31 May 2013

छत्तीसगढ़ हमले पर माओवादियों की ओर से जारी की गई प्रेस रिलीज

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं पर हमले के बाद दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रवक्तता गुड्सा उसुंडी की ओर से एक प्रेस रिलीज जारी की गई है, जिसे बीबीसी की हिंदी वेबसाइट ने खबर की शक्ल में प्रकाशित किया है। यहां इस रिलीज की मूल कॉपी प्रकाशित की जा रही है। इसे दखल की दुनिया ब्लाग से लिया गया है। गौरतलब है कि हमले के बाद से माओवादियों की ओर से सफाई की प्रतीक्षा की जा रही थी। इस रिलीज में माओवादियों ने यह तो बताया है कि कार्रवाई क्यों की गई, लेकिन यह नहीं बताया है कि इनके साथ मारे गए बुकसूर लोगों को भी क्यों निशाना बनाया गया। अब तक माओवादियों की ओर से सिर्फ अफसोस जाहिर किया गया है। 

25 मई 2013 को जन मुक्ति गुरिल्ला सेना की एक टुकड़ी ने कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं के 20 गाड़ियों के काफिले पर भारी हमला कर बस्तर की उत्पीड़ित जनता का जानी दुश्मन महेन्द्र कर्मा, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कुल कम से कम 27 कांग्रेसी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस बलों का सफाया कर दिया। यह हमला उस समय किया गया था जब आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस के दिग्गज नेता ‘परिवर्तन यात्रा’ चला रहे थे। इस कार्रवाई में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल समेत कम से कम 30 लोग घायल हो गए। इस ऐतिहासिक हमले में उत्पीड़क, हत्यारा, बलात्कारी, लुटेरा और भ्रष्टाचारी के रूप में बदनाम महेन्द्र कर्मा के कुत्ते की मौत मारे जाने से समूचे बस्तर क्षेत्र में जश्न का माहौल बन गया। पूर्व में गृहमंत्री के रूप में काम करने वाला नंदकुमार पटेल जनता पर दमनचक्र चलाने में आगे ही रहा था। उसके समय में ही बस्तर क्षेत्र में पहली बार अर्द्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) की तैनाती की गई थी। यह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं कि लम्बे समय तक केन्द्रीय मंत्रीमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालयों को संभालने वाला वी.सी. शुक्ल भी जनता का दुश्मन है जिसने साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और जमींदारों के वफादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियों को बनाने और लागू करने में सक्रिय भागीदारी ली। इस हमले का लक्ष्य मुख्य रूप से महेन्द्र कर्मा तथा कुछ अन्य प्रतिक्रियावादी कांग्रेस नेताओं का खात्मा करना था। हालांकि इस भारी हमले में जब हमारे गुरिल्ला बलों और सशस्त्र पुलिस बलों के बीच लगभग दो घण्टों तक भीषण गोलीबारी हुई थी उसमें फंसकर कुछ निर्दोष लोगों और निचले स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं, जो हमारे दुश्मन नहीं थे, की जानें भी गईं। इनकी मृत्यु पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी खेद प्रकट करती है और उनके शोकसंतप्त परिवारजनों के प्रति संवेदना प्रकट करती है।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस हमले की पूर्ण जिम्मेदारी लेती है। इस बहादुराना हमले का नेतृत्व करने वाले पीएलजीए के कमाण्डरों, हमले को सफल बनाने वाले वीरयोद्धाओं, इसे सफल बनाने में प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग देने वाली जनता और समूची बस्तरिया क्रांतिकारी जनता का दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस मौके पर क्रांतिकारी अभिनंदन करती है। इस वीरतापूर्ण हमले से यह सच्चाई फिर एक बार साबित हो गई कि जनता पर अमानवीय हिंसा, जुल्म और कत्लेआम करने वाले फासीवादियों को जनता कभी माफ नहीं करेगी, चाहे वे कितने बड़े तीसमारखां भी क्यों न हो आखिर जनता के हाथों सजा भुगतनी ही होगी।
आदिवासी नेता कहलाने वाले महेन्द्र कर्मा का ताल्लुक दरअसल एक सामंती मांझी परिवार से रहा। इसका दादा मासा कर्मा था और बाप बोड्डा मांझी था जो अपने समय में जनता के उत्पीड़क और विदेशी शासकों के गुर्गे रहे थे। इसके दादा के जमाने में नवब्याहाता लड़कियों को उसके घर पर भेजने का रिवाज रहा। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका खानदान कितना कुख्यात था। इनका परिवार पूरा बड़े भूस्वामी होने के साथ-साथ आदिवासियों का अमानवीय शोषक व उत्पीड़क रहा। महेन्द्र कर्मा की राजनीतिक जिंदगी की शुरूआत 1975 में एआईएसएफ के सदस्य के रूप में हुई थी जब वह वकालत की पढ़ाई कर रहा था। 1978 में पहली बार भाकपा की तरफ से विधायक बना था। बाद में 1981 में जब उसे भाकपा की टिकट नहीं मिली थी तो कांग्रेस में चला गया। बीच में जब कांग्रेस में फूट पड़ी थी तो वह माधवराव सिंधिया द्वारा बनाई गई पार्टी में शामिल होकर 1996 में लोकसभा सदस्य बना था। बाद में फिर कांग्रेस में आ गया। 1996 मेें बस्तर में छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग से एक बड़ा आंदोलन चला था। हालांकि उस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से भाकपा ने किया था, उस समय की हमारी पार्टी भाकपा (माले) (पीपुल्सवार) ने भी उसमें सक्रिय रूप से भाग लेकर जनता को बड़े पैमाने पर गोलबंद किया था। लेकिन महेन्द्र कर्मा ने बाहर के इलाकों से आकर बस्तर में डेरा जमाकर करोड़पति बने स्वार्थी शहरी व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए उस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था। इस तरह उसी समय उसके आदिवासी विरोधी व दलाल चरित्र को जनता ने साफ पहचाना था। 1980 के दशक से ही बस्तर के बड़े व्यापारी व पूंजीपति वर्गों से उसके सम्बन्ध मजबूत हुए थे।
उसके बाद 1999 में ‘मालिक मकबूजा’ के नाम से चर्चित एक घोटाले में कर्मा का नाम आया था। 1992-96 के बीच उसने लगभग 56 गांवों में फर्जीवाड़े आदिवासियों की जमीनों को सस्ते में खरीदकर, राजस्व व वन अधिकारियों से सांठगांठ कर उन जमीनों के अंदर मौजूद बेशकीमती पेड़ों को कटवाया था। चोर व्यापारियों को लकड़ी बेचकर महेन्द्र कर्मा ने करोड़ों रुपए कमा लिए थे, इस बात का खुलासा लोकायुक्त की रिपोर्ट से हुआ था। हालांकि इस पर सीबीआई जांच का आदेश भी हुआ था लेकिन सहज ही दोषियों को सजा नहीं हुई।
दलाल पूंजीपतियों और बस्तर के बड़े व्यापारियों के प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस की ओर से चुनाव जीतने के बाद महेन्द्र कर्मा को अविभाजित मध्यप्रदेश शासन मेें जेल मंत्री और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद उद्योग मंत्री बनाया गया था। उस समय सरकार ने नगरनार में रोमेल्ट/एनएमडीसी द्वारा प्रस्तावित इस्पात संयंत्र के निर्माण के लिए जबरिया जमीन अधिग्रहण किया था। स्थानीय जनता ने अपनी जमीनें देने से इनकार करते हुए आंदोलन छेड़ दिया जबकि महेन्द्र कर्मा ने जन विरोधी रवैया अपनाया था। तीखे दमन का प्रयोग कर, जनता के साथ मारपीटकर, फर्जी केसों में जेलों में कैद कर आखिर में जमीनें बलपूर्वक छीन ली गईं जिसमें कर्मा की मुख्य भूमिका रही। नगरनार में जमीनें गंवाने वाली जनता को आज तक न तो मुआवजा मिला, न ही रोजगार मिला जैसे कि सरकार ने वादा किया था। वो सब तितर-बितर हो गए।
क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति महेन्द्र कर्मा शुरू से ही कट्टर दुश्मन रहा। ठेठ सामंती परिवार में पैदा होना और बड़े व्यापारी/पूंजीपति वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में ‘बड़ा’ होना ही इसका कारण है। क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ 1990-91 में पहला जन जागरण अभियान चलाया गया था। इसमें संशोधनवादी भाकपा ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। इस प्रति-क्रांतिकारी व जन विरोधी अभियान में कर्मा और उसके कई रिश्तेदारों ने, जो भूस्वामी थे, सक्रिय भाग लिया था। 1997-98 के दूसरे जन जागरण अभियान की महेन्द्र कर्मा ने खुद अगुवाई की थी। उसके गृहग्राम फरसपाल और उसके आसपास के गांवों में शुरू हुआ यह अभियान भैरमगढ़ और कुटरू इलाकों में भी पहुंच चुका था। सैकड़ों लोगों को पकड़कर, मारपीट करके जेल भेज दिया गया था। लूटपाट और घरों में आग लगाने की घटनाएं हुईं। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। हालांकि हमारी पार्टी और जन संगठनों के नेतृत्व में जनता ने एकजुट होकर इस हमले का जोरदार मुकाबला किया। इससे कम समय के अंदर ही वह अभियान परास्त हो गया था।
उसके बाद क्रांतिकारी आंदोलन और ज्यादा संगठित हो गया। कई इलाकों में सामंतवाद-विरोधी संघर्ष तेज हो गए। इसके तहत हुए जन प्रतिरोध में महेन्द्र कर्मा के सगे भाई जमींदार पोदिया पटेल समेत कुछ नजदीकी रिश्तेदार मारे गए थे। गांव-गांव में सामंती ताकतों व दुष्ट मुखियाओं की सत्ता को उखाड़ फेंककर क्रांतिकारी जन राजसत्ता के अंगों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। गांवों में जन विरोधी व सामंती तत्वों से जमीनें छीनकर जनता में बंटवारा करना, अतीत में जारी कबीले के मुखियाओं द्वारा नाजायज जुर्माने वसूले जाने की पद्धति को बंद कर जनता का जनवादी शासन को शुरू करना कट्टर सामंती अहंकार से सराबोर महेन्द्र कर्मा को बिल्कुल रास नहीं आया। महिलाओं की जबरिया शादियां करवाने पर रोक, बहुपत्नीत्व आदि रिवाजों को हतोत्साहित करना आदि प्रगतिशील बदलाव भी सामंती ताकतों के गले नहीं उतरे। उसी समय बस्तर क्षेत्र में भारी परियोजनाएं शुरू कर यहां की जनता को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर यहां की प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करने की मंशा से उतरे टाटा, एस्सार जैसे कार्पोरेट घरानों के लिए भी यहां का विकासशील क्रांतिकारी आंदोलन आंखों की किरकिरी बना था। इसलिए उन्होंने सहज ही महेन्द्र कर्मा जैसी प्रतिक्रांतिकारी ताकतों से सांठगांठ कर ली। उन्हें करोड़ों रुपए की दलाली खिला दी ताकि अपनी मनमानी लूटखसोट के लिए माकूल माहौल बनाया जा सके। दूसरी ओर, देश भर में सच्चे क्रांतिकारी संगठनों के बीच हुए विलय के बाद एक संगठित पार्टी के रूप में भाकपा (माओवादी) के आविर्भाव की पृष्ठभूमि में उसे कुचल देने के लिए शोषक शासक वर्गों ने अपने साम्राज्यवादी आकाओं के इशारों पर प्रतिक्रांतिकारी हमला तेज कर दिया। अपनी एलआईसी नीति के तहत महेन्द्र कर्मा जैसी कट्टर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को आगे करते हुए एक फासीवादी हमले की साजिश रचाई। इस तरह, कांग्रेस और भाजपा की सांठगांठ से एक बर्बरतापूर्ण हमला शुरू कर दिया गया जिसे ‘सलवा जुडुम’ नाम दिया गया। रमन सिंह और महेन्द्र कर्मा के बीच कितना बढ़िया तालमेल रहा इसे समझने के लिए एक तथ्य काफी है कि मीडिया में कर्मा को रमन मंत्रीमण्डल का ‘सोलहवां मंत्री’ कहा जाने लगा था। सोयम मूका, रामभुवन कुशवाहा, अजयसिंह, विक्रम मण्डावी, गन्नू पटेल, मधुकरराव, गोटा चिन्ना, आदि महेन्द्र कर्मा के करीबी और रिश्तेदार सलवा जुडूम के अहम नेता बनकर उभरे थे। साथ ही, उसके बेटे और अन्य करीबी रिश्तेदार सरपंच पद से लेकर जिला पंचायत तक के सभी स्थानीय पदों पर कब्जा करके गुण्डागर्दी वाली राजनीति करते हुए, सरकारी पैसों का बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करते हुए कार्पोरेट कम्पनियों और बड़े व्यापारियों का हित पोषण कर रहे हैं।
और सलवा जुडूम ने बस्तर के जन जीवन में जो तबाही मचाई और जो क्रूरता बरती उसकी तुलना में इतिहास में बहुत कम उदाहरण मिलेंगे। कुल एक हजार से ज्यादा लोगों की हत्या कर, 640 गांवों को कब्रगाह में तब्दील कर, हजारों घरों को लूट कर, मुर्गों, बकरों, सुअरों आदि को खाकर और लूटकर, दो लाख से ज्यादा लोगों को विस्थापित कर, 50 हजार से ज्यादा लोगों को बलपूर्वक ‘राहत’ शिविरों में घसीटकर सलवा जुडूम जनता के लिए अभिशाप बना था। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। कई महिलाओं की बलाात्कार के बाद हत्या कर दी गई। कई जगहों पर सामूहिक हत्याकाण्ड किए गए। हत्या के 500, बलात्कार के 99 और घर जलाने के 103 मामले सर्वोच्च अदालत में दर्ज हैं तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन अपराधों की वास्तविक संख्या कितनी ज्यादा होगी। सलवा जुडूम के गुण्डा गिरोहों, खासकर पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों, नगा और मिज़ो बटालियनों ने जनता पर जो कहर बरपाया और जो जुल्म किए उसकी कोई सीमा नहीं रही। ऐसी कई घटनाएं हुईं जिसमें लोगों को निर्ममता के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर नदियों में फेंक दिया गया। चेरली, कोत्रापाल, मनकेली, कर्रेमरका, मोसला, मुण्डेर, पदेड़ा, परालनार, पूंबाड़, गगनपल्ली... ऐसे कई गांवों में लोगों की सामूहिक रूप से हत्याएं की गईं। सैकड़ों आदिवासी युवकों को एसपीओ बनाकर उन्हें कट्टर अपराधियों में तब्दील कर दिया गया। महेन्द्र कर्मा ने खुद कई गांवों में सभाओं और पदयात्राओं के नाम से हमलों की अगुवाई की। कई महिलाओं पर अपने पशु बलों को उकसाकर बलात्कार करवाने की दरिंदगी भरे उसके इतिहास को कोई भुला नहीं सकता। जो गांव समर्पण नहीं करता उसे जलाकर राख कर देने, जो पकड़ में आता है उसे अमानवीय यातनाएं देने और हत्या करने की कई घटनाओं में कर्मा ने खुद भाग लिया था। इस तरह महेन्द्र कर्मा बस्तर की जनता के दिलोदिमाग में एक अमानुष हत्यारा, बलात्कारी, डकैत और बड़े पूंजीपतियों के वफादार दलाल के रूप में अंकित हुआ था। पूरे बस्तर में जनता कई सालों से हमारी पार्टी और पीएलजीए से मांग करती रही कि उसे दण्डित किया जाए। कई लोग उसका सफाया करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आए थे। कुछ कोशिशें हुई भी थीं लेकिन छोटी-छोटी गलतियों और अन्य कारणों से वह बचता रहा। आखिरकार, कल, जनता के सक्रिय सहयोग से किए गए इस बहादुराना हमले में हमारी पीएलजीए ने महेन्द्र कर्मा का सफाया कर बस्तर की जनता को बेहद राहत पहुंचाई।
इस कार्रवाई के जरिए हमने उन एक हजार से ज्यादा आदिवासियों की ओर से बदला ले लिया जिनकी सलवा जुडूम के गुण्डों और सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों हत्या हुई थी। हम उन सैकड़ों मां-बहनों की ओर से बदला ले लिया जो बेहद अमावीय हिंसा, अपमान और अत्याचारों का शिकार हुई थीं। हम उन हजारों बस्तरवासियों की ओर से बदला ले लिया जो अपने घरों, मवेशियों, मुर्गों-बकरों, गंजी-बर्तनों, कपड़ों, अनाज, फसलों... सब कुछ गंवाकर ठहरने की छांव तक छिन जाने से घोर बदहाली झेलने पर मजबूर कर दिए गए थे। घरबार गंवाकर, टिककर रहने तक की जगह के अभाव में, इस अनभिज्ञता से कि अपने प्रियजनों में कौन जिंदा बचा है और कौन खत्म हो गया, बदहवास तितर-बितर हुए तमाम लोगों के गुस्से और आवेश को एक न्यायोचित और आवश्यक अभिव्यक्ति देते हुए हमने महेन्द्र कर्मा का सफाया कर दिया।
इस हमले के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह... सभी ने इसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह आह्वान किया कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सबको मिलजुलकर नक्सलवाद और आतंकवाद का मुकाबला करना चाहिए। हम पूछते हैं कि क्या शोषक वर्गों के इन पालतू कुत्तों को लोकतंत्र का नाम तक लेने की नैतिक योग्यता है। अभी-अभी, 17 मई को बीजापुर जिले के एड़समेट्टा गांव में तीन मासूमों समेत आठ लोगों की जब पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों ने हत्या की तब क्या इनको ‘लोकतंत्र’ की याद नहीं आई? जिस काण्ड को खुद कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को भी मजबूरन ‘नरसंहार’ बताना पड़ा था, उस पर इन नेताओं के मुंह पर ताले क्यों लग गए थे? 1 मई को नारायणपुर जिले के मड़ोहनार गांव के फूलसिंह और जयसिंह नामक दो आदिवासी भाइयों को पुलिस थाना बुलाकर हरी वद्रियां पहनाकर गोली मारकर जब ‘मुठभेड़’ की घोषणा की गई थी तब क्या इनका ‘लोकतंत्र’ खुश था? 20-23 जनवरी के बीच बीजापुर जिले के पिड़िया और दोड्डि तुमनार गांवों पर हमले कर 20 घरों में आग लगाकर, जनता द्वारा संचालित स्कूल तक को जला देने पर क्या इनका ‘लोकतंत्र’ फलता-फूलता रहा? 6-9 फरवरी के बीच अबूझमाड़ कहलाने वाले बेहद पिछड़े आदिवासी इलाके के गरीब माड़िया लोगों का गांव गट्टाकाल पर जब सरकारी सशस्त्र बलों ने हमला कर, घरों को लूटकर, जनता के साथ मारपीट कर, गांव में क्रांतिकारी जनताना सरकार द्वारा संचालित स्कूल को जलाकर राख कर दिया था तब इनका ‘लोकतंत्र’ क्या कर रहा था? आज से ठीक 11 महीने पहले 28 जून 2012 की रात में सारकिनगुड़ा में 17 आदिवासियों के खून की होली खेलना और 13 युवतियों के साथ बलात्कार करना क्या ‘लोकतंत्रिक मूल्यों’ का हिस्सा था? क्या यह लोकतंत्र महेन्द्र कर्मा जैसे हत्यारों और नंदकुमार पटेल जैसे शोषक शासक वर्गों के गुर्गों पर ही लागू होता है? बस्तर के गरीब आदिवासियों, बूढ़ों, बच्चों और महिलाओं पर लागू नहीं होता? उनका चाहे कितनी बड़ी संख्या में, चाहे कितनी ही बार कत्लेआम करना क्या ‘लोकतंत्र’ का हिस्सा ही था? क्या इन सवालों का जवाब उन लोगों के पास है जो इस हमले पर हाय तौबा मचा रहे हैं?
2005 से 2007 तक चला सलवा जुडूम जनता के प्रतिरोध से पराजित हो गया। उसके बाद 2009 में कांग्रेस-नीत यूपीए-2 सरकार ने देशव्यापी हमले के रूप में आपरेशन ग्रीनहंट की शुरूआत की। इसके लिए अमेरिकी साम्राज्यवादी न सिर्फ मार्गदर्शन और मदद व सहयोग दे रहे हैं, बल्कि अपने स्पेशल फोर्स को तैनात करके काउण्टर इंसर्जेन्सी आपरेशन्स का संचालन करवा रहे हैं। खासकर माओवादी नेतृत्व की हत्या करने पर उनका जोर है। आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से ‘जनता पर जारी युद्ध’ के अंतर्गत कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने अभी तक 50 हजार से ज्यादा अर्द्धसैनिक बल छत्तीसगढ़ में भेज दिए। इसके फलस्वरूप नरसंहारों और तबाही में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई। अब तक 400 से ज्यादा आदिवासियों को केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भेजे गए सशस्त्र पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों ने मार डाला। 2011 के मध्य से यहां पर प्रशिक्षण के नाम से सैन्य बलों की तैनाती शुरू कर दी गई। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के अलावा पहले चिदम्बरम और शिंदे दोनों ही रमनसिंह द्वारा चलाए जा रहे हमले से खुश होकर लगातार वादे पर वादे कर रहे हैं कि मुंहमांगी सहायता दी जाएगी। रमनसिंह भी केन्द्र से मिल रही मदद पर तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। छत्तीसगढ़ में क्रांतिकारी आंदोलन के दमन की नीतियों के मामले में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच कोई मतभेद नहीं है। सिर्फ जनता के दबाव में और साथ ही, चुनावी फायदों के मद्देनजर कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं ने सारकिनगुड़ा, एड़समेट्टा जैसे नरसंहारों का खण्डन करने का दिखावा किया। जबकि उसमें ईमानदारी बिल्कुल अभाव है। राज्य में रमनसिंह द्वारा लागू जन विरोधी और कार्पोरेट अनुकूल नीतियों के प्रति और दमनात्मक नीतियों के प्रति कांग्रेस को कोई विरोध नहीं है। वह विरोध का महज दिखावा कर रही है जो अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं है। दमन की नीतियों को लागू करने में इन दोनों पार्टियों की समान भागीदारी है। इतना ही नहीं, आंध्रप्रदेश से ग्रेहाउण्ड््स बलों का बार-बार छत्तीसगढ की सीमा के अंदर घुसना और पहले कंचाल (2008) और अभी-अभी पुव्वर्ति (16 मई 2013) में भारी हत्याकाण्डों को अंजाम देना भी कांग्रेस द्वारा लागू दमनात्मक नीतियों का ही हिस्सा है। इसीलिए हमने कांग्रेस के बड़े नेताओं को निशाने पर लिया।
आज दण्डकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ खड़े हुए छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, मंत्री रामविचार नेताम, केदार कश्यप, विक्रम उसेण्डी, राज्यपाल शेखर दत्त, महाराष्ट्र गृहमंत्री आर.आर. पाटिल आदि; डीजीपी रामनिवास, एडीजी मुकेश गुप्ता जैसे पुलिस के आला अधिकारी इस गफलत में हैं कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। महेन्द्र कर्मा ने भी इस भ्रम को पाल रखा था कि जड प्लस सेक्यूरिटी और बुलेटप्रूफ गाड़ियां उसे हमेशा बचाएंगी। दुनिया के इतिहास में हिटलर और मुस्सोलिनी भी इसी घमण्ड में थे कि उन्हें कोई नहीं हरा सकता। हमारे देश के समकालीन इतिहास में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे फासीवादी भी इसी गलतफहमी के शिकार थे। लेकिन जनता अपराजेय है। जनता ही इतिहास का निर्माता है। मुठ्ठी भर लुटेरे और उनके चंद पालतू कुत्ते आखिरकार इतिहास के कूड़ादान में ही फेंक दिए जाएंगे।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी मजदूरों, किसानों, छात्र-बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों, तमाम जनवादियों से अपील करती है कि वे सरकारों से मांग करें कि आपरेशन ग्रीनहंट को तत्काल बंद कर दिया जाए; दण्डकारण्य में तैनात सभी किस्म के अर्द्धसैनिक बलों को वापस लिया जाए; प्रशिक्षण के नाम से भारत की सेना को बस्तर में तैनात करने की साजिशों को बंद किया जाए; वायुसेना के हस्तक्षेप को रोक दिया जाए; जेलों में कैद क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और आम आदिवासियों को फौरन व बिना शर्त रिहा किया जाए; यूएपीए, छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून, मकोका, अफस्पा जैसे क्रूर कानूनों को रद्द किया जाए; तथा प्राकृतिक संपदाओं के दोहन की मंशा से विभिन्न कार्पोरेट कम्पनियों के साथ किए गए एमओयू को रद्द किया जाए।

28 May 2013

जी, ये भी एक ‘गांधी’ हैं

वरुण गांधी बीते दिनों दो कारणों से चर्चा में रहे. एक, उनके खिलाफ चल रहे भड़काऊ भाषण के मुकदमों में उन्हें बरी कर दिया गया और दूसरा उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिया गया. तहलका की इस रिपोर्ट में ऐसी तमाम सच्चाइयां सामने आई हैं जिनसे साफ होता है कि वरुण इन दोनों में से किसी के भी हकदार नहीं हैं. तहलका के खुफिया कैमरों और इन मामलों से जुड़े दस्तावेजों में कैद तथ्यों से साबित होता है कि वरुण ने असल में वे सारे अपराध किए थे जिनके आरोपों में उन पर मुकदमे चल रहे थे. इतना ही नहीं, इस पड़ताल से यह भी साफ होता है कि कैसे भड़काऊ भाषणों के इन आपराधिक मामलों को निपटाने के फेर में भी कई अपराध किए गए. तहलका की यह रिपोर्ट आपको यह भी बताएगी कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए वरुण गांधी क्यों इस पद के लायक नहीं हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी ही पार्टी के खिलाफ गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं.

इस कहानी की शुरुआत साल 2009 से होती है. उस साल हुए लोकसभा के आम चुनावों ने गांधी परिवार के एक और सदस्य वरुण गांधी को राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर ला खड़ा किया था. इससे पहले वरुण की पहचान सामान्य ज्ञान के उस प्रश्न से ज्यादा नहीं थी कि 'इंदिरा गांधी के दूसरे पोते का नाम क्या है'? उनके चचेरे भाई-बहन राहुल-प्रियंका सालों पहले देश भर में चर्चित हो चुके थे, जबकि वरुण को उस वक्त लोग ठीक से जानते तक नहीं थे. सालों से गुमनामी में रहे वरुण अचानक ही मार्च 2009 में सारे देश में चर्चा का केंद्र बन गए. वह नाम और चर्चा, जो हमारे देश में नेहरू-गांधी परिवार के ज्यादातर वारिसों को एक प्रकार से मुफ्त में मिलती रही है, वह उन्होंने भी एक झटके में हासिल कर ली. लेकिन वरुण का यह रूप नया था. गांधी-नेहरू परिवार की परंपरा के विपरीत. इन सबसे ज्यादा भारत के उस विचार के तो बिल्कुल ही उलट जिसे स्थापित करने में उनके परनाना जवाहरलाल नेहरू की भूमिका बहुत बड़ी थी.
वरुण अपने चुनावी मंच से मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे थे और सारा देश स्तब्ध था. कई दिनों तक उनके भड़काऊ भाषण टीवी पर छाए रहे. उनकी अलग-अलग सभाओं की नई-नई सीडी सामने आती गईं और वे हर बार पहले से भी ज्यादा जहर बुझे नजर आए. गांधी उपनाम वाले किसी शख्स को इस रूप में देखना सारे देश के लिए ही चौंकाने वाला था. उन पर एक समुदाय के खिलाफ नफरत से भरे भाषण देने और सांप्रदायिक हिंसा का माहौल तैयार करने के आरोप में दो मुकदमे दर्ज किए गए. उन्हें बीस दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा. मगर पीलीभीत में विवादों से वरुण का यह कोई पहला सामना नहीं था और न ही आखिरी. अगस्त, 2008 में अपनी पीलीभीत यात्रा के दौरान ही उन पर मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का एक मुकदमा दर्ज हो चुका था. और वरुण गांधी ने जब पीलीभीत की अदालत में अपने भड़काऊ भाषणों के मामले में आत्मसमर्पण किया था उस वक्त वहां हुई हिंसा के चलते भी उन पर एक और मामला दर्ज किया गया था. इसमें उन पर दंगा-फसाद करवाने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोप थे.
वरुण गांधी अब एक बार फिर से चर्चा में हैं . इस बार मामला और भी ज्यादा चौंकाने वाला है. जिन वरुण गांधी को सारे देश ने टीवी चैनलों पर सांप्रदायिक और भड़काऊ भाषण देते सुना था, उन्हें एक-एक कर सभी मामलों में दोषमुक्त किया जा चुका है. हज़ारों की भीड़ के सामने उन्होंने जो भड़काऊ भाषण दिए थे और जिन्हें करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा था उनसे जुड़े दोनों मामलों में वे इसलिए बरी कर दिए गए कि कोर्ट को उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले. मारपीट का मुकदमा कहां गायब हो गया इसकी किसी को खबर भी नहीं हुई. वरुण के आत्मसमर्पण के वक्त हुई हिंसा के मामले में भी चार मई को पीलीभीत की सत्र अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया.
तहलका ने जब वरुण को दोषमुक्त करने वाले न्यायालय के फैसलों और अन्य दस्तावेजों पर नजर डाली तो उनमें कई ऐसी खामियां सामने आईं जिनसे यह साफ था कि वरुण को एकतरफा फायदा पहुंचाया गया है. वरुण गांधी के भाषण और आत्मसमर्पण से जुड़े तीन मामले शायद भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक रिकॉर्ड होंगे जिनमें कुल मिलाकर सभी 88 गवाह पक्षद्रोही हो गए. वरुण से जुड़े एक मामले में दो ही दिन में अदालत में 18 गवाहों को पेश किया गया और इन गवाहों के विरोधाभासी बयानों पर सरकारी वकील और कोर्ट ने कोई सवाल खड़ा नहीं किया. इस मामले की जांच के दौरान वरुण गांधी ने अपनी आवाज का नमूना देने से ही इनकार कर दिया और अभियोजन पक्ष ने बिना किसी विरोध के इस बात को स्वीकार कर लिया. मामले के ट्रायल के दौरान कई अहम गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया और इसकी अर्जी खुद सरकारी वकील ने यह कहकर दी कि उन गवाहों को कोर्ट में बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है. ऊपरी तौर पर मुआयना करने से ही पता चल जाता है कि वरुण गांधी से जुड़े मामलों को कदम-कदम पर कमजोर करने का प्रयास सिर्फ बचाव पक्ष ने ही नहीं किया, बल्कि अभियोजन ने भी इसमें उसका पूरा साथ दिया.
इसके बाद जब तहलका ने वरुण गांधी से जुड़े मामलों की तहकीकात शुरू की तो परत दर परत ऐसी सच्चाइयां सामने आईं जिनमें पीलीभीत के वर्तमान एसपी अमित वर्मा, सरकारी वकील, भाजपा के नेता और प्रदेश सरकार सबके हाथ रंगे मिले. इन मामलों में गवाह बनाए गए लोगों और खुद जिले के भाजपा उपाध्यक्ष परमेश्वरी गंगवार ने तहलका को बताया कि किस तरह से पीलीभीत के पुलिस अधीक्षक और अन्य पुलिस अधिकारियों ने गवाहों को धमकाया और कम से कम एक गवाह के यहां स्वयं वरुण गांधी के यहां से गवाही बदलने के लिए फोन किया गया. इसके अलावा इन गवाहों ने जो सनसनीखेज सच उजागर किया उसके मुताबिक कोर्ट में न्यायिक प्रक्रियाओं का जमकर मखौल उड़ाया गया, जज की नामौजूदगी में ही उन सबकी गवाहियां हो गईं, उनके बयान खुद वकील ने लिखे और उनसे सिर्फ अंगूठा लगवाया गया या दस्तखत करवाए गए. इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और उनके एक मंत्री तक ने वरुण को बरी करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई.
पहले शुरुआत वहां से जहां से वरुण की विवादित राजनीतिक यात्रा शुरू हुई थी.
वरुण गांधी का राजनीतिक सफर साल 2008 में शुरू हुआ. अपने पहले चुनाव के लिए उन्होंने पीलीभीत संसदीय सीट को चुना जहां से पिछली कई लोकसभाओं में उनकी मां मेनका गांधी सांसद रही थीं. जब उन्होंने अपने होने वाले चुनाव क्षेत्र का भ्रमण शुरू किया तो शुरू में उनके साथ उनके दिल्ली के ही ज्यादातर साथी होते थे. एक अगस्त, 2008 को वरुण अपने इन्ही साथियों के साथ पीलीभीत से 22 किलोमीटर दूर बरखेड़ा नाम के कस्बे की ओर जा रहे थे. इसी रास्ते पर एक गांव पड़ता है ज्योरह कल्यानपुर. इस गांव की सड़क उस वक्त काफी खराब थी जिस कारण वरुण की गाड़ी एक गड्ढे में फंस गई. वरुण अपने साथियों के साथ गाड़ी से उतर गए और उन्होंने लोगों से बात करनी चाही. इस गांव में ज्यादातर स्थानों पर किसान मजदूर संगठन एवं कांग्रेस पार्टी के झंडे लगे थे. यह बात वरुण को पसंद नहीं आई. उन्होंने गांववालों से पूछा कि यहां ये झंडे क्यों लगे हैं? भरतवीर गंगवार नाम के एक स्थानीय दुकानदार ने जवाब में कहा कि 'किसान मजदूर संगठन ने यहां के किसानों के लिए काम किया है इसलिए उनके झंडे लगे हैं.'
भरतवीर के गांव के निवासी और इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी फूल चंद 'आचार्य जी' यह पूरा किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, 'वरुण ने भरतवीर से गुस्से में कहा कि यहां किसानों के लिए जो कुछ भी किया है वह मेरी मां ने किया है. भरतवीर ने उन्हें जवाब दिया कि किसान नेता वीएम सिंह ने गन्ना किसानों के हितों की लड़ाई लड़ी है इसलिए यहां लोग उनका समर्थन करते हैं. यह बात वरुण को नागवार गुजरी और उन्होंने भरतवीर को थप्पड़ मार दिया. बस, वरुण के हाथ छोड़ते ही उनके अन्य साथी भी भरतवीर को पीटने लगे. गांव के लोगों ने छुड़ाने की कोशिश की लेकिन उन लोगों के पास हथियार भी थे और वरुण गांधी के सामने किसी की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी.'
एक अगस्त को ही शाम 6.30 बजे भरतवीर ने थाना बरखेड़ा में वरुण गांधी और उनके सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई जिसमें फूल चंद का नाम भी बतौर गवाह दर्ज था. उधर, वरुण की ओर से भी तत्कालीन भाजपा जिलाध्यक्ष योगेंद्र गंगवार ने रात को लगभग 9.10 बजे एक एफआईआर दर्ज करवा दी. जहां पहली रिपोर्ट में वही लिखा था जो फूलचंद ने हमें बताया था, दूसरी रिपोर्ट में कहा गया था कि भरतवीर ने देसी तमंचे से वरुण गांधी पर गोली चलाई, उनसे दस हजार रुपये लूट लिए और अपने साथियों के साथ तमंचे लहराता हुआ फरार हो गया. पुलिस ने दोनों मामलों की जांच की, भरतवीर के खिलाफ दर्ज किए गए मामले को झूठा पाया और 22 अक्टूबर, 2008 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए इसे बंद कर दिया. वहीं वरुण गांधी के खिलाफ दर्ज हुए मामले को पुलिस जांच में सही पाया गया और 24 दिसंबर को पुलिस ने इस मामले में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. केस नंबर 2362/08 के रूप में दर्ज हुआ यह मामला पीलीभीत जिले में वरुण गांधी के खिलाफ दर्ज हुआ पहला आपराधिक मामला था.
अब तक वरुण अपने संभावित संसदीय क्षेत्र में अपना जनाधार देख चुके थे. उन्हें अंदाजा हो चुका था कि इस क्षेत्र में सिर्फ गांधी परिवार का नाम उनकी जीत सुनिश्चित नहीं करवा सकता. ऐसा सोचने के उनके पास और भी कारण थे. हाल ही में हुए परिसीमन के चलते इस संसदीय क्षेत्र से कुछ ऐसे इलाके बाहर हो गए थे जहां से मेनका गांधी को एकतरफा वोट पड़ा करते थे. इसके अलावा हिंदू-मुसलमानों की मिली-जुली आबादी वाला बहेड़ी अब पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में आ चुका था. पीलीभीत संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभाओं में से तीन पर मुस्लिम विधायक थे जबकि क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 35 प्रतिशत ही थी. वरुण गांधी को इन्हीं समीकरणों में अपनी जीत का रास्ता नजर आया और उन्होंने पूरे चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील कर दिया.
चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने का उनका यह खेल शुरू हुआ फरवरी, 2009 से. स्थानीय लोगों के मुताबिक सबसे पहले 22 फरवरी को उन्होंने पीलीभीत के ललोरी खेडा इलाके के 'राम मनोहर लोहिया बालिका इंटर कॉलेज' में खुद को देश का एकमात्र हिंदुओं का रखवाला घोषित किया और मुसलमानों के खिलाफ बोलना शुरू किया. ललोरी खेड़ा में हुई वरुण की इस सभा में भड़काऊ भाषण दिए जाने का जिक्र उस चुनाव याचिका में भी किया गया है जो वरुण के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी. पिछले करीब डेढ़ महीने के दौरान तहलका ने पीलीभीत जिले में जिनसे भी बात की उनमें से ज्यादातर लोगों ने हमें यह बताया कि 2009 के आम चुनावों से पहले वरुण जहां भी सभाएं कर रहे थे,  हर जगह गीता की कसमें खाते हुए मुसलमानों के हाथ और गले काटने की बातें कर रहे थे.
छह मार्च, 2009 को वरुण को पीलीभीत के देशनगर मोहल्ले में एक सभा को संबोधित करना था. तब तक पीलीभीत में ज्यादातर लोगों को यह मालूम हो गया था कि वरुण गांधी के भाषणों का विषय क्या होता है. वरुण के समर्थक सभा में आए किसी भी व्यक्ति को वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं देते थे और इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाता था कि कोई भी वीडियो कैमरा लेकर सभा में न पहुंच पाए. रात को लगभग नौ बजे वरुण देशनगर में सभा को संबोधित करने पहुंचे. स्थानीय पत्रकार शारिक परवेज के मुताबिक जब उन्होंने इस सभा की वीडियो रिकॉर्डिंग करनी चाही तो वरुण के समर्थकों ने उनका कैमरा बंद करवा दिया. शारिक सिर्फ कुछ मिनट ही वरुण के भाषण को रिकॉर्ड कर पाए. वरुण देशनगर के निवासियों को हिंदू धर्म का वास्ता देते हुए चेतावनी दे रहे थे कि 'यदि हिंदू धर्म को बचाना है तो मुझे वोट देने जरूर जाना और जो हिंदू वोट नहीं डालेगा वो अपने धर्म से गद्दारी कर रहा होगा.' वरुण इस भाषण में लोगों को यह भी चेतावनी दे रहे थे, 'देखिए! ये मुसलमान चाहें जो भी बोलें .. उनका एक-एक वोट जाना है उस कटुवे के लिए .. समझे? तो आपका एक-एक वोट जाना चाहिए हिंदुस्तान के लिए...'
इस बीच इस मोहल्ले के ही एक स्थानीय युवा शैलेंद्र सिंह ने वरुण गांधी का यह पूरा भाषण अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया. शैलेंद्र बताते हैं, 'मैं कई लोगों से ये बात सुन चुका था कि वरुण गांधी सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वाले भाषण लगातार दिए जा रहे हैं. इसलिए मैं सोच कर गया था कि उनका भाषण रिकॉर्ड कर लूंगा. वीडियो तो वहां कोई भी बना नहीं पा रहा था लेकिन मैंने अपने फोन की रिकॉर्डिंग ऑन करके उसे अपनी जेब में रख लिया और उनका पूरा ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया.' (लगभग 28 मिनट का यह ऑडियो और बाकी ज्यादातर वीडियो जिनका जिक्र इस स्टोरी में किया गया है, तहलका के पास हैं).
अगले दिन यानी सात मार्च को वरुण पहुंचे पीलीभीत के मोहल्ला डालचंद में और यहां भी उन्होंने उसी तरह के मुस्लिम विरोधी भाषण दिए. वरुण अपने इन भाषणों में कई ऐसे आंकड़े भी लोगों को बताते थे जिनका हकीकत से तो कोई भी वास्ता नहीं था लेकिन इनसे जनता का ध्रुवीकरण आसानी से हो जाता था. उदाहरण के तौर पर, उन्होंने लोगों से कहा कि 'पिछले कुछ समय में 13 हिंदू औरतों का बलात्कार हुआ और जिन मुसलमानों ने ये बलात्कार किए वो आज भी खुले घूम रहे हैं.' तहलका ने इन तथाकथित बलात्कारों के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की मगर उसे ऐसा कोई मामला थाने में दर्ज नहीं मिला. मगर चुनाव के दौरान इस तरह की अफवाहें जंगल की आग की तरह फैलकर दो समुदायों के बीच गहरे तनाव की वजह बन रही थीं.
अब तक उनके भड़काऊ भाषणों की चर्चा सारे पीलीभीत में हो चुकी थी. आठ मार्च को जब वे बरखेड़ा नाम के कस्बे पहुंचे तो वहां कुछ पत्रकार उनका वीडियो बनाने में सफल हो गए. उनकी यही सभा थी जिसमें दिया हुआ उनका जहर बुझा भाषण सबसे पहले सारे देश ने 2009 में देखा था. बरखेड़ा के इस मंच पर कई साधु भी बैठाए गए थे. चूंकि उनकी यह सभा दोपहर में आयोजित की गई थी, इसलिए पत्रकारों को उनका वीडियो बनाने में उस तरह की परेशानी नहीं हुई जैसी कि इससे पहले की सभाओं में हो रही थी. इसके बाद वरुण गांधी के पहले बरखेड़ा और बाद में डालचंद में दिए भड़काऊ भाषण सभी राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर प्रसारित होने लगे. वरुण के सांप्रदायिक चेहरे को सारे देश ने देखा. मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग ने तत्कालीन एसपी और जिलाधिकारी पीलीभीत का तबादला कर दिया और जिला प्रशासन को वरुण के खिलाफ सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए.
17 तथा 18 मार्च को वरुण गांधी के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में दो आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए. इनमें से एक डालचंद मुहल्ले से संबंधित था और दूसरा बरखेड़ा से. हालांकि वरुण के खिलाफ चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी और रिश्ते में उनके दूर के मामा वीएम सिंह ने देशनगर वाला ऑडियो चुनाव आयोग को भेजा था. साथ ही सिंह ने 16 अप्रैल, 2009 को घटना के चार प्रत्यक्षदर्शियों - प्रशांत कुमार रवि, मुख्तार अहमद, कादिर अहमद एवं शैलेंद्र सिंह - के शपथपत्र भी चुनाव आयोग को भेजे थे जिनमें इन चारों ने कहा था कि वरुण गांधी ने देशनगर में भी मुस्लिम समुदाय के विरोध में अपशब्द कहे थे और वे घटना की गवाही देने को तैयार हैं, लेकिन इस मामले को पुलिस द्वारा दर्ज नहीं किया गया.
कई दिनों तक राष्ट्रीय चैनलों पर वरुण के सांप्रदायिक भाषण ही चुनावी कवरेज का मुख्य मुद्दा बने रहे . उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त सहित तीनों चुनाव आयुक्तों ने बरखेड़ा की सीडी को देखने के बाद 22 मार्च को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश में आयोग द्वारा कहा गया था, 'आयोग ने एक बार नहीं बल्कि कई बार इस सीडी को देखा है. हम इस तथ्य से पूरी तरह सहमत और आश्वस्त हैं कि इस सीडी से कोई भी छेड़छाड़ नहीं की गई है.' चुनाव में वरुण गांधी को किसी अदालत द्वारा प्रतिबंधित किए जाने से पहले ऐसा न कर पाने की मजबूरी तो आयोग ने इस आदेश में जताई मगर यह भी कहा, 'आयोग की सुविचारित राय में प्रतिवादी मौजूदा चुनाव में प्रत्याशी बनने के योग्य नहीं है...'
अब तक अपने भाषणों से वरुण की कानूनी मुश्किलें तो बढ़ चुकी थीं लेकिन उनका चुनावी पैतरा कामयाब हो गया था. उनके समर्थकों ने सारे पीलीभीत में उनको हिंदू नेता के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया. 'वरुण नहीं है आंधी है, दूसरा संजय गांधी है' सरीखे नारों और पोस्टरों से सारा पीलीभीत भरा जा चुका था. पीलीभीत में रहने वाले भाकपा (माले) के कार्यकर्ता अफरोज आलम बताते हैं, 'वरुण गांधी ने पूरे चुनाव को ही हिंदू-मुस्लिम लड़ाई में तब्दील कर दिया था. अपनी सभा वो इसी बात से शुरू करते थे कि जो भी मुसलमान यहां मौजूद हैं वो लौट जाएं, मुझे किसी मुसलमान का वोट नहीं चाहिए. उन दिनों पीलीभीत के आस-पास के गांवों में उनके लोगों द्वारा कई अफवाहें भी फैलाई गईं. हर जगह सुनने को मिलता था कि दूसरे गांव में कुछ मुसलमान लड़कों ने एक हिंदू लड़की का बलात्कार कर दिया है. या फिर कुछ मुस्लिमों ने मिलकर हिंदू लड़कों की पिटाई कर दी है .
कई बार रात को 10-12 मोटर साइकिलों पर कुछ अज्ञात लोग लाठी-डंडे और मशाल लेकर निकलते थे और शोर मचाते हुए गुज़र जाते थे. अगले दिन सुबह अफवाहें फैल जाती थीं कि वो मुस्लिम लुटेरे थे.'
अपनी मनचाही चुनावी जमीन तैयार कर लेने के बाद अब वरुण को चिंता थी अपने खिलाफ दर्ज हुए आपराधिक मामलों से निपटने की. उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करके अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे खारिज किए जाने की मांग की. उच्च न्यायालय ने उनके मुकदमे खारिज करने के बजाय 25 मार्च, 2009 को वरुण की इस याचिका को ही ख़ारिज कर दिया. अब उन्हें कभी भी खुद के गिरफ्तार हो जाने का डर था. लिहाजा अपनी गिरफ्तारी को राजनीतिक रंग देने और उससे सियासी फायदा उठाने के लिए उन्होंने खुद ही अदालत में आत्मसमर्पण करने का फैसला किया. अपनी गिरफ्तारी का माहौल बनाने के लिए उन्होंने अपने लोगों को बाकायदा निर्देश दिए. योजनाबद्ध तरीके से जेल और कोर्ट के बाहर भारी भीड़ जुटाई गई. मगर उस दिन पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने यह कहकर वरुण गांधी की योजना की हवा निकाल दी कि अदालत के संज्ञान में अभी तक यह मामला किसी भी औपचारिक माध्यम से नहीं पहुंचा है, इसलिए अदालत उन्हें जेल नहीं भेज सकती. वरुण गांधी की सारी योजना धराशायी होती दिख रही थी. अब एक नया दांव चला गया. भाजपा के तत्कालीन जिला अध्यक्ष योगेंद्र गंगवार ने कोर्ट को शपथपत्र दिया कि वरुण गांधी के खिलाफ दो आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और वे स्वयं ही जेल जाना चाहते हैं लिहाजा उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाए (तहलका के पास उस शपथपत्र की कॉपी मौजूद है). जाहिर है वरुण पूरी तैयारी कर चुके थे और वे अपनी योजना को यों ही असफल नहीं होने देना चाहते थे.
किस तरह से योजनाबद्ध तरीके से इस सबको अंजाम दिया गया इसके बारे में पीलीभीत के वर्तमान भाजपा जिला उपाध्यक्ष और वरुण गांधी के बेहद करीबी परमेश्वरी दयाल गंगवार तहलका के खुफिया कैमरे पर बताते हैं, 'हमें दिल्ली से फैक्स आ चुका था कि सरेंडर वाले दिन इतनी-इतनी भीड़ हो जानी चाहिए. हमने कहा हो जाएगी साहब. पुलिस लग गई थी गाजियाबाद से, नोएडा से. लेकिन गांधी परिवार तो गांधी परिवार है . हम-तुम तो सोच ही नहीं सकते वो बात. मुरादाबाद हाईवे पे बाईपास पड़ता है, वहां से काफिले की नौ गाडि़यां निकल गईं सीधी बरेली और एक कट गई सितारगंज को. जहां से वो एक गाड़ी कट हुई वहां दस गाडि़यां और खड़ी थीं जो उसके साथ लग गईं. काफिला बरेली में रोका गया तो वरुण गांधी गायब मिले साहब. मुझे फोन आया कि जेल गेट पहुंच गए हैं.'
वरुण गांधी द्वारा जुटाई गई यह भीड़ आत्मसमर्पण के समय हिंसक प्रदर्शनों पर उतर आई. कई गाड़ियों और भवनों के शीशे फोड़ दिए गए, कई संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया और ईंट-पत्थरों की ऐसी बरसात की गई कि पांच पुलिसकर्मियों सहित लगभग 20 लोग घायल हुए. उनके इस अपराध के लिए उन पर और उनके साथियों पर एक और आपराधिक मुकदमा 28 मार्च को दर्ज किया गया. इस मामले में अदालत ने उन्हें चार मई, 2013 को इस स्टोरी के लिखे जाने के दौरान बरी कर दिया. हालांकि इस मामले से जुड़े तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी को मिला नहीं है और जिन्हें आगे के पन्नों में उठाया गया है.
वरुण के जेल जाते ही उनके इस सांप्रदायिक चुनावी अभियान की बागडोर उनकी मां मेनका गांधी ने संभाल ली. 28 मार्च को ही प्रदर्शन में घायल हुए लोगों को देखने जिला अस्पताल पहुंची मेनका गांधी ने घायलों के लिए एक मुस्लिम इंस्पेक्टर को जिम्मेदार ठहराते हुए बयान दिया 'लगभग 45 लोगों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. इन घायलों में से 25 लोगों को एक ही पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा घायल किया गया है जिसका नाम है परवेज़ मियां.' मगर तहलका को मिली जानकारी से ऐसा लगता है कि इंस्पेक्टर परवेज़ मियां घटना के वक्त मौके पर मौजूद ही नहीं थे.
बहरहाल वरुण गांधी 20 दिन के लिए जेल चले गए. जब वे जमानत पर जेल से लौटे तो सारा माहौल हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील हो चुका था और वे 'हिंदू हृदय सम्राट' बन चुके थे. अपने पहले ही चुनाव में इस गांधी ने सोनिया और राहुल गांधी को भी पछाड़ते हुए लगभग तीन लाख वोटों की बढ़त से जीत दर्ज की और संसद पहुंच गए. अब तक वरुण के खिलाफ आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन, स्थानीय लोगों से मारपीट, भड़काऊ भाषण देने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, धर्म के नाम पर लोगों को उकसाने, पुलिस टीम पर जानलेवा हमला करवाने और बलवा करवाने के कई मुकदमे दर्ज हो चुके थे. 2009 के बाद से वरुण फिर कभी भी इतनी चर्चाओं में नहीं रहे. उनके खिलाफ दर्ज हुए आपराधिक मुकदमों की सुनवाई पीलीभीत की अदालत में चलती रही. पिछले दिनों अचानक ही वरुण फिर से चर्चाओं में आ गए जब भड़काऊ भाषण से जुड़े दोनों मामलों में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया.
मेहरबान सपा सरकार
वरुण कैसे सारे मामलों में बरी हो गए इस पर चर्चा करने से पहले बात करते हैं उस पृष्ठभूमि की जो इन सब मामलों को निपटाने के लिए तैयार की गई. वरुण पर मेहरबानियों की शुरुआत हुई उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद. पिछले साल अक्टूबर में उत्तर प्रदेश के कई अख़बारों में यह खबर छपी कि अखिलेश सरकार वरुण गांधी के सभी मुकदमे वापस लेने वाली है और न्यायिक विभाग से इन मामलों की मेरिट भी मांगी गई है. लेकिन इस खबर के सार्वजनिक होते ही कई मुस्लिम संगठनों और दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने इसका विरोध कर दिया. बढ़ते विरोध के चलते मुकदमे वापस तो नहीं हुए लेकिन उनके निपटारे में ऐसी तेजी आई जो शायद पीलीभीत के पूरे इतिहास में कभी नहीं देखी गई होगी. पांच-पांच, दस-दस दिन पर तारीखें पड़ने लगीं, कुछ ही समय में सारे गवाह पक्षद्रोही घोषित हो गए और वरुण गांधी बरी हो गए. पीलीभीत जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी अग्निहोत्री बताते हैं, 'मैं कई सालों से पीलीभीत में वकालत कर रहा हूं. मेरी नजर में आज तक एक भी मामला ऐसा नहीं आया है जब एक ही दिन में इतने लोगों की गवाही हो गई हो जितने लोग वरुण के मामलों में एक-एक दिन में परीक्षित हुए.'

पार्टी विरोधी गांधी
आखिर प्रदेश की सपा सरकार वरुण गांधी पर इतनी मेहरबान क्यों थी? इसकी तहकीकात करने पर हमने पाया कि भाजपा का यह युवा महासचिव जिसके भरोसे भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने पुराने दिन लौटने की उम्मीद कर रही है उसने 2012 के विधानसभा चुनाव में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हराने और पीलीभीत से सपा के उम्मीदवार को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.  'महासचिव' वरुण गांधी ने पीलीभीत से अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी सतपाल गंगवार को चुनाव हराने के निर्देश दिए. तहलका को मिले एक ऑडियो में वरुण के बेहद करीबी और पीलीभीत में उनके मीडिया प्रभारी रिजवान मलिक पीलीभीत भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष मोहम्मद सदर को स्पष्ट रूप से निर्देश दे रहे हैं कि भाजपा प्रत्याशी सतपाल गंगवार को चुनाव हराना है क्योंकि वरुण गांधी ऐसा चाहते हैं.
रिजवान मलिक और मोहम्मद सदर की बातचीत के अंश :
रिजवान मलिक : यार, हमसे पूछो मत ... मैं कह रहा हूं हमसे पूछो मत अब जो मुनासिब लग रहा है वो सोच-समझ के अब फैसला लो...
मोहम्मद सदर : जैसे...फिर भी तो कुछ-कुछ
मलिक : अरे यार, अब इससे ज्यादा साफ़ बात क्या है वरुण गांधी ने साफ कह दिया है सतपाल को जिताना नहीं है, सतपाल को वोट नहीं देना है, बात ख़तम. हराना है. अब ये आपको तय करना है कौन हराने वाला है. कौन जीतने वाला है , उसके साथ आप लग जाओ, क्या बोला जाए ..
मोहम्मद सदर : चलिए ठीक है फिर ...
मलिक : ठीक है न ?
जब तहलका ने इस बात की पुष्टि भाजपा प्रत्याशी सतपाल गंगवार से करने की कोशिश की तो पहले तो वे बात करने से कतराते रहे लेकिन बाद में उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि वरुण ने उन्हें हराने का काम किया था और इस बात को साबित करने वाली एक और ऑडियो क्लिप उनके पास भी है.

सतपाल से तहलका की बातचीत के अंश :
तहलका : मैं बस आपसे ये जानना चाह रहा था कि वो जो लड़के ने वो वीडियो रिकॉर्ड किया था वो कहां का... किस मीटिंग का है वो एक्चुअली?
सतपाल : मीटिंग का नहीं टेलीफ़ोन का ... टेलीफ़ोन पे ये कहा गया है कि बसपा को लड़ाओ ....
तहलका : बसपा को लड़ाओ या बसपा को जिताओ ?
सतपाल : हां बसपा को जिताओ, वही ..
तहलका : अच्छा तो उसमें वो  उसमें वरुण जी खुद बोल रहे हैं या उनका कोई आदमी है वो बोल रहा है ....
सतपाल : खुद बोले हैं वरुण गांधी
पीलीभीत की राजनीति को बेहद नजदीक से समझने वाले हारुन अहमद कहते हैं, ‘बसपा इस पूरी लड़ाई में कहीं थी ही नहीं. लोकसभा के चुनाव में जो हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में ध्रुवित हुआ था वो अगर विधानसभा में भी हो जाता तो सतपाल गंगवार चुनाव जीत जाते. ऐसे में अगर भाजपा का अपना वोट बसपा के साथ बंट जाता तो उसका सीधा फायदा सपा को मिलना था. यही हुआ भी और सपा के रियाज अहमद चुनाव जीत गए. इस तरह से वरुण गांधी ने सपा को फायदा पहुंचाया और बदले में सपा ने उनके ऊपर दर्ज मामलों को वापस लेने की पहल की.’ ये वही रियाज अहमद हैं जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार में खादी और ग्रामोद्योग मंत्री और पार्टी की अल्पसंख्यक इकाई के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. इनके बारे में भाजपा के पीलीभीत जिला उपाध्यक्ष परमेश्वरी दयाल गंगवार तहलका के स्टिंग में बताते हैं कि इस मामले के मुस्लिम गवाहों को तोड़ने का काम रियाज अहमद को ही दिया गया था.
तहलका की परमेश्वरी से बातचीत के अंश:
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=uYWUz9VC9h4#t=7s
तहलका : तो गवाह वगैरह को कैसे मैनेज किया..?
परमेश्वरी: अरे...जैसे रियाज बाबू मंत्री हैं सपा से...और मुलायम सिंह से सीधे संबंध हैं गांधी जी के...उनके केस निपटाओ सारे...तभी वो...एक वो बुखारी दिल्ली वाले ने आवाज उठा दी...मुलायम ने तो बोल दिया था वापस लेने को लेकिन बुखारी ने आवाज उठा दी...
तहलका : हां उन्होंने तो बोला था बीच में वापस लेने के लिए...
परमेश्वरी: फिर जो मंत्री था यहां का ...रियाज ...उसपे दबाव डाल दिया...कि सारे मुसलमान गवाह हैं, फटाफट लगाओ , फटाफट उठाओ, फटाफट हटाओ... तो सारे मुसलमान उसने एक कर लिए रियाज ने... मैं गया था उस तारीख में...
रियाज अहमद का भी एक इतिहास है. वे मेनका गांधी के पुराने सहयोगी रहे हैं और जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रीय संजय मंच का गठन किया था तब रियाज अहमद उसके सचिव बने थे. पीलीभीत के पुराने नेताओं और पत्रकारों से बातचीत करने पर पता चलता है कि मेनका गांधी को पीलीभीत लाने वाले रियाज अहमद ही थे. हालांकि तहलका के साथ बातचीत में वे वरुण के मामले में अपनी और अपनी पार्टी की किसी भी तरह की भूमिका से यह कहकर इनकार कर देते हैं कि मामलों को खत्म करने की अर्जी स्वयं वरुण गांधी ने दी थी मगर वरुण के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को वे कुछ इस तरह स्वीकार करते हैं, 'हम उनके बाप के साथी हैं, उनकी अम्मा के साथी हैं.'
अब चर्चा करते हैं उन तीन मुख्य मामलों की जिनमें वरुण के ऊपर संगीन आरोप थे और जिनके सिद्ध होने पर उन्हें जेल जाना पड़ सकता था, उनका राजनीतिक जीवन अवरुद्ध हो सकता था, और इन सबसे बचने के लिए नियम-कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं को जमकर तोड़ा-मरोड़ा गया. हमारी मुलाकात के दौरान रियाज अहमद ने भी अन्य कई गवाहों की तरह ही हमें यह बात बताई कि वरुण के मामले में एक बहुत बड़े स्तर पर शासन, गवाहों और यहां तक कि न्यायपालिका तक को मैनेज किया गया. लेकिन इसके बारे में हम थोड़ा आगे बात करेंगे.

मामला-1: मारपीट और जान से मारने की धमकी
घटना दिनांक : 1 अगस्त 2008
प्रथम सूचना रिपोर्ट : 1 अगस्त 2008
आरोप पत्र : 24 दिसंबर 2008
अंतर्गत धारा: 452, 352, 323, 504 तथा 506 भारतीय दंड संहिता
जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि स्थानीय दुकानदार भरतवीर गंगवार से मारपीट का यह मामला वरुण के खिलाफ पीलीभीत का पहला आपराधिक मामला था. इस मामले की सुनवाई 2008 से ही चल रही थी. अचानक ही यह मामला खत्म हो गया और इसकी कहीं चर्चा तक नहीं हुई. दरअसल वरुण के मामलों को तेजी से निपटाने का सिलसिला शुरू हुआ पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में. उनके कुछ मामले कोर्ट में निपटाए जा रहे थे तो कुछ कोर्ट के बाहर. यह मामला भी उन्हीं में से एक था जिसका निपटारा कोर्ट के बाहर ही हुआ. लगभग चार साल तक एक मामूली-सा दुकानदार जिस मजबूती से वरुण के खिलाफ कोर्ट में लड़ाई लड़ रहा था वह अचानक ही तब वरुण से समझौते को तैयार हो गया जब वरुण के सभी मुकदमे एक-एक कर ख़त्म हो रहे थे. इसकी पड़ताल के लिए जब हम पीड़ित भरतवीर गंगवार से मिले तो उनके चेहरे पर मौजूद डर साफ देखा जा सकता था. यह डर भरतवीर की उन मजबूरियों को भी बयान करता था जिनके चलते वे वरुण गांधी से समझौते को तैयार हो गए. भरतवीर इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुए. उन्होंने इस मामले में समझौता क्यों किया और वरुण के खिलाफ केस क्यों वापस ले लिया इन सवालों का उनके पास कोई भी जवाब नहीं था. भरतवीर  2008 की घटना पर भी बात करने से पूरी तरह कतराते रहे . लेकिन इस घटना के एक चश्मदीद फूलचंद 'आचार्य जी' हमें पूरी आंखों-देखी सुना चुके थे जिसका जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं.
इस मामले में समझौता करने के पीछे भरतवीर की क्या मजबूरियां थीं इनका पता हमें तब चला जब हम मामले की पैरवी कर रहे भरतवीर के वकील से मिले. भरतवीर गंगवार के वकील अश्विनी अग्निहोत्री इस पूरे मामले के निपटारे के बारे में बताते हैं, 'वर्तमान पुलिस अधीक्षक महोदय अमित वर्मा साहब ने भरतवीर को बुलाया. उन्होंने कहा कि आप मुकदमा खत्म करिए. भरतवीर हमारे ऊपर बात डाल कर चला आया कि मैं अपने वकील साहब से बात करके आपको बताऊंगा. उन्होंने दूसरी बार जब बुलाया तो उसने टाल दिया. तीसरी बार उन्होंने पुलिसिया रंग दिखाया और पुलिसिया तरीके से समझाया या यूं कहिए कि धमकाया. एसपी ने कहा कि देख लीजिए वरना आप भी परिणाम भुगतने को तैयार रहिएगा.' अश्विनी आगे बताते हैं कि भरतवीर ने उन्हें आकर कहा कि एसपी उसे सीधे-सीधे धमका रहा है और उस पर ऐसे दबाव बनाया जा रहा है कि उसे किसी भी मामले में जेल भिजवा दिया जाएगा. 'मैंने भरतवीर को कहा कि आपके खिलाफ कोई मुकदमा होगा तो हम लड़ेंगे लेकिन साथ ही मैंने उन्हें यह भी साफ़-साफ़ कहा कि इतनी पावर तो मेरी नहीं है कि वरुण आपको बंद करवाए तो मैं रोक लूं. कोर्ट में तो मैं मामले से निपट सकता हूं.
फिर मैंने भरतवीर को एक सलाह दी कि अगर आप समझौता करना चाहते हैं तो पहले आप वरुण से एक एफिडेविट ले लो क्योंकि आपने एफआईआर लिखवाई, इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर को बयान दिया और कोर्ट में आप होस्टाइल हो गए तो कल वो आपके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दाखिल कर देगा. इसलिए मैंने भरतवीर को कहा कि पहले वरुण से एफिडेविट लो कि वे समझौता होने के बाद हिंदुस्तान की किसी भी अदालत में इस केस के संबंध में आपके खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं करेंगे.' अश्विनी वरुण गांधी से यह शपथपत्र लिए जाने के संबंध में भी बताते हैं कि भरतवीर का एक रिश्तेदार दिल्ली में वरुण गांधी के घर गया और उनसे यह शपथपत्र लिया.
अश्विनी कहते हैं, 'अशोका रोड पर उनके आवास से एफिडेविट लिया गया. फिर वहीं से मुझे वह पढ़कर सुनाया गया. मैंने उसमें कुछ कमियां बताईं इसलिए उस एफिडेविट में उसी वक्त कुछ संशोधन किए गए और नया एफिडेविट दिया गया. जब वो एफिडेविट हमारे पास आ गया तब मामले में समझौता हुआ.'
इस तरह से एसपी के दबाव में यह मुकदमा कोर्ट के बाहर ही समाप्त हो गया. जिला पीलीभीत के जिस एसपी का जिक्र यहां भरतवीर के वकील कर रहे हैं उन्होंने वरुण के बाकी मामलों को निपटाने में भी अहम भूमिका निभाई है. 2008 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित वर्मा मई, 2012 से पीलीभीत में तैनात हैं. तहलका की तहकीकात में आप आगे देखेंगे कि कैसे इस आईपीएस अधिकारी के कारनामों का जिक्र बरखेड़ा और मोहल्ला डालचंद मामले से जुड़े कई लोगों ने हमारे खुफिया कैमरे पर किया है.
मामला-2: भडकाऊ भाषण (क़स्बा बरखेड़ा)
घटना दिनांक : 8 मार्च 2009
प्रथम सूचना रिपोर्ट : 17 मार्च 2009
आरोप पत्र : 11 जुलाई, 2009
अंतर्गत धारा : 153(क), 295(क), 505(2) भारतीय दंड संहिता एवं 125 लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम
कुल गवाह: 34
वरुण गांधी के सिलसिलेवार भड़काऊ और सांप्रदायिक भाषणों में बरखेड़ा का भाषण ही सबसे ज्यादा कुख्यात हुआ था. इसी भाषण की झलकियां थी जो सबसे ज्यादा टीवी चैनलों पर दिखाई गई थीं. आठ मार्च को बरखेड़ा में दिए गए उनके इस भाषण से पहले वे मोहल्ला देशनगर, मोहल्ला डालचंद, लालोरी खेड़ा, दड़िया भगत एवं अन्य छोटी-बड़ी सभाओं में भी ऐसी ही आग उगल चुके थे. लेकिन भड़काऊ भाषण के बस दो ही मुकदमे वरुण गांधी के खिलाफ दर्ज हुए.
बरखेड़ा का मामला सबसे ज्यादा चर्चित हुआ और माना जा रहा था कि वरुण गांधी को इस मामले में सजा होना तय है. लेकिन इस मामले में 34 गवाह कोर्ट में पेश हुए और सभी को पक्षद्रोही घोषित किया गया. गवाहों के बयानों को यदि देखा जाए तो उनमें कई विरोधाभास मिलते हैं. वरुण गांधी की इस सभा में जिन पुलिसकर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था में तैनाती थी उनमें से कईयों को गवाह बनाया गया. गवाह नंबर 13 के रूप में पेश हुए कांस्टेबल किशोर पुरी ने कोर्ट में दिए अपने बयान में यह तो स्वीकार किया कि आठ मार्च को उनकी ड्यूटी बरखेड़ा में सुरक्षा व्यवस्था में लगी थी लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें रैली की कोई भी जानकारी नहीं है. गवाह नंबर 11 के रूप में पेश हुए हेड कांस्टेबल हेतराम ने भी अपनी गवाही में यही कहा कि उनकी ड्यूटी उस दिन सुरक्षा में लगी थी लेकिन वे रैली में नहीं गए और उन्होंने भाषण नहीं सुना. इसी तरह गवाह नंबर 14 मथुरा प्रसाद और गवाह नंबर 10 रामेंद्र पाल ने भी कोर्ट में यही कहा कि वे सुरक्षा व्यवस्था में थे और उन्होंने कोई भाषण नहीं सुना. इन बयानों पर कोर्ट में कोई भी सवाल नहीं किया गया. ये सभी पुलिसकर्मी जिस सुरक्षा व्यवस्था में ड्यूटी की बात कर रहे हैं वह वरुण गांधी की रैली के लिए ही लगाई गई थी. वरुण खुद भी यह स्वीकार कर चुके थे कि उन्होंने रैली की थी. ऐसे में पुलिसकर्मियों का यह कहना कि उन्हें रैली की कोई जानकारी ही नहीं है एक कोरा झूठ था. लेकिन ऐसे बयानों के बावजूद  न तो इन गवाहों से कोई सवाल किया गया, न ही कोर्ट ने इन पर झूठी गवाही देने या कोर्ट को गुमराह करने के आरोप में कोई कार्रवाई की और न ही इन पर कोई विभागीय कार्रवाई ही की गई.
पुलिस द्वारा वरुण के भाषण वाला वीडियो जांच करने के लिए चंडीगढ़ की केंद्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला को भेजा गया था. इस जांच के लिए पुलिस ने एक कैमरा, एक कैसेट, एक मोबाइल फोन और एक फोन का मेमोरी कार्ड एफएसएल को भेजा था. एफएसएल के एडिशनल डायरेक्टर डॉक्टर एसके जैन ने इन उपकरणों की जांच के बाद पाया कि इनमें मौजूद वीडियो आपस में मेल खाते हैं. डॉक्टर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह तो लिखा कि ये वीडियो 'ओरिजिनल' नहीं हैं लेकिन पुलिस को दिए अपने बयान में उन्होंने 'ओरिजिनल'  का अर्थ भी  स्पष्ट किया है. उनके मुताबिक 'ओरिजिनल' वीडियो उसे कहा जाता है जो एक ही शॉट में बनाया गया हो. लेकिन इस वीडियो के बीच में कट थे, इसलिए इसे ओरिजिनल नहीं कहा जा सकता.
लैब ने वीडियो में कट की जो बात बताई है उसकी दो वजहें हैं. पहली, दूर-दराज के इलाकों में काम करने वाले स्ट्रिंगर (स्वतंत्र पत्रकार) अक्सर अपने वीडियो टुकड़ों में रिकॉर्ड करते हैं. उनके सामने टेप को बचाने की मजबूरी रहती है, इसलिए वे काम की चीजें ही रिकॉर्ड करते हैं. वीडियो में कट की दूसरी और महत्वपूर्ण वजह यह रही कि वे पत्रकार वरुण के भाषण चोरी से रिकॉर्ड कर रहे थे क्योंकि वरुण की सभाओं की वीडियो रिकॉर्डिंग करने की मनाही थी. उनके समर्थक बीच-बीच में रिकॉर्डिंग बंद करवा रहे थे. कुछ दिन पहले ही वरुण के समर्थक एक कैमरामैन का कैमरा भी तोड़ चुके थे. एफएसएल लैब ने वरुण की आवाज की सत्यता पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया है. डॉक्टर एसके जैन की रिपोर्ट में साफ लिखा है, 'भाषण के इन हिस्सों की पहचान और पुष्टि के लिए आरोपित व्यक्ति की आवाज़ का संतुलित नमूना लिया जाना आवश्यक है.' नमूने के आधार पर ही कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता था. जब इस मामले की जांच के लिए पुलिस ने वरुण गांधी की आवाज़ का नमूना मांगा तो उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वे अपने वकील की अनुमति के बिना कोई कदम नहीं उठाएंगे. इसके बाद न तो अभियोजन पक्ष ने और न ही कोर्ट ने वरुण की आवाज के नमूने के लिए जोर दिया. आवाज का नमूना इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी था जिस पर पूरा मामला टिका था, इसके बावजूद वरुण की आवाज का नमूना नहीं लिया गया और कोर्ट ने मामले का निर्णय दे दिया.
एफएसएल के अतिरिक्त एनडीटीवी ने भी वरुण के भड़काऊ भाषणों वाली सीडी की जांच अमेरिका की एक स्वतंत्र फोरेंसिक लैब 'डिजिटल एविडेंस लीगल वीडियो सर्विसेज'  से करवाई थी. उस रिपोर्ट में यह कहा गया कि सीडी के साथ कोई भी छेड़छाड़ नहीं की गई है और सीडी पूरी तरह से असली है (एनडीटीवी द्वारा करवाई गई वह जांच रिपोर्ट तहलका के पास मौजूद है). पीलीभीत न्यायालय में यह रिपोर्ट भी एनडीटीवी द्वारा इसके प्रसारण की अनुमति के लिए प्रस्तुत की गई थी.
इस मामले की सुनवाई के दौरान ही उत्तर प्रदेश की एक सामाजिक संस्था 'आवामी काउंसिल' के महासचिव असद हयात द्वारा कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया. इसमें कहा गया था कि वरुण गांधी की आवाज़ का नमूना आवश्यक रूप से लिया जाए और यदि वे सैंपल देने से मना करते हैं तो इसे उनके खिलाफ माना जाए. साथ ही असद हयात ने कोर्ट से यह भी मांग की कि जिन समाचार चैनलों ने यह वीडियो प्रसारित किया था उन्हें भी मामले में बतौर गवाह पेश किया जाए. उनके इस प्रार्थना पत्र को न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि जिस अभियोजन पक्ष को इसका समर्थन करना चाहिए था उसी ने इसका विरोध किया. अभियोजन पक्ष का कहना था, 'प्रार्थी आवेदक सूची में नहीं है और न ही कोई अभियोजन साक्ष्य में लिंक साक्षी है लिहाजा प्रार्थी असद हयात द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र निरस्त किए जाने योग्य है.' अभियोजन पक्ष ने एक और प्रार्थना पत्र कोर्ट में दाखिल किया जिसे पढ़कर यह यकीन हो जाता है कि वह असल में वरुण को सजा दिलाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें बरी करवाने का काम कर रहा था.

18 फरवरी, 2013 को दाखिल किए गए इस प्रार्थना पत्र में कहा गया कि डॉक्टर एसके जैन अपनी रिपोर्ट जमा कर चुके हैं इसलिए उन्हें कोर्ट में बतौर गवाह पेश किया जाना न्यायहित में नहीं है. जबकि डॉक्टर जैन को बुलाना बेहद आवश्यक था क्योंकि सीडी की विश्वसनीयता को लेकर उन्होंने जो राय दी थी उसे अदालत को सिर्फ वे ही समझा सकते थे. इसी शपथपत्र में आगे अभियोजन पक्ष ने तत्कालीन जिलाधिकारी महेंद्र प्रसाद अग्रवाल और एलआईयू रिपोर्ट देने वाले पुलिसकर्मी राजेंद्र प्रसाद जैसे दो अहम गवाहों को भी गवाही से उन्मोचित (मुक्त करने) करने का निवेदन किया. अभियोजन पक्ष किसी गवाह को गवाही से मुक्त करने की मांग कैसे कर सकता है यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है.
अभियोजन पक्ष और स्वयं न्यायालय द्वारा इतनी लापरवाहियां करना किसी भी मामले को निश्चित ही संदेह के घेरे में ला देता है. और मामला जब वरुण गांधी जैसे प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा हो तो यह संदेह और भी ज्यादा गहरा जाता है. तहलका ने जब इन खामियों को देखने-समझने के बाद एक-एक कर इस मामले से जुड़े कई गवाहों और अन्य लोगों से मुलाक़ात की और उनसे जुड़े दस्तावेजों आदि को खंगाला तो कई शर्मनाक तथ्य सामने आए. इन मुलाकातों से न सिर्फ यह स्पष्ट हुआ कि वरुण गांधी ने ये सभी अपराध किए थे बल्कि यह हकीकत भी सामने आई कि क्यों ये अपराध कोर्ट में साबित नहीं हो पाए.
गवाह नंबर 4 : रामऔतार
रामऔतार को पुलिस ने घटना का चश्मदीद गवाह बनाया था. इनका दायित्व था कि ये अभियोजन के कथन का समर्थन करें और कोर्ट को बताएं कि वरुण गांधी ने भाषण में मुस्लिम विरोधी बातें कही थीं. लेकिन कोर्ट में दिए गए अपने बयान में रामऔतार ने कहा कि क़स्बा बरखेड़ा में वरुण गांधी की कोई सभा ही नहीं हुई थी और न ही उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण दिया.
तहलका ने जब रामऔतार से बात की तो उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे घटना के दिन वरुण की सभा में मौजूद थे और उन्होंने वरुण का भाषण भी सुना था. हमारे खुफिया कैमरे पर रामऔतार यह भी बताते हैं कि न सिर्फ बरखेड़ा में बल्कि उनके गांव दड़िया भगत में भी वरुण ने मुस्लिम विरोधी बातें कही थीं. वे कहते हैं, 'मेरे गांव में भी गांधी जी ने कहा था कि जिले में तीन-तीन विधायक मुसलमान बना दिए, अब क्या पाकिस्तान बनाओगे. अगर मैं सांसद बन गया तो अगर किसी मुसलमान ने कोई अत्याचार किया जैसे फूल बाबू अपनी मनमानी कर रहे हैं ऐसे अगर मुसलमानों ने मनमानी की तो मुसलमानों के हाथ काट लेंगे.'
अपनी कोर्ट में हुई गवाही और उससे मुकर जाने के संबंध में रामऔतार बताते हैं, 'गवाही के लिए हमें पुलिसवाले लेने आए थे. पहले तो कहने लगे कि इन्हें सीधे एसपी साहब के बंगले पे ले चलो. फिर पुलिसवालों ने मुझसे कहा कि अरे यार शासन भी चाह रहा है और प्रशासन भी चाह रहा है कि मामला निपट जाए. तो अपने लोगों को क्या बनती है यार, अपने लोगों को क्यों लफड़े में पड़ना. नेताओं वाली बात है.'
यानी जिन पुलिसवालों की यह जिम्मेदारी थी कि वे अपराधी को सजा दिलवाने के लिए गवाहों को प्रोत्साहित करें और उन्हें संरक्षण दें, वही घटना के चश्मदीद गवाह को यह समझाते हैं कि शासन-प्रशासन मामले को निपटाना चाह रहा है तो क्यों तुम मुसीबत मोल लेते हो. यही निर्देश देते हुए पुलिस रामऔतार और अन्य गवाहों को कोर्ट ले गई और उनके बयान दर्ज किए गए.
गवाह नंबर 6: अब्दुल रहमान
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=_BDViMeoTa0#t=2s
अब्दुल रहमान बरखेड़ा के पास ही रहते हैं और एक टेंट हाउस के मालिक हैं. वरुण गांधी की इस सभा में इन्हीं की दुकान से टेंट बुक किया गया था. इन्हें भी घटना के चश्मदीद के तौर पर गवाह बनाया गया था.
कोर्ट को दिए अपने बयान में अब्दुल ने कहा है,  'मैं सभा में नहीं गया था और अपनी दुकान पर ही था. टेंट वरुण गांधी की सभा के लिए बुक हुए थे लेकिन टेंट गए नहीं थे.' पुलिस द्वारा अब्दुल को गवाह बनाए जाने का एक मुख्य कारण ही यह था कि वरुण की सभा में उन्होंने टेंट लगाए थे. इसके बावजूद उनकी गवाही में लिखा गया है कि उनकी दुकान से टेंट गए ही नहीं.
तहलका के स्टिंग में वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने ही वरुण की सभा में टेंट लगाए थे. अब्दुल यह भी कहते हैं, 'कोर्ट में कुछ पूछ ही नहीं रहे थे वकील कि तुमने क्या देखा, क्या नहीं देखा. वहां बस खड़ा कर दिया और वो वकील लिख रहा था.' वे आगे बताते हैं, 'मजिस्ट्रेट सामने ही बैठा था और वकील अपने से ही लिखवा रहे थे कि मैं वहां था ही नहीं, न मैंने कुछ देखा, न उनने कुछ कहा न मैंने कुछ सुना...मतलब कि मुकर जाने वाली गवाही.'
अब्दुल यह भी बताते हैं कि वरुण गांधी का भाषण सुना तो सबने ही था लेकिन डर के कारण कोई भी गवाही को तैयार नहीं था. वे तहलका से कहते हैं, 'सब भ्रष्टाचार है. तुम्हारे सामने सीडी बना ली. सीडी सामने चल रही है फिर भी तुम झुठला रहे हो कि नहीं नहीं कही यार तो कोई क्या गवाही देगा.'

गवाह नंबर 17: मोहम्मद यामीन ; गवाह नंबर 18 : मोहम्मद रजा
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=DOSZXu8zin8#t=0s
लखनऊ की एक स्वयंसेवी संस्था के प्रतिनिधि बनकर हम मोहम्मद रजा से मिले. रजा राजनीतिक रूप से भी काफी सक्रिय हैं और समाजवादी पार्टी के नगर अध्यक्ष हैं. कोर्ट को दिए अपने बयान में रजा कहते हैं कि उन्होंने कोई भी भाषण नहीं सुना था और न ही वे वरुण गांधी की रैली में गए थे. लेकिन तहलका के कैमरे पर वे साफ बताते हैं कि उन्हें वरुण गांधी के यहां से फोन आया था और उनसे वरुण के पक्ष में गवाही देने को कहा गया था. वे कहते हैं, 'वहां (वरुण गांधी) से कॉल आई थी. सारे लोग भी पीछे पड़े थे. बोले यार दे दो (गवाही) उनका भला हो जाएगा.
हमने कहा ठीक है चलो दे देते हैं कोई दिक्कत नहीं.' रजा से हुई इस मुलाकात में हमारा कैमरा बीच में ही बंद हो गया जिसके बाद हमने उनसे दोबारा मिलना तय किया. इस दूसरी मुलाकात में उनके साथ मोहम्मद यामीन भी थे. इन दोनों ही लोगों को घटना के चश्मदीद के तौर पर गवाह बनाया गया था. लेकिन मोहम्मद यामीन ने भी कोर्ट में गवाही देते हुए कहा था कि वे वरुण गांधी की रैली में नहीं थे और उन्होंने कोई भी भाषण नहीं सुना था. तहलका ने जब इन बयानों की हकीकत उनसे जाननी चाही तो उन्होंने विस्तार से यह बताया कि क्यों सभा में मौजूद होने के बावजूद वे कोर्ट में सच नहीं बोल पाए.
इस मुलाकात की शुरुआत में हमने रजा और यामीन को उस संस्था के बारे में बताया जिसके प्रतिनिधि बनकर हम इन लोगों से मिले थे. कुछ देर बातें करने के बाद यामीन हमें बताते हैं, 'देखिए मैं बताऊं .. उस दिन हमारे यहां बाजार लगती है, जहां उसने स्पीच दी थी ... उस दिन उसने स्पीच दी थी वरुण गांधी ने ... बहुत महात्मा लोग भी साथ में थे .. मैं वहीं पे खड़ा था'. यामीन आगे बताते हैं, 'तो उनने सबसे पहले उस मंच पे चढ़के वरुण गांधी ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए . जय श्री राम के नारे लगाने के बाद .. ये बोले कि मैं अपने हिंदू भाइयों से कहना चाहता हूं कि जिस तरीके से दो विधायक, दो-दो विधायक यहां पर बने हुए हैं और अगर उन्होंने होश नहीं लिया तो हो सकता है कि ये पीलीभीत पाकिस्तान बन जाए. तो वो जो वो .... ओसामा बिन लादेन ...रियाज विधायक थे .. उनके लिए बोला .. फिर वो, फिर कहा कि किसी हिंदू पे अगर हाथ उठातो मैं हाथ काट लूंगा ... इस तरीके की गलत-शलत (बातें)...'
यही सारी बातें उन्होंने कोर्ट में क्यों नहीं कहीं, इसके जवाब में यामीन और रजा दोनों ही कहते हैं कि यहां कोई भी इस मामले की पैरवी सही तरीके से नहीं कर रहा था, ऐसे में कौन वरुण से दुश्मनी मोल लेता. यामीन यह भी बताते हैं कि जिले के कई पुलिस अधिकारी और खुद एसपी ने गवाहों से बयान बदलवाने में अहम भूमिका निभाई. यामीन कहते हैं, 'कप्तान साहब इन्वॉल्व थे...कप्तान साहब ने बयान बदलवाए हैं ये समझ लीजिए सारे लोगों से...वास्तव में ये चीज है कि अब सरकार से कैसे टक्कर लें... इतने बड़े नेता से कैसे टक्कर लें... लोकल में कोई बड़ा हमारे साथ सहारा नहीं था... कप्तान साहब जैसा जिम्मेदार वो कह रहा है कि कप्तान साहब की मंशा है कि इसको खत्म करिए.' अपनी मजबूरी स्पष्ट करते हुए यामीन कहते हैं, 'दरोगा हमें बता रिया था कि जज भी हमने सेट कर लिया है, सरकारी वकील भी सेट कर लिया है, सरकार भी हमारे साथ है, कप्तान भी हमारे साथ है. हमने कहा जब आप आए हो...केस फंसाने के लिए पुलिस आती है ये केस छुड़ाने के लिए आए हैं तो हम कहां से क्या करते?'
गवाह नंबर 31: मोहम्मद तारिक
मोहम्मद तारिक इस मामले के सबसे अहम गवाहों में से एक थे. यही वह पत्रकार है जिसने बरखेड़ा में हुए वरुण के भाषण को एक अन्य साथी रामवीर सिंह के साथ मिलकर रिकॉर्ड किया था. तारिक की गवाही पर लगभग पूरा केस ही आधारित था. पुलिस ने इस मामले में आरोपपत्र दाखिल करते वक्त लिखा था कि तारिक यह सिद्ध करेंगे कि उन्होंने बरखेड़ा में अपने कैमरे से वरुण का भाषण रिकॉर्ड किया है. कोर्ट में अपने बयान में तारिक ने यह तो स्वीकार किया कि वे अपने साथी के साथ बरखेड़ा गए थे और उन्होंने वरुण गांधी का भाषण रिकॉर्ड भी किया था लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उस भाषण को सुना नहीं था. इस बात पर विश्वास करना लगभग असंभव ही है कि कोई पत्रकार एक खबर बनाए और उसे खुद ही न पता हो कि खबर क्या है.
तारिक ने वरुण गांधी के भाषण को रिकॉर्ड किया और उसे खबर के तौर पर अपने चैनल को भेजा, सारे देश ने उसी खबर के बाद वरुण का यह रूप देखा और अब वही पत्रकार कहता है कि मैंने भाषण नहीं सुना. लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि कोर्ट में ऐसे बयान को बिना कोई सवाल किए स्वीकार कर लिया गया. इसी मामले के गवाह नंबर 30 शारिक परवेज़ तहलका के स्टिंग में कहते हैं कि तारिक को इस बयान के लिए पांच लाख रुपये दिए गए थे.
हम पीलीभीत में तारिक से रिसर्च छात्र के रूप में मिले जो सांप्रदायिक तनाव आदि पर शोध कर रहे थे. पहले तो तारिक इस रूप में भी हमसे मिलने से कतराते रहे, लेकिन बाद में एक स्थानीय वकील की सिफारिश पर वे हमसे मिलने को तैयार हो गए. वे हमसे अपने दोस्त के घर मिले जहां उनके इस दोस्त अंकित मिश्रा ने तारिक के सामने ही हमें बताया कि वर्तमान पुलिस अधीक्षक और जिले के अन्य अधिकारियों ने सारे गवाहों से बयान बदलवाए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वरुण ने भड़काऊ भाषण भी दिया था. तारिक इस बातचीत के दौरान बिलकुल खामोश रहे. उन्होंने बस इतना कहा, 'वरुण को हीरो हमने बनाया है.'
गवाह नंबर 34: रामवीर सिंह (आरवी सिंह)
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=-aOrR6zXOxs#t=0s
रामवीर सिंह अभी सहारा समय में पत्रकार हैं और भाषण वाले दिन इन्होंने ही तारिक के साथ मिलकर वरुण का भाषण रिकॉर्ड किया था. इनका दायित्व भी बतौर गवाह, तारिक की ही तरह यह सिद्ध करना था कि इन्होंने बरखेड़ा में वरुण का भाषण रिकॉर्ड किया था. कोर्ट में इनसे पूछा गया कि क्या पुलिस अधिकारियों ने तुमसे भाषण की सीडी ली थी तो इन्होंने कहा कि मुझसे पुलिस ने कोई भी सीडी नहीं ली थी. इसके अलावा रामवीर से कुछ पूछा ही नहीं गया. जिस व्यक्ति ने मौके पर मौजूद होकर वह भाषण रिकॉर्ड किया उससे घटना का चश्मदीद मानकर कोई भी सवाल नहीं पूछा गया.
तहलका से बातचीत में रामवीर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने वरुण को भड़काऊ भाषण देते सुना था और तारिक के साथ मिलकर उसे रिकॉर्ड भी किया था. कोर्ट में दिए अपने बयान के बारे में वे बताते हैं, 'अरे सब साले बिके हुए थे ये ...वकील से लेकर सारा सब कुछ सब बिके हुए थे...उन्होंने सिर्फ एक क्वेश्चन मुझसे पूछा कि आपने सीडी दी. वाकई मैंने नहीं दी थी, मैंने चैनल को दी, चैनल ने इनको दी ... सीडी, टेप, कैमरा जो कुछ था मैंने चैनल को दिया...चैनल से फिर इनके पास आया.' रामवीर के इस बयान पर यदि एक भी सवाल और कोर्ट में पूछा जाता तो यह साफ़ हो जाता कि उन्होंने सीडी अपने चैनल को दी और चैनल ने पुलिस को. लेकिन कोर्ट में शायद सच जानने की मंशा किसी की थी ही नहीं.
सरकारी वकील द्वारा कोर्ट में दाखिल किए गए एक प्रार्थना पत्र से यह पता चलता है कि रामवीर सिंह कोर्ट में सबसे आखिर में पेश हुए थे. उनके परीक्षित होने के बाद सरकारी वकील ने अभियोजन साक्ष्य को समाप्त करने की मांग की. उनके आखिर में पेश होने के बारे में गवाह नंबर 30 शारिक परवेज जो स्वयं भी पत्रकार हैं, बताते हैं कि रामवीर गवाही के लिए डील कर रहे थे. शारिक कहते हैं कि रामवीर गवाही देने नहीं आ रहे थे और लाखों रुपये की मांग कर रहे थे. फिर पुलिस ने उन्हें उठाया और एसपी के साथ उनकी डील हुई. शारिक के अनुसार रामवीर को एक वैगन-आर गाड़ी देकर खरीदा गया और तब उन्होंने वरुण के बचाव में गवाही दी. रामवीर से हमारी मुलाकात काफी अंधेरे में हुई थी जिस कारण उनके स्टिंग में उनका चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था. लेकिन तभी उनकी वैगन-आर कार को लेकर एक मेकैनिक आ गया और उसकी हेडलाइट की रोशनी में रामवीर का चेहरा हमारे कैमरे में कैद हो गया.

गवाह नंबर 30 : शारिक परवेज़
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=3xavqOsseDs#t=0s
शारिक परवेज इस मामले में बतौर गवाह पेश होने वाले तीसरे स्थानीय पत्रकार थे. उन्हें पुलिस ने बरखेड़ा के अलावा मोहल्ला डालचंद वाले मामले में भी गवाह बनाया था. अगर शारिक के मामले में पुलिस ने क्या किया यह ध्यान से देखें तो ऐसी अजीबोगरीब गड़बड़ियां सामने आती हैं जिन पर विश्वास करना कठिन है. बरखेड़ा वाले केस की बात करें तो इसका आरोपपत्र दाखिल करते हुए पुलिस ने लिखा है, 'शारिक देशनगर में मोबाइल से वरुण गांधी का भाषण रिकॉर्ड करना साबित करेंगे.' बड़ी अजीबोगरीब बात है. मामला दर्ज किया गया है बरखेड़ा में वरुण गांधी के भाषण का और पुलिस साबित देशनगर के मामले का कुछ करना चाह रही है. यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि चुनाव आयोग को देशनगर में दिए वरुण के भाषण की ऑडियो क्लिप और तमाम शपथ पत्र भेजे जाने के बाद भी पुलिस ने इस मामले को दर्ज तक नहीं किया था.
बहरहाल गवाही के दौरान शारिक कोर्ट में इस बात से भी मुकर गए कि उन्होंने देशनगर में वरुण के भाषण को रिकॉर्ड किया था. कोर्ट ने वरुण गांधी को दोषमुक्त करने वाले आदेश में शारिक की गवाही इन शब्दों में लिखी है, 'ये मीटिंग में नहीं गए थे. दिनांक 07.03.2009 को इन्होंने देशनगर में वरुण की मीटिंग में मोबाइल से क्लिपिंग नहीं ली थी. जिरह में इन्होंने कहा है कि ऑडियो नहीं बनाई थी.इनका यह कथन है कि इन्होंने ऑडियो नहीं बनाई थी और यह मीटिंग में भी नहीं गए थे, इसलिए इनका कथन विश्वसनीय नहीं है.' यह पहले से भी अजीबोगरीब बात है. कोर्ट भी बरखेड़ा के मामले में आदेश देते समय शारिक के देशनगर के बारे में दिए बयान को अविश्वसनीय बता रहा है और देशनगर वाले मामले की तारीख छह मार्च के बजाय सात मार्च लिख रहा है.
खैर, शारिक इस मामले में कोर्ट के लिए तो महत्वपूर्ण साबित नहीं हो सके लेकिन उन्होंने तहलका को जरूर कुछ महत्वपूर्ण बातें बताईं. शारिक ने हमारे खुफिया कैमरे पर यह स्वीकार किया कि वे 'होस्टाइल' हुए हैं.
हमारे साथ बातचीत में कई अन्य गवाहों की तरह ही शारिक भी तहलका को बताते हैं कि गवाहों को मुकरवाने में पीलीभीत के वर्तमान पुलिस अधीक्षक (एसपी) अमित वर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. वे बताते हैं, 'मुझे प्रशासन से बार-बार फोन आ रहे थे. खुद एसपी के पीआरओ ने फ़ोन करके गवाही देने के लिए कहा.' अन्य गवाहों के बारे में भी वे बताते हैं कि जो आम जनता के बीच के गवाह थे उन सबको गवाही से दो-तीन दिन पहले थानों में उठवा लिया गया था. एसपी अमित वर्मा द्वारा गवाहों से डील किए जाने के बारे में वे कहते हैं, 'देखिए आरवी सिंह (रामवीर सिंह) तब खुले ...जब एसपी ने बातचीत करी.'
शारिक ने इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोगों के बारे में हमें और भी बहुत कुछ बताया. हालांकि ऊपर लिखी बात की तरह हम उनकी इन बातों को भी अलग से सत्यापित नहीं कर सके, मगर उन्होंने जो बातें हमें बताईं वही हमें इस मामले से जुड़े अन्य लोगों से भी मालूम हुईं. शारिक का कहना था, 'सरकारी वकील पहले ही बता चुके थे एमपी वर्मा कि शारिक भाई सब कुछ खत्म है. हम समझ गए थे सब कुछ ऊपर से मैनेज हो रहा है.'
शारिक हमारे खुफिया कैमरे पर यह भी बताते हैं कि इस मामले में सरकारी वकील और न्यायपालिका तक को उपकृत किया गया. चूंकि हमारे पास इसे सत्यापित करने का कोई और जरिया नहीं था, इसलिए हम इसके बारे में बिल्कुल उतना और वैसा नहीं लिख रहे हैं जितना और जैसा हमें शारिक ने बताया था. मगर कुछ-कुछ ऐसा ही हमें मोहम्मद यामीन ने भी बताया था. उनका कहना था, 'दरोगा हमें बता रिया था कि जज भी हमने सेट कर लिया है, सरकारी वकील भी सेट कर लिया है, सरकार भी हमारे साथ है, कप्तान भी हमारे साथ है.’ शारिक ने अपने साथी पत्रकार मोहम्मद तारिक और रामवीर सिंह को बयान बदलने के लिए पैसे और कार दिए जाने की जो बातें हमें बताई थीं उनका जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं.
ये बातें तब और परेशान करने लगती हैं जब उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और पीलीभीत से विधायक रियाज अहमद भी कुछ-कुछ ऐसी ही बातें हमें बताते हैं.
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=a20twHQMKWw#t=0s
तहलका : हम लोगों ने देखा तो लगा कि ये एक तरह से ओपेन ऐंड शट केस है. जिस तरह से वीडियो आया था. आप लोग तो खैर नजदीक से देख रहे थे.
रियाज : मैं तो उम्मीदवार था ना.
तहलका : आप तो उम्मीदवार ही थे. तो ये समझ में नहीं आया कि वो बरी कैसे हो गए.
रियाज : देखिए, मैं ये ऐसे कह रहा हूं.
तहलका : बताएं.
रियाज : देखिए, उसमें एक तो गवाह उसके लोग थे. एक तो गवाह उनके लोग थे नंबर एक. दूसरे उसने उनको सबको ऑब्लाइज किया. किसी को दस लाख रुपया दिए, किसी को पांच लाख दिया, किसी ने ग्यारह लाख लिया, किसी ने बड़ी गाड़ी ली, किसी ने कुछ लिया किसी ने कुछ लिया.
तहलका : गवाहों ने?
रियाज : गवाहों ने... और यहां तक कि जुडीशरी तक को ऑब्लाइज किया... बड़े पैमाने पर.
तहलका : पीलीभीत कोर्ट को?
रियाज : (इशारे में हां)
तहलका : प्रशासन भी इसमें शामिल था?
रियाज : जी प्रशासन को भी ऑब्लाइज किया.
 परमेश्वरी दयाल गंगवार (भाजपा जिला उपाध्यक्ष -पीलीभीत)
पीलीभीत में मामले की पड़ताल करते वक्त हमारा सामना बार-बार परमेश्वरी दयाल गंगवार के नाम से हुआ. परमेश्वरी दयाल पीलीभीत में भाजपा के जिला उपाध्यक्ष हैं. बरखेड़ा से कुछ दूरी पर स्थित गांव दड़िया भगत के रहने वाले परमेश्वरी कुछ साल पहले ग्राम प्रधान थे (यहीं के रहने वाले रामऔतार ने हमें बताया था कि वरुण ने दड़िया भगत में भी भड़काऊ भाषण दिया था). शायद इसीलिए इस पूरे क्षेत्र में उन्हें आज भी परमेश्वरी 'परधान' के नाम से जाना जाता है. परमेश्वरी 'परधान' की वरुण गांधी से नजदीकियों के बारे में हम कई लोगों से सुन चुके थे और पीलीभीत में हमें भाजपा के कई ऐसे होर्डिंग भी दिखाई दिए जिनमें वरुण गांधी के साथ प्रमुखता से गंगवार का भी चित्र लगा हुआ था. हमने उनसे मिलने का फैसला किया. कई सालों से गांधी परिवार की विरासत रहे पीलीभीत संसदीय क्षेत्र के इस गांव तक पहुंचने के लिए आम आदमी के पास आज भी बैलगाड़ी ही एकमात्र साधन है. बैलगाड़ी से उतरकर हम जब परमेश्वरी परधान के घर पहुंचते हैं तो घर के बाहर ही हमारे बिना कुछ बोले ही उनके घर का एक सदस्य हमसे पूछता है, 'गांधी जी के यहां से आए हैं?' परमेश्वरी दयाल हमें घर पर नहीं मिलते. फिर यही रिश्तेदार हमें वापस बरखेड़ा लेकर जाता है. यहां एक गन्ने के जूस की दुकान के पास हमें परमेश्वरी मिलते हैं. दबंग प्रवृति के परमेश्वरी सामने से गुजरने वाले एक गन्ने के ट्रैक्टर को रुकवाते हैं और उसमें से कुछ गन्ने के गट्ठे उतरवा लेते हैं. परिचय के बाद हम उनसे बात शुरू करते हैं. कुछ देर इधर-उधर की बात के बाद परमेश्वरी हमें वे सारी बातें एकसाथ बताते हैं जो हमने अलग-अलग गवाहों से सुनी हैं. परमेश्वरी शुरुआत करते हुए ही बताते हैं कि उन्होंने ही बरखेड़ा वाली मीटिंग आयोजित करने के सारे इंतजाम किए थे और वे ही उस मीटिंग के प्रभारी भी थे. वे हमें यह भी बताते हैं कि उस मीटिंग में साधुओं को जो पैसे बांटे गए थे उसे बांटने वाले भी वे ही थे. उस समय समाचार चैनलों पर वरुण की सभा में पैसे बांटने और चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने की खबरें भी आई थीं और जाहिर है परमेश्वरी उसी का जिक्र कर रहे थे.
बातचीत के क्रम में परमेश्वरी ने हमारे खुफिया कैमरे पर यह स्वीकार किया कि वरुण के जो भाषण टीवी पर दिखाए गए थे वरुण ने वास्तव में वही सब कहा था. हम उनसे पूछते हैं कि क्या बोल गए थे वरुण गांधी तो वे जवाब देते हैं, 'बोल तो ये गए थे कि मुसलमान मजहब का कोई भी व्यक्ति अगर हिंदू की तरफ हाथ उठाता है तो हाथ काट दो, सर उठता है तो सर काट दो. और सबसे ज्यादा बीमारी बीसलपुर में है, वहां एक पहले फैक्ट्री खरीदूंगा, पेट्रोल पंप...वो तेल की...फिर स्प्रे करवाऊंगा...उससे ..हेलीकाप्टर से ... फिर आग लगवाऊंगा हिंदुओं से ...बस्ती खाली करवा के रहूंगा 24 घंटे में.' बीसलपुर पीलीभीत का एक मुस्लिमबहुल क्षेत्र है और यहां जिस बीमारी की बात परमेश्वरी कर रहे हैं उसका मतलब मुस्लिम समुदाय के लोगों से ही है. वरुण अपनी कई सभाओं में मुसलमानों को बीमारी बता चुके थे. इस मामले में दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में भी यह लिखा गया था कि वरुण ने अपने भाषण में कहा है, 'मुस्लिम एक बीमारी है. चुनाव के बाद खत्म हो जाएगी.'
जैसा कि हम इस स्टोरी में पहले देख ही चुके हैं, आगे बातचीत में भाजपा जिला उपाध्यक्ष हमें यह बताते हैं कि इस मामले में वरुण गांधी को बचाने में सपा सरकार की भी भूमिका रही है और कैसे सपा सरकार में मंत्री रियाज अहमद को ही मुस्लिम गवाहों को तोड़ने का काम सौंपा गया था.
 परमेश्वरी से हुई बातचीत में यह बात एक बार फिर से सामने आई कि वर्तमान एसपी अमित वर्मा ने गवाहों को धमका कर बयान बदलवाए हैं. मुस्लिम गवाहों को मंत्री रियाज अहमद द्वारा समझाए जाने की बात जब परमेश्वरी ने बताई तो हमने उनसे अगला सवाल पूछा कि हिंदू गवाहों को कैसे तोड़ा गया? इसके जवाब में वे कहते ह, 'वो तो वैसे ही टूट गए...पुलिस दबाव में...एसपी बुलवाता था एसपी...एक गवाह था...एसपी ने बुलवाया...यहां आओ...एसपी ने कहा –पढ़े लिखे हो..? बोला साहब मैंने क्या-क्या पीएचडी-फीएचडी की है...पढ़ा-लिखा था बच्चा, पूछा क्या पे है.? तो उसने बताया पचीस हजार रुपये... तब बोले- फिर तो शादी अच्छी हुई होगी..? वो बोला हां साहब ठीक-ठाक हो गई...तब पूछा बीवी से प्यार करते हो..? वो बोला हां साहब....करते रहना चाहते हो या बंद कर देना चाहते हो? ... तब जाओ...क्या कहना है कोर्ट में सोच लो...वापिस जाना चाहते हो कि नहीं? '
तहलका के खुफिया कैमरे पर पीलीभीत में भाजपा के उपाध्यक्ष परमेश्वरी गंगवार ने कई चौंकाने वाली बातें कहीं. परमेश्वरी से तहलका की पूरी बातचीत.

तहलका : तो गवाह वगैहरा को कैसे मैनेज किया..?
परमेश्वरी: अरे...जैसे रियाज बाबू मंत्री हैं सपा से...और मुलायम सिंह से सीधे संबंध हैं गांधी जी के...उनके केस निपटाओ सारे...तभी वो...एक वो बुखारी दिल्ली वाले ने आवाज उठा दी...मुलायम ने तो बोल दिया था वापस लेने को लेकिन बुखारी ने आवाज उठा दी...
तहलका : हां उन्होंने तो बोला था बीच में वापिस लेने के लिए...
परमेश्वरी: फिर जो मंत्री था यहां का ...रियाज ...उसपे दबाव डाल दिया...कि सारे मुसलमान गवाह हैं, फटाफट लगाओ, फटाफट उठाओ, फटाफट हटाओ... तो सारे मुसलमान उसने एक कर लिए रियाज ने... मंै गया था उस तारीख में.
तहलका : अच्छा
परमेश्वरी: तो सारे गवाह भी साफ...ऐसा कुछ भी नहीं था...
तहलका : तो गवाहों को किसने कहा था...समझाया था..?
परमेश्वरी: पुलिस ने........अरे मंत्री बनाना वरुण का काम है....
तहलका : और जो हिंदू थे गवाह ...वो कैसे तोड़े..?
परमेश्वरी: वो तो वैसे ही टूट गए...पुलिस दबाव में...
तहलका : पुलिस दबाव में...अच्छा...
परमेश्वरी: एसपी बुलवाता था एसपी...
तहलका : अच्छा...
परमेश्वरी: एक गवाह था...एसपी ने बुलवाया... कहा –पढ़े लिखे हो..? बोला, साहब मैंने क्या-क्या पीएचडी-फीएचडी की है...पढ़ा लिखा था बच्चा, पूछा क्या पे है.? तो उसने बताया पचीस हजार रुपए... तब बोले- फिर तो तो शादी अच्छी हुई होगी..? वो बोला हां साहब ठीक ठाक हो गयी... तब पूछा बीवी से प्यार करते हो..? वो बोला हां साहब... करते रहना चाहते हो..? तो बोला हां साहब... तब जाओ...क्या कहना है कोर्ट में सोच लो...वापिस जाना चाहते हो कि नहीं..? ....ऐसा हुआ था...
..........
तहलका : ये कौन से वाली मीटिंग की बात है..? दो मीटिंग हुई थी शायद?
परमेश्वरी: ये 8 मार्च की शायद मीटिंग थी...होली से पहले की  मीटिंग थी..
तहलका : बरखेडा में मीटिंग थी..?
परमेश्वरी: हां...उसमें साधु बुलवाए थे हमने डेढ़ दो सौ... यहां के लोकल थे, कुछ बाहर से थे... तो जिस हिसाब से संत रहे मैंने उस हिसाब से दक्षिणा बांटी...मैंने वरुण गांधी से कहा था...
परमेश्वरी: ...तो ऐसा है आचार संहिता लग गयी थी तो सम्मलेन का नाम बदल दिया था... उसमंे ये...जब आचार संहिता लग गयी तो...हिंदू सम्मान सम्मलेन रख दिया था उसका नाम...उस मीटिंग का नाम बदल के...हिंदू सम्मान सम्मलेन... हिंदू सम्मान सम्मलेन तो संतों का होता है...तो सौ दो सौ संत बुलाए जाएंगे ...बुलाया तो दूर-दूर से लोग आए तो मैंने गांधी जी से कहा...मैंने कहा कि इनको दक्षिणा भी देनी होती है...ये संत लोग हैं...इनकी खेती बाड़ी नहीं होती, महाराजा लोग हैं... तो बोले कि दे दो...
मेरे पास जितना रुपया था तीस-चालीस हजार रूपये...वो दे दिया...कम पड़ गया था तो मैंने फिर फोन किया तो बोले फलानी जगह से पैसे आ रहे हैं अभी...मैंने फोन किया तो पैसे आ गए...फिर बंट गए... वो भी सीडी में दिखाया जाता है लिफाफे जो दे रहे थे...
तहलका : वो अलग मामला था या उसी में था..?
परमेश्वरी: उसी में था...उसी मीटिंग में था...
..........
तहलका : वैसे वो क्या...मतलब क्या गड़बड़ बोल गए थे..?
परमेश्वरी: बोल तो ये गए थे...फूल बाबू मंत्री था बसपा का...हिंदू पर कुछ अत्याचार भी हो रहे थे...किसी की....ललना...भैंस-वेंस छुडवा  लेना...कटवा लेना... ...तो इस तरह की.... मुसलमान मजहब का कोई भी व्यक्ति अगर हिंदू की तरफ हाथ उठाता तो हाथ काट दो...सर उठाता तो सर काट दो...और सबसे ज्यादा बीमारी बीसलपुर में है, वहां एक पहले फैक्ट्री खरीदूंगा, पेट्रोल पंप...वो तेल की...फिर स्प्रे करवाऊंगा...उससे (गाली)...हैलीकाप्टर से ...ओर फिर आग लगवा के बस्ती खाली करवाऊंगा...
तहलका : ये बोला था..?
परमेश्वरी: बहुत बोला था...हमारे यहां मोम्डन गांवों में नहीं जाते थे फेरी करने वाले...
तहलका : अच्छा...
परमेश्वरी: बंद हो गए थे... बहुत भयभीत, पूरा पीलीभीत... हाहाहाहा....
तहलका : जो मीटिंग थी...उसमें जितने भी लोग थे उसमे अधिकतर हिंदू ही रहे होंगे..?
परमेश्वरी: हां टोटल...
तहलका : टोटल हिंदू थे ..?
परमेश्वरी: टोटल हिंदू थे...
तहलका : अगर दो-चार रहे भी होंगे तो....
परमेश्वरी: नहीं दो- चार थे मुसलमान थे वो अपने थे...अपने थे...
तहलका : अच्छा...
तहलका : फिर वो मंत्री जिन्होंने मुसलमान गवाह तुड़वाए...वो भी मुसलमान थे..?
परमेश्वरी: हां वो भी मुसलमान थे...
तहलका : ये तो ऊपर के लेवल वाली बात है...
परमेश्वरी: फिर बात आ जाती है...वो कहते हैं कि- खुदा कसम पैसा खुदा तो नहीं, खुदा कसम पैसा खुदा तो नहीं, लेकिन खुदा कसम पैसा खुदा से कम भी नहीं...
..........
तहलका : तो यहां जो गवाह-वगैरह  थे उनको भी कुछ पैसा-वैसा दिया या वो ऐसे ही मान गए थे..?
परमेश्वरी: अरे जब एसपी डाइरेक्ट बुलवा रहा है...मंत्री खुला कह रहा है...(गाली)
तहलका : उनको तो पैसे-वैसे की भी कोई जरुरत नहीं पड़ी होगी..?
परमेश्वरी: कुछ नहीं....कुछ नहीं....कुछ नहीं
..........
तहलका : गिरफ्तारी वाले दिन भी तो कितना भीड़ हो गया था यहां...
परमेश्वरी: ढाई लाख आदमी था...
तहलका : जब गिरफ्तारी...
परमेश्वरी: मैं तो साथ था भइया.  जब एसपी की गाड़ी इधर आ रही थी तो लोगों ने इतनी...जिधर पब्लिक थी उधर कर दी...
तहलका : अच्छा..?
परमेश्वरी: हां... बहुत पब्लिक थी...वो तो गांधी जी ने समझा दिया था नहीं तो पता नहीं (गाली ) ना जाने कितनी (गाली ) धारा बह जाती...
तहलका : अच्छा...
परमेश्वरी: हां...तैयारी थी हम लोगों की फुल...
तहलका : अच्छा...
परमेश्वरी: हां...हम लोगों के पास फैक्स आ गया था पहले हे...बोले इतनी-इतनी भीड़ होनी है...हमने कहा होगी साहब...
तहलका : फैक्स कहां से..? उधर...
परमेश्वरी: दिल्ली से...
तहलका : दिल्ली से..?
परमेश्वरी: हां...पुलिस लग गयी थी गाजियाबाद से...नॉएडा से...लेकिन गांधी परिवार गांधी परिवार है यार...हम-तुम सोच ही नहीं सकते वो बात...
बीस...बीस सफारी गाड़ी...गाड़ी एंडेवर वगेरह (गाली)...एक ही सी...
तहलका : अच्छा
परमेश्वरी: एक ही सी.. एक-एक करोड़ की गाड़ी ...उसमे से एक में बैठा था (गाली) पीछे से (गाली)...नौ चले गयी (गाली) रामपुर से मुरादाबाद से सीधी बरेली (गाली)...एक चली गयी (गाली ) सितारगंज (गाली)...
इधर आ रही पुलिस (गाली) इधर लगी हुई...(गाली) खटीमा होके आ रहे सितारगंज  होके...मुरादाबाद जो हाई-वे पे बाई पास पड़ता है..? 
तहलका : हां-हां...
परमेश्वरी: पुलिस लगी ही इतनी थी...
तहलका : अच्छा
परमेश्वरी: ठीक है... नौ सीधी जा रही... एक उसमे से कट हो गई...और जो, जहां से कट हुई उसके साथ और दस गाड़ियां खड़ी थीं और...
परमेश्वरी: काफिला बरेली में रोका गया तो वरुण गांधी गायब मिले साहब...  तो मुझे फोन हो रहा है कि जेल गेट पहुंच गए हैं...

मामला-3: भडकाऊ भाषण (मोहल्ला डालचंद, पीलीभीत)
घटना दिनाँक : 7 मार्च 2009
प्रथम सूचना रिपोर्ट : 18 मार्च 2009
आरोप पत्र : 11 दिसंबर, 2010
अंतर्गत धारा : 153(क), 295(क), 505(2) भारतीय दण्ड संहिता एवं 125 लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम
कुल गवाह: 15

पीलीभीत के डालचंद मोहल्ले में जहां वरुण गांधी की सभा हुई थी वहां वाल्मीकि समाज के लोग ज्यादा रहते हैं. वरुण अपनी हर सभा में मुस्लिम समुदाय के बारे में कह रहे थे कि 'मैं मुस्लिम को दुश्मन नहीं मानता, एक बीमारी मानता हूं जिसे हमें ठीक करना है.' वाल्मीकि बहुल इस क्षेत्र में आयोजित अपनी इस सभा में भी वरुण ने इन्ही बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, 'समय आएगा तो इस बीमारी का अंत होगा. मैं जनरल नहीं बन सकता, नेता हूं, वाल्मीकि जनरल बनेगा और इसका अंत करेगा.'
इस मामले में भी प्रथम सूचना रिपोर्ट घटना के लगभग दस दिन बाद दर्ज की गई थी वह भी तब जब चुनाव आयोग ने इसके निर्देश दिए. तब तक समाचार चैनलों के माध्यम से सारा देश साप्रदायिकता का जहर उगलते वरुण को  देख-सुन चुका था. अपनी पड़ताल के दौरान तहलका ने पाया कि पुलिस ने इस मामले में कई ऐसे लोगों को भी गवाह बना दिया जो कि वहां मौजूद ही नहीं थे और उन्होंने वरुण का भाषण सुना ही नहीं था. कोर्ट के आदेश में लिखा है कि इस मामले में कोई वीडियो भी कोर्ट में पेश नहीं किया गया. गवाहों की संख्या भी इस मामले में बरखेड़ा वाले मामले की तुलना में कम थी. इन सभी कारणों से यह मामला काफी कमजोर तरीके से कोर्ट में पेश हुआ.
मौहल्ला डालचंद वाले मामले के अदालती दस्तावेजों से पता चलता है कि इसमें शामिल ज्यादातर गवाहों द्वारा दिए बयानों की भाषा तक एक जैसी थी. तहलका ने इस मामले से जुड़े चार गवाहों से बात की तो इसकी वजह शीशे की तरह साफ हो गई. इन चार गवाहों ने अलग-अलग समय पर तहलका के ख़ुफ़िया कैमरों पर यह स्वीकार किया कि उनकी गवाही के दौरान जज साहब अदालत में मौजूद ही नहीं थे. इस मामले की सुनवाई भी बरखेड़ा वाले मामले की सुनवाई करने वाले पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अब्दुल कय्यूम ही कर रहे थे. गवाहों द्वारा पुलिस को दिए गए बयानों की इसीलिए कोर्ट में ज्यादा अहमियत नहीं होती क्योंकि यह माना जाता है कि पुलिस उनके बयान दबाव बनाकर भी दर्ज कर सकती है. इसीलिए कोर्ट में जज के सामने दिए बयानों को ही सबसे अहम माना जाता है. मगर मोहल्ला डालचंद के मामले में जज होता तभी तो यह सुनिश्चित होता.
गवाह नंबर 1: विजयपालइस मामले के मुख्य गवाह विजयपाल का बयान था, 'दिनांक 07.03.2009 को डालचंद मोहल्ले में वरुण गांधी की चुनावी सभा नहीं हुई, न ही घर से कहीं गए थे, न ही वरुण गांधी का भाषण सुना था, न ही उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिया था.' मोहल्ला डालचंद मामले के एक अन्य गवाह रियासत तहलका से कहते हैं, 'मैं सभा खत्म होने के बाद वहां पहुंचा था. विजयपाल, प्रताप आदि लोग सभास्थल के पास पहले से ही मौजूद थे.' यानी वरुण की सभा भी हुई थी और विजयपाल वहां मौजूद भी थे. मगर यदि रियासत की हमसे कही बात को नज़रंदाज़ कर भी दिया जाए तो भी चार वाक्यों का विजयपाल का बयान बड़ा अजीब-सा है. मगर उनके इस बयान के बेतुकेपन पर न तो अभियोजन पक्ष ने ही कोई सवाल किया और न ही अदालत ने. अदालत करती भी कैसे जब जज साहब विजयपाल की गवाही के वक्त वहां मौजूद ही नहीं थे. यह बात खुद विजयपाल ने हमें बताई-
तहलका : जज साहब से तुम मिले थे कोर्ट में?
विजयपाल : जज साहब नहीं-नहीं, पेशकार साहब के सामने हुई थी गवाही..
तहलका : अच्छा, जज साहब बैठे नहीं थे?
विजयपाल : न, जज साहब नहीं बैठे थे.

गवाह नंबर 4 - रियासत
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=m07H4bAN458#t=0s
जहां इतने प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ गवाही हो रही हो तब तो जज का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि गवाहों पर कोई दबाव तो नहीं है और वे स्वेच्छा से बयान दे रहे हैं.  लेकिन इस मामले को पीलीभीत के सीजेएम कितनी गंभीरता से ले रहे थे इसका अंदाजा गवाह नंबर चार के रूप में पेश हुए रियासत की बातों से भी लगाया जा सकता है.
तहलका : कोर्ट में क्या हुआ?
रियासत : कोर्ट में बोले फोटो खिंचवा लो जब पहुंचे. अरे हमने कहा खेत पे से आके ...पैसे लेके तो लाए नहीं हैं ... 40-50 रुपये लाए हैं, 20 रुपये रिक्शेवाला लेता है , जाएंगे काए से? और 20 रुपये के फोटो हैं. अरे बोले फोटो तो खिंचवा लो पैसे वो पुलिसवाला बोला मुझसे ले लो. अरे मैंने बोला तुझसे क्यों लेंगे? फोटो खिंचवाया. फिर वो बड़े भाई थे हमारे उधर. उनसे लिए पैसे मैंने, फोटो खिंचवाय के पैसे-वैसे लेके. उन लोगों को फोटो दिए तीन. उन्होंने फोटो-वोटो लगाया फाइल में ...अंदर से ... कुछ उन्होंने हमसे पूछा ही नहीं क्या है ...ना अंदर जाने का मौका मिला किसी गवाह को. किसी मतलब कि किसी गवाह को .. मुझे ही नहीं ... किसी गवाह को...अंदर कोई नहीं गया गवाह.
तहलका : अंदर मतलब कोर्ट में कोई नहीं गया ?
रियासत : कागज बने हुए रखे हैं. क्या है वो ... फोटो लगे सबकी .. सब गवाह सब गवाहों के.
तहलका : बस आपने अंगूठा लगा दिया ?
रियासत : बस,.... अंगूठा लगा दिया ....फिर चले गए ...
तहलका : और जज ने आपसे कुछ पूछा?
रियासत : अरे जज ससुरा छुट्टी ले रहा तीन-तीन दिन से. तीन दिन पहुंचे हम अदालत, तीनों दिन साहब बैठे नहीं. एक फेरे गवाही पे गए लौट आए, दिन बर्बाद किया. दूसरा दिन गए, दूसरा गए लौट आए. फिर 20 तारीख जब गए.
तहलका : जिस दिन गवाही हुई उस दिन भी जज साहब नहीं थे ?
रियासत : जज साहब उस दिन बैठे थे मगर लंच हो गया था. लंच के बाद सब गवाह पहुंचे. अंगूठा लगा लगा के चले आए लौट के
तहलका : तो जज से कोई मुलाकात भी नहीं हुई आप लोगों की?
रियासत : कोई मुलाकात नहीं किसी की .. हमारी नहीं किसी भी गवाह की
तहलका : मतलब कोई बातचीत कुछ भी नहीं
रियासत : ना
तहलका : और वो अंगूठा जहां आपने लगाया, वो कोर्ट के बाहर ही हो गया था वो ? जज साहब के सामने हुआ या अलग ही ?
रियासत : नहीं, वो पेशकार जो बैठता है न ...
तहलका : हां, पेशकार के सामने ?
रियासत : हां .

गवाह नंबर-2: प्रताप
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=CvRas8n5CJk#t=0s
गवाही के दौरान जज साहब की नामौजूदगी की बात एक और गवाह प्रताप के मुंह से भी सुनिए--
तहलका: जज साहब ने पूछा कुछ सवाल
प्रताप: नहीं.. उधर साहब(पेशकार) थे नीचे अर्दली था...
तहलका: जज साहब नहीं थे?
प्रताप: जज साहब नहीं थे..




गवाह नंबर 5 नफीस
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=vZ3DdOtQz7Y#t=0s
जज की नामौजूदगी में गवाही होने की बात नफीस भी तहलका के कैमरे पर स्वीकार करते हैं.
तहलका : जज साहब ने कुछ कहा नहीं कि फिर आपको गवाह क्यों बनाया गया...उन लोगों को डांटा नहीं कि जब आप थे ही नहीं वहां पर तो क्यों...
नफीस : ना-ना-ना उन्होंने कुछ भी नहीं कहा...पहली बात तो जज साहब थे ही नहीं...पेशकार साहब थे...
स्पष्ट है कि बिना कोर्ट में उपस्थित हुए और बिना गवाहों को सुने या बिना उनसे कोई सवाल-जवाब किए सीजेएम अब्दुल कय्यूम ने 27 फरवरी, 2013 को वरुण गांधी को मोहल्ला डालचंद के मामले से दोषमुक्त करने का आदेश जारी कर दिया.
इस सबको पढ़कर कोई बच्चा भी आसानी से समझ सकता है कि किस तरह कानून का हर जगह हर तरह से मजाक उड़ाया गया जिससे वरुण गांधी भड़काऊ भाषणों के दोनों ही मामलों में साफ बच निकले.
इसके बाद कम से कम यह सवाल तो हमारे सामने खड़ा होता ही है कि क्या इन मामलों की दुबारा जांच और ट्रायल नहीं किए जाने चाहिए. और जिन्होंने ऐसा किया या होने दिया उनके बारे में भी क्या नहीं सोचा जाना चाहिए?
लेकिन वरुण गांधी की खुद को बचाने की कहानी यहीं खत्म नहीं होतीः
आखिरी मामलाः दंगा भड़काना, पुलिस के ऊपर जानलेवा हमला करना और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना
घटना दिनाँक : 28 मार्च 2009
प्रथम सूचना रिपोर्ट : 28 मार्च 2009
अंतर्गत धारा : 147, 148, 149, 307, 427, 336, 332, 188 भारतीय दंड संहिता
कुल गवाह: 39
चार मई को वरुण गांधी बलवा, फसाद और हत्या के प्रयास से संबंधित आखिरी मामले में भी अदालत से बरी हो गए. तहलका को इस अपराध से जुड़े दो तथ्य अपनी तहकीकात के दौरान ही मिल गए थे. भाजपा जिलाध्यक्ष परमेश्वरी गंगवार का छिपे कैमरे पर बयान और योगेंद्र गंगवार का शपथपत्र जिससे यह बात सिद्ध होती है कि वरुण गांधी के आत्मसमर्पण के दौरान जो कुछ हुआ वह पूर्वनियोजित था. वरुण गांधी के खिलाफ यह तीसरा मामला 28 मार्च, 2009 को दर्ज हुआ था. इस मामले पर अदालत का निर्णय तब आया जब हम अपनी स्टोरी के अंतिम पड़ाव पर थे. इसके बावजूद थोड़ी-सी खोजबीन करने पर ही कुछ बड़ी गड़बड़ियां सामने आ गईं.
वरुण गांधी के साथ इस मामले में कुल नौ लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इसमें कुल गवाहों की संख्या 39 थी. इस मामले में जहां वरुण गांधी तो बरी हो चुके हैं वहीं बाकी आठ आरोपितों का मुकदमा अभी प्रारंभिक चरण में ही है. बाकी दोनों मामलों की तरह इस मामले में भी सभी 39 गवाह अपने बयान से मुकर गए. किसी भी आरोपित का ट्रायल अन्य आरोपितों से अलग किए जाने के बारे में पीलीभीत के अधिवक्ता अश्विनी अग्निहोत्री हमें समझाते हैं, 'किसी भी मामले में एक से ज्यादा अभियुक्त हों तो उन सभी का ट्रायल एकसाथ ही होता है. किसी भी अभियुक्त को सिर्फ उसी हालत में बाकियों से अलग किया जा सकता है जबकि वह फरार हो या कोर्ट में पेश न हो रहा हो. लेकिन वरुण गांधी को यह विशेष रियायत पीलीभीत कोर्ट में दी गई.' एक ही मामले में आरोपित लोगों के अलग-अलग ट्रायल न किए जाने की भी कुछ वजहें हैं. जैसे एक तो उन्हीं गवाहों को बार-बार गवाही के लिए बुलाना होता है, ऊपर से कोर्ट का भी कीमती समय नष्ट होता है. इसके अलावा न्यायिक प्रक्रिया में आने वाला सरकारी खर्च भी बढ़ जाता है. लेकिन वरुण को यह विशेष कृपा मिली. बाकी अभियुक्त अभी कचहरी के चक्कर काटते रहेंगे.
इस तीसरे मामले में जिस तरह की स्थितियों में गवाहों की गवाहियां हुईं हैं वे बाकी दोनों मामलों से बिल्कुल मेल खाती हैं. इस मामले में भी एक-एक दिन में कई-कई गवाहों की गवाही हुई और सब के सब अपने बयान से मुकर गए. वरुण गांधी के तीनों मामले शायद भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक कीर्तिमान होंगे. एक व्यक्ति के खिलाफ तीन आपराधिक मामले थे. हर मामले में बीस-तीस-चालीस गवाह. मगर एक भी गवाह अपने बयान पर कायम नहीं रहा. ये स्थितियां पहली नजर में ही गड़बड़ी के संदेह को जन्म देने के लिए पर्याप्त हैं. ऊपरी अदालतें इनका संज्ञान ले सकती है. यह न्यायपालिका की विश्वसनीयता का भी मामला है.
जो वरुण गांधी ने 2009 में किया था, वह उन मूल सिद्धांतों के ही खिलाफ था जिन पर हमारे देश की बुनियाद टिकी है. मगर उसके बाद वरुण ने खुद को बचाने के लिए जो किया वह उससे कई कदम आगे था. पहले उन्होंने देश के धर्मनिरपेक्ष और विविधताओं से भरे ताने-बाने को उधेड़ने की कोशिश की थी और बाद में उन्होंने जो किया वह न्याय पर आधारित व्यवस्था की जड़ पर चोट करने जैसा था. इन सभी मामलों को लेकर जब हमने वरुण गांधी से संपर्क किया तो उन्होंने इन पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.
आज वरुण गांधी खुद पर लगे सभी आरोपों से मुक्त हैं, पार्टी में उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं और भाजपा उनके रूप में भविष्य के एक बड़े राजनेता को तलाश रही है. लेकिन क्या वरुण गांधी का इन आरोपों से मुक्त हो जाना एक अपराधी का सजा से बच निकलना भर है? या फिर उनका दोषमुक्त होना उस बुनियाद का मजबूत होना है जिस पर आगे चलकर इसी तरह के और भी अपराध फलते-फूलते हैं. उन्नीस सौ चौरासी के सिख विरोधी दंगों के अपराधियों को यदि सजा हुई होती तो 2002 का नरसंहार रोका जा सकता था. चौरासी के दंगाइयों को मिला राजनीतिक संरक्षण ही आगे चलकर बाबू बजरंगी और माया कोडनानी जैसे लोगों को पैदा करता है. ठीक उसी तरह से यदि वरुण गांधी को उनके अपराधों की समय रहते सजा मिलती तो कोई अकबरुद्दीन ओवैसी पैदा नहीं होता.
अपने राजनीतिक हित साधने के लिए जिस तरह से वरुण गांधी ने पूरे क्षेत्र की सांप्रदायिक भावनाओं को भड़का दिया था उसके परिणाम बहुत ही घातक हो सकते थे. वरुण के ही नजदीकी परमेश्वरी हमारे खुफिया कैमरे पर यह कहते हैं, 'हमारे यहां मोम्डन गांवों में नहीं जाते थे फेरी करने वाले...बंद हो गए थे... बहुत भयभीत, पूरा पीलीभीत.' वरुण के उस जहरीले भाषण के एक चश्मदीद और उसको रिकॉर्ड करने वाले पत्रकार रामवीर सिंह भी बताते हैं,  'बरखेड़ा वाला इसने इतना गलत कहा था...कि सामने मुस्लिम बस्ती है पूरी, कम से कम एक-डेढ़ हजार मुस्लिम था. वो खाली अपनी छत से ईंट-पत्थर फेंक देते...बाजार का दिन था उस दिन तो सौ-दो सौ मर जाते'. इसी तरह से मोहम्मद यामीन ने भी हमें बताया कि वरुण के भाषण के बाद पीलीभीत में दंगा होते-होते बचा. और इस मामले के एक गवाह रामऔतार ने तो यहां तक कहा कि गांव के लोग मुसलमानों को मारने की तैयारी भी करने लगे थे, 'गांव का इंटेलिजेंट पर्सन तो इन बातों को नहीं मानता है...ठीक है...गांव का जो इलिट्रेट पर्सन है उसने कहा अच्छा यार ये नेता बढ़िया है. हम लोग हिंदू, साले ये चार-छह मुसलमान...ये सही कह रहे हैं बिल्कुल.. तो गांववाले मुसलमानों को मारने की तैयारी करने लगे...'इसे एक सुखद संयोग ही कह सकते हैं कि वरुण गांधी की लगाई हुई चिंगारी आग बनते-बनते रह गई.
(प्रदीप सती के सहयोग के साथ)

खदानें नहीं कब्र खोद रहे हैं रमन सिंह

  • अरुणेश सी दवे  

सूडान के स्वयंभ इस्लामिक पैगंबर महदी ने जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ विद्रोह किया था तो उसके पास महज कुछ सौ लड़ाके थे। जब उसने खारतूम का किला जीता तब पचास हजार लड़ाके थे और उनके सारे आधुनिक हथियार ब्रिटिश सेना से छीने गये थे। इतिहास हमें सामाजिक विज्ञान, युद्ध विज्ञान के सारे सबक सिखाता है। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने सिर्फ़ एक ही सबक पढ़ा था। वह था आदिवासियों के गांवों को खाली कर वहां शरण पाये नक्सलवादियों को मार गिराने का पुराना नुस्खा। शासन का ख्याल था कि अगर ये गांव न होंगे तो नक्सलवादियों को जंगल में भोजन और आसरा नहीं मिलेगा। इन गांवों को खाली कराने का नुस्खा भी पुराना था। लालच, धमकी और हिंसा। तीन चौथाई गांव वालों ने अपना गांव छोड़ने से इंकार कर दिया। जिन्होंने छोड़ा भी था वे जल्द ही राहत शिविर नामक जगह में भूख-गंदगी-बीमारी से त्रस्त हो गये। इसके बाद शुरू हुआ इन गांवों तक रसद, दवाई, डॉक्टर न पहुंचने देने का ब्लॉकेड। 

आधुनिक मानव इतिहास में स्थानीय लोगों में से ही लड़ाके खड़ा कर उन्हें स्थानीय विद्रोह को कुचलने के लिये लगा देना भी आजमाया हुआ नुस्खा है। हर इलाके में दो तरह के निवासी होते हैं। एक वे जो शासनकर्ताओं से मिले होते हैं और शासन के लाभ में हिस्सेदार होते हैं। दूसरे वे जो शोषित होते हैं। बस्तर में भी अगड़े आदिवासी खेती और व्यवसाय अपना चुके हैं। पिछड़े आदिवासी अब भी आदिकालीन तरीकों से वनोपज पर जीवन यापन करते हैं। इन दो आदिवासियों में वर्ग शत्रुता भी थी, अमीर और गरीब वाली। सरकार को गांव खाली कराने की जल्दी थी। टाटा और एस्सार से एमओयू हो चुका था। नक्सलवादियों को जल्द खदेड़ने की चाह में सरकार समर्थक आदिवासियों को सलवा जुड़ूम के नाम पर हथियार दिये गये और उन्हें नक्सलवाद से लड़ने छोड़ दिया गया। 

दोनो ओर से हिंसा का तांडव चला। युद्ध के कोई नियम न थे। जिसके हाथ जो पड़ जाये हत्या और बलात्कार निश्चित था। लेकिन शुरुआती बढ़त के बाद जल्द ही सरकार और सलवा जुड़ूम के पैर उखड़ने लगे। दूसरी ओर अब तक नक्सलवादियों को केवल भय के कारण मिलने वाला सहयोग विशाल जनसमर्थन में बदल चुका था। हर अत्याचार की दास्तान के बाद नये आदिवासी लड़ाकों की फ़ौज भर्ती होने लगी। सरकार समर्थक आदिवासी और पुलिस किलेबंद कस्बों, थानों से बाहर निकलने में थर थर कांपने लगी। हालात यह हो गये हैं कि दिशा मैदान के लिये थाने से निकलना भी दूभर है। एक अनुमान के मुताबिक नक्सलवादियों के पास मौजूद हथियारों में से नब्बे प्रतिशत पुलिस से ही छीने गये होंगे। अत्यधिक तनाव और दबाव में जी रहे पुलिसकर्मी मौका मिलते ही ऐसे वीभत्स अत्याचार द्वारा आदिवासियों से बदला लेते हैं कि रक्तबीज असुर की तरह नये नक्सलवादियों की भरमार हो रही है। 

नक्सलवादी हों या पान सिंह तोमर के जैसे बागी, पैदा होते और पनपते शोषण की खाद से ही हैं। बस्तर मे शोषण का लंबा इतिहास है। एक समय मध्यप्रदेश के कर्मचारियों के लिये कालापानी समझा जाने वाला बस्तर धीर-धीरे ऐसे स्वर्ग में तब्दील हो गया जहां नाचने वाला मोर किसी के द्वारा देखा नहीं जाता। कागजों में बंटती दवाइयों, बनती सड़कों तक आदिवासियों के विकास के लिये आने वाली विपुल राशि की वीभत्स लूट आज भी जारी है। लेकिन ऐसे घपलों से आदिवासियों को फ़िर भी फ़र्क नहीं पड़ता था। फ़र्क पड़ता था पुलिस और वन विभाग से। दारू, बकरा और बेटियों की भेंट चढ़ाते आदिवासी त्रस्त थे। नक्सलवादियों के आगमन ने इन गांव वालों को आशा की नई किरण दिखाई। पुलिस का भय तो फिर भी था लेकिन फॉरेस्ट गार्ड पटवारी सब नदारद हो गये। सन २००० तक नक्सलवादी पुलिस से सीधे मुकाबले की स्थिति में आ चुके थे। इस वक्त तक नक्सलवाद को संभाला जा सकता था। ब्रह्मदेव शर्मा जैसे कई अधिकारी शासन को आगाह कर रहे थे कि शोषण बंद होने से नक्सलवादियों को जन समर्थन मिलना बंद हो जायेगा। लेकिन रमन सिंह के सत्ता में आते-आते बस्तर की प्राकृतिक संपदा पर उद्योगपतियों की नजर पड़ चुकी थी। टाटा एस्सार जैसी कंपनियों के साथ एमओयू करते ही रमन सिंह ने नक्सलवाद को थामने का सीधा रास्ता त्याग दिया था। इसके बाद तो शुरू हुई खदानों की बंदरबांट, आज जिन थानों में रसद हेलीकाप्टर के सिवा भेजी नहीं जा सकती वहां की खदानें भी रायपुर के दफ़्तरों में बैठ बांटी जा चुकी हैं। रमन सिंह का ख्याल था कि नक्सलवादियों को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचला जा सकता है। और आदिवासियों को विकास थमा उनकी खदानें लूटी जा सकती हैं। विकास बोले तो अच्छी सड़क, स्कूल, हैंडपंप।

"लेकिन रोटी कहां से आयेगा रमन बाबू?" इस सवाल का जवाब उनके पास न था न है। रमन सिंह एक ऐसे भ्रष्ट तंत्र के मुखिया हैं कि वे चाह भी लें तो भी उनका विकास नीचे नहीं पहुंच सकता। सलवा जुडूम और ग्रीन हंट जैसी तमाम तरकीबें ध्वस्त हो चुकी हैं। हम अखबारों में जिन नक्सलवादियों के मरने पकड़ाने की खबरें पढ़ते हैं उनमें से पांच प्रतिशत भी नक्सलवादी नहीं होते। वे या तो आम आदिवासी होते हैं या उनके सबसे निचले स्तर के कार्यकर्ता। उल्टे नक्सलवादी ही पुलिस को भ्रामक सूचनाएं दे निहत्थे आदिवासियों पर गोलीबारी करवा देते हैं। पुलिस का खुफिया तंत्र जन आधारित है ही नहीं। उसे आदिवासियों से लगभग कोई सूचना नहीं मिलती। पुलिस निर्भर करती है फोन टैपिंग और सैटेलाइट इमेज पर, जो जाहिराना तौर पर नक्स्लवाद से निपटने के लिये नाकाफी है।

अब आखिरी अस्त्र है सेना। लेकिन सेना भी इलाके कब्जा सकती है नक्सलवाद को खत्म नहीं कर सकती। कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक यही साबित हुआ है कि विद्रोह राजनैतिक समाधान से खत्म होता है हथियारों से नहीं। लेकिन कांग्रेस हो या भाजपा इनके लिये उद्योगपतियों का हित सर्वोपरि है। देश का मध्यमवर्ग नक्सल समस्या को समझता ही नहीं। उसकी नजर में नक्सली मतलब देशद्रोही। इस मध्यम वर्ग के लिये आदिवासी उनके इस देश का पार्टनर ही नहीं। इन आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार की बात रखने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता इन्हें देशद्रोही नजर आते हैं। मीडिया के लिये भी आदिवासी कोई अस्तित्व नहीं रखता। उनको विज्ञापन देने वाले बाजार का ये आदिवासी ग्राहक नहीं। तो यह मीडिया भी वही खबरें पेश करता है जो इस बाजार का ग्राहक मध्यमवर्ग पढ़ना चाहता है या अखबारों को धन देने वाली सरकारें पढ़वाना चाहती हैं। ऐसे में नक्सल समस्या जल्द निपटती नजर आती नहीं। इस समस्या का समाधान आज से ७० साल पहले ही गांधी जी ने दे दिया था। सत्ता का पूर्ण विकेंद्रीकरण। हर इलाके के लोगों को अपने संसाधनों का उपयोग तय करने का हक। जंगल, जल, जमीन आदिवासियों के हैं। अगर वह उसे नहीं खोना चाहता तो रायपुर और दिल्ली में बैठे सत्ता के ठेकेदारों को कोई हक नहीं कि वे उसे बेच दें।

अब हालात बहुत बिगड़ चुके हैं। जनप्रतिनिधियों की हत्या हो रही है। मध्यमवर्ग फिर बदले की आग में सुलग रहा है। मीडिया में आदिवासियों के पक्ष में बोलना गुनाह बन चुका है। सबका एक ही तर्क है कि लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखो। पर बस्तर के सुदूर जंगलों में लोकतंत्र पहुंचा हो तब न। लोकतांत्रिक तरीके सुझाये जाएं। ऐसा भी नहीं है कि सारे आदिवासी पाक साफ़ हैं, भोले हैं। ऐसा भी नहीं कि नक्सलवादी सिर्फ हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। स्थिति गड्डमड्ड है। कौन डाकू है और कौन हक की लड़ाई लड़ रहा है यह अंतर कर पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन जब तक भारत नामक देश अपना राजधर्म नहीं निभाता, आदिवासियों को उनका हक प्रदान नहीं करता, तब तक वह अधर्म के ध्वज तले युद्ध कर रहा है। और अधर्म की हार सदैव निश्चित होती है। रमन सिंह जॉर्ज ओरवेल के हाथी की तरह चंद सालों बाद "मस्त" की स्थिति और सत्ता उतरने पर जरूर मासूम नजर आ सकते है, लेकिन जो सत्ता में रहेगा उसका "मस्त" की स्थिति में होना तय है। शायद यही आदिवासियों की नियति है। मेरी तो एक ही विनती है, माननीय रमन सिंह जी सुधर जाइये। अब भी समय है। आप खदानें नहीं खोद रहे, देश के जवानों, नेताओं, नागरिकों और आदिवासियों की कब्र खोद रहे हैं।

(अरुणेश सी दवे खालबाड़ा नाम से ब्लाग लिखते हैं। उनका यह आलेख एभीटी के ब्लगा साइट से लिया गया है। दवे  जी से
runeshd3@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है )