछ हल्का होता है चनेसर का मन।
बैसाख की पहली और तीखी किरणों ने ठीक उसी समय दुलारी पासवान के चेहरे पर प्रहार किया... तीर की भांति सीधे उनकी आंखों पर। कुछ  बोलने के बजाय वह चनेसर को विचित्र आंखों से ताकने लगे। जैसे वहां चनेसर नहीं कोई और बड़ी समस्या खड़ी हो गई हो। कुछ देर के बाद उनके मुंह से बोल निकले। गाढ़े तरल की भांति, रुके-रुके-से, धीर-गंभीर।
चनेसर, जब अभी से तेरा इ हाल है तो तू मंत्री जी से हाथ कैसे मिलाएगा? कैसे बोलेगा माइक पर... कैसे संबोधित करेगा जनसभा को, ...और हमको तो इसमें भी शक है कि तुम मंत्राी जी के सामने मांगों को गिना भी पाओगे... जबकि तुम सचिव हो। हमारे अंबेदकर कल्याण समिति के  सचिव! ये बोलते-बोलते जैसे उनके चेहरे पर दुनिया भर का अपफसोस, दुनिया भर की दयनीयता उभर आई। 
चनेसर को उनकी स्थिति समझने में वुफछ क्षण लग गए, फ्हम कर लेंगे दुलारी भैया... संभाल लेंगे सब... पिछला सभा में हम बोले थे कि नहीं? भले माइक नहीं था। अपनी मांगों और समस्याओं को वैफसे भूल सकते हैं हम!य् वह माइक पर बोलने का अभिनय करने लगा, चबूतरे पर चढक़र- फ्माननीय मंत्राी जी... अधिकारीगण व साथियो...मैं आभार व्यक्त करता हूं आप सबके प्रति...
उच्चारण और भाषा की शुद्धता पर दुलारी पासवान किंचित अचंभित हुए। क्षोभ कुछ कम हुआ। निराशा तनिक दूर भागी। और उनकी आंखों में चबूतरे पर खड़े चनेसर की जगह कोई और बिम्ब उभरने लगा। उनकी नजरें कुछ और देखने लगीं।
...अभी कितना दिन गुजरा है?
जब इसी कामता सिंह, छोटे मालिक के घर में रोज बैठकी हुआ करती थी। रामनवमीकझण्डे का मौका हो या मुहर्रम, ताजिया का, कोई झगड़ा झंझट हो या कोई और आरोप-प्रत्यारोप किसी भी तरह का विवाद हुआ तो यही बैठकी विचार-विमर्श की सभा बन जाती। मन-मुटव्वल हो तो आपस में मिलने-मिलाने का बहाना बन जाता। न्याय गुहार की पंचायत बन जाती। दुलारी पासवान को याद आते हैं वे दिन। स्टिल पफोटोग्रापफी की तरह सामने आते हैं एक-एक चित्र... तब छोटे मालिक के पिताजी श्यामता प्रसाद सिंह जिन्दा थे।
फसल कटने के बाद अगहन से बैठकी का जो सिलसिला शुरू होता तो फिर सावन तक यानी बरसात आरंभ होने तक चलता। सांझ होता नहीं कि गांव के सभी बड़े-बूढ़े ठाकुर के खलिहान की ओर निकल पड़ते। धोबीखोरी, चमटोली, महरटोली, धनखेरी से लेकर बामन टोली तक के लोग जमा होते थे यहीं। एक ओर फसलों के ग_र, अनाजों की ढेरी... बिहन के धान पड़े होते। दूसरी ओर एक चारपाई पर ठाकुर साहब होते। हुक्का गुडग़ुड़ाते हुए। उनके साथ कुछ दूसरे ठाकुर लोग और साव... बनिया लोग होते।
चारपाई के सामने ही गोबर से लीपी हुई जमीन पर पलथी मारे बैठते वो। वो, यानी भुइंया, कहार, दुसाध... रजक रविदास... घर के लोग। बडक़न के सुर में सुर मिलाते। बात-बात में बत्तीसी झलकाते। हां, वही यानी नीची जाति के लोग। हरिजन, ओछ... अछूत।

बिना उद्वेलित हुए याद करते हैं दुलारी। चालीस के बाद कहां गुस्सा और कहां आक्रोश। फिर ठाकुर  साहब के यहां से नाश्ता आता। भुना हुआ चावल, चना, चुड़ा... मूढ़ी। किसी-किसी दिन चाय भी मिल जाती। अब सभी लोगों के लिए वह भी रोज-रोज कौन सेव-दालमोठ का खर्च उठा सकता है। सो वह वहीं तक सीमित रहता। चारपाई तक।
फिर ठाकुर साहब चल बसे। दुलारी पासवान हृदय से कहते हैं भगवान से- उनको स्वर्ग में स्थान दे। जात-कुजात, उंच-नीच, धर्मी-अधर्मी तो तब भी थे। मगर क्या मजाल जो कभी किसी ने अपनी सीमा तोड़ी हो। कभी किसी की बेजा महत्वाकांक्षा ने सिर उठाया हो।
ठाकुर साहब ने भले ही चारपाई पर बगल में नहीं बैठाया, या उन्होंने कभी खुद भी नहीं सोचा मगर रहे तो हमेशा ही उनके परिवार की तरह। शादी ब्याह हो या मरनी-जीनी, तीज-त्यौहार हो या कोई भी और मौका, सभी नेग वह पूछ-पूछकर जरूरत से ज्यादा देते। सतीश नाई का टोले भर में मात्रा उसी का ही मकान ढलाउवा और ततला है। मगर पूछो उससे, वह जमीन किसकी है। बड़े ठाकुर ने ही दिया था नेग में। नस्ल-दर-नस्ल वो दाढ़ी हजामत जो बनाते आ रहे थे ठाकुर परिवार की। इसी तरह धोबी, कहार, दर्जी... कितने लोग पलते थे उनके  आसरे पर, चिंता मुक्त होकर। जब भी जरूरत पड़ी ठाकुर साहब ने खुद बुलाकर पूछा।

रही न्याय-अन्याय की बात। तो कब नहीं रहा यह? कोई कह सकता है... सृष्टिके आरंभ से आज तक। रूप और बहाने बनते-बदलते रहे बस। कभी इसने धर्म का चोला पहना तो कभी कानून का मुखौटा लगा लिया। अन्याय से पृथ्वी कभी खाली नहीं रही। फिर भी न्याय की अन्याय पर जीत तो हमेशा होती रही है। और हमेशा होती रहेगी। हां, दीगर बात है कि उसके लिए भी साहस चाहिए। त्याग और बलिदान की शक्ति चाहिए। दधीची का ही किस्सा ले लो। दानवों के नाश के लिए उनको अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी या नहीं?
उसी तरह रंजन बहू को भी समझ लो इन्दारा में कूदकर... नहीं... नहीं इन्दर देवता ने ही मांगा था बलिदान उसका। गांव को कोप-प्रकोप से बचाये रखने के लिए। वह ऐसा-वैसा बलिदान नहीं था। यह बलिदान था एक नवब्याहता के सपनों का, उसकी खुशियों और अरमानों का और हम हरिजन टोला के लोग इसे अकारण नहीं जाने देंगे। थान पर एक खस्सी उसके यानी सोनरिया के नाम से भी कटेगा इस बैसाख से। हां, ठाकुर  साहब की मंशा भी यही है। और क्या कहा था उन्होंने? हां, याद आया। जैसे आकाश में मेघ टकराते थे। उसी तरह आवाज ऊंची उठती गई थी ठाकुर  साहब की, खबरदार जो इस घटना का जिक्र दोबारा किसी की जबान पर आया। हाथी बनकर पेट में पचा लेना है इसको! गांव की शांति सभा खतरे में पड़ सकती है। और गांव का हर फरद यह भी सुन ले कि रंजन गोड़ाइत भी हमारा बेटा जैसा है। हम उसका लगन फिर से कराएंगे। अपने खर्चे से। दावत-दारू और गाजा-बाजाकसाथ।

रंजन के बाबूजी गद्गद हो उठे थे। गांव का कण-कण मालामाल हो उठा था। और घटना भी कितनी सी, देखो! अरे, आज के लिए होगा यह जुलम और अन्याय। कल तक तो यह परंपरा और रीति-रिवाज का ही हिस्सा था। और रीति-रिवाज क्या ऐसे ही टूटते हैं? ऐसे ही धराशायी होती हैं परंपराएं! ऐसे ही छूटती है आदत! पान-बीड़ी की आदत को छोडऩे में सालों लग जाते हैं। और यह तो... फिर चाहिए पक्का इरादा और साहस। रंजन बहू ने पहले किया था साहस, किसी ने किया था इसका विरोध!

सभी जानते थे। सभी मानते थे। जिला भर का चलन था यह तो। छोटी जातियन के यहां विवाह होता तो पहला  न्यौता ठाकुर साहब को दिया जाता। और घूंघट की पहली सेज उन्हीं की हथेली से सजाई जाती। लाल जोड़े में सजी दुल्हन की पालकी पहले उन्हीं के दरवाजे पर लगती। फिर वह आशीर्वाद देकर विदा कर दें दुल्हन को या नेग के लिए रोक लें, उनकी मर्जी।



पालकीक साथ खुद दूल्हा भी होता था हाथ जोड़े। विनय की मुद्रा में। कि हे अन्नदाता, हे पालनहार, उद्धार कर दो हमारा भी। इ हमारा तन-मन-धन सब आप ही का है। इ हमारी बहू की आपकी है कि लक्ष्मी है, इस पर भी पहला हक आप ही का है!
ऐसा ही कुछ कहा होगा रंजन गोड़ाइत ने उस समय कि तभी घूंघट में छिपी सोनरिया की चंचल आंखें लहर उठी थीं। पोर-पोर जलन से भर उठा था। नया चेहरा, नयी जगह और तिस पर नये बोल... शौच के बहाने से एकान्त पाकर निकल पड़ी थी वह हवेली से। दूसरे दिन सोनरिया की लाश कुएं से बरामद हुई थी। उंगलियां हवेली की ओर उठने लगी थीं। खुसर-पुसर होने लगा था। थाना पुलिस के तक के बारे में सोच गए थे हरिजन टोला के हरिजन। मालूम पड़ते ही ठाकुर  दौड़े-दौड़े आए। अचानक हवा का रुख बदला हुआ पाया। सदियों से जमी मैल की परत छूट कैसे गई। उन्होंने लोगों को मनाया, पुचकारा, मिन्नत- समाजत की, हाथ तक जोडक़र खड़े हो गए। किसी तरह अशुभ टला। गांव की मर्यादा दागदार होने से बची। किन्तु अंदर ही अंदर विभाजन की लकीरें खिंच गई थीं दिलो-दिमाग पर। छोटा-बड़ा, उंच-नीच, अर्थ-अनर्थ... जैसी कितनी रेखाएं खींच गया था सोनरिया की मांग से धुला हुआ सिन्दूर। राम-सलाम... पाए लागूं... जय सरकार की... सब चल रहा था। मगर एक हूक, एक आक्रोश के साथ। खलिहान की बैठक में भी उन लोगों ने जाना बंद कर दिया था। एक ही झटके  में वीरान हो गया था लम्बा-चैड़ा खलिहान। उसकी शोभा, उसका सौंदर्य।
सांझ बेला जब ठाकुर खलिहान पहुंचते तो दो-तीन जन से अधिक लोग वहां नहीं मिलते। और वे भी वो ही, चारपाई पर बैठने वाले। सामने की खाली जगह, खाली धरती उन्हें जैसे मुंह चिढ़ाती रहती। काटने को दौड़ती। धीरे-धीरे सहिया साहू और बनियों ने भी आना छोड़ दिया। ठाकुर  साहब को भी बैर हो गया खलिहान से जैसे। जरूरत पड़ती तो भी जाने से कतराते।
बिस्तर पर मरीज की तरह लाचार और अपाहिज हो गए थे ठाकुर  श्यामता प्रसाद सिंह। कभी बीसियों गांव की जमींदारी करने वाली विरासत का यह हाल! यह दुर्गति! कि कोई खैर-खबर लेने वाला नहीं। परिवार के लोगों को क्या गिनना। लड़ते रहते अपने अकेलेपन से। मन होता, भंभाड़ रोएं या तान लें दोनाली अपने ही सीने पर।
और देखो, अनर्थ इतने पर ही जाकर नहीं रुका। एक और बिजली गिरी फिर। एक और पहाड़ टूटा सीने पर। सुनने में आया, गांव में एक अलग बैठकी होने लगी है हरिजन टोला में। टोटन पासवान के यहां। सब अपनी सुनाते हैं, अपनी कहते हैं। देर रात तक चलती है बैठकी। खूब हा-हा, ही-ही होता है। टोटन का बेटवा भी आया हुआ है कोलवरी से। वहां मिस्त्री है किसी मोटर गैराज में।
जाने क्या-क्या बताता फिर रहा है सबको। डॉक्टर अम्बेदकर... शिक्षा... संगठन। कुछ किताबें भी लाया है। बैठकी में सुनाता है पढक़र। गांधी जी को बनिया कहता है। और हरिजन शब्द को लॉलीपाप माने लेमनचूस... माने लडक़न बच्चन को फुसलाने का सामान। कहता है, अब तो जगना होगा। फिर कमर कसना होगा। और इ भी जान लो

आईसबर्ग

जेब अख्तर


समुद्र जागृत हो रहा था और उसकी लहरें मानो मैरिन ड्राइव की सीमाओं को तोडक़र स्वतंत्र हो जाने पर आमादा हों। सामने ही कांच का वस्त्र धारण किए ऊंची-ऊंची इमारतें आकाश को छूने की स्पर्धा में जुटी हुई थीं। भीड़ और कोलाहल भरे वातावरण में जोड़े एकदम से एक होकर चलने का प्रयास कर रहे थे। और यहां से वहां तक चैड़ी बिछी हुई साफ-सुथरी सडक़ पर रेंगती तरह-तरह की मोटर-गाडिय़ां जैसे इस पूरे लैंडस्केप पर नन्हें-नन्हें बच्चे हों। 

 गोया शहर उसके सामने पूरी आधुनिकता के साथ खड़ा था। पूरी तरह से अनावृत... कहीं कोई भूमिका या औपचारिकता नहीं। बस दूर-दूर तक संगीत-सा फैलता हुआ एक सम्मोहन, एक आमंत्राण जो हर किसी पर नशे की तरह हावी हो रहा था। 
 पर रामन्ना था कि इन सब से मुंह मोड़े, एक पत्थर पर बैठा अपने तलवे सहला रहा था। वह अकेला था और उसके सामने उसका जूता पड़ा हुआ था- नया और एम्बेसडर का सबसे कीमती ब्रांड। उसके पांवों के के बिल्कुल अनुरूप। इसके बावजूद उन्हें पहनने पर उसे पांव में एक चुभन, एक टीस महसूस हो रही थी, जो उसका सारा रोमांच और सारा कौतूहल सोखती जा रही थी।  
वह उन्हें कई बार उतारकर देख चुका था- अंदर झांककर, हथेलियों को अंदर फेरते हुए। कहीं कुछ भी नहीं था। एक छोटा-सा कंकर तक नहीं। फिर  यह क्या हो रहा था उसे? उसने सिगरेट सुलगा लिया। राहत और इत्मीनान भरे कुछ कश लेने के पश्चात् उसका हाथ टाई की ओर चला गया। पिछले कई दिनों से उसे टाई और सूट में भी असहजता महसूस होने लगी थी। चलता तो मालूम पड़ता, बगलों पर कोई दोनों ओर से दबाव डाले हुए है। कमर पर बंधी हुई नरम खाल की पेटी भी बड़ी सख्त जान पड़ती और टाई की गांठ जैसे गले में किसी फंदे का अहसास दिलाती। और अब ये जूते, उफ....! 

 उन्हें वैसे ही छोडक़र वह टाई की गांठ ढीली करने लगा। व्याकुलता के उसी अवांतर में उसका ध्यान घड़ी की ओर गया- तो शो का समय भी हो गया था। बल्कि अब तो वह शुरू भी हो चुका होगा। वह जूतों को हाथ में लिए नंगे पांव उठ खड़ा हुआ। टैक्सी की तलाश में। 
 विल्सन थियेटर आज पूरी भव्यता के साथ जगमगा रहा था। स्थापत्य की मुगल शैली में बनी यह इमारत जैसे फिर से अपने वैभव भरे अतीत में पहुंच गई थी। उसके ऊपरी छोर पर लाल प्रकाश का पुंज-सा था और नीचे के छतरीनुमा हिस्सों पर हल्की पीली किरणों की बौछारें हो रही थीं। 
रामन्ना को दूर से प्रतीत हुआ जैसे वह किसी भवन के सामने नहीं बल्कि पारदर्शी ज्वालामुखी के सम्मुख खड़ा है। प्रवेश द्वार पर ही नियॉन बोर्ड पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था- केट विंसलेट, द रियल टाइटेनिक। 
 रामन्ना अंदर पहुंचा तो विस्मित होकर एक स्थान पर जम-सा गया। भीड़ की आपाधापी या घने अंधेरे के कारण नहीं बल्कि मंच के बीचों-बीच खड़ी और प्रकाश से नहाई हुई लडक़ी को देखकर। लडक़ी यानी केट विंसलेट... एक्ट्रेस ऑफ इलेवन एकेडमी एवार्ड विनर मूवी, द टाइटेनिक गर्ल।

 झिलमिलाती रेखाओं के बीच वह झुक-झुककर अपने प्रशंसकों का अभिवादन कर रही थी। डूम का एक शोर और एक रिद्म में बजती तालियों के  दौरान रामन्ना को लगा, उसे फिर से कुछ चुभने लगा है, पहले से कहीं अधिक शिद्दत के साथ। जूते, टाई की गांठ, सूट और बेल्ट के साथ कोई चीज उसे फिर से असहज किए जा रही है। और यह कोई चीज नहीं बल्कि मुस्कराती हुई यही बाला थी जिसे लोग केट विंसलेट के नाम से पुकार रहे थे। इस समय दुनिया की सबसे अधिक चर्चित और महंगी अभिनेत्री। 
 रामन्ना के सामने अब कोई धुंध और कोई वहम नहीं है। गुप्त-ऊर्जा की तरह उसके कण-कण में संश्लेषित होती हुई यह लडक़ी केट विंसलेट नहीं तारामिला है। दलम की आजीवन सदस्या। विरकापुलम गांव की शिक्षिका। जंगल के रास्तों और पेड़-पौधों तक से परिचित। 


 वारंगल के बीहड़ों का अभियान हो या मुख्यालयों पर हमले की योजना, खाद्य सामग्री की समस्या हो या सूचनाओं का प्रचार-प्रसार, हर अवसर पर तत्पर रहने वाली तारामिला। उसका प्रेम, जरूरत या संबल, कहां-कहां नहीं थी वह। अव्यवस्थित और डूबती उतरती सांसों के बीच एक अजीब-सी मुक्ति और खुले आकाश को छुआ था उसने, जाने कितनी-कितनी बार। 
 हॉल में तालियों के साथ अब शोर भी उठने लगा था। उसने आंखों को फिर से मींचा कि शायद यह दृष्टि भ्रम या खुली आंखों का सपना ही हो। मंच पर अब वह नृत्य प्रस्तुत किया जा रहा था जो फिल्म का एक प्रमुख आकर्षण था। नायिका और उसके सहयोगी पाश्र्व-संगीत के साथ सधे हुए कदमों से लय बद्ध हो रहे थे। यह मद्धिम गति का यूरोपियन नृत्य था जिसमें पंजों के बल हवा में झूलते हुए नृत्य का समापन होता है। नृत्य के  इस अंतिम पड़ाव पर रामन्ना को याद आया... हवा में झूलती हुई तारामिला भी एक क्षण के लिए नायिका की भांति ही उछल पड़ी थी। बिल्कुल  अंतिम क्षण में जब वह चैंककर दौड़ी थी। फिर किसी चीज से टकराकर हवा में उछल पड़ी थी। 

 मिलेनियम बग की भांति उलझी हुई गुत्थियों को जैसे समाधान मिलता है। शनै:-शनै: हवा के झोंके और सदिश होते हैं और परदे के बाद, स्टेज पर, शेष क्या बचा रहता है वही खंडहर। साल, चील, चिनार और छोटी-बड़ी पहाडिय़ों से घिरा उनका तत्कालीन ठिकाना... पार्टी का स्थानीय कार्यालय! फ्रांसीसी किला। कब आया था वह यहां? कितने साल हुए? तारामिला, नागी और राव कब मिले थे उससे? 
 रामन्ना जैसे समुद्र की तह में डूबे हुए टाइटेनिक की ओर अपने पंजे बढ़ाता है। कपास, धान और अंत में ज्वार की खेती ने बैर किया था। यह लगातार तीसरे वर्ष हुआ था। अप्पा रोज शराब पीकर आता और अम्मा से लड़ता। महाजन का कर्ज उतारने के लिए वह उससे उसका एकमात्र कंगन देने के लिए कहता, जो सोने-चांदी के नाम पर घर की अंतिम धरोहर थी। अम्मा रोज इन्कार करती और रोज पिटती। अप्पा पीटते-पीटते थक जाता तो स्वयं रोने लगता। टूटे दांत और पिचके हुए गालों से उसकी आवाज तब बड़ी विचित्र होकर निकलती, डरावनी- डरावनी-सी। 
और फिर अप्पा ने आत्महत्या कर ली थी। खाली पड़ी गोशाला में, फांसी से लटक कर। उसी समय से वह देखता आया था, मां को बूढ़ी होते हुए। और तिल-तिल महाजन का बढ़ता दबाव उन दिनों अचानक बढ़ गया था। इकलौते कंगन के विषय में उसे जानकारी मिल गई थी, जिसे मां ने न जाने कहां छिपा दिया था। इस मोह के कारण एक दिन वह अम्मा से लड़ बैठा। तब अम्मा ने उसे शांत करते हुए कहा था, इस कंगन को मैंने तेरी बहू के लिए संभाल कर रखा है। 
 वह दंग रह गया था सुनकर। अम्मा की निस्संगता और भीतर पलती जिजीविषा पर आश्चर्य से भर उठा था। बल्कि कहना चाहिए, लाज से भर उठा था। अब तक वह उसे लाचार और बेबस स्त्री के रूप में ही देखता आया था। मगर वह तो बलशाली निकली थी। उससे और अप्पा से कहीं अधिक। 

 उन्हीं दिनों उसकी मुलाकात मुहैया से हुई थी, जो दलम के सदस्यों के लिए भोजन का प्रबंध करता था। कहने के लिए गांव में उसका अपना कोई नहीं था। पर वह आस-पास के दसियों गांवों में जाना जाता था। और यह शायद मुहैया का ही प्रभाव था कि महाजन ने उसे तंग करना बंद कर दिया था। फिर मुहैया ने उसे तारामिला, नागी और राव से मिलवाया था। 
 शीघ्र ही कई-कई अभियानों में सफल भागेदारी के पश्चात् वह अपने ही हमउम्र किंतु दलम के वरिष्ठ पटनायक से मिला था। घंटों की बातचीत के  बाद पटनायक भी उससे प्रभावित हुआ था। उसे दस्ते में शामिल होने का आमंत्रण  मिला था। रामन्ना के शरीर पर एकाएक कुछ रेंगा था। उसे नये उतरदायित्व और कर्तव्य का बोध हुआ था, अपने ढंग से कुछ कर लेने का। कुछ खोने के साथ कुछ पाने का भी। एक धुंधला-सा बिंब अप्पा का कौंध गया था फिर। सड़े हुए गोबर और बदबू में सने पुआल के ऊपर झूलते हुए अप्पा। उसका यह बेहद निजी दुख तब एकदम से व्यापक हो उठा था। जिसकी परिधि में कई अप्पा थे। कई आत्महत्याएं थीं। कई अम्माएं थीं और कई रामन्ना थे। उस क्षण से, वह इन सबके लिए था। उसे गोदावरी के केश-सी बिखरी उन छोटी-छोटी लहरों का रास्ता खोलना था, जिन्हें खेतों तक पहुंचने से पहले ही रोक लिया जाता था। 

 कितना ऊंचा उठ गया था वह उस घड़ी अम्मा की नजरों में, मुहैया, तारामिला, नागी और राव की नजरों में, पर उसके कुछ ही दिनों बाद पटनायक से उसके मतभेद गहराने लगे थे। उस दिन पटनायक के एक निर्णय से वह असहमत ही हो उठा था। 

 उनके कुछ साथी पुलिस की हिरासत में थे। सूचना मिली थी कि जंगल से होकर उच्च अधिकारियों की जीप गुजरने वाली है। उनमें सबसे महत्वपूर्ण जिला आयुक्त मिस्टर डांगे था। पटनायक ने सदस्यों की मुक्ति के लिए इनके अपहरण की योजना सामने रखी थी, जो उसके आक्रामक  तेवर के अनुरूप था। जबकि रामन्ना के लिए अपने साथियों की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण थी। उस दिन इसी बात को लेकर मीटिंग रखी गई थी। 
  
जहां रामन्ना आकलन और उचित अवसर की भूमिका का पक्ष लेकर बात करता वहीं पटनायक उसे व्यर्थ बताते हुए धन, हथियार और पार्टी की अप्रत्याशित लोकप्रियता का तर्क प्रस्तुत करता। रामन्ना ने कई बार महसूस किया था- पटनायक अपने अनुभवों को सौंदर्य शास्त्रा की तरह प्रस्तुत करता और अपने कार्यक्रम की भावी रूपरेखा एक रूमानी कवि की भांति खींचता। रामन्ना ने कहा था, फिलहाल शासक वर्ग स्थिरता के पड़ाव पर है। कई आकार और कई प्रकार की बैसाखियों पर खड़ी सरकार भले ही दौड़ न रही हो पर धीरे-धीरे सरक जरूर रही है। ऐसे में आक्रामक रवैया अपनाकर हमें अपने शासक वर्ग को सजग होने का अवसर नहीं देना चाहिए। 
 तुम्हारा सोचना गलत है रामन्ना। पटनायक ने बहुत संतुलित स्वर में कहा था- तुम जिसे सरकने का नाम दे रहे हो वह पहलू बदलना और शरीर के  उस भाग को सहलाना मात्रा है जिस पर सहयोग के नाम पर यह छोटे-छोटे दल अपने नाखून चुभो रहे हैं। 
 फिर भी उदारीकरण, ?लोबलाइजेशन और दलित तथा मुसलमानों को मुख्यधारा में शामिल करने की बात कहकर यह सरकार जनता को तो भरमा ही चुकी है। पिफर धर्म निरपेक्षता और सामाजिक समानता वेफ नाम पर इस सरकार ने ऐसा चोला बदला है कि देश की वामपंथी पार्टियां भी चकित हैं। बल्कि उनको अपने अस्तित्व और पहचान की चिंता होने लगी है। ऐसी स्थिति में कोई गलत निर्णय बहुत महंगा पड़ सकता है। स्थितियां हमारे बिल्कुल विपरीत हैं। 



 स्थितियां अनुकूल हैं रामन्ना। पटनायक अपनी ऐनक साफ करने लगा था, अफरा-तफरी मचाने के लिए हमारे गिने-चुने सदस्य ही काफी हैं। अभी तुम्हीं ने कहा, गठबंधन में शामिल राज्य सरकारें अपना हित साधने में दुबली हुई जा रही हैं। एक ओर उनकी मांगें, हठ और जिद हैं तो दूसरी और सरकार के सामने महंगाई और राष्ट्रव्यापी आर्थिक मंदी से निबटने की विकट समस्या है। और ऐसे वातावरण में भी शीर्ष नीतिगत मसलों पर विभाजित है। इसे स्थिरता या प्रतिकूलता की स्थिति नहीं कहा जा सकता।
 रामन्ना खामोश हो गया था। खिंचा-खिंचा लौटा था फिर। गोदावरी के दूर तक फैले दूध-से सेफद आंचल पर उसकी नाव एक पगडंडी-सी खींचती जा रही थी, जिसका संबंध कहीं न कहीं से उसके विचारों में पड़ी एक दरार और मस्तिष्क में उठे उथल-पुथल से भी था। 
 चप्पू खेते हुए रामन्ना की यह मुद्रा तारामिला को मोह गई थी। कभी ऐसे क्षण आते तो तारामिला का सामना होते ही सब कहीं खो जाता। पर आज तो जैसे वह उसकी ओर से भी विमुख था। 

 पूर्णिमा की उजली रात में गोदावरी का कल-कल जल अपनी एक अलग आभा से आतंकित कर रहा था। सन्नाटे में छोटी-छोटी मछलियां, दूर आकाश पर विचरते पक्षी, पूर्णिमा का सम्पूर्ण चांद... न जाने तारामिला को इनमें से किसने डराया, कि वह एकाएक उठकर रामन्ना के पास सिमट आई। छोटी-सी नाव में हलचल हुई, फिर उसके लंबे केश और उन्नत वक्षों की ओट में सब कुछ छिपता चला गया... गोदावरी की विरासत... चंद्रमा का एकाधिकार... चर-अचर प्राणियों का कोलाहल... तभी वह बोल पड़ी थी, सच पूछो तो ... पटनायक से तुम्हारा उलझना मुझे भी अच्छा नहीं लगता! 
 मुझे भी मतलब....? 

 हां, नागी और राव भी तुमसे सहमत नहीं दिख रहे थे। 
 रामन्ना ने उसे घूरकर देखा था। पगडंडी और गहरी होकर उभरने लगी थी। उसी दिन वह तारामिला के गांव भी गया था। जहां वह तारामिला के  अपाहिज भाई शिवम से मिला था जो चार पहियों वाली स?गड़ गाड़ी पर घिसटकर चलता था। उसने बताया था, शिवम भी कभी दस्ते में था। मगर एक मौके पर पुलिस के साथ झड़प में वह सामने आ गया था। तभी से उसकी यह हालत हो गई थी, रामन्ना सिहर कर चला गया। जीवन, इतना विवश, इतना लाचार, उसकी कल्पना से परे था। 
 शिवम की अव्यवस्थित और गर्द से अटी दाढ़ी, मोटी-मोटी मूंछें और धंसी हुई बड़ी-बड़ी आंखें... वहां भी कुछ अनकहा और कुछ अनखुला रह गया था। रामन्ना को देखकर उसने तारामिला से फुसफुसाते हुए कहा था, तारा, रामन्ना अच्छा है, तुझे इसी की खातिर रुकना होगा... यहीं मेरे साथ सदा के लिए... इंगेरे... 
मगर तारामिला खामोश थी, जैसे कहना चाहती हो- तुम भी कितनी जल्दी भूल गए अन्ना... मेरे अपमान और तिरस्कार को! यह वही गांव तो है... जिसने बोंगी के दिन कूड़े-कचरे के साथ मुझे भी त्याग दिया था। तुम भूल गए हो तो ठीक है, मगर मुझे याद है वह सब कुछ! चाहकर भी वह इन शब्दों को स्वर नहीं दे सकी थी। बस लौटते हुए रामन्ना से इतना ही बोली थी- मैं कभी जिद भी करूं तो दोबारा मुझे यहां कभी मत आने देना। 
कितनी निर्भर रहने लगी थी वह उन दिनों उस पर। रामन्ना को अजीब सा लगता यह सब। वह उसकी कलाई सहलाने लगता। जैसे अम्मा का सपना, अम्मा के सहेज कर रखे कंगन वहीं कहीं हों। वह अब शरीर भर नहीं रह गई थी, रामन्ना के लिए। उन दिनों उसका दलम सबसे अधिक सुर्खियों में रहने लगा था। उन्हें चुनौती के रूप में देखा जाने लगा था। और उन्हीं दिनों रामन्ना और उसके साथियों पर भारी इनाम की घोषणा हुई थी। पटनायक की ओर से उन सबको अतिरिक्त सतर्क रहने का आदेश मिला था और वह पूरी तरह से जंगल का होकर रह गया था। 
लंबे अंतराल पर होने वाली अम्मा से मुलाकातें भी अब दुर्लभ हो गई थीं। कई सूत्रों को जोड़ता तो कुछ जान पाता। इसी क्रम में एक दिन सूचना मिली कि अम्मा को पुलिस थाने ले गई है। वह बेचैन हो उठा था। पता नहीं उसके साथ पुलिस का बर्ताव कैसा हो? एक आतंकवादी की मां के साथ, वह अपने संदर्भों से कटकर एक बेटे के रूप में सोचने लगा था अचानक। 
 वातानुकूलित विल्सन हॉल में बैठा वह पसीने से सराबोर हो उठा था। लगा, कोई रेल गाड़ी बहुत तेज गति से उसकी ओर दौड़ी आ रही है, और वह बाध्य है दोनों पटरियों के बीच खड़ा रहने के लिए। 
विचारधारा, उद्देश्य, सिद्धांत...दलम की लाइन... उसे सब निरर्थक लगने लगे थे। पटनायक ने ही उन काइयों साफकिया था, दृढ़ से दृढ़ व्यक्ति के  जीवन में भी लचीले क्षण आते हैं। उन्हीं क्षणों में आइन्स्टीन जैसा वैज्ञानिक प्रेम पत्र लिखने लगता है तो सिमोन-द-बुआ जैसी भौतिकवाद की पक्षधर किसी के बनियान और मोजे धोने के लिए आतुर हो उठती है। पर इससे उनके लक्ष्य और उनकी दिशाएं नहीं बदल जातीं। यह क्षण अति भंगुर और तात्कालिक होते हैं। 
फिर भी रामन्ना उन्हीं क्षणों का शिकार हो रहा था, जबकि अगले ही दिनों उसे उस विशेष अभियान का संचालन करना था, जिसकी रूपरेखा पटनायक ने  उसे दी थी। सरकारी अधिकारी दौरे पर निकलने वाले थे। 
 स्टेज पर अब उदास कर देने वाला हंटर पेटिव संगीत बज रहा था। नायिका केट विंसलेट भावुक होकर उस संवाद को दुहरा रही थी, जो वह मृत्यु के समय नायक से कहती है, मैं अब और जीवित नहीं रह सकती। मेरे जीवन की कोई दिशा नहीं है। मेरा इस पर कोई अधिकार नहीं है।
तारामिला से उसने भी कुछ ऐसा ही कहा था, पर सहानुभूति के बदले उसका बिफरा हुआ रूप सामने आ गया था। क्रोध से दीप्त मटमैली छाती पर रेंगती उसकी उंगलियां अचानक थम गई थीं। अपने आपको समेटती हुई वह एक झटके के साथ उठकर खड़ी हो गई थी, मैं सोचती थी यह प्रेम है, मगर अब लगता है बलात्कार का एक रूप यह भी हो सकता है, तविड... पच्चन! एक बहुत भद्दी गाली निकली थी तारामिला के मुंह से आदतन। 
 कुछ ही दूरी पर उनके बंधक अधिकारी पड़े हुए थे, मि. डांगे, कानूनविद महथि और अन्य दो वरिष्ठ अधिकारी। उनके साफ-सफेद कपड़े और  चिकने सफेद जूते अंधेरे में भी अपने वैभव का प्रदर्शन कर रहे थे। उन सभी के चेहरों पर भय और असमंजस का मिला-जुला भाव था, क्योंकि मुहैया ने अभी-अभी आकर सूचना दी थी कि पास के ही एक गांव में सुरक्षा बलों की एक बहुत बड़ी टुकड़ी तैनात की गई थी।

इसका अर्थ बिल्कुल साफ था। वे सब इस समय मृत्यु के प्रांगण में खड़े थे। राव, मुहैया पर उबल पड़ा था, जो उन दिनों सूचना प्रभारी भी था, फ्देखा जाए तो यह सूचना हमें पहले ही मिल जानी चाहिए थी। आखिर शहर से दूर इस उजाड़ इलाके में फोर्स को भेजने की योजना सरकार ने अचानक तो नहीं बना ली होगी। क्या कर रहे थे तुम?
 फ्क्या पता सरकार को हमारे इस ठिकाने का पता भी चल गया हो! नागी ने शंका जाहिर की थी- फ्हमारी कठिनाई और बढ़ सकती है। 
 फ्ऐसी अवस्था में हम इन्हें साफ कर देंगे। मुर्हया का संकेत अफसरों की ओर था। 
 फ्क्यों...? 
 फ्ताकि हमें भागने में आसानी हो...!
 फ्अगर यही स्थिति आई तो... सबसे पहले मैं तुझे ही, तुम्हारी लापरवाही की वजह से...! कहते-कहतेे राव ने दोनाली के कुंदे से उस पर वार कर दिया था। मुहैया बचते-बचाते गिर ही पड़ा था। झाडिय़ों में फंसकर उसकी धोती चरमरा गई थी और वह लगभग नंगा हो गया था। सिर पर एक और गहरी चोट आई थी और खून की एक मोटी धारा पट से खिंच आई थी। 
 फ्इसमें मुहैया की गलती नहीं है राव! रामन्ना ने बीच-बचाव करते हुए कहा था- फ्पटनायक को मैंने पहले ही इस ऑपरेशन के लिए मना किया था। इतनी जल्दबाजी में लिया गया निर्णय... और वैसे भी चुनाव होने वाले हैं... सुरक्षा की चैकसी तो होगी ही। 
 दूसरे दिन उन लोगों को वह स्थान छोड़ देना पड़ा था। उनका दूसरा शरण-स्थल बना था फ्रांसीसी सिपाही डुप्ले का वीरान पड़ा किला, जो जंगल के ठीक मध्य में होने के कारण सबसे अधिक सुरक्षित स्थल माना जाता था। 
आगे-आगे रास्ता बनाती हुई तारामिला। पीछे अधिकारी, नागी तथा राव। मुहैया इलाज के लिए गांव की ओर चला गया था। रामन्ना सबसे पीछे चल रहा था। उसके कानों में मि. डांगे के शब्द खलबली मचा रहे थे। उन्होंने एकांत पाकर रामन्ना से कहा था, फ्जानते हो डुप्ले क्लाइव से भी अधिक बहादुर और निष्ठावान सेनापति था। फिर भी वह हारा... बता सकते हो क्यों...? 
 उसने रामन्ना की आंखों में उतरने का प्रयास किया था, फ्क्योंकि तब समय उसके अनुकूल नहीं था। दूसरे उसने इन जंगलों के जैसे दूरवर्ती इलाके में अपनी छावनी विकसित की थी। नहीं तो इसी सता का यही संघर्ष तब भी था। 
 कई महीने बाद रामन्ना ने अपने सूखे हुए होठों पर सिगरेट का स्पर्श महसूस किया था। क्या डांगे ने इसे नोट कर लिया था? वह सोचता है आज भी। ढूंढ़ता है इस प्रश्न का उतर। कितने महीने गुजर चुके हैं, पर वह निरुतर ही है। उसकी एक और जहाज है तो दूसरी ओर बर्फ, बारी-बारी से जल की सतह पर गुजरते हुए वह खड़ा रह जाता है, सिगनल टॉवर की भांति, समुद्र के बीचों-बीच, नितांत अकेला.... असहाय। 

 रामन्ना को आश्चर्य होता है, जीवन का कितना बड़ा हिस्सा ऐसे ही पल्लवित होकर रह गया है! ऐसे ही तिरोहित होकर रह गया है! निरुद्देश्य निरर्थक, इसी टॉवर के निकट। इसी धुरी के इर्द-गिर्द। बदबू, कीचड़ और काइयों के संग... सुविधा, मदिरा और सस्ती वेश्याओं के संग। अंधेरी, दमघोंटू कोठरियों में हांफते... सुस्ताते हुए। 
 सन्नाटे को और सघन पाकर डांगे ने आगे कहा था, धीमी आवाज में, जैसे छिपकली रेंगती हो, दबे पांव, फ्तुम्हारी हालत भी डुप्ले से बहुत अच्छी नहीं है यंग मैन। स्थितियां अभी चारों ओर से तुम्हारे आदमियों का बढ़ता आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है और एक सीमा तक दलम की नीतियों का का समर्थन तो मैं भी करता हूं। लेकिन जिस चेतना को तुम परिवर्तन का प्रथम सोपान मानते हो, क्या वही हो पाया है अब तक? इतने वर्षों के त्याग... प्रयास... बलिदान और हत्याओं के बावजूद। इन सबके सामने दलम की उपलब्धियां क्या हैं? 

उपलब्धियां हैं। वह आवेशित हो उठा था- फ्हमारे हमलों की वजह से सरकार को कई मुद्दों पर झुकना पड़ा है। विधान सभा में बैठने वाले कई विधायक तक हमारे द्वारा मनोनीत हैं। हमारी नीतियों के खिलाफ वे आवाज नहीं उठा सकते। इसी विषय पर हमने ऊपरी सदन को विभाजित करने में भी सपफलता पाई है। आज दलम पहाड़ और जंगलों से निकलकर शहरी उद्योग और छात्रों तक पहुंच गया है। आपने कभी सुना नहीं होगा कि हमारे इलाके में कभी चोरी या बलात्कार जैसी घटना भी हुई है! यह कहते हुए रामन्ना का जी धक्क से रह गया। उसे इस कदर आवेशित नहीं होना चाहिए था। अनायास ही उसने कई अंदरूनी बातें उजागर कर दी थीं। 
 फ्इतना तो तुम एक सामान्य जीवन जीते हुए भी कर सकते हो!
फ्सत्ता के दरवाजे पर बैठकर हड्डियां चूसने को आप सामान्य जीवन कहते हैं! वह पुन: अनियंत्रिात होने लगा था- फ्जहां हर कदम अविश्वास और अनिश्चितता के वातावरण में उठाया जा रहा है, जहां न कोई आधारभूत भविष्य है न दूरदर्शी वर्तमान, बाजार, अर्थ और सुरक्षा जैसे वैज्ञानिक उद्यमों का आरंभ जहां यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान के पाखंड के साथ किया जा रहा हो, वहां पता नहीं आप जैसे लोग कैसे सांस लेते हैं! उस पर दावा यह कि हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच रहे राष्ट्रों में से एक हैं। 
 इस बार वह बोला तो जैसे अंदर का पुराना रामन्ना फिर से लौट आया था। 
डांगे खामोश पड़ गए थे। पता नहीं अपने पास उत्तर न होने के कारण या नागी को अपनी ओर आता देखकर, कहा नहीं जा सकता। पर उस दिन अपने अंतिम एकांत में, उन्होंने उससे कहा था, रामन्ना, बुरा मत मानना। पिछले पंद्रह दिनों से मैं तुम सबके साथ हूं। और पिछले पंद्रह दिनों से तुम्हारे साथियों का सौतेला व्यवहार मुहैया के साथ देख रहा हूं। नीतियों के नाम पर क्या तुम स्वयं भी विभाजित नहीं हो? और यह विभाजन क्या धर्म और जातिगत सीमाओं से बाहर है? नागी और राव क्या एक ही कुल के नहीं हैं? और तुम और मुहैया और तारामिला क्या सहधर्मी मादिंगा जाति के नहीं हो? 
विशाल टाइटेनिक अब एक मामूली आइसबर्ग से टकरा रहा था। विल्सन हॉल अंधेरे में डूबा हुआ था और लोग सांस लेना भूल गए थे। 
 रामन्ना के पास रेडियो था। आकाशवाणी से सूचना प्रसारित हुई कि सरकार ने कुछ कमांडो दस्ते जंगल में भी उतारे हैं। इस सूचना से सरकार और उनके बीच होने वाली बातचीत रुक गई। दलम की ओर से यह साफ कह दिया गया कि असफलता की स्थिति में वह कुछ भी कर सकते हैं। उन्होंने यह भी अनुमान लगाना आरंभ कर दिया था कि वह कितनी देर तक पुलिस का सामना कर सकेंगे। डुप्ले के खंडहर में वह उनका अंतिम दिन था। 

 रामन्ना, तुम एक बहादुर देशभक्त और सच्चे सिपाही हो। यह आवाज डांगे की नहीं बल्कि पैनी दृष्टि वाले कानूनविद मि. महंथि की थी। अशांत रामन्ना पर उन्होंने एक और विक्षोभ उत्पन्न किया था। 
 फ्तुम्हारी सुरक्षा की पूरी गारंटी हमारी होगी। तुम देख सकते हो... सरकार हमें छुड़ाने के लिए क्या-क्या प्रयास कर रही है। और इस बीच यदि हम मारे भी जाते हैं तो हमारे परिवार को भरपूर सुविधाएं मिलेंगी, यह तुम भी जानते हो, लेकिन इससे तुम सबको क्या मिलने वाला है? उल्टे तुम एक अवसर खो दोगे... एक बेहतर जीवन का... तुम्हारे एक-एक साथी पर सरकार ने लाखों रुपये का इनाम रखा हुआ है। 

रामन्ना को चोर-सिपाही का वह खेल याद आ गया था, जिसे वह बचपन में खेला करता था। उसे लगा था वही खेल फिर से खेला जा रहा है, मगर बिना किसी नियम और उसूल के। सिपाही, अब चोर को ढूंढ़ निकालने का खतरा नहीं उठाता बल्कि अब वह एक स्थान पर बैठ गया है ढेर सारी मिठाइयां लेकर, जिनमें विष मिला हुआ है। 
 स्वार्थ, कर्तव्य और नैतिकता का ऐसा घालमेल उसने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। एक पल के लिए वह संविधान, उसके द्वारा प्रदत जीवित रहने के अधिकार और औचित्य तक पर सोच गया। पर दूसरे ही क्षण उसने स्वयं को व्यवस्थित भी कर लिया था। उसके सामने मां, मुहैया और फिर शिवम का चेहरा घूम गया था। फिर भी शब्द जैसे उसके गले से घिसटते हुए निकले थे, बलात्, फ्लेकिन फिर भी मुझे सोचना होगा। दलम की नीतियां इस मामले में बहुत कड़ी हैं। दे माइट डू एनी ऑफ द वस्र्ट विद मी...!
फ्देन यू केन गो एवरी व्हेयर... एब्रॉड एज वेल! मि. डांगे फिर से बोले थे। 
 झुटपुटों से किरणों की दस्तक शुरू हो चुकी थी। रामन्ना शायद पूरी रात गुजार चुका था, मि. डांगे और मि. महंथि के बीच। और जहां तक उसे याद है निर्णय की वह अंतिम रात भी थी। जहाज जैसे कई दिनों से रन-वे पर चक्कर लगा रहा था। पर हवा में वह पहली बार उसी रात... उसी सुबह को उड़ा था... अपने नये गंतव्य की ओर। 
टाइटेनिक के टूटने की आवाज अब सुनाई देने लगी थी। एक धमाके साथ वह दो अलग हिस्सों में बंट रहा था। उसका एक भाग बहुत तेजी से महासागर के गर्त में समा रहा था। चारों ओर से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। लोग एक दूसरे पर सवार होकर भी अपनी जान बचा लेना चाह रहे थे। और सागर की निरंतर उठती हुई लहरें मानो मृत्यु का अश्लील अट्ट्टहास हों! 
 इसी बीच रामन्ना की पिस्तौल से दो गोलियों चली थीं - 
 तड़ाक! 
 तड़ाक!! 

 पहले नागी फिर राव। तारामिला तेजी से अपनी बंदूक की ओर लपकी थी। लेकिन उससे पहले रामन्ना उसके सामने आ गया था। तारामिला का एक धक्का खाकर वह गिरते-गिरते बचा। फिर बड़ी मुश्किल से अधिकारियों के साथ आए नौकर उसे जकड़ पाए थे। मृत्यु का भय न जाने कहां लुप्त हो गया था! और उसके बदले घृणा की एक अविकल धारा उसवेफ अंग-अंग से फूट पड़ी थी। गर्दन पर रक्त पेशियां उभर आईं थीं और चेहरा किसी डरावने मास्क की भांति विद्रूप हो गया था। डांगे और महंथि के साथ रामन्ना भी सहम गया था। उसने आगे बढक़र कहा था उसने, फ्तारा, मेरी बात सुनो... ये लोग हमारी पूरी मदद करेंगे... शहर जाकर हम घर बसा लेंगे। 
 फ्घर बसा लेंगे! वह बीच में बोल पड़ी थी- फ्एक बलात्कारी और गद्दार के साथ! बोलते-बोलते जैसे उसने सारी शक्ति को इक_ा कर लिया था। वह मुक्त होकर पुन: अपनी बंदूक की ओर बढ़ी थी, कि तभी एक और गोली चली थी। रामन्ना चैंक पड़ा था। नागी की बंदूक अब महंथि के  हाथों में थी। वह चीख रहे थे- रामन्ना निकल पड़ो अब....! 
लेकिन वह तो वहीं जम गया था, शिला की भांति, तारामिला की अनियंत्रिात और उखड़ती हुई सांसों का साक्ष्य बनने के लिए। घुटनों के बल वह भर-भराकर गिर पड़ा और गोदावरी की एक धारा जैसे आंखों में ही जज्ब होकर रह गई। उस धारा को उफनती लहर का रूप धारण करने के  पहले डांगे की गरजदार आवाज ने कुचल दिया।  

 वह उठ खड़ा हुआ था। नशा खाये हाथी को जैसे नुकीले हथियार से कांचकर उठाया गया हो। महंथि के हाथों में धुएं की सपेफद लकीर उगलती हुई बंदूक अब तक मौजूद थी। उसकी दिशा किसी भी पल बदल सकती थी। 
समय का चक्र कितनी गति से घूमा था, वह सोच भी नहीं पाया था। 
 पीड़ा, पश्चाताप या प्रेम का अधखिला अंकुर - इनमें से कौन-सा था उसका अपना आइसबर्ग, जिससे टकराकर वह निरंतर टुकड़े-टुकड़े होता रहा था। टाइटेनिक के विपरीत वह किश्तों में टूट रहा था, डूब रहा था। 

 और क्या टाई की वह संकीर्ण होती गांठ और जूते और सूट का कसाव उन्हीं तरंगों की आवृति है। क्या यह सब पूर्व निर्धारित, पूर्व योजना के तहत है जो अब शांत और स्थिर हो गया है। और क्यों उसे बेमानी-सी वही रूमानी कविता याद आने लगी है? पटनायक के मुंह से कभी सुनी हुई : 
 मैं एक ऊंचे टीले पर बैठा हूं 
 मेरे चारों ओर पहाड़ और जंगल हैं 
 सामने लोग हैं 
 ख्प्रसिद्धि विहीन 
 संप्रदाय और जाति विहीन 
 पर सस्वप्न और ऊर्जावान 
 ये मुक्ति लाएंगे शोषण से 
 ये मुक्ति लाएंगे अंधेरे से, विषमताओं से 
 क्योंकि वे सपनों में 
 विश्वास रखते हैं,  
 यही उनकी पूंजी,  
 धरोहर और सुंदरता है 
 ये आए हैं.... 
 जंगल, पहाड़ और मैदानों से निकलकर 
 हां ये र्सिफ सपने नहीं देखते। 

 तो उसने क्या सिर्फ सपना ही देखा था। यही असफलता थी उसकी। नहीं, वह डूब नहीं सकता। तो, रामन्ना तैरना जानता है, लेकिन छोर और किनारा, कहीं न कहीं होगा वह भी। इसी बहाव के  साथ वह स्वत: अध्यात्म की ओर मुड़ चला। इस परिवर्तन पर वह किंचित् अचंभित भी हुआ। पर दूसरे ही क्षण लगा यह इतना अप्रत्याशित और इतना अस्वाभाविक भी नहीं है। अपनी जड़ों की ओर लौटना भर है। पाप, पश्चाताप, क्षमा की याचना और फिर मुक्ति। इस बने-बनाए समीकरण ने उसे भीतर तक उद्वेलित किया। 
 और शो के समाप्त होने पर थियेटर के अहाते में ही बोल्ड अक्षरों में मिटता-उभरता यह विज्ञापन संसार का अंतिम सत्य प्रतीत हो रहा था, मुक्ति का जैसे अगला कदम, फ्टेक कंट्रोल ऑफ योर इमोशन। रिमूव योर सपल एंड गो एहेड फोर लाइफ प्लानिंग- सीखें हमारे संस्थान से। एक-एक शब्द ने जड़ होते चेतन पर मंत्र का सा प्रभाव डाला। 
 शरीर से मांस का एक टुकड़ा काटकर फेंक दिया गया जो अहसास, अनुभूति, आद्र्रता और टीसें उत्पन्न करने पर तुला हुआ था। अब वह सचमुच सहज हो चुका था। बहुत सामान्य हो वह खरीदारी करने किसी बाजार की ओर निकल पड़ा। हालांकि यह काम अम्मा किया करती थी, पर आज वह व्यस्त होना चाहता था, किसी भी तरह। 
अपार्टमेंट तक पहुंचते-पहुंचते रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी। बार में शायद वह आज कुछ ज्यादा देर बैठ गया था। अम्मा भी सो चुकी थी। हल्के प्रकाश में उसकी हथेली और चेहरे पर पड़ती झुर्रियों को साफ गिना जा सकता था। उसने अम्मा की ओर ध्यान से देखा, जैसे वहां कुछ पढऩा चाह रहा हो। मगर अक्षर हैं कि फिसल-फिसल पड़ते हैं। वह पलंग के और निकट आ गया। बिल्कुल उसके पास।  
 अम्मा खुश तो है! पांच कमरों का मुंबई में यह आलीशान फ्लैट... टीवी... फ्रिज... नौकर... ढेर सारे कपड़े और जाने कितना पैसा, और अच्छे दिनों के सपने भी! उपलब्धियों की इन बैसाखियों के  सहारे वह अम्मा तक पहुंचा चाहता है- उसकी प्रसन्नता, संतुष्टि या कम से कम उसकी किसी एक प्रतिक्रिया तक भी। 
 पर अम्मा है कि हमेशा बंधी-बंधी रहती है। शांत बिल्कुल। गांव में वह कितनी बातें करती थी। घर और आस-पड़ोस की चिंताओं से उसका सोना दूभर हो जाता। फिर उससे विवाह के विषय में अवश्य पूछती। ऐसी घड़ी में वह बहुत सहेजकर रखा हुआ कंगन निकालकर उसे निहारने लगती।

पर यहां आने के बाद सब छूट गया था। बड़ी मुश्किल से वह कभी उसकी हां-हूं सुन पाता। आरंभ में वह यहां आने का कारण अवश्य पूछती रही थी। पर धीरे-धीरे यह बर्फ भी पिघल गई थी। और सब नंगा हो गया था। 
 अनायास उसे कंगन देखने की इच्छा हुई। वह सब कुछ भूलकर उसे ढूंढऩे लगा। अलमारी, भगवान की मूर्ति के पास, शेल्फ में। फिर उसने अम्मा के पुराने संदूक में भी तलाश किया। देखते-देखते उसने पूरे घर को छान मारा था। पर कंगन उसे कहीं नहीं मिले। 
 हताश होकर वह बिस्तर पर चला आया। बहुत प्रयास के बाद भी वह सो नहीं पाया। आंखों में वही कंगन चांद का आकार लिए ठहर गया था। सोये-सोये ही उसने नींद की गोली की तलाश की। वह भी नहीं मिली। वह दुबारा पसर गया। मगर कुछ ही क्षणों के बाद अजीब-सी बेचैनी के  साथ उठ बैठा। 
आखिर अम्मा ने कंगन का किया क्या? चारों ओर से इस प्रश्न का जाल-सा तनता गया। उसे ताजा और ठंडी हवा के झोंकों की जरूरत महसूस हुई। वह खिडक़ी के पास आकर खड़ा हो गया। 
 बाहर सन्नाटा और समुद्र का साम्राज्य अनंत छोर तक फैला हुआ था। वह वहां भी बहुत देर तक रुक नहीं सका। शायद समुद्र से समुद्र का तारतम्य जुडऩे लगा था। वह तेजी से मुड़ा। उसे वाइन चाहिए वाइन... अमेरिकन ब्रांड, जनिथ द रायल एंड नथिंग... वह स्वयं से बड़बड़ाया। तभी उसकी नजर अम्मा के सिरहाने पर पड़ी। वहां बिस्तर से दबा हुआ सस्ते साटन का वही लाल टुकड़ा दिखाई पड़ा था जिसमें कंगन बंधा हुआ था। उसकी आंखें चमक उठीं। एक लंबी सांस लेकर वह बड़ी सावधानी के साथ उसे बाहर खींचने लगा। लेकिन उसमें कंगन की जगह कोई और चीज मालूम पड़ी... लोहे की सी, कोई भारी-भरकम वस्तु। वह जल्दी-जल्दी उसे खोलने लगा। 
 एकबारगी वह कांप उठा। एसी, हवा के नरम और ठंडे झोंकों के बावजूद उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलछला आईं। अंदर बहुत तेजी से कुछ बैठता हुआ  महसूस हुआ। लगा, घुटनों की शक्ति समाप्त हो गई है और मांसपेशियों में रक्त की जगह कुछ और बह रहा है। उसे अतिरिक्त खड़े रहना कठिन जान पड़ा। कपड़े में कंगन की जगह एक छोटी-सी पिस्तौल थी, नयी। पारे की तरह चमचमाती हुई। और साथ में एक ही कारतूस, सोने की तरह चमचमाती, दीप्त। 


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21 Jun 2013

‘स्टार’ जिसमें बसता था आम आदमी

यह सुखद संयोग है कि भारतीय सिनेमा और अभिनेता बलराज सहानी का जन्म एक ही माह और एक ही वर्ष हुआ। यह कितना त्रासद है कि आज जब भारतीय सिनेमा इतना विशाल रूप धारण कर चुका है और अपनी यात्रा के सौ वर्ष मना रहा है, वह और उसके प्रशंसक उस महान अभिनेता को भूल गए हैं जिसने अपने अभिनय से भारत की शोषित और दमित जनता के दुख-दर्द को सिनेमा के पर्दे पर साकार किया। बलराज साहनी को श्रद्धा के सुमन अर्पित कर रहे हैं दीवान सिंह बजेली  

एक ऐसे अभिनेता के रूप में, जो व्यावसायिक फिल्मों से जुड़ा होने के बावजूद अपनी प्रतिबद्धता में अटल रहा बलराज साहनी की तुलना हॉलिवुड और ब्रितानवी व्यवसायिक सिनेमा के चार्ली चेपलिन, वेनेसा रोडग्रेव और राबर्ट रेडफोर्ड जैसे अभिनेताओं से की जा सकती है। हिंदी फिल्मों को उन्होंने यथार्थवादी अभिनय की एक ऐसी शैली दी जो विशिष्ट है।
यह सुखद संयोग है कि भारतीय सिनेमा और अभिनेता बलराज सहानी का जन्म एक ही माह और एक ही वर्ष हुआ। अपने आप में यह विडंबना है कि आज जब भारतीय सिनेमा इतना विशाल रूप धारण कर चुका है और अपनी यात्रा के सौ वर्ष मना रहा है वह और उसके प्रशंसक उस महान अभिनेता को भूल गए हैं जिसने अपने अभिनय से भारत की शोषित और दमित जनता के दुख-दर्द को सिनेमा के पर्दे पर साकार किया। इससे बड़ी दुख और शर्म की बात क्या हो सकती है कि दिल्ली में 25 से 30 अप्रैल तक चलने वाले सरकारी स्तर पर हो रहे समारोह में बलराज सहानी की तो कोई फिल्म दिखलाई गई और ही उन्हें याद किया गया। क्या यह ऐसा अवसर नहीं था जब यथार्थवादीवादी परंपरा की हिंदी व्यावसायिक सिनेमा की सबसे बड़ी देन दो बीघा जमीन को दिखाया जान चाहिए था?
बलराज साहनी का भारतीय फिल्मों के इतिहास में अपनी मानवीय संवेदनाओं और किसान-मजदूर के हमदर्द के रूप में एक अभिनेता के तौर पर अद्वितीय स्थान है। कलाकार के रूप में अपनी उपलब्धि के चरम पर पहुंचने के बवजूद तो वह अपनी जड़ों को भूले और ही भारत के संघर्षरत आम आदमी को। उनका जीवन एक ऐसे कलाकार का रहा जिसने समाज के प्रति अपने दायित्व का सच्चाई से निर्वहन किया। जनता के कठोर जीवन की वास्तविकता को अपनी कला में आत्मसात करने के लिए उन्होंने उनके संघर्षमय जीवन से तादात्म्य स्थापित किया। यही कारण है कि उनके चरित्र जैसे शंभू महतो (दो बीघा जमीन), पोस्ट ऑफिस का क्लर्क (गर्म कोट), एक मुस्लिम व्यापारी (गर्म हवा) पठान (काबुलीवाला) चिरस्मरणीय हैं। वह ऐसे कलाकार थे जो जीवन और कला के पारस्परिक अंतर्संबंधों के अंतद्र्वंद्वों को कलात्मक स्वरूप देने के लिए कटिबद्ध रहे और वास्तविकता की सच्चाई को उसके आंतरिक अंतद्र्वंद्वों को निरंतर प्रतिपादित करते रहे।
बलराज साहनी का जन्म 1 मई, 1913 को रावलपिंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान में हैउनका नाम वास्तविक नाम युधिष्ठिर था। उनके पिता एक कर्मठ व्यक्ति थे, क्लर्क की नौकरी छोड़कर एक अच्छे जीवन की तलाश में व्यापारी बन गए और समाज में एक संपन्न आर्य समाज के अनन्य अनुयायी के रूप में जाने जाते थे। उनकी दो बहनें एक भाई (लेखक कलाकार भीष्म साहनी) थे। पढ़ाई में वह प्रखर थे।
ज्यों-ज्यों वह बड़े होते गए और उच्च शिक्षा प्राप्त करते गए अपने पारिवारिक पुरातनपंथी विचारों के विरोधी बनते गए। उनके विचारों में उस समय एक नया मोड़ आया जब उन्होंने रावी नदी के किनारे इंडियन नेशनल कांगे्रस के 1929 के ऐतिहासिक अधिवेशन को देखा। इस अधिवेशन में जवाहरललाल नेहरू ने पूर्ण आजादी प्राप्त करने की घोषणा की थी।

अगली घटना जिसने युवा बलराज को गहरे प्रभावित किया वह थीब्रिटिश सरकार द्वारा भगत सिंह उनके कॉमरेडों को फांसी देने की। इस जघन्य अमानवीय अपराध के प्रति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध देशव्यापी आक्रोश की लहर फैली। बलराज पर इस लहर का गहरा असर पड़ा। कॉलेज के दिनों से ही बलराज का रुझान साहित्य नाटकों की ओर बढ़ता गया। बलराज के जीवन दर्शन में, उनके प्रगतिशील चिंतन में उनकी शोषित जनता के संघर्ष के प्रति आस्था में एक क्रांतिकारी परिवर्तन तब आया जब वह बीबीसी (रेडियो) में उद्घोषक के कार्यकाल की समाप्ति पर मुंबई आए और उन्होंने इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोशियेशन (इप्टा) में अपनी पत्नी दमयंती के साथ नाटकों में काम करना शुरू कर दिया। इसी के साथ उनके विचारों पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद का असर बढ़ता गया।
मुंबई इप्टा में प्रवेश करते ही उनका संपर्क ख्वाजा अब्बास से हुआ। उस समय अब्बास साहब के नाटक जुबेदा की रीडिंग चल रही थी और इसका निर्देशन स्वयं उन्होंने करना था। हालांकि उस समय उन दोनों का विशेष परिचय नहीं था। बलराज ने लंदन में उनकी कुछ कहानियां अवश्य पढ़ी थी। अचानक अब्बास ने घोषणा की :
दोस्तो, मुझे खुशी है कि आज बलराज साहनी हमारे बीच में है। मैं इस नाटक को उन्हें इस आशा के साथ सौंपता हूं कि वह इसका हमारे लिए निर्देशन करेंगे।
बलराज ने जुबेदा का निर्देशन बड़े जोश सफलता के साथ किया। इस नाटक की प्रस्तुति के साथ ही दोनों के बीच गहरी निकटता बन गई। वास्तव में यह नाटक बहुत लोकप्रिय हुआ जो एक मुस्लिम लड़की उसके परिवार के निजी संघर्ष को बृहद जन संघर्ष के परिपे्रक्ष्य में प्रतिपादित करता है। अब्बास ने धरती के लाल फिल्म में बलराज साहनी को मुख्य भूमिका में रखा और साथ ही उनकी पत्नी दमयंती ने भी इस फिल्म में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। बलराज ने इप्टा के कई नाटकों में काम किया जिनमें महत्त्वपूर्ण हैइंसपेक्टर जनरल।
दुर्भाग्यवश दमयंती की 28 वर्ष की आयु में अचानक मृत्यु हो गई और वह अपने पीछे दो बच्चे छोड़ गईं। बलराज पर जैसे बज्रपात हो गया। पर धीरे-धीरे उन्होंने अपने नैराश्य, अकेलेपन असाध्य दुख का इप्टा की गतिविधियों रचनात्मक कार्यों में लग कर सामना किया।
बलराज को बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए विकट संघर्ष करना पड़ा। एक अभिनेता के रूप में वह अपनी कला में उच्च स्तर प्राप्त करना चाहते थे। उनकी शैली यथार्थवाद पर आधारित थी। जबकि बॉलीवुड में लगातार मनोरंज और रोमांस का बोलबाला होता जा रहा था। अंतत: वह स्वयं को बॉलीवुड में एक महान कलाकार के रूप में स्थापित करने में सफल हो पाए। उन्होंने 135 फिल्मों में अभिनय कियाधरती के लाल, दो बीघा जमीन, गर्म कोट गर्म हवा भारतीय सिने जगत की कालजयी कृतियां हैं। इन फिल्मों में बलराज अपने चरित्रों के माध्यम से गहनता, सजीवता, जीवंतता संवेनशीलता का अद्वितीय सम्मिश्रण कर दर्शकों के हृदयों में अमिट छाप छोड़ते हैं। ये चरित्र हमारे समाज के प्रतिनिधि परिचित हैं जिनसे दर्शक एक सहज तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यथार्थवाद और संवेनशीलता उनकी कला की शक्ति है। उन्होंने सीमा (1955) सोने की चिडिय़ा (1958) में चिरस्मरणीय चरित्रों का किरदार निभाया है। ये चरित्र कलाकार के नैतिक, सामाजिक राजनीतिक चेतना प्रतिबद्धता के कारण ही प्राणवान बन गए।
धरती के लाल जहां एक ओर बलराज के मानवीय दृष्टिकोण उनकी मानवी आजादी के प्रति गहन आस्था की द्योतक है, दूसरी ओर इस फिल्म ने एक नई प्रवृत्ति का सूत्रपात किया जिसका विकास अभिवृद्धि विमल राय सत्यजीत राय ने किया और भारतीय सिनेमा को विश्व सिनेमा के इतिहास में एक सम्मानजनक स्थान दिलवाया।
धरती के लाल (1946) अब्बास का निर्देशन के रूप में पहला प्रयास था। बिजोन भट्टाचार्य के नाटक नवना कृष्णचंदर की कहानी अन्नदाता पर आधारित इस फिल्म की कहानी अब्बास बिजोन भट्टाचार्य ने लिखी। इसके गीत लिखे सरदार जाफरी और पे्रम धवन ने। यह पहली भारतीय फिल्म है जिसे सोवियत यूनियन में व्यापक रूप से 1949 में वितरण किया गया। यह फिल्म 1943 के बंगाल के अकाल पर एक कठोर व्यंग्य है। और साथ ही अकाल पीडि़त मानवों का हा-हाकार अमानवीयकरण का सजीव दस्तावेज के रूप में मील के पत्थर के रूप में हमेशा याद की जाएगी।

दो बीघा जमीन (1953) जिसे विमल राय ने निर्देशित किया। भारतीय सिने इतिहास में एक महान क्लासिकल फिल्म के रूप में सदैव याद की जाएगी। इस फिल्म के नायक के रूप में बलराज की अभिनय कला उच्चतम शिखर तक पहुंची। इस चरित्र का गहन यथार्थ चित्रण करने के लिए बलराज ने मुंबई में जोगेश्वरी में रहने वाले उत्तर प्रदेश के मेहनतकश लोग जो दूध बेचने का कार्य करते थे के जीवनशैली का गहराई से अध्ययन किया। इस फिल्म का जो भाग कोलकाता के रिक्शे चालकों के जीवन चित्रण से संबंधित था बलराज ने स्वयं कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा चलाया। इस अभ्यास के दौरान एक रिक्शा चालक बलराज के पास पहुंचा और पूछा, ”बाबू! यहां क्या हो रहा है?” बलराज ने उसे दो बीघा जमीन की कहानी सुनाई। उसकी आंखों में आंसू गए और बोला, ”यह मेरी कहानी है।उसकी आंखों से अश्रुधार बहने लगी। बिहार में उसके पास दो बीघा जमीन थी जो उसने 15 साल पहले जमींदार के पास गिरवी रखी थी और उस जमीन को जमींदार से छुड़ाने के लिए वह कोलकाता में दिन-रात रिक्शा चला रहा है। और उसका शरीर क्राशकाय हो गया था। पर जमीन को जमींदार के कब्जे से छुड़ाने की आशा बहुत कम थी। उस रिक्शा चालक की दारुण-कथा को सुनकर बलराज भावतिरेक में डूब गए और मन ही मन कहने लगे, ”मुझसे भाग्यवान व्यक्ति कौन होगा, जो विश्व के एक लाचार निस्सहाय व्यक्ति की कहानी सुना रहा है
मुझे पूर्ण शक्ति से अपना कर्तव्य करना चाहिए। तब मैंने इस अधेड़ रिक्शा चालक की अंतर्रात्मा को आत्मसात किया और अभिनय की कला को भूल गयाऔर अंतत: अभिनय के बुनियादी सिद्धांत किसी पुस्तक से नहीं मिले पर जीवन से।
लगभग दो दशाब्दी बाद एम.एस. सत्थ्यू द्वारा निर्देशित फिल्म गर्म हवा जहां उनकी अभिनय कला की महानता का एक और उदाहरण है, वहीं यह फिल्म एक विश्व क्लासिक के रूप में बार-बार प्रदर्शित की जाती है। इस फिल्म का केंद्रीय चरित्र लखनऊ का एक मुस्लिम व्यापारी है जो भारत विभाजन की त्रासदी का शिकार है और घोर आंतरिक द्वंद्व से जूझ रहा है। उसके अधिकांश रिस्तेदार पाकिस्तान चले गए हैं।
इस फिल्म में एक अत्यंत हृदयग्राही दृश्य है। मुस्लिम व्यापारी की लड़की आत्महत्या करती है। दिल्ली के एक रंगकर्मी जिसने इस फिल्म के प्रोडक्शन में काम किया, यह दृश्य कई बार शूट किया। यह दृश्य कला जीवन के अंतर्संबंधों की जटिलता को दिखाता है। बलराज की प्रिय बेटी शबनम ने आत्महत्या का प्रयास किया और बाद में मानसिक बीमारी के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु से बलराज टूट गए। यहां फिल्म में बलराज का चरित्र अपनी बेटी, जिसने अपने हाथ की नाड़ी काटकर आत्महत्या की, के मृत्यु शरीर को देख रहा है। कला जीवन के इस अद्वितीय अंतर्संबंधों ने एक ऐसे दारुण दृश्य की संरचना की जो अविस्मरणीय है।
बलराज एक मात्र कलाकार ही नहीं थे, वे लेखक भी थे। वे कहानी, जिसे उनके भाई भीष्म साहनी संपादन करते थे, लिखते थे। इप्टा के कलाकार होने के नाते वे जन संघर्षों में शामिल होते थे। इसी कारण आसिफ की फिल्म हलचल की शूटिंग के समय उन्हें गिरफ्तार किया गया और आसिफ ने कोर्ट से विशेष आज्ञा लेकर अपनी शूटिंग पूरी करवाई। इस दौरान बलराज पुलिस एस्कोर्ट में रहे।
आज जब हम उनकी 100वीं जन्मतिथि मना रहे हैं, इस अद्वितीय कलाकार, जो कलाकार से पहले एक इंसान था, संघर्षरत जनता का साथी रहा और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत था, का क्रांतिकारी अभिवादन करते हैं।