31 Oct 2013

चला गया जिंदगी की धज्जियां उडाने वाला---


जेब अख्तर

तब कहानियों का ककहरा भी मालूम नहीं था। संजीव भाई कुलटी में रहते थे। उनकी कहानी अपराध छप चुकी थी। नए लिखने वालों पर उनका आतंक बरपा होने लगा था। हालांकि इसमें उनका दोष नहीं था। अपराध कहानी का आभा मंडल ही ऐसा था उन दिनों। इसके बाद सृजंय की कामरेड का कोट आई। अपराध सारिका में छपी थी और कामरेड का कोट हंस मेंं। संजीव से मिलने का बहाना तब तक नहीं मिला था। लेकिन संृजय से आसनसोल में मुलाकात का बहाना मिल गया। कहानियों पर बात होने लगी। फिर आसनसोल आना जाना शुरू हो गया। मकसद सिर्फ कहानियों पर बात। एक दिन सृंजय बिना बताए संजीव भाई के पास के ले गए। मेरी एक कहानी उन दिनों मित्रों के बीच जेर-ए-बहस थी। वो अभी लिखी ही गई थी। छपी नहीं थी। उस कहानी को संजीव भाई को दिखाया। उन्होंन तारीफ की। साथ ही कहा कि इसे हंस में भेज दूं। मैंने दो राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखकों के बीच था। मैंने आग्रह किया कि दोनों में से कोई एक नोट इस कहानी के लिए लिख दें फिर इसे हंस में भेजूं। अकेले कहानी भेजने का मुझे साहस नहीं हो रहा था। दोनों ने सख्ती से इस बात को नकार दिया। मरता क्या न करता। कहानी भेज दी। और इंतेजार करने लगा कि कहानी कब लौट कर आती है।
लेकिन १५ दिनों के बाद ही राजेंद्र यादव का पत्र आ गया। उन्होंने कहानी की तारीफ की थी। औ्रर कहा कि इसे प्रकाशित करेंगे। यह राजेंद्र यादव से मेरा पहला संवाद था। कहानी छपी और कई बड़े लेखकों की चि_ियां मिलीं। आसपास के कई मित्रों ने पूछना शुरू कर दिया कि हंस में छपने के लिए क्या करना पड़ता है। आज भी लोग इसी तरहर के सवाल पूछते हैं। मेरे अपने अनुभव पर शायद ही किसी को यकीन आता है। साहित्य में गुटबंदी और अखाड़ेबाजी की बड़ी-बड़ी बातें सुनते हुए दो दशक तो गुजर ही चुके हैं। लेकिन मेरा ये विश्वास आज तक हंस से खाद पानी पाता रहा है कि कहानी में कुछ भी होगा तो वो छपेगी जरूर। यहां मैं नाम नहीं लेना चाहता। लेकिन बड़े-बड़े नाम हैं जो ये मानने के लिए तैयार नहीं होते। बहरहाल। एक और प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा। मैने एक लंबी कहानी लिखी थी रात के राही। नक्सलवादी पृष्टभूमि पर। तब जितनी समझ थी वैसा लिख दिया। कई बार उसका पाठ हुआ। आसनसोल और धनबाद और बेरमो में। मित्रों को लग रहा था कि कहानी अधूरी है। चार साल लग गए थे उसे लिखते-लिखते। संजीव, सृंजय, सुवास कुमार, बृजमोहन शर्मा, मनमोहन पाठक, शिव कुमार यादव, गोविंद प्रिय, नरेंद्र, कृत्यांश, अजय यतीश और भी मित्र थे। जिन्होंने कहानी सुनी थी। सबकी राय थी कि फिर से लिखूं। मगर मैं बुरी तरह से ऊब गया था। बिना किसी को बताए राजेंद्र यादव को भेज दी। दूसरे ही महीने कहानी के साथ उनका नोट आया कि कहानी में ये ये कमियां हैं। मैंने उनकी बात मानते हुए फिर से उसे लिखा। फिर भेजी। कहानी फिर लौट आई। यादव जी अभी भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। मैंने दोबारा उसे भेजते हुए लिखा था कि एक कहानी पर कहानी कार का भी कोई अधिकार है या नहीं। फिर कहानी छपी। तीन लंबी कहानियों के साथ। हेमंत और नरेन के सथा। यहां यह जिक्र इसलिए कि लोग कहानियों के छपने के मसले पर राजेंद्र यादव पर क्या-क्या आरोप लगाते नहीं थकते। लेकिन मैं अपनी ही कहानियों के माध्यम से जानता हूं कि वे कहानियों को कितनी गंभीरता और गहराई से लेते थे। वो भी एक नए लेखक की कहनी को।
संगमन की एक गोष्ठी में उनसे मिलना हुआ। साल याद नहीं है। शायद ९४-९५ का साल रहा होगा। चित्रकुट में। तीन दिनों तक देश भर के लेखकों का जमावड़ा। चित्रकुट के घाट और कहानियों पर बहस। साथ ही राजेंद्र यादव को अलग-अलग तरीके से घेरने की कोशिश। फलां कहानी में क्या था, जो हंस में छप गई। आप लेखिकाओं को ज्यादा तरजीह देते हैं? कहानकारों को पारिश्रीिमक क्यों नहीं देते। ऐसे न जाने कितने मुद्द। राजेद्र यादव सबका जवाब देते। कभी-कभी खीझते तो कहते- सालों तुम सबको सिर्फ कहानी लिखनी है, मुझे हंस भी चलाना है। अब अखबार में हूं तो अंदाजा होता है कि वे कितने सही थे।
देशभर में न जाने कितनी पत्रिकाएं शुरू होती हैं। बंद हो जाती है। लेकिन हंस निरंतर छपता रहा। कई बार इसके बंद होने की उम्मीद बहुत नजदीक पहुंच गई। मुझे याद है एक बार दिल्ली के दफ्तर में उन्होंने कहा था, मेरे जीते जी हंस कभी बंद नहीं होगा। तब वे दफ्तर में अकेले थे। हम दो-तीन दोस्त थे। शायद उर्दू के खुर्शीद अकरम और मुशर्रफ आलम जौकी भी थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है। बहरहाल हमारी बातचीत का प्रसंग इससे अलग था। अचानक हंस को लेकर उन्होंने ऐसा कह दिया था। तब हम सभी को अंदाजा था वे हंस को निकालते ही नहीं थे उसे जीते भी थे। हंस एक नशे की तरह उनके दिमाग पर छाया रहता था। दिल्ली से लौटकर मैंने कुछ सालाना खरीदार बनाए थे। राजेंद्र यादव के साथ बहुत कुछ चला गया है। साहित्य को स्टरडम में बदलने से लेकर दलित और स्त्री विमर्श के अविष्कारक के रूप तक में वे याद किए जाएंगे। मगर एक जो चीज बार-बार खलेगी वो है उनकी बेलौस हंसी। आज सचमुच का हंसना बहुत दुर्लभ होता जा रहा है। ऐसे समय में उनकी हंसी मानो हंसने को परिभाषित करती थी। मेरा अपना तजुर्बा है कि ऐसी हंसी हंसने के लिए आत्मविश्वास, हिम्मत और ईमानदारी चाहिए। अब इंटरनेट के जमाने में ये चीजें तो महंगी होती जा रही है। हर कोई के बूते की बात नहीं इनको गले लगाना। अपनाए रखना। मेरी नजर में राजेंद्र यादव इसलिए वरणीय बने रहेेंगे। मैने एक बार हंस के दफ्तर में ही उनसे इस हंसी का राज पूछा था। तब उन्होंने फिर से एक ठहाका लगाते हुए कहा था, जिंदगी को समझते हो। मैने कहा, इस सवाल के पीछे तो सुकरात और बुद्ध तक भटकते रहे। मगर शायद ही उनको भी जवाब मिला हो। उन्होंने कहा था, यही सबसे बड़ी समस्या है---- यार जिंदगी को समझने की कोशिश मत करो----जितनी हो सके इसकी मां बहन करो। ये मंत्र कम से मेरी समझ में आज तक नहीं आया। नतीजा भी सामने है। हंसने के लिए दिनों का इंतेजार करना पड़ता है। कभी हफ्तों और महीनों भी लग जाते हैं। कभी-कभी याद नहीं आता कि पिछली बार कब खुल कर हंसे थे। बहरहाल अर्चना वर्मा ने ठीक ही लिखा है- जिंदगी की धज्जियां उड़ाने वाला लेखक चला गया। आज इतना ही।

28 Oct 2013

MAKING YOUR FIRST FILM

अपनी पहली ही फिल्म गिप्पी से चर्चे में आई निर्देशक सोनम नायर बता रही हैं कि फिल्म बनाने के डर को कैसे मात दिया जाए। अपनी पहली फिल्म बनाने से जुड़े अनुभव को उन्होंने अपने ब्लाग चिंकी चमेली पर शेयर किया है। ये पोस्ट वहीं से कॉपी पेस्ट है। 

There are things people tell you, and things people just let you find out on your own. When I decided that I would like to direct films for a living, I was 13 and had no idea what a director actually does. Now, after having directed a film, I feel like I know only about a 10% of what it means to be a director. I guess it’s better than zero!
So, I thought, maybe I should do something no one did for me- write about what you might think making a film is like vs what actually happens.

The Idea
If you start off thinking you’ll make a film that’ll bring Shah Rukh Khan and Aamir Khan together finally, that’s set in New York with one song in Paris and one in Switzerland,  with Kareena, Katrina and Deepika and an item number by Priyanka, chances are… your film is not going to get made. You need to start small. You haven’t made a film before, so it’ll be easier for a producer to trust you with 5 crores instead on 50.
Also, don’t write a script that you think will be a hit and therefore get producers interested. Write what you are most passionate about, because you only get to do that in your first film. After that, you’ll get polluted with the ‘business’ of movies and stop thinking only from the heart. Write from your life, your experiences, your world- not a script that anyone could have written. One of the reasons I got to direct my film was because it was so personal that it was obvious that I should be the one to make it.

After the First Draft
Don’t think that once you’ve typed the words ‘The End”, the script is ready for the world to see. It’s not. If you want to make a film, chances are you have been working in films for a few years and have a few friends in the industry now. So give out the script to a select few of these- your fellow ADs, maybe an editor you got friendly with during the post-production of your earlier film, maybe a dialogue writer you found interesting. Just make sure you have registered your script and mention the fact that you have before giving it out.  Take their advice, write a second draft, then give that out to more people. Be very careful about people’s responses. If they’re being generic and polite, they might not have liked it. By the time you’ve heard feedback from about 10 people, you’ll have a pretty good idea of whether the script is working or not. If you think it’s working, give it out to someone you respect. The director of your last film, an actor you got friendly with, another scriptwriter- someone in the power to get your film to the next level. If they love it, you know you’ve got something there.

Meeting Producers
I was extremely lucky that the first producer I went to said yes to my film, but that might not always happen. It helps if you have someone backing your script. An actor, another director, someone close to the producer, someone whose opinion is important. If you don’t have that, then your script will first go to the script-reader, and that’s a very long and unreliable process. So make sure you get someone on your side before you go to 
producers.
Don’t go to several people at once. The industry is small and you don’t want people talking about your double-dealings. Go one by one, starting with whoever you think you have the best chances with. It’s always helpful if you’ve been working for the same production house for a few years instead of hopping around. But often, people work with one house and get produced outside it- so there’s no one formula. If a producer says he likes your script but wants more time to think about it, give it a couple of months and then ask if you can show it to other producers. You don’t want to get stuck for a year and then get rejected. Always keep your options open.

You’re On!
If you get your project greenlit, congratulations! You might want to celebrate and enjoy it, but you’ll probably enter a state of panic. The reality that you’re actually going to make a film is terrifying. You’ll think of everything that can go wrong. You’ll start worrying about your health. You’ll start drinking green tea and  driving more cautiously. Let this phase pass. Don’t make any rash decisions about the film till about 2 weeks after it’s been picked up. Then- go all out! Start putting your team together- your team can make or break the film. Meet as many people as you can. Don’t think some people have too much experience and some too little. Meet whoever you think is talented, pitch to whoever you would love to work with. You might hear a few no’s but so what? You got a Producer to say yes, and others will follow soon. Don’t leave room for regret. I always thought my film was too small for a lot of people in the industry whose work I admired, and now I wish I had at least met them. Even if they can’t do your film, each meeting will make you a little wiser, and you might get great tips from the people you admire. One important thing- be humble. You might be the director, but these people have a lot of good work behind them- so learn from them. Finally, take people who respect you and won’t overstep your position. I have heard of many cinematographers or actors or editors who try and take over the film, thinking the director doesn’t know anything. Don’t let your film slip away from your fingers.

Putting It All Together
Now that you’ve got yourself a Cast, a Cinematographer, a Production Designer, a Costume Designer, a Music Director, and a First AD, it’s time to bring everyone together and share your vision with them. Don’t doubt yourself at this point. You have written the script, and you know more about it than any of them do. But this time is more crucial than people might think- because it’s very important that everyone is on the same page. You might think they get it, and they might think they get it- but everyone might be making their own movie in their heads. So… extra-simplify! Don’t talk about things… SHOW them. Make a giant folder of references. Put in everything you can think of- the color of the fabric you want in this scene, the size of the kettle you want in that scene, the way you want sunlight to fall on the actor’s face in the other scene. Nothing is too small to put in here. Put videos, songs, pictures, websites, artwork, whatever you can find. I used a lot of my pictures from childhood to give everyone a sense of the emotional world of the film. Be open to suggestions at this point, it’s only talk so just let it flow. Let others bring their own references and see if they’re close to yours or not. Meet your HODs (Heads of Departments) as often as you can. Read every scene with your actors, once, twice, three times. If you have time, make storyboards. One thing though- don’t let anything you decide at this point become too rigid in your head. Everything will change when you actually shoot things, but this prep will not go to waste, believe me.

Shooting
Easily the most exhilarating part of the whole process, and also the most harrowing. You might not sleep before the first day of your shoot, but try not to over-think it and put too much pressure on yourself. Start with the easiest shots first. I did a whole day of inserts when I began. Hand on clock, Object on table, Sign on door. It really helped me get into the zone. Everyone is finding their groove so don’t expect perfection straightaway. Just concentrate on keeping a good environment on set, because once that is in place, work will happen smoothly from here on. Don’t let fear, confusion or frustration spoil your mental peace. If you feel any of these brewing, take 5 minutes off. Remember, you have all the answers, and there is no right or wrong. Plus, you have a team to help you out. And don’t be afraid to admit that you’re not sure about something or can’t figure it out. It’s better to ask for help than make the wrong choices.
The most important thing to remember while shooting is that nothing will go as planned. Start with that, and you won’t be thrown off by the million problems that arise. Your job is to make the best of any situation and keep the show going. Don’t compromise on everything the first time a problem crops up, but also keep in mind that you’ll have to let go of a few things to get the rest done. It’s good to have a backup plan, especially on problematic days with lots of background actors or heavy equipment. However, when you do solve the problem and get the shot, it’s the best feeling in the world! So work towards that.
Not to be an aunty about it, but try and recuperate after the shoot on your own. Don’t hang out too much with the cast and crew. You need to brew over the day’s shoot and mentally prepare yourself for the next day. No one else is under the same pressure you are, so even if you hear everyone talking and laughing down the hallway, resist the temptation and go to sleep! You need to rest your mind, and cut off for while.
One tip- you should review your work during shoot.  Keep an editor on set to put together rough edits of the scenes you shoot- it’ll help you a lot in the long run. Even if you see the scenes every 3-4 days, just watching the scenes will help you see the drawbacks while you can still fix them. If your gut says that a scene isn’t working, try and reshoot it while you’re still at that location. You might not get to go back once the film is in post-production.
And lastly, don’t forget to ENJOY YOURSELF! Laugh when you’re shooting a funny scene, cry when you’re shooting an emotional one, and dance your butt off when you’re shooting songs. If you don’t feel it, how will you make others feel it? You won’t get to shoot another film for a long time, so make the best of these days!

What Have I Done?
Once the shoot is over, the most nerve-wracking phase begins. When you look at what you’ve shot, you’ll invariably think that everything looks horrible and nothing is working and that you’ve ruined your film. Relax. Cut off for a while. Let your editor go through the footage, assemble some scenes, try and get all the beats right- while you take a mini-vacation. Then come back with fresh eyes and look at the footage. Focus on getting each scene working first, and then worry about the length or scope of the entire film. Once you’re more or less satisfied with each scene, then put them all together and watch the whole film. This will make new problems stand out, but most things can be fixed on the edit. Don’t look at scenes bare. Put reference background music wherever you feel the need to. Don’t hold back with the music- there’s no copyright issue yet so go all out! Later, you can help recreate the same feeling with your Background Music Director.
Once you have a satisfactory first cut, ask a few people close to you to give some feedback on it. Don’t invite the whole world yet, the film is at a vulnerable stage and you don’t want people to form rigid opinions about it yet. If your friends have more or less the same few pointers, work on that, and then call them again. If they seem satisfied, start calling in more people. I called in hoards of people of different ages, professions and walks of life. Sometimes they’ll give you bizarre feedback, but you’ll find out the fundamental problems if they keep coming up in every screening. And every now and then, someone gives a brilliant suggestion that can swing things around! Don’t let criticism get you down, it’s better to hear things now and fix them than hear them later once the film has released.

Deadlines and Madness
Once your edit is locked, a period of complete chaos begins. Even if you do everything on time, you cannot account for the 100 new things that crop up, and of course everything has to be done NOW and done PERFECTLY. There is background music, DI, VFX, Sound mixing, Dubbing, Subtitling, Censoring, Publicity, Trailers (theatrical trailer, music promos, dialogue promos, 30 seconder, 20 seconder, 15 seconder), DEATH! You’ll have to take a hundred calls a day from things like the order of the opening credits, to which dialogue promo should go out first, to what your actors should wear in a last minute publicity shoot, to what the font of the ‘intermission’ should be like. It’s exhausting and you don’t have time to dilly-dally, so you just have to trust your instincts and keep ticking off the boxes. There’s no point in trying to be healthy, or get enough sleep during this time. You’ll probably skip lunch every single day, smoke a pack of cigarettes even if you’re not a smoker, and have 2-3 tearful emotional breakdowns. Just remember to keep going, no matter what. The end is near and your very own film will release all over the country!! That’ll make it all worth it.

Looks Like We Made It!
Your baby is out! You’re a mother now! (Yes, even the men!) All that buildup and hard work and emotional trauma, it has all been for this one day, right?! What happened? What was the opening? What are the reviews? What was the overseas response? What does my producer think? What do I do now? CALM DOWN. Don’t sit and think that your world is going to change the day your film releases. It’s not. If you’re very lucky, you’ll go to the theater and see a house-full board and hear people laughing and clapping inside. But don’t make this day about that. Make it about taking your friends and family to watch the film. Your friends will whistle when your name comes on screen and your parents will cry every 5 minutes, filled with pride and joy. That is what will make this day special. Or go alone and buy a ticket for your own film. It’s the best feeling in the world. Take the day to pat yourself on the back for having done what thousands of people yearn to do in this country. Go watch it with a real audience everyday. Feel your heart swell up with pride every time they laugh or cry. That’s what making films is about, right?
If your film does well, you’ll get calls and texts from people in the industry. You’ll get invited to a few parties. You’ll get nominated for some awards. If it doesn’t do well, you’ll get a lot of people saying ‘Oh you made that film? Sorry, I haven’t seen it yet but I’ve been meaning to catch it.’ You’re not an actor, so no one will recognize you on the street and tell you whether they liked your film or not. Whatever response you get from the general public will be limited to Twitter and Facebook and Youtube comments. After a couple of months, people will move on to the next crop of films and yours will be one of the many films that came out that year.  Either way, your life won’t change drastically. You might move to a bigger apartment or buy a new car, but the money will run out soon, so you’ll have to be careful with it.
The few weeks after the film’s release are the worst. Your hectic life suddenly feels empty. You stop getting hundreds of calls a day about deadlines and requirements, and the phone occasionally beeps when someone sends you a nice message about your film. Or VMCallertunes wants you to buy a new ringtone. Take this time to take account of everything you learned from this film, what your strengths and weaknesses are, what you would like to do differently next time around, and thank the lord that your film actually made it to the theaters! Then… stop thinking about it. You’ve thought about your film for a looooong time now, and you need to stop. Go away somewhere. Meet new people who have no connections to films. Read books. Watch entire seasons of TV shows in one day. Wash yourself off the film, so you can start thinking about the next one with a clean state of mind.

Aftermath
Making films is, I think, the best job in the world. I have never been as happy as I was during the making of my film. Every problem seemed small, every setback manageable, when I just sat back and thought, ‘Wow, I’m making my own film!’ But I’m not going to lie, it really takes a toll on you. You put everything you have in your first film- blood, sweat, tears and all your heart. And yet, to the rest of the world, it’s just another film. It might be a good film, a successful film, but it isn’t the most important film of their lives. Don’t let that deter you. Your first film should never be about the destination, because it will be the journey of a lifetime. And you only get to go through it once. So if you don’t put everything you’ve got into it, you’re going to regret it for the rest of your life.
Now, I’m going through the immense anxiety of starting my next project. Putting too much pressure on every little idea, second-guessing myself at every step and analyzing everything way too much. I yearn for the simplicity of when I did this the first time around, when just getting the film made was the most important thing. Cherish that innocence, it gets snatched away pretty soon. But whatever happens next, I can always put my Gippi DVD on, watch my first baby come alive and smile that I got to do this. And no one can ever take that away from me.
With all my love and wishing you all the luck in the world,
Sonam Nair

11 Oct 2013

How to Make a Movie in Rs 95,000

Lhendup G Bhutia 

A few months ago, authorities at PVR Cinemas informed Kenny Basumatary that they would screen his indie Assamese production Local Kung Fu across the country, but he would have to redub the dialogue in Hindi. With no money to hire a recording studio in Mumbai for this purpose, he created his own. Using large thermocol sheets, reinforced by bed-sheets and held together with a framework of pipes, he created something of an acoustic box large enough for a person and a microphone to fit in.
“It wasn’t ideal,” Kenny’s brother Tony remembers, “but it kept out external noise to a large degree and retained most of what the person inside would say.”
For a few weeks, this box occupied the living room of the modest apartment he shares with his brother and sister-in-law in Malad, a distant suburb of Mumbai. Eventually, PVR authorities had a change of heart and 32-year-old Kenny did not have to employ his contraption. Believing it would work best in its original language, they decided to screen it in Assamese itself.
The film released in Mumbai, Pune, Kolkata, Ahmedabad, Chennai, Delhi, Gurgaon and Guwahati on 27 September, becoming the second Assamese language film, after Jahnu Baruah’s Baandhon earlier this year, to have a release outside Assam. But what is striking about Local Kung Fu is how it was made. While Baandhon was made by the accomplished National Award-winning Baruah and produced by the state via Assam State Film Finance & Development Corporation on a budget of Rs 50 lakh, Local Kung Fu was made by a group of amateurs for exactly Rs 95,000.
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About four years ago, the film’s lead actor, director, scriptwriter, producer, editor and sometimes cameraman Kenny Basumatary participated in a scriptwriting workshop in Mumbai called Sankalan. He had moved to Mumbai to push for a career in films, after having quit his job as a newsreader for an Assamese news channel, and, prior to that, having dropped out of IIT-Delhi, where he was pursuing computer engineering. The organisers of the scriptwriting workshop were to develop the top three scripts into films. His script for a martial arts-based film did not make it past the top six.
After this experience, he appeared in a number of commercials, TV soaps, and a few blink-and-miss roles in Bollywood films like Shanghai and Phata Poster Nikla Hero. He has a larger role in an upcoming Mary Kom biopic. Hoping that perhaps a producer would fancy adapting a book and hire him either as its scriptwriter or director, he authored a book, Chocolate Guitar Momos, which was published by Westland in 2011.
“I came to realise that no producer was going to show up at my doorstep anytime soon. If I wanted to direct a film, I would have to put in my own money,” Kenny says. When he moved to Guwahati temporarily, his mother offered him Rs 60,000. With an additional Rs 35,000 that he had saved, he decided to make what he calls an ultra-low-budget film for the internet. “Before doing anything else, I sat down and calculated how much money I had and how much I could allocate to various departments,” he says. The most expensive and important purchases, he knew, would be the camera equipment. A Canon 550D, which resembles a camera for still pictures ratherthan videos, cost him Rs 44,000. Additional costs included Rs 11,000 for a 55-250 mm lens, Rs 5,000 for a Rode VideoMic, and another Rs 7,000 for smaller purchases like memory cards, battery, filters, etcetera. “This left me with only Rs 28,000 for actors, props and whatever other expenditure,” he says.
To work around these limitations, he decided to shoot the film in Guwahati.
He approached his friends and family to act in the film for free. That way, he could also use their homes as sets. One of Kenny’s uncles, credited as ‘The Master’ in the film, was a martial arts instructor in Guwahati for over two decades. He could choreograph fight sequences and his students could act as fighters in the film. “I knew that my strong point was martial arts. So I decided to make a kung fu film with about six or seven fight sequences. I then wrote a story revolving around these fights. What I had in mind was something like the old Jackie Chan films which did not rely on cables or elaborate stunts. Just simple and well-choreographed fight scenes,” he explains.
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Apart from Kenny, who plays the lead role, four of his cousins, two uncles, two aunts, his 80-plus grandfather, and his brother Tony are all part of the film’s acting cast. The others are mostly his uncle’s students. The highest paid actor in the film is its female protagonist, Sangeeta Nair. She was signed on for Rs 3,000. “One of my friends, who was also Kenny’s acquaintance, approached me for the film. I had missed many opportunities in the past because I was too lazy to try them out,” she says, not explaining what those opportunities were. “This time I thought I would at least audition for it.” A few days after the auditions, Nair, who then worked as a newsreader on an Assamese channel, got a call from Kenny telling her she’d been cast.
To ensure that the fight scenes looked convincing, they were meticulously practised. A scene involving two people and six moves would be rehearsed for at least three mornings, three hours each. Longer and more complicated fight scenes would require more practice. An additional Rs 2,000 was spent in purchasing various types of pads and guards to protect fighters from injuries.
However, this did not stop the film’s only mishap from occurring. In one scene, Kenny is to be beaten by a villain. Both of them are to jump towards each other, and Kenny is to receive a kick on his chest mid-air. In the first take itself, Kenny received the kick on his inner right thigh, keeping him away from the shoot for over two weeks. After about 28 takes, they eventually perfected the scene. It turned out so well, he says, that they used it as the film poster’s lead visual.
In the initial stages, the biggest challenge, Kenny says, turned out to be technical. “Since I have never worked with cameras before, I didn’t know how to deal with highlight burnouts on sunny days, where some part of the frame would be bright but another part dark. I read up online and asked a few friends who worked as DoPs (Directors of Photography). That’s how I learnt I needed to use Neutral Density filters. For quick-paced action scenes, I learnt through trial and error that I needed to use high shutter speeds,” Kenny says.
Nair proved invaluable not just for her acting but also her suggestions. One of the key effects Kenny wanted in the fight scenes was for puffs of dust to appear on impact whenever someone was kicked or punched. “Everyone does it in Bollywood and it looks good,” Kenny says. “But I trawled the internet, asked friends, [and] nobody knew how to do that.” They tried rubbing their hands and sweaters in dust, immersing these items in talcum powder and chalk, but it didn’t generate the desired effect. Says Nair, “That’s when I asked them, ‘Have you tried multani mitti?’” None of the boys had heard of it. Multani mitti, or fuller’s earth, is a clay-like material used for face-packs to deal with acne and blemishes. It proved to be the ideal material.
Since most of the actors were either students or did other jobs, a crucial aspect of the process turned out to be coordinating schedules. “I kept a diary and I would note down each individual’s schedule. Some would have school classes, guitar classes, and some would have day jobs. So I would have to work out various combinations of schedules,” Kenny says. Actors were encouraged to eat at home. “Once when I reported to the set for a morning shoot without having had my breakfast, I was offered two boiled eggs,” Nair says.
The film was completed in 2011. Kenny’s brother Tony, who works as a music arranger in Mumbai, composed a background score for the film, and Kenny edited the film by himself at home. He submitted it to a few festivals on a lark. One of the festivals to screen it was the 2012 Osian’s Cinefan Film Festival. Believing it to be commercially viable, Mumbai-based entrepreneur Durlov Baruah approached Kenny earlier this year with a plan to release it in theatres. Baruah has so far spent about Rs 2 lakh converting the film into digital format for PVR Cinemas and marketing it online.
During the shooting of the film, Tony fell in love with Nair. They have since gotten married and moved to Mumbai. In a bid to promote the film before its release, Kenny has moved to Guwahati to give interviews and arrange screenings. Through various connections, he has also shown the film to well-known names like Anurag Kashyap, Dibakar Banerjee and Navdeep Singh. Some, like Mieyang Chang and Adil Hussain, have put up video testimonials for the film. Meanwhile, Tony and Nair are holding forth in Mumbai. They expect to hold a press screening soon. “What happens at a press screening? Tony asks me. “Do you think I can learn about it online?”

(Courtesy : Open Magazine October, 2013)

ट्रेन टू हिंदुस्तान

 जेब अख्तर


जावर खान। हां. बाद में यही नाम बताया था उसने अपना। मुझे याद है जब वह कोच की ओर आ रहा था, तब दूर से वह ऐसा दिखाई दे रहा था जैसे कोई छोटा-मोटा पहाड़ अपने पैरों से चल कर आ रहा हो। व्हील चेयर के साथ सरकता हुआ। धीरे-धीरे। रेंगता हुआ-सा। खाकी रंग के पठानी कुरते पायजामे में उसका कद और भी चौड़ा और लंबा दिखाई पड़ता था। चेचक के धब्बों से भरे चेहरे पर घनी और बेतरतीब दाढ़ी, बड़ी-बड़ी आखें। जैसे कई रातों से ये सोई नहीं हों। अजीब थी उसकी आंखें। कोई नरम दिल इंसान अगर उन्हें अंधेरे में देखे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूु कि वो डर जाए या होश खोए बिना नहीं रह सकता। हां, माथे पर से गरदन तक झूलते लंबे सीधे बालों के साथ उसकी आंखे ऐसे ही चमकती थीं। लगता था, उन कई रातों की उनींदी आखों में पानी की जगह खून बह रहा हो। तभी तो, वह अभी भी लाल दिखाई दे रही थीं। कभी बुझती और कभी लौ उगलती चिंगारी की तरह। उसके उसके साथ कोई और था जो व्हील चेयर पर लेटा हुआ था। कंबल से लिपटा हुआ। ऊनी और गहरे रंग के कनटोप से उसका चेहरा लगभग पूरा ढंका हुआ था।
हम सब ने उसे ध्यान से देखा था। मैं, संदीप, अमर और अविनाश ने। करांची स्टेशन के प्लेटफार्म पर चलते हुए अब वो हमारे बिल्कुल करीब आ गया था। व्हील चेयर पर लेटे उस बीमार आदमी का चेहरा बदस्तूर ढंका हुआ था। हम चाह कर भी उसे और ज्यादा नहीं देख पा रहे थे। सो हम सभी का पूरा ध्यान और हमरी पूरी जिज्ञासा जावर खान पर केंद्रित हो गई थी। हमारी जिज्ञासा तब और बढ़ गई थी, जब वह हमारे ही कूपे में सवार हुआ था। अपने मजबूत और लोहे जैसी खुरदरी-चौड़ी हथेलियों से उसने बिना किसी की मदद लिए उस बीमार आदमी व्हील चेयर समेत अकेले ही प्लेटफार्म पर से कोच में चढा़ लिया था। हालांकि हमारा दल उसकी मदद के लिए तैयार बैठा था। बस उसके एक इशारे या कुछ शब्दों की जरूरत थी। प्लीज, थोड़ी मेहरबानी करें, भाई साहब...ऐसा ही कोई औपचारिक शब्द वह बोल सकता था। मगर उसने नहीं कहा था। हां, व्हील चेयर पर से अपने मरीज को उठाते हुए वह थोड़ा झल्लाया जरूर था, अमां चलो यार --- रेल अब चलने वाली है। बीमार होने का यह मतलब नहीं कि मैं ही तुम्हें हर जगह उठाता फिरूं---
और देखते ही देखते उसने मरीज को पूरा का पूरा उठा लिया था। अपने कंधों पर। हमारे सामने के ऊपर वाले बर्थ पर उसे बड़े सलीके से सुलाकर  कंबल से ढंक दिया था। इससे फारिग होने के बाद वह हांफने लगा था। कमीज के आस्तनीने को कुहनियों तक चढाते हुए उसने बाकी का सामान वहीं पटक दिया था। फिर ढेर सारा झाग उगलते हुए जैसे अपने-आप से कहा था, बेनचो---रेशमा ने मुझे फंसा दिया---साली छिनाल----खुद तो गुलछर्रे उड़ा रही होगी और मुझे यहां फंसा दिया इस मुसीबत में ---आन दे मुझे वापस---बेनचो---रेशमा की तो मैें----बोलते-बोलते वह अचानक रुक गया था। शायद उसे ख्याल आ गया था कि वह कोच में अकेला नहीं कई लोगों के बीच है। हड़बड़ी में व हमारी तरफ देखने लगा था। हमने खिडक़ी से बाहर देखते हुए उसने न देखने और न सुनने का बहाना किया था।
तभी अविनाश ने मुझे कुहनियों से छूते हुए कहा था, सुधीर भाई मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मुसलिम आतंकवादी ऐसे ही होते होंगे। इतना ही ताकतवर---कद्दावर---इतना ही दिलेर----
क्यों --- आतंकवादी होने के लिए इतना कद्दावर होना जरूरी तो नहीं है, ---- वो तो कोई भी हो सकता है एक दुबला-पतला आम सा आदमी या मासूम चेहरे वाला कोई शख्स क्यों नहीं हो सकता आतंकवादी----
अविनाश आगे कुछ कहता कि इससे पहले ही उसे खामोश हो जाना पड़ा था। क्योंकि अब वह हमारे सामने ही, नीचे की बर्थ पर बैठ गया था। हालांकि वह बर्थ हमारा था. लेकिन हम खामोश थे। उस वक्त मुझे शर्मिंदगी महसूस हो ही रही थी। २५ लोगों का हमारा दल हिंदुस्तान से पाकिस्तान आया था। दोनों मुल्कों के बीच बेहतर रिश्तों के लिए जमीन तैयार करने। आपसी मेलजोल बढ़ाने और रोज ब रोज खराब होते जा रहे हालात को पुरसकून बनाने के लिए। इस दल में पढ़े लिखे लोग थे। कलाकर, पत्रकार, कारोबारी और राजनीति से संबंध रखने वाले। १५ दिनों में हमने कई मीटिंगें की थी। पाकिस्तान के कई शहरों में गए थे। कई लोगों से मिले थे। जो हमारी ही तरह सोचने-समझने वाले थे। लेकिन हासिल सिफर रहा था। १५ दिनों के इस दौरे में हमें कुछ हाथ नहीं लगा था। हमारी गतिविधियां अचानक रोक दी गई थी। दल के लीडर अहलूवालिया साहब दो दिन पहले ही लौट चुके थे और हम मायूस, उदास और लटके हुए चेहरे लेकर पाकिस्तान से अब लौट रहे थे।
पूछने पर आहुलिया साहब ने बताया था, सीमा पर अचानक तनाव बढ़ गया है। विदेश मंत्रालय ने फरमान जारी किया था कि पाकिस्तान गया डेलीगेशन जितनी जल्दी वापस हो सके, अपने देश वापस लौट आए। दोनों मुल्कों के बीच की बातचीत अगली घोषणा तक के लिए टाल दी गई थी।
उस पूरे दौरे में कहीं कुछ सकारात्मक हुआ था तो यह कि चालीस सालों से बंद दोनों मुल्कों के बीच चलनेवाली एक मात्र रेल गाड़ी आज ही शुरू होने वाली थी। हमारा दल इस एतिहासिक घड़ी का गवाह बनने जा जा रहा, यह भी कम रोमांचित करने वाला नहीं था। लेकिन यह सब पहले से तयशुदा प्रोग्राम के तहत हो रहा था। दोनों देश की सरकारों ने भारी दबावों के बीच चालीस साल बाद रेल परिचालन को स्वीकृति दी थी।
करांची स्टेशन पर इस समय  पुलिस, कस्टम, सीमा सुरक्षा बल की अलग-अलग टुकडिय़ां तैनात थीं। दूसरी ओर कुछ बड़े राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने झंडे को लहराते हुए पल्टफार्म पर यहां से वहां नारे लगा रहे थे। अपने ही मुल्क की तरह। सियासी पार्टियों में इसका श्रेय लेने की  होड़ लगी हुई थी। स्वार्थ का चेहरा कैसे हर जगह एक-सा  होता है - मैं सोच रहा था।
रात के दस बज चुके थे। यानी गाड़ी के खुलने का समय नजदीक आ गया था। हमारे दल को करांची से खोखराजार होते हुए सिंध और रेगिस्तान में दो रातों का लंबा सफर तय कर इस रेल से हिंदुस्तान आना था।
गाड़ी को दूसरे दिन सुबह पांच बजे उदयपुर पंहुंचना था। यानी इस डिब्बे में जावर खान के साथ हमें दो रातें गुजारनी थीं। मैं मन ही मन आश्वस्त था कि जावर खान इतने समय में अपने बारे ंमें जरूर कुछ न कुछ बताएगा।
गाड़ी रात के अंधेरे को चीरती जा रही थी। बाहर थार के रेगिस्तान का साम्राज्य फैेला हुआ था। थार का यह हिस्सा शायद हैमाडा शैली का रेगिस्तान था। पथरीला और चट्टानी पठार जैसा। दोपहर की धूप में रेत के कण मखमली चादर की तरह चमक रहे थे। कुछ दूरी पर रेत की एक पतली सी चादर, बेचैन और आतुर, सतह से उठती हुई दिखाई दे रही थी। इससे एक बहुत महीन मगर तीखी आवाज सुनाई दे रही थी, रेत के कणों के आपस में टकराने की। और दूसरी तरफ रेत के उड़ते हुए गुबारों के झुंड जैसे खुद से ही स्पर्धा कर रहे थे। और ठीक उसी समय रेत के टीलों के पीछे से बाज या गिद्धों का एक झुंड उड़ता हुआ हमारे सरों के ऊपर आ गया था। गाड़ी की रफ्तार के साथ वे भी उड़ रहे थे। कोलाहल भरी डरावनी आवाज के साथ। उनमें से एक ने अपने पंजों में मांस का एक बड़ा-सा टुकड़ा दबोच रखा था। इस टुकड़े को झपटने के लिए उनमें आपस में तकरार हो रही थी। उनका शोर, वातावरण को और भी कर्कश बना रहा था। सुना था किसी जमाने यह इलाका सोन चिरैया के लिए जाना जाता था। दूर-दूर से सैलानी उन्हें देखने के लिए आते थे। लेकिन अब न सोन चिरैया दिखाई देती थी उनकी मधुर आवाज सुनाई पड़ती थी। थार के विस्तार ने उनके आकाश को छीन लिया था। और हमारे हिस्से बचे थे यही गिद्ध, बाज, उकाब, चील और लंबी चोच और पैर वाले हिंसक शिकारी पक्षी। मैंने उपर बर्थ की तरफ देखा था। जावर को शायद उपर का एक ही बर्थ मिला था। वह बीमार आदमी के लगकर पीठ टिकाए उपर की बर्थ पर बैठा था। और लगातार बीडिय़ां फूंके जा रहा था। बीच-बीच में उसके मुंह से गालियों जैसे शब्दों का निकलना का बंद नहीं हुआ था। अविनाश, अमर और संदीप सो चुके थे, लेकिन मेरी आंखों मेंं नींद नहीं थी।
रात के बारह बज रहे थे। तभी जावर अपनी सीट से चौंक कर उठा था। कुछ वर्दीधारी बोगी में आए थे। पुलिस अफसरों के सामने उसे मैंने पहली बार देखा था। उसके चेहरे का रंग अचानक, तेजी से बदल गया था। घबराहट से भरपुर। अफसर ने कडक़दार आवाज में उससे पूछा था,
कहां से हो---?
लाहौर---
अबे लाहौर कहां---मॉडल टाऊन में रहता है क्या तू---?
जी हाजी पुरा का हूं सर जी
अबे कौन सा हाजीपुरा---जो पीर नसीर से लगे है
हां हाकिम ---
और ये कौन है बे तुम्हारी बर्थ पर ?
मेरा भाई है जी, बीमार है----
टिकट और पासपोर्ट---शिनाख्ती कार्ड---कुछ है तेरे पास?
जी मजूद है जी ---- वह घबराहट के बीच कमीज के भीतर वाली जेब से कागजात निकालने लगा था।
कुछ देर के बाद अफसर चले गए थे। लेकिन उनमें से एक लौटते हुए भी पीछे मुड़-मुडक़र जावर को घूरता रहा था। बहुत धीमी आवाज में उसने अपने अफसर से कहा था,
साहब जी, मुझे इस पर कुछ शक लगे है----आपने देखा, कैसे कांपने लगा था हमें देख कर
अबे जान दे ---कोई खेफिया होगा साला----और क्या --- इस पर ज्यादा सर खपाने की जरूरत नहीं---
अफसर और सिपाही चले गए थे। मुशिकल से वे आठ-दस मिनट रुके होंगे। लेकिन इतनी ही देर मेंं, जावर काफी नर्वस हो गया था। हल्की सर्दी के बावजूद उसकी चौड़ी पेशानी पर पसीने की मोटी-मोटी बूंदों को साफ देखा जा सकता था।

ऐसा बार-बार हुआ था। होश आने पर भी वह साफ-साफ कुछ बोल तो नहीं पाता था लेकिन उसके हाथों से कुछ भी लेने से इनकार करता था। वह बार-बार जावर खान के हाथों को झटक देता। जिससे दवाई या उसके हाथ की खाने वाली चीज दूर जा गिरती। जावर खान फिर झाग उगलने लगता। लेकिन फिर दूसरे ही पल खुद को संभालने का जतन करने लगता। उस आदमी के सामने मिन्नत-समाजत करता और हाथ जोडक़र दवा पी लेने की गुजारिश करता। और मैं देखता आ रहा था ज्यादातर वह इसमें नाकाम ही रहता था। हर बार एक झुंझलाहट, एक पछतावा उस पर हावी हो जाता। पहाड़ पर घने कोहरे की तरह। बर्थ वाले आदमी की आंखों में कभी तो उसके लिए हिकारत दिखती और कभी वह उसे बेचारगी के भाव से देखने लगता।
मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी। पुलिस वालों का लगातार आना-जाना, जावर की घबराहट और बर्थ पर निरंतर लेटे उस बीमार ने मेरी जिज्ञासा को अतिरिक्त रूप से बढा दिया था। और वह शायद रात का अंतिम पहर था जब गाड़ी सिगनल न होने की वजह रूकी हुई थी।
बाहर, रेत पर ऊंट और भेंडों का एक काफिला गुजर रहा था। जो बता रहा था गाड़ी अब हिंदुस्तान की सरहद में पहुंच गई है। थार का साम्राज्य इस इलाके में और भी समृद्ध और, और भी विस्तृत था। किसी ने बताया था, थार के पांव राजस्थान से निकल कर पड़ोसी राज्यों- मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब और हरियाणा तक में पसर चुके हैं। और यह कि यहां से उठने वाले बवंडर ने हिमालय के गलैशियर तक को तेजी से फिघलने पर मजबूर कर दिया है। यानी जहां तक देखो रेत ही रेत। कहीं-कहीं आंक की कटीली और सूखी झाडियों का झुंड भी दिखाई पड़ता था। किसी ने बताया था, रेगिस्तान में वही पौधे अपना अस्तित्व बचा सकते हैं जिनकी जड़ों में धरती के बहुत नीचे से जल खींचने की क्षमता हो। मैं सोचने लगा था जावर खान की जड़ें कहां है। कहां से मिल रहा है इन जड़ों को पानी। आद्रता। कहां से मिल रही थी उसे जोखिम से लडऩे की इतनी ताकत। और कौन थी रेशमा----जिसने उसे इस मुसीबत यानी खतरे में डाल दिया था। एक अटपटी सी इच्छा और वासना मेरे अंदर जन्म लेने लगी थी, यह सब जानने की।
मैंने जावर को फिर से सिगरेट ऑफर किया था। इस बार, कुछ संकोच के बाद उसने पैकेट से एक सिगरेट निकाल लिया था। मैेंने लाइटर निकाल कर उसकी सिगरेट सुलझाने के बहाने उसे और निकट से देखने की कोशिश की थी। इस वक्त वह सामान्य दिखाई दे रहा था। न उसके चेहरे पर पसीने की बूंदे नहीं दिखाई पड़ी थी, न ही उसने सिगरेट जलाने में किसी तरह की जल्दीबाजी की थी। लेकिन लंबे कश लेने के उसके अंदाज से लगता था कि वह कुछ छिपा रहा है। अंदर की बेचैनी या ओठों से बाहर निकलने के लिए आकुल शब्द।
क्या बात है --- कोई परेशानी है तो मुझे बताओ--- शायद मैं तुम्हारे किसी काम आ सकूं----
उसने तीर की तरह एक कड़वी नजर मुझ पर डाली और फिर कुछ कहते -कहते रुक गया था।
हम हिंदुस्तान से आए थे तुम्हारे मुल्क---- दोस्ती करने के लिए --- प्रेम का पैगाम लेकर
मुझे पता है--- तुम इंडियन हो ---उसने पहली बार मुझ से कुछ कहा था, कोशिश करते रहो---मगर बेनचो कुछ उखडऩे का नहीं है---
क्यों---
देखो मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं---आटो चलाता हूं आटो---- उसने मेरी आंखों में आखें डालते हुए जोर देकर कहा था, जैसे यकीन दिला रहा हो, मैं ऑटो ड्राइवर हूं समझे----लेकिन तुम्हारी नहीं अपनी सरकार को तो मैं जानता हूं---ये कभी कुछ सई नहीं होने देंगे---ये ख्याल ही निकाल दो मन से ----
बोलते-बोलते उसका लहजा सख्त हो गया था। लग रहा था उसके मुंह से शब्द नहीं कड़ुवा झाग निकल रहा हो। या बाहर उड़ते रेत के नुकीले कण उसके शब्दों के साथ मिलकर चुभ रहे थे।
इसके बाद वह फिर खामोश हो गया था। मैंने इस खामोशी को तोडऩे के लिए एक बेतुका सा सवाल किया था,
सिगरेट का टेस्ट कैसा लगा तुम्हें---
बढिय़ा है --- मैं पहले भी पी चुका हूं----लाहौर की पान मंडी में मिल जाती है सभी इंडियन ब्रांड---उसने सपाट सा जवाब दिया था।
तुम वही ऑटो चलाते हो?
चलाता हूं तो --?
उल्टे उसने मुझी पर सवाल दाग दिया था। मैं सकपका गया था। फिर उसने आगे कहा था,
हां---वहीं आटो चलाता हूं--------पिछले आठ सालों से
और तुम्हारे यह भाई साहब---मैंने बर्थ के ऊपर इशारा करते हुए पूछा।
ये मेरा भाई है ----फिर उसने जैसे लफ्जों को चबाते हुए कहा था, नहीं यह मेरा दुश्मन है, इसकी वजह से तबाह हो गई मेरी जिंदगी----रेशमा और इसने मिलकर फंसा दिया मुझे---
बहुत देर के बाद उसके मुंह से रेशमा का नाम फिर निकला था। उसने फिर गाली के साथ, दांत भींचते हुए कहा था, बेनचो---रेशमा की तौ मैं लौट कर वो---करूंगा----देखूंगा साली में कितना दम है---मुझे नचा रही है ---मैं भी कितना बड़ा बावला हूं---
बोलते -बोलते वह फिर खामोश हो गया था। रात का अंधेरा और घना हो गया था। और इसी के साथ मेरी जिज्ञासा की परत भी। उसने अब तक मेरे  एक भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया था। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।
रात के अंतिम पहर में मेरी नींद खुली थी। यह सुबह का आगाज था। बाहर नागफनी की नुकीली झाडिय़ों और रेतीली धाराओं के बीच खंडहर में तब्दील हो चुकी एक हवेली चुपचाप हमारी गाड़ी के साथ-साथ चल रही थी। रेगिस्तान का साम्राज्य यहां भी अपना परचम लहरा रहा था। गाड़ी की रफ्तार तेज हो गई थी। तभी जावर खान की खनकदार आवाज सुनाई पड़ी थी। बेनचो ---पानी  भी खत्म हो गया ---अब मैं इसको दवा कैसे पिलाऊं---
मैं झट से उठ बैठा था। बर्थ वाले आदमी को उस घड़ी शायद प्यास लगी थी। वह इशारों से पानी मांग रहा था। मगर जावर खान की बोटल खाली हो चुकी थी। और वह अंधेरे में बड़बड़ा रहा था, अरे देता हूं---थोड़ा सब्र करो
न चाहते हुए भी उसने मेरे हाथों से बोटल ले लिया था। पानी पी कर बर्थ वाला आदमी लंबी-लंबी सांसे लेने लगा था। हांफने जैसा। जावर खान ने उसे शीशी से निकाल कर एक दवाई पीने के लिए दी थी। इसे पीते ही वह सो गया था। मुझे उसकी हालत अच्छी नहीं लग रही थी। किसी भी वक्त कुछ भी हो सकता था।
तुम दोनों को जाना कहां है----
हैदराबाद---इस बार उसने बिना झुंझलाए सीधा सा जवाब दिया था।
हैदराबाद ---कहां---किसी अस्पताल में ?
वह फिर खामोश हो गया था।
बताओ शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं---
तुम मेरी मदद नहीं कर सकते--- उसने लगभग चीखते हुए कहा, पुलिस लगी है मेरे पीछे जानते हो तुम---बंदूक की गोली पीछा कर रही है मेरा----मरना चाहते हो
मैं उसे हैरत से देखने लगा था। वह कहे जा रहा था, पता नहीं किस जुनून में, पता है तुम्हें ---मैं कौन हूं-----
मैं जानना चाहता हूं---मैं उठकर उसके पास आकर बैठ गया था। उसके कंधों पर मैंने अपना हाथ रख दिया। सिगरेट को उसने पैरों से बढ़ी बेरहमी से कुचला था, जैसे वहां सिगरेट नहीं बिच्छू हो। उसने कहना शुरू किया था,
मैं लाहौर में ऑटो चलाया करता था। शाही मुहल्ला और हीरा मंडी के इर्द-गिर्द। बाहर से आने वाली सवारियों को मंडी तक पहुंचाया करता था। इसी दौरान मेरी मुलाकात रेशमा से हुई थी। रेशमा के बाप ने उसे पैसों के लिए बेच दिया था। एक गाने वाली के यहां। वह बहुत रोया करती थी। ग्राहकों के सामने उसे जबरदस्ती गाने के लिए कहा जाता था। मैंने उसे भरोसा दिलाया था कि मैं उसे वहां से निकाल लूंगा। मगर कोई रास्ता नहीं मिल रहा था। तभी मेरी मुलाकात मुख्तारा खान से हुई थी। देखने में पतला-दुबला मुख्तारा वकालत करता था और गजब की बातें कहता था। उसने मुझ से कहा दीन की खिदमत में लग जाओ। इस जिंदगी में कुछ नहीं रखा है। जिहाद पर निकलो। इस्लाम तुम्हे बुला रहा है। पहली मुलाकात के वक्त ही उसने मेरी हथेली पर नए-नए नोटों की गड्डी रख दी थी। और अगली मुलाकात में और भी देने का वादा किया था। मैंने हिसाब लगा कर देख लिया था। रेशमा को मंडी से निकालने के लिए इतने पैसे काफी थे। कुछ भी होते तो मैं अपनी ऑटो बेच सकता था। जब मैंंने पूछा था कि मुझे करना क्या है, तो उसने कहा था, पाकिस्तान की जमीन को पाक करना है। सरकार यह काम नहीं कर रही है तो हम करेंगे----कायदे आजम के अज्म को आगे बढ़ाएंगे। मुझे तीन महीने की ट्रेनिंग पर एक कैम्प में भेजा गया था। वहां कई कैम्प थे। अलग-अलग तनजीमों के अलग-अलग कैम्प।
ट्रेनिंग के बाद मुख्तारा ने मुझ से कहा था, तैयार रहना जल्दी ही तुम्हें एक ऑपरेशन पर निकलना है। मैं डर गया था। कहीं यह खबर रेशमा को मिल गई तो। मैंने उन से कहा था, मुझे अफगान भेज दो, मैं वहीं ऑपरेशन करूंगा---जैसा तुम कहोगे---
अफगान क्यों---?
क्योंकि वहां ब्रतानवी और अमेरिकन फौज ज्यादा है----मैंने चालाकी भरा जवाब दिया था, जो हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं---
ये तय करना तुम्हारा काम नहीं है
लेकिन मैं ज्यादा सवाब कमाना चाहता हूं---जैसा कि तुम कहते हो? ज्यादा बड़ा दुश्मन---ज्यादा सवाब
कहीं भी फिदाई करो---सवाब सब जगह बराबर मिलता है? एक ने मेरी बात को काटते हुए कहा था, मकसद तो ये है कि अपने जिस्म के तुम कितने टुकड़े करते हो ---तुम खुदा की राह में किस तरह से कुर्बान करते हो---
मैं इसके आगे कुछ नहीं बोल पाया था। कैम्प की उस संकरी गली में, बंदूक और दूसरे हथियारों के बीच, मेरे सामने रेशमा का चेहरा लहराने लगा था। जब-जब ऐसा होता मैं अपना निशाना भूल जाता। मैं किसी भी सूरत पर उसे उसके मालकिन के चंगुल से निकालना चाहता था। इसके लिए कुछ भी कर गुजरना चाहता था। मुख्तारा ने कहा था कि ऑपरेशन के बाद मैं आजाद हो जाऊंगा। अपनी मरजी से कहीं भी आने जाने के लिए।
एक दिन सुबह-सुबह मुख्तारा के साथ चार लोग आए थे मेरे घर पर। एक तसवीर लेकर। इसमें तीन लोगों की तसवीरें थीं।
कौन हैं यह लोग?
हिंदुस्तानी काफिर हैं---
सिर्फ इसी लिए ---?
नहीं ---- मुख्तारा की आंखों से उस घड़ी चिनगारियां निकलने लगी थीं, मुजरा सुन रहे थे तीनों --- हमारी लड़कियों से। हमारी कौम की तवायफें मुजरा करें इन हिंदुस्तानी बुतपरस्तों के सामने ---- तुम्हें पसंद आयेगा यह सब----
जनाब ---- किसी ने पीछे से कहा था, सुना है मुजरा करने वाली रेशमा जावर खान की महबूबा है
तब तो तू भड़ुवा हुआ बे भड़ुवा---- अपनी महबूबा को नचवा रहा है काफिरों के सामने
नथ भी उतरियो किसी काफिर से ही दल्ले---
जावर खान जैसे लफ्जों का चबा रहा था, 
सभी हंसने लगे थे इस बात पर। मेरे जबड़े भिंच गए थे। मुठ्यिां तन गई थीं और रगों का खून उबल कर जैसे आंखों के रास्ते बाहर निकल जाना चाहता था।  जहन में बगावत पैदा होने लगी जी। वो तीनों सामने होते तो मैं उसी वक्त उनको हलाक कर देता।
होश से काम लो होश से ---- ये काम इतना आसान भी नहीं है।  मुख्तारा ने कहा था, मौका आने दो------और सब्र से काम लो---- सब्र करने वालों की मदद खुदा खुद करता है। मैं लौट आया था। अगली खबर मिलने तक। पता नहीं कैसे रेशमा उन दिनों बीमार रहने लगी थी। मैं बहुत तनाव था। उसे जल्दी-जल्दी बुखार आता और वह ठंड से कांपने लगती। एक डॉक्टर ने कहा था उसे लंबे इलाज की जरूरत है। 
कुछ दिनों बाद ही हमें मौका मिल गया था।  उस दिन वे तीनों शहर से दूर एक गांव में गए हुए थे। शायद किसी मेडिकल कैम्प में। वहां सिक्युरिटी सख्त नहीं थी। ऑपरेशन के बाद मैं भागा-भाग रेशमा के पास पहुंचा था।  उसके कमारे मेें। टीवी पर दिखाया जा रहा था। आनन-फानन में तीनों को अस्पताल में भरती किया था। लेकिन पता नहीं कैसे उनमें से एक बच गया था। टीवी पर उस जिंदा बचे हुए आदमी का चेहरा देखकर चौंक पड़ी थी रेशमा।  गुस्से और अफसोस के साथ वह उबलने लगी थी वह,
अरे इसे किसने मारा, इस देवता जैसे इनसान से किसी को क्या दुश्मनी हो सकती है ----
तुम जानती हो इसे, मैं चौंका था।
हां, बिल्कुल---पता है यह वही ड़ॉक्टर है जो उसका और हीरा मंडी के दर्जनों लड़कियों का ईलाज किया करता है। बिना पैसे लिए।
हां, बदले में  मुजरा जो सुनने के लिए मिलता था, मैंने तलखी से कहा था।
सुनकर और उबल पड़ी थी रेशमा,
तो इसमें गलत क्या है,  मारने वालों को यह नहीं दिखता कि इस पेशे को कोई खुश होकर नहीं अपनाता--- करना पड़ता है रोटी और पेट के लिए ---- अरे खत्म ही करना है तो मुआसरे की इस दाग को खत्म करने की कोशिश क्यों नहीं करता कोई ----  उलटे यह बड़े-बड़े सफेदपोश पालते हैं तवायफों को --- इस पेशे को ----गिनवाउं उनके नाम ---  हुंह---
बोलते-बोलते रेशमा की सांस उखडऩे लगी थी। और जाने किस खौफ से मेरी बोलती बंद हो गई थी। तभी मेरा मोबाइल बजा था। दूसरी तरफ मुख्तारा था। उसने मुझ से शहर से निकल जाने का हुक्म दिया था। मेरे माथे पर पसीने की बंूदे उभर आईं थीं। मैंने रेशमा से कहा था,
मुझे अभी निकलना होगा।
अभी ----कहां और क्यों?
ये सब मैं बाद में बताऊंगा --- अभी सिर्फ ये करो को तुम भी तैयार हो जाओ मेरे साथ चलने के लिए---
मैं ----
इतनी देर में रेशमा को सब समझ में आ गया था। पिछले दिनों की एक-एक कड़ी उसके सामने जुड़ गई थी। रेशमा ने उबलते हुए मेरा गिरेबान पकड़ लिया था,
तो तुम हो वह हैवान जिसने इस फरिश्ते पर गोली चलाई--- इसकी जान लेने के लिए --- वह तुम हो ---- और मैं ऐसे आदमी से मोहब्बत करती हूं---- लानत है मुझ पर भी ----
रेशमा ये वक्त जजबात में बहने का नहीं है---
पता है तुम्हें इस आदमी के बारे ंमें-----वह जैसे अपने आप से बोलने लगी थी-----इसके घर में इसकी एक मां है---एक बहन है, जिसकी सगाई की रस्म के लिए यह अगले हफ्ते जाने वाला था, कहा करता था उसका कोई भाई या नहीं या रिश्तेदार ऐसा नहीं है जो उसकी मदद कर सके---यह काम उसे जाकर खुद ही करना होगा, अपने हाथों से-----
रेशमा मेरी बात सुनो ये बाते हम बाद में भी कर सकते हैं
लेकिन वो मेरी ओर आग भरी आंखों से देखते हुए बोल रही थी, और तुम सबने ऐसे आदमी को मार डाला----अब कौन जाएगा उसके घर---
ओए बावली न बन तू----वो मरा नहीें है जिंदा है अभी --- चल तैयार कर अपना सामान जल्दी? मैंने उसे दिलासा देने की कोशिश की थी और जल्दी-जल्दी जरूरी सामानों को बैग में भरने लगा था। तभी रेशमा ने मुझे जोरदार झटका देते हुए कहा, कमीने साले तुमने सोच कैसे लिया कि मैं तुम्हारे साथ जाउंगी---तुम जैसे कातिल गुनाहगार के साथ
उसने धक्का दे कर मुझे घर से बाहर निकाल दिया था। जाबर खान कह रहा था,
फिर मैंने बहुत कोशिश की रेशमा को मनाने की---मिलने की ---- लेकिन सारी कोशिशें बेकार---मैं रोता और गिड़गिड़ता रहा उसके सामने। इधर पुलिस की गश्त बढ़ गई थी। मेरी जान कहीं भी, कभी भी जा सकती थी। आखिर एक दिन उसे मुझ पर रहम आ गया, उसने कहा- मैं तुम्हारी सुरत तभी देखूं जब तू डॉक्टर साहब को उनके घर पहुंचा दे --- उनकी बहन की सगाई वाले दिन के पहले.. .
अरे पागल है क्या तूं---पता है पुलिस के सख्त पहरे में रखा गया है उसे
डर गया तू----तू तो बड़ा बहादुर है--- एक निहत्थे पर हमला करने वाला --- मरद कहता है खुद को ---- अरे तुझसे ज्यादा दमखम वाले मरद तो हीरा मंडी की रंडियों ने जने हैं बड़े-बड़े इंजीनियर, जज, डॉक्टर --- फौज तक में जांबाजी दिखा रही हैें  इस मंडी में पैदा हुई औलादें ---मुझे तो शक लगे है तू मरद है भी कि नहीं---
ओए बकवास बंद कर बेनचो----तू मरवाना चाहती है क्या मुझे 
जो तू इस काम में मर भी गया तो मैं अपने मोहब्बत को कामयाब समझ कर सब्र कर लूंगी---
कहकर उसने दरवाजा बंद लिया था। अजीब भंवर में फंस गया था मैं। लग रहा था रेशमा के अंदर उससे अलग, एक और रेशमा है। जो दिखाई देने वाली रेशमा से कहीं ज्यादा मजबूत, ताकतवर और वस्सत वाला है। उसके सामने मेरा वजूद रूई फाहे जैसा हवा में इधर-उधर बे सिम्त उड़ता हुआ - सा महसूस हो रहा था। मैं अपने आप से लड़ सकता था, मुख्तारा से लड़ सकता था, पुलिस से लड़ सकता था लेकिन रेशमा से नहीं। आखिर ये सब उसी के लिए तो था। मैं हार गया था उसके सामने, 
कब है उसके बहन की सगाई ?
आठ दिन बाद --- अगले हफ्ते के जु्मेरात को
और साहब---बोलते बोलते जावर खान सिसकतने लगा। बच्चों की तरह। और साहब मैं रेशमा से बहुत मोहब्बत करता हूं---उसकी बिना मैं जी नहीं सकता---कसम खुदाया की ---
तो ये बर्थ वाला आदमी तुम्हारा भाई नहीं है----मैंने लंबी सांस लेते हुए कहा था।
हां साहब---ये आदमी वही है डाक्टर----इसे कल तक पहुंचाना है मुझे इसके घर---मगर पुलिस --- तुम मदद करोगे मेरी --- वह सवालिया नजरों से देख रहा था मुझे।
मेरे माथे पर सोच की लकीरें पड़ गई थीं। दो अफसर जैसे पुलिस वाले हमारी तरफ आ रहे थे। जावर खान चेहरा छिपाने के लिए फिर से खिडक़ी बाहर देखने लगा था।
अफसरों ने मुझे अपने साथ चलने के लिए कहा था। दूर ले जाकर उन्होंने मुंझ से कहा था, ये आदमी डाउट फुल है --- इसे हमें कस्टडी में लेना है---आपकी मदद की जरूरत पड़ेगी---
मगर मैं आपकी मदद कर सकता हूं
देखिए हम नहीं चाहते कि एक आदमी के लिए किसी तरह का खून-खराबा हो
जी मैं मदद के लिए तैयार हूं---मगर इसकी जान को खतरा नहीं होना चाहिए
क्यों---इसकी गारंटी चाहिए क्या आपको, अफसर की आवाज तल्ख हो गई थी।
जी गारंटी  नहीं मांगता हूं --- लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि यह नेक आदमी है ---  बहकावे में आ गया है
हमें भी यही उम्मीद है लेकिन --- अफसर ने अपने पतलून की गर्द झाड़ते हुए कहा था, तभी उसका मोबाइल फोन बजने लगा था और उसकी बात अधूरी रह गई थी। 
यस सर दूतावास को खबर दे दी गई है----जी सर मुझे कुछ और लोगों की जरूरत पड़ सकती है---खतरनाक दिखाई पड़ता है ---- ऑपरेशन इतना आसान नहीं लगता---साइट एंड शूट भी करना पड़ सकता है सर --- ओके सर---थैंक यू---हमारी पूरी नजर है सर---
मेरी धडक़नें बढ़ गई थी। मैंने वहीं से जावर खान की तरफ देखा था। वह अभी भी बर्थ वाले मरीज को दवा पिलाने की जद्दोजहद कर रहा था। मैं अभी भी पुलिस अफसर से मुखातिब था, सर मेरी रिक्युवेस्ट है कि आप उसे एक मौका दें----वो एक नेक काम पर निकला हुआ है---वो खुद को पुलिस के हवाले कर देगा।
कहते-कहते मैंने अपने टूर का हवाला दिया था। जिससे हमें कुछ हासिल नहीं हुआ था,
सर यकीन मानिए दोनों देशों की राजनीति और हमारा डेलीगेशन जो नहीं कर पाए --- वह काम यह आदमी अकेले कर रहा है---इसके साथ कोई हादसा दोंनों मुल्कों के बीच की खाई को और चौड़ा करेगा
हम अपनी ड्यटी करने आए हैं मिस्टर ----------?
जी ---सुधीर कुमार, अ डेलीगेशन फ्राम पीएमओ आफिस ---
ओ---यस, तभी आप पुलिस के काम में इंटरफेयर कर रहे हैं , अफसर ने आगे कहा था, लेट मी डू ऑवर ड्यूट एंड डोन्ट टेक एनी बोदर अबाउट द मैटर ---बस आप हमें को-अपरेट कीजिए---
जाने क्यों मुझे अफसर की बात पर भरोसा नहीं हुआ मैंने आहुलिया साहब से बात की थी। आहूलिया ने मुझे बेफिक्र रहने को कहा था। उन्होंने जावर खान को सुरक्षा देने का भरोसा दिलाया था। कहा था पीएमओ आफिस और आला अफसरों से जावर खान के बारे में बात करेंगे। मैं उन्हें यह समझाने में कामयाब हो चुका था कि वक्त बहुत कम है। और जावर खान की जान को खतरा है। लेकिन फिर भी मन था कि बेचैनी से भरा जा रहा था। इसी दरम्यान मेरी आंख लग गई थी। और सुबह जब नींद खुली तो गाड़ी स्टेशन पर पहुंच चुकी थी और अफरातफरी मची हुई थी। जावर खान और डॉक्टर अपनी बर्थ पर नहीं थे। गाड़ी उदयपुर पहुंच चुकी थी।
मैं भाग कर गाड़ी से नीचे उतरा था। मेरा अंदेशा सच साबित हुआ था। पुलिस ने स्टेशन को चारो तरफ से घेर रखा था और स्टेशन की माइक ऊंची आवाज में चीख रही थी,
सभी मुसाफिर अपनी-अपनी जगह पर खड़े रहेें, खबर मिली है कि इस गाड़ी से एक पाकिस्तानी आतकंवादी हमारे देश में घुस आया है। पुलिस उसे पकडऩा चाहती है। दूर खड़ा जावर खान घबराहट के साथ इधर-उधर देख रहा था। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। दाढ़ी की ओंट में भरा-भरा  दिखने वाला उसका चेहरा इस वक्त बेहद खाली-खाली नजर आ रहा था।
उसने व्हील चेयर का थाम रखा था, जिस पर डॉक्टर गहरी नींद में सोया हुआ था। कुछ वर्दीधारी अफसर उसकी ओर बढ़ रहे थे। उनके हाथों में रिवाल्वर चमक रही थी। जावर खान के मुंह से फिर गाली निकली थी, बेनचो----रेशमा ने मुझे फंसा दिया-----------कहते-कहते उसने अपने नाफ में हाथ डालकर एक छोटी सी बंदूक निकाल ली थी।
जावर रुको ----नहीं ---- तुम्हें कुछ नहीं होगा----मैं बेतहाशा उसकी तरफ दौड़ा था।
लेकिन  इससे पहले कि जावर तक मेरी आवाज पहु्ंच पाती, बहुत सारी गोलियां उस तक पहुंच चुकी थी। उसके पहाड़ जैसे जिस्म को छेदते हुए। जावर वहीं गिर गया था। हत्थे वाली कुर्सी उससे दूर जाकर छिटक गई थी। और खंभे का सहारा लेकर टिक गई थी। जावर का जिस्म प्लेटफार्म की सख्त फर्श पर ऐंठते हुए यहां वहां तड़प रहा था। फिर कुछ देर बाद वह शांत हो गया।  पुलिस वाले बूटों से ठोकर मार कर अपना यकीन पक्का कर रहे थे।
मैंने हत्थे वाली कुरसी को थाम कर भारी मन से स्टेशन से बाहर निकल गया था।

फिर पुलिस वालों के आने का सिलसिला फिर बढ़ गया था। और मैंने नोट किया था, वे जब भी आते जावर उनसे बचने की कोशिश करता। वो या  तो बाथरूम चला जाता या नींद में होने का उपक्रम करने लगता। यही नहीं उसने पुलिस वालों से झूठ भी बोला था। तय था कि बर्थ पर सोया वह बीमार आदमी उसका भाई हर्गिज नहीं था। मैंने देखा था, बर्थ पर चढ़ाते समय उसके गले में हनुमान का लॉकेट। तभी मेरा ध्यान फिर से उसके बीमार साथी की ओर गया था। कौन था वह जावर खान का। और क्यों जा रहा था वह हिंदुस्तान। बर्थ में उसे लिटाए लगभग २४ घंटे हो चुके थे, लेकिन वह एक बार भी नीचे नहीं उतरा था। न ही कोई उसका चेहरा देख पाया था। बर्थ पर ही जाबर ने उसे ब्रेड और चाय पीने को दिया था। उसका सिर अपनी गोद में रख कर। जिसे वो बार-बार झटक देता था। जाबर उसे बड़ी मुश्किल से एक या दो टुकड़े खिला सका था।

6 Oct 2013

भागे नहीं थे हम

निवेदिता झा 

 पिछली रात देर तक नींद नहीं आयी। यादों ने मेरी पलको से नींद चुरा ली। कमरे में एक म्लान सा अंधेरा है। अंधेरे को टटोलते हुए यादें मेरे सिराहने खड़ी हैं। वह हंस रही है, चिढ़ा रही है। कामरेड भागो नहीं दुनिया को बदलो। मैं बुदबुदा रही हूं… भागे नहीं थे हम। तो फिर क्या हुआ उन सपनों का, जिसके लिए तुमलोग मारे-मारे फिरते थे? उन दिनों यही लगता था कि हम दुनिया को बदल डालेंगे। उन सपनों पर यकीन भी था। अगर यकीन नहीं होता तो क्या हम दुस्साहस कर पाते। यादें तारीक के जंगलों से निकल कर मेरे करीब खड़ी हो गयीं।
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, वह साल कौन सा था। शायद ’83 के आस-पास की घटना होगी। देश की सत्ता इंदिरा गांधी के हाथों में थी। सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद इंदिरा गांधी को मैं निजी तौर पर पसंद करती हूं। दुनिया के इतिहास में ऐसी महिला प्रधानमंत्री कम रही हैं, जिन्होंने एक राजनीतिक हस्ती के रूप में अपनी गहरी छाप छोड़ी हो। इंदिरा गांधी ने हिंदुस्तान पर 16 सालों तक राज किया। 1975 में आपातकाल लागू करने के फैसले ने उनको सत्ता से बाहर कर दिया। 1977 के चुनाव में उन्हें गहरी हार का सामना करना पड़ा, 1980 में भारी बहुमत के साथ उनकी वापसी हुई।
वो गर्मी की एक सुबह थी, जब इंदिरा गांधी ने गांधी मैदान से अपनी विशाल सभा को संबोधित किया था। पटना की धरती का एक विशाल कोना, जिसके सीने में जाने कितने इतिहास दफन हैं। हम सुबह ही पहुंच गये थे। रात के ओस से अभी तक जमीन गीली थी और आसमान साफ। नर्म और करीने से कटे दूब के बीच लाल और पीले अमलतास के गाछ। प्रकृर्ति अपने तमाम कयानात को समेटे बैठी थी। मैं सोच रही थी कि इतिहास सिर्फ राजा महराजाओं का इतिहास नहीं होता, इतिहास उनका भी होता है जो दुनिया को बदलने में यकीन रखते हैं। हमारे टीचर कहते थे इतिहास तब तक समझ में नहीं आएगा, जब तक फलसफा न पढ़ो… हम फलसफा समझने की कोशिश कर रहे थे कि शीरीं ने आवाज दी। कहा – अभी चलो मीटिंग है। अभी? अचानक! क्या हुआ? कल इंदिरा गांधी आ रहीं हैं।
साथियों ने तय किया है कि उन्हें काला झंडा दिखाया जाए। मैं सकते में आ गयी। क्या कह रही हो? दिमाग खराब हुआ है? यह कोई बच्चों का खेल है? यह कब फैसला हुआ? उसने कहा – अभी फैसला नहीं हुआ है। उसी के लिए मीटिंग बुलायी गयी है। चलो…
उन दिनों एआईएसएफ का दफ्तर लंगर टोली में था। दो मंजिले मकान के ऊपर। कमरे में एक टेबुल और सात-आठ कुर्सियां लगी हैं। सामने खुरदरी दीवार पर भगत सिंह का पोस्टर लगा हुआ है। पोस्टर काफी पुराना है। कमरा किसी ठहरे हुए जहाज की तरह है। हम सब बैठ गये। कुछ ही देर बाद हमारे सचिव आ गये। लाल सलाम कॉमरेड। लाल सलाम। सबने एक दूसरे का हाथ उठा कर अभिवादन किया। आप सबों को एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करने के लिए बुलाया गया है। यह कहकर उन्होंने हम सब की ओर देखा। जब उन्हें इत्‍मीनान हो गया कि उनकी बातों को सब गंभीरता से सुन रहे हैं, तो उन्‍होंने अपनी बात शुरू की। कहा – इंदिरा गांधी पटना आ रही हैं। मेरी राय है कि हमें उनका विरोध करना चाहिए। पिछले दिनों देश के जो राजनीतिक हालात रहे हैं, आप सब जानते हैं। आप ये भी जानते हैं कि हमारी शिक्षा की क्या स्थिति है। नयी शिक्षा नीति को हमलोगों पर थोपने की कोशिशें हो रही हैं। इतनी बेरोजगारी बढ़ रही है। ये ऐसी शिक्षा नीति है, जो असमानता और गैर बराबरी को बढ़ावा देगा। अगर इसका जोरदार विरोध नहीं हुआ, तो आने वाले दिन इससे भी बुरे होंगे। मेरा प्रस्ताव है कि हम इंदिरा गांधी का पुरजोर विरोध करें।
इस प्रस्ताव पर लगभग चार घंटे तक बहस हुई। सवाल खड़े किये गये कि इंदिरा गांधी के विरोध का आधार क्या है? कॉमरेड ने बहुत साफ-साफ और सधी हुई आवाज में कहा – साथी आज हम नये संकटों से जूझ रहे हैं। हम सब एक बेहतर दुनिया के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि देश की सत्ता आम आदमी के प्रति कितनी जबावदेह है? ऐसे वक्त में मुझे चार्ली चैप्लिन की फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर की हमेशा याद आती है। जिस फिल्म के अंतिम संवाद में उन्होंने कहा था – हम एक ऐसी दुनिया के लिए लड़े, जहां विज्ञान और उन्नति हम सब के लिए खुशियां लेकर आये। पर ये उन्नति हमारे लिए नहीं है। वे धोखेबाज हैं। झूठे हैं। अपना वादा पूरा नहीं करते। मैं पूछता हूं एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस ने देश की जनता को क्या दिया? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गलत नीतियां, भाई भतीजावाद! क्या पूंजीवाद व सामंतवाद के संरक्षण का काम कांग्रेस नहीं कर रही है?
यह जबरदस्त भाषण था, जिसका असर हुआ। कामरेड की बातों से सब सहमत दिखे। आखिर तय हुआ कि गांधी मैंदान में आयोजित उनकी आमसभा का बहिष्कार किया जाए। गुप्त योजनाएं बनीं। मुझे सुबह छह बजे एआईएसएफ के दफ्तर पहुंचने कहा गया। साथ ही ताकीद की गयी कि किसी को कानों खबर नहीं हो।
छह बजे कॉलेज की बस आती थी। हम मुंह अंधेरे बस स्टॉप पर पहुंच गये। अभी वहां खड़े ही हुए थे कि देखा मां घबरायी सी भागती आ रही है। घबराहट में वह नंगे पांव दौड़ती चली आयी। दरअसल हमारी योजनाओं का पता मेरे छोटे भाई प्रियरंजन को लग गया था। उन दिनों वह नया-नया छात्र संगठन से जुड़ा था। उसने मां को खबर कर दी कि हमलोग आज इंदिरा गांधी का विरोध करेंगे। मैंने किसी तरह मां को विश्‍वास में लिया। उसे यकीन दिलाया कि हम ये सब नहीं करेंगे। मैं समय से आधे धंटे देर से पहुंची। सभी साथी मेरी राह देख रहे थे। इंदिरा गांधी की सभा पटना के गांधी मैदान में थी। गांधी मैदान में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। यह तय हुआ कि पहले मैदान का जायजा ले लिया जाए। मुझे, शीरीं और नूतन को मंच के पास अगली कतार में जाकर बैठने का जिम्मा मिला था। योजना बनी कि जैसे ही इंदिरा गांधी संबोधित करेंगी हम लड़कियां काला झंडा उन्हें दिखाएंगे। लड़कों को कहा गया कि वे गैस वाले बैलून में काला रिबन लगाएंगे। हमारे झंडा लहराने पर लड़के सारे बैलून को आकाश में छोड़ देंगे। हमारा कोड वर्ड था, भाइयो और बहनों।
मेरे पास उन दिनों एक लाल रंग का बैग था। हमें खूब सारा पर्चा दिया गया। मेरे जिम्मे था इंदिरा गांधी को भरी सभा में काला झंडा दिखलाना। शीरीं के जिम्मे पर्चा बांटना। नूतन को यह कहा गया कि अगर हम दोनों गिरफ्तार हो गये, तो साथियों को इसकी सूचना देना। हम तीनों में नूतन सबसे छोटी थी। मैंने नूतन को देखा। उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी। लंबा फ्रॉक, सर से लटकती दो लंबी चोटी। जिसे वह बार बार सहला रही थी। उसकी कैफियत बयान नहीं की जा सकती। शीरीं बड़ी दिलेर लड़की थी। मैंने उसे कभी घबराते हुए नहीं देखा। हम तीनों अगली कतार में जाकर बैठ गये। यह जगह वीआईपी के लिए थी। हमलोगों को पुलिस ने यह सोच कर नहीं रोका कि शायद हम कांग्रेस नेता के परिवार से हैं। पहली बार मैं इतने नजदीक से इंदिरा गांधी को देख रही थी। एक ऐसा सौंदर्य, जिसमें भव्यता भी है और सादगी भी। सामने मंच पर बहुत बड़ी मेज थी, जिसके इर्द-गिर्द मखमल की, ऊंची पीठ वाली कुर्सियां लगी थीं। एक गहरे लाल मखमल का शाही किस्म का दीवान और एक तरफ काली चमकती हुई लकड़ी की मेज पर कई माइक लगे थे। मैं देखती रह गयी। वो सधे कदमों से माइक तक पहुंची। हाथ हिलाकर अभिवादन किया। इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारों से गांधी मैदान गूंज उठा। पूरी भव्यता समेटे हुए उन्‍होंने सर पर आंचल को संभाला। मैंने अपने अंदर की औरत को जी भर के देखा। ये जो सामने खड़ी है, वह भी तो हम सब जैसी है। उसका रूप इतना भरा-पूरा था कि मैं भूल गयी की यहां क्यों आयी हूं। जब ख्याल आया तो मेरे पांव जम गये। दिल की धड़कन तेज हो गयी। जैसे ही उन्होंने ने कहा भाइयों और बहनों कि मैंने बैग से काला झंडा निकाला और लहरा दिया। इसके पहले की लोग समझ पाते, शीरीं ने पर्चा बांटना शुरू कर दिया। सभा में अफरा-थफरी मच गयी। मैं अपनी पूरी ताकत से चीखी – इंदिरा गांधी वापस जाओ! इंदिरा गांधी मुर्दाबाद! मुझे होश तब आया, जब चारों ओर से महिला पुलिस ने मुझे दबोज लिया। मेरी चोटी पकड़ कर वे खींचते हुए बाहर ले आयीं। दर्द से मेरा चेहरा लाल हो गया। कमर तक फैले हुए मेरे काले-घने बाल मेरी मुसिबत बन गये। मैंने कहा मेरे बाल छोड़ि‍ए। एक हट्टी-कट्टी महिला पुलिस ने मेरे कमर पर जोर से एक डंडा जमाया और कहा साली की हिम्मत देखो। और उसे जितनी मादा गालियां आती थीं, उसने चुन-चुन कर दिया। मैं सोच रही थी सत्ता सत्ता होती है। औरत और मर्द नहीं।
हमें गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मां की थी। कल होकर जब अखबारों में खबर आएगी तो वह क्या करेगी। थाने से मेरे पिता के पास फोन गया। पापा के शब्‍द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। उन्होंने कहा कि आपका कानून जो कहता है कीजिए। मेरी बेटी जानती है कि उसे क्या करना है। उन्होंने पुलिस से कोई पैरवी नहीं की। मुझे छुड़ाने अपूर्व आये थे। पुलिस वाला बांछे खिलाये बैठा था। उसने मेरा लाल रंग का बैग कब्जे में कर लिया था। जिसमें मेरे कुछ नोट्स बुक पड़े हुए थे। उसने कापियां उलट-पुलट कर देखा जैसे सुराग तलाश रहा हो। मेरी दोनों कापियां ले ली और पूछा ये क्या है? अपूर्व ने कहा ये नोट्स बुक हैं। निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के जहां चली है रस्म के कोई सर उठा के न चले… फैज की नज्म झिलमिला रहे थे मेरे पन्नों पर। उसने ताकीद के साथ मेरा बैग लौटा दिया।
हम सब के जीवन में ऐसी कई घटनाएं घटीं, जिसने हमारे अनुभवों का विस्तार किया। यादें चाहे जितनी यातनापूर्ण हो, है तो वह हमारे जीवन का हिस्सा। हम बार बार लौटते हैं उन्हीं स्थानों पर, जिसे किसी अनजाने क्षण में हमने छोड़ दिया था। यूनिवर्सिटी खुली और पढ़ाई तेजी से शुरू हो गयी। क्लास में लेक्चर होते थे। लेक्चर के बाद हम और शीरीं ट्यूटोरियल क्लास में साथ होते। मगध महिला से लेकर साइंस कॉलेज तक छात्रों के बीच काम करने का जिम्मा हमलोगों का था। हम सब का ज्यादा समय सड़क पर ही बीतता। कॉलेज में सामने गंगा बहती। चैत के माह में बड़ा भारी मेला लगता। मेले की बड़ी वजह थी काली मंदिर। यह मंदिर कई वजहों से लोकप्रिय था। जब सब मंदिर में कामना करते होते, मैं और शीरीं गंगा के किनारे बैठे रहते। शीरीं पूछती, तुमने बनारस की सुबह और अवध की शाम देखी है? हमारी गंगा में तो दोनों दृश्‍य देख सकते हैं।
शीरीं में साहित्य की गहरी समझ थी। यह उसे विरासत में मिला था। उसके पिता, जिन्हें हम आलम चाचा कहते थे, साहित्य उनके जीवन में रचा-बसा था। उनके घर पर अकसर महफिल जमती। उनको देखकर लगता कि मैं जीवित इतिहास के साथ हूं। जिनकी पूरी जिंदगी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए थी। जो अब तक कई बार जेल जा चुके थे। कई बार बिना खाये-पीये लगातार काम करते रहते। अक्सर बहस में वे बताते वर्ग संघर्ष क्या है? पूंजीवाद क्या है? वे इस बात पर यकीन करते कि सर्वहारा की जीत निश्चित होगी। उन दिनों जब लड़कियों का घर से निकलना ही बड़ी बात थी। शीरीं को पूरी आजादी थी। उतनी ही आजादी जितना मनुष्य होने के नाते एक मनुष्य को मिलना चाहिए। शीरीं बुरका नहीं पहनती थी न ही अल्ला पर उसका एतबार था। वाम आंदोलन के प्रति उसकी गहरी आस्था थी।
उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर को इतने कम पैसे मिलते थे कि उससे परिवार चलाना और बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाना मुश्किल था। पार्टी होलटाइमर के बच्चे रूस जाकर पढ़ सकते थे। यह सुविधा वैसे कॉमरेड के परिवार के लिए था, जो होलटाइमर थे। मुझे याद है, मास्को जाने के फैसले के बाद शीरीं बहुत उखड़ी-उखड़ी रहने लगी थी। जाने के एक दिन पहले हम मिले थे। वह पूरे समय रोती रही थी। उसके भीतर भयानक तूफान मचा था। वह जानती थी कि एक दूसरे देश में उसके आंसू देखकर संजीदा और पशेमान होने वाला कोई नहीं होगा। पर वही देश था, जो बाद में शीरीं के दिल में बस गया। मास्को जाने के बाद भी उसकी लंबी-लंबी चिट्ठियां आती। जिसमें देश के राजनीतिक हालात और वाम संगठनों को लेकर गहरी चिंता रहती। मास्को में रहते हुए उसके कुछ अच्छे दोस्त बने, जिसमें सुनंदा उसके दिल के सबसे करीब थी। उसकी हर चिट्ठियों में उसका जिक्र होता। प्यार से लबरेज उसके खत आते…
मेरी प्यारी निवेदिता,
तुम्हें इस बात का अंदाज नहीं होगा कि मैं तुम्हारे खतों का कितनी बेताबी से इंतजार करती हूं। मास्को एक खूबसूरत शहर है। वोल्गा नदी के किनारे। यहां के लोगों का अकीदा है कि अगर वोल्गा नदी में अपनी दोस्ती के नाम पर ताला लगाकर चाभी को फेंक दो, तो पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ गुजरेगी। जाने कितने जोड़ों के रिश्‍ते की चाभी वोल्गा नदी के पास है। कई बार मन में आया मैं भी तुम्हारे नाम की चाभी नदी में प्रवाहित कर दूं, पर लगा यार तुमसे अलग जाएंगे कहां। हमारी दोस्ती का तो खूंटा बंध गया है। तुम्हें पता है मेरे कॉलेज से एक सीधी सड़क जाती है रेडस्कायर तक। जहां लेनिन चिर निद्रा में सोये हुए हैं। मैं उन्हें देखने गयी थी। देखकर मेरे बदन में झुरझुरी सी आने लगी। तुम सोच कर देखो, जिन्हें हम किस्से कहानियों में सुनते थे, उस आदमी को साबूत देखना। वह इतिहास का ऐसा अंश है, जिसे देखकर क्रांति में यकीन होने लगता है। जैसे हर क्रांति में अगली क्रांति का बीज छिपा हो। तुम्हें पता है सर्दियों में यह शहर बर्फीले पेड़ से भर जाता है। सामने वोल्गा बहती रहती है। अक्सर मैं वोल्गा की तारीक लहरों को देखती रहती हूं। रात गहरी हो गयी है। वोल्गा धीमे-धीमे बह रही है। तुम होती तो इस देश की खूबसूरती में खो जाती। मुझे वो गीत याद आ रहा है, जो अक्सर तुम सुनाया करती थी। ‘रात अंधेरी है और बादल गहरे’… तुम ऐसी रात में किस तरह आओगे। बस आज यहीं तक। अब नींद आ रही है।
तुम्हारी शीरीं
मेरे पास अब शीरीं के खत ही रह गये हैं। वर्षों से हम नहीं मिले हैं। या यूं कहूं की उसने अपने अतीत का सारा हिस्सा खुद से अलग कर दिया। पर हम अलग हुए कहां? जिंदगी आगे बढ़ती हुई खाली जगह छोड़ती जाती है, जिसमें गुजरी हुई घटनाएं अपना घर बनाती जाती है। समय के चेहरे पर स्मृति की पुरानी छाया उतर आयी। मेरे गले की आवाज गीली है। होठों पर जो लब्ज हैं, सूखे नहीं। कितना कुछ है यादों में जो मेह की तरह बरस रहा है।
ऐसी ही अवसन्न सूनी दोपहर थी, जब हम सुनंदा से पहली बार मिले। सुनहले पीले रंगों के कपड़े में एक लड़की सालों बाद इस तरह मिलेगी, यह कभी सोचा नहीं था। कभी-कभी अतीत अचानक से आपके सामने खड़ा होता और आप हैरान हो जाते हैं। जैसे कोई पुराना सपना धीरे धीरे कदमों से आपके पास आ गया हो। देखते ही वह पहचान गयी। उसने पूछा तुम पटना वाली निवेदिता हो? मैंने सर हिलाया। वह मेरे गले से लिपट गयी। मैं सुनंदा। शीरीं वाली सुनंदा? वह चिल्लायी – हां। हम घंटों शीरीं के बारे में बातें करते रहे। जंग लगी पुरानी यादों को खुरच-खुरच कर ताजा करते रहे।
उसने पूछा, शीरीं की कोई खबर? नहीं यार। अंतिम बार चाचा के रहते मिले थे। फिर उसका परिवार दिल्ली चला गया। उड़ते उड़ते खबर आयी की उसने शादी कर ली है। हममें से उसने किसी को खबर नहीं किया। मुझे भी नहीं। अच्छा वह बच कर जाएगी कहां? हम उसे तलाश लेंगे। हमारी बातें खत्म नहीं हो रही थीं। जिंदगी के बीते पन्ने पलटते जा रहे थे। स्‍मृति पुराने नोटबुक की तरह है, जिसके सफे पर आंखें अटक जाती है।
सालों बाद जब अपने बीते दिनों को सहेजने बैठी हूं, तो लगता है बहुत कुछ है, जिसे साझा किया जाना चाहिए। वाम आंदोलन ने सिर्फ विचार ही नहीं दिये, बहुत सारे दोस्त भी दिये। वही पूंजी हमारे पास बची हुई है। हम बहस करते, लड़ते-झगड़ते, पर विचारों के लिए हमेशा जगह बनी रहती। दोस्तों की मंडली में शैलेंद्र के पास जंगल के गहरे अनुभव थे। वह आदिवासियों के बीच काम करता था। झारखंड उन दिनों बिहार का ही हिस्सा था। अर्पूव अक्सर राजनीति पर बातें करते। श्रीकांत और विनोद नाटक और इप्टा की बातों में रमे रहते। दिलीप गाने की धुन बनाने में लगा रहता। चंद्रशेखर को राजनीति में जितनी दिलचस्पी थी, उतनी ही रंगकर्म में। उसे लड़कियों की बात करने में भी मजा आता था। शीरीं हमेशा गंभीर बनी रहती। रश्मि के पास इप्टा के अलावा भी ढेर सारे मजेदार किस्से होते। वह उन दिनों पटना इनजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ती थी। हम चटखारे ले-ले कर कॉलेज की प्रेम कथाओं को सुनते और अपने प्रेम की गाथाओं को भी महिमामंडित करते। नासिर जो हम सबों में छोटा था, हमारी बातें रस ले-ले कर सुना करता। अफशां, पूर्वा और नासिर जिसे हम कब्बू कहते हैं, उनकी आपस में खूब छनती थी। नासिर उन लोगों में से है, जिसने अपनी मेहनत से जीवन के रास्ते तय किये। एआईएसएफ में रहते हुए उसने संगठन के लिए जम कर काम किया। यह वही समय था जब नौजवानों का कम्युनिस्ट आंदोलन से मोहभंग होने लगा था। संगठन में गुटबाजी, अराजकता और वैचारिक संकट गहराने लगे थे।
पटना कॉलेज में एआईएसएफ का सम्मेलन था। सम्मेलन में नयी कमिटी का गठन होना था। पदाधिकारियों का चयन होना था। हमलोगों ने जो पैनल तय किया था, उसे सर्वसम्मति से पास करना चाह रहे थे। पर दूसरे ग्रुप को मौजूदा लीडरशिप का पैनल स्वीकार नहीं था। जमकर बहस हुई। हो हंगामा होने लगा। कोई किसी की बात नहीं सुनना चाह रहा था। दोनों ग्रुप में मार-पीट की नौबत आ गयी। दूसरे ग्रुप ने सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उनके विरोध के बावजूद मौजूदा लीडरशिप ने अपनी सूची पर मुहर लगाया। एआईएसएफ उसके बाद वर्षों तक दो खेमों में बंटा रहा। हालात ये थे कि लोग एक-दूसरे पर निजी स्तर पर वार करने लगे। उसकी प्रतिक्रिया में दूसरा खेमा खड़ा हुआ। अगर आप पार्टी लाईन से सहमत नहीं हैं तो संशोधनवादी या प्रतिक्रियावादी तक करार दिये जाते थे। वैचारिक टकराव के कारण सिरफुटौव्‍वल की नौबत आ जाती। लोग सीआईए के एजेंट तक घोषित किये जाते।
इन्हीं दिनों हम राणा से मिले। राणा बनर्जी से। लंबा सांवला चश्‍मे के भीतर झांकती बड़ी-बड़ी आंखें। पहली बार उसे नुक्कड़ पर गाते सुना – ओ गंगा तुमी बोए छे केनो। उसकी आवाज ऐसी थी जैसे शाम के आसमान पर सुलगते हुए सितारे। आम तौर पर वह जन गीत ही गाता था। वह गाता, हमारे बदन के रोयें सिहर जाते। जैसे सागर के रेतीले साहिलों पर आबसार झर रहे हों। कभी कभी हमलोग उससे फरमाईश करते – यार कुछ दूसरे गीत भी सुनाओ। हमेशा क्रांति ही करते रहते हो। वह हंसता और कहता लो सुनो – पागला हवा पागोल दीने पागल आमार मॉन नेचे उठे… हमारा मन भी नाच उठता।
इप्टा अगर हमारा काबा था, तो एआईएसएफ काशी। हमारा एक पांव इप्टा में तो एक पांव एआईएसएफ में। उन्हीं दिनों इप्टा का सम्मेलन हैदराबाद में तय हुआ। पटना से हम सब का जाना तय हुआ। जाने के लिए पैसे जुटाये गये। चंदा मांगने का सबसे कारगर तरीका था कि रंगकर्मियों की टोली गाते-बजाते सड़कों पर निकल जाती। ढोल, हारमोनियम, खंजरी और कुछ सुर वाले गायकों के साथ हम जैसे कुछ बेसुरे भी साथ देते। दिन भर सड़कों पर चंदा मांगते और शाम को नाटक का रिहर्सल। कुछ लोग थे जो दिल खोलकर चंदा देते। उसमें डॉ एके सेन, ब्रजकिशोर प्रसाद, हरि अनुग्रह नारायण और मेरे पिता भी शामिल थे। जबकि पापा के पास हमेशा पैसों की कमी रहती। कई बार घर चलाने के लिए पैसे नहीं होते, पर संगठन के लिए हमेशा उनका द्वार खुला रहता। इप्टा के सम्मेलन में हैरदराबाद के लिए पटना से बड़ी टीम का जाना तय हुआ, जिसमें लड़कियों की अच्छी संख्या थी। तनवीर अख्तर इप्टा के सचिव थे। उनकी मेहनत और लगन ने इप्टा को पुनर्जीवित किया था। संगठन में अनुशासन को काफी महत्व दिया जाता था। पर अनुशासन का सबसे बड़ा मसला लड़के और लड़कियों को लेकर ही रहता था। यह स्‍वाभाविक था कि जहां आग होगी, वहां धुआ होगा ही। इस कड़े अनुशासन के बावजूद प्रेम हिलोरें मारता। अपने लिए रास्ता खोज निकालता। जाने कितने दिल जुड़े और टूटे। प्रेम की नाकामियों और प्रेम की गाड़ी चल निकलने के हजारों किस्से हैं। हमारी गाड़ी प्लेटर्फाम पर लग गयी थी। उन दिनों लड़कियों के लिए विशेष कूपा हुआ करता था, जिसे लेडिज कूपा कहते थे। हमलोगों के लिए वही कूपा रिजर्व कराया गया था। पुष्पा दी हमारी टीम की लीडर थीं। इप्टा से लंबे समय से जुड़ी हुई थीं। इप्टा की गायन मंडली की सशक्‍त आवाज। उनको देखकर मशहूर अदाकारा बैजेंती माला की याद आती थी। उन्हें इस बात का एहसास था। उनको लेकर हम सब के मन में उत्सुकता बनी रहती। पुष्पा दी बिहार के जाने माने लॉयर ब्रजकिशोर प्रसाद की बेटी हैं। ब्रजकिशोर प्रसाद कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे। उनका पूरा परिवार कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए समर्पित था। उनकी बेटियां इप्टा में सक्रिय थीं। पुष्पा दी के निजी जीवन को लेकर लोगों की दिलचस्पी बनी रहती थी। हमारे समाज में महिलाएं अगर जिंदगी का रास्ता अकेले तय कर रही हो, तो उस पर सबकी निगाह रहती है। हमलोगों को पता था कि पुष्पा दी की शादी हुई थी, जो चल नहीं पायी और वे अलग हो गये। ट्रेन की लंबी यात्रा से एक फायदा हुआ कि हम एक-दूसरे के ज्यादा करीब आये। हमने जीवन के उन अनुभवों को साझा किया, जिसे शायद आम दिनों में बांटना संभव नहीं था। पुष्पा दी से उसी यात्रा में अतरंग होने का मौका मिला। उन्होंने अपने मन को खोल कर रख दिया। पहली बार हम जान पाये कि हमेशा खुश दिखने वाली पुष्पा दी अपने निजी जीवन में कितनी अकेली हैं।
हम लड़कियां अपने-अपने किस्से में मशगूल थे कि मुझे लड़कों ने आवाज दी। श्रीकांत, विनोद, अर्पूवानंद, परवेज अख्तर, जावेद समेत सभी बगल के डिब्बे में मजमा लगाये बैठे थे। गीत-संगीत का दौर जारी था। ये भी ज्यादती थी कि साथ सफर कर रहे हैं, पर अलग अलग। उनलोगों का भी मन हम सब के बिना नहीं लग रहा था। हम वहां पहुंचे ही थे कि तनवीर अख्तर आ गये। उन दिनों इप्टा के सचिव थे। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, आप यहां क्या कर रहीं हैं? कुछ नहीं इनलोगों से गप कर रहे हैं। नहीं आप उठिए, जाइए यहां से। यहां आने की आपलोगों को इजाजत नहीं है। मुझे धक्का लगा। आंखें भर आयीं। पर किसी साथी में साहस नहीं था कि वे तनु भैया का विरोध कर पाते। मैं आंखें पोंछते हुए वापस लेडीज कूपे में चली गयी। हम सब लड़कियों ने तय किया कि अब हम इस कूपे से बाहर ही नहीं निकलेंगे।
बराबरी, समानता और वैचारिक आजादी के पक्ष में काम करने वाले संगठनों की पहली चुनौती थी, अपने भीतर बदलाव लाना। वे खुद अभी इसके लिए तैयार नहीं थे। स्त्री-पुरुषों के संबंधों को लेकर हमारा नजरिया तंग था। साथियों के भीतर सामंतवाद के अवशेष बचे हुए थे। सारे रास्ते लड़कियां खुद में मशगूल रहीं। लड़कों से परदेदारी की। तय किया कि हमलोग उनका बहिष्कार जारी रखेंगे। गाड़ी रुकी। स्‍टेशन पर कुछ साथी तख्ती हाथ में लिये स्वागत के लिए खड़े थे। हम एक कोने में खड़े हो गये। श्रीकांत पास आये। उसने कहा तुम नाराज क्यों हो? हमलोगों ने तो कुछ नहीं कहा। यूं भी यह नाराजगी ज्यादा देर टिकने वाली नहीं थी। दोस्तों के बिना कोई महफिल सजती कहां है? देश भर से इप्टा के कलाकार आये थे। पहली बार मैंने वहीं भूपेन हजारिका को देखा था। श्‍याम बेनेगल ने सम्मेलन का उद्धाटन किया था। उस समय के मशहूर अभिनेता फारुख शेख भी सम्मेलन में आये थे। वह इस कदर खूबसूरत थे कि हम सब देखते ही रह गये। कमबख्त क्‍या कयामत आंखें थीं और काले खूबसूरत बाल। रंग इतना गोरा की अगर छू दो तो मैले हो जाएं। उनको देख कर हम लड़कियों का दिल धड़कने लगा। हम फारुख की ओर बढ़े। हमलोग आपसे मिलना चाहते हैं! क्यों नहीं! कहां से हैं आपलोग? जी बिहार इप्टा से। ओह! अच्छी बात है आप लोगों से मिलकर खुशी हुई। फिर वे मंच पर जाकर बैठ गये। पूरा मैदान रौशनियों से नहाया हुआ था। लोग मैदान में अपनी जगह ले रहे थे। मंच पर अदाकार, उर्दू के शायर और गायन मंडली की टीम थी। पहला गाना बिहार इप्टा का था। पुष्पा दी ने कमान संभाली।
हम सब हिंदी हैं अपनी मंजिल एक है। ओ हो हो एक है…
दरअसल हमलोगों को स्टेज पर पहुंचने में देर हुई। हुआ यूं कि हम जहां ठहरे थे, वहां से लगभग चार किलोमीटर दूर एक खुले मैदान में मंच बनाया गया था। सभी लड़कियों को एक ऑटो पर बिठा दिया गया। ऑटो चालक को रास्ता बता दिया गया। हमलोग मस्ती में चले जा रहे थे। हैदराबाद की लंबी सड़कों का आनंद लेते हुए। काफी देर तक जब हमलोग चलते रहे, तब चिंता हुई कि अब तक वह जगह क्यों नहीं आयी है। हम लोगों ने ऑटो चालक से पूछना शुरू किया तो वह कुछ बता नहीं पा रहा था। वह न तो अंग्रजी समझता था न हिंदी। तब तक काफी अंधेरा हो चुका था। लड़कियां घबराने लगीं। रास्ता अंधेरा था और सड़क पर खामोशी पसरी हुई थी। हमलोग जितना पूछते, वह ऑटो चालक अपनी स्पीड बढ़ा देता। न वह हमारी भाषा समझ रहा था, न हम उसे कुछ समझा पा रहे थे। सभी लड़कियों के चेहरे के रंग उतर गये। कुछ तो घबराहट के मारे रोने लगीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दूर दूर तक कोई बस्‍ती नहीं थी। सुनसान सड़क पर सिर्फ ऑटो की आवाज। मैंने किसी तरह उसे रोका और इशारे में समझाया कि वह गलत जा रहा है। पता नहीं क्या समझा, उसने टैंपो दूसरी दिशा की ओर मोड़ा। काफी जद्दोजहद के बाद हम कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। हमलोग पहुंचे तो वहां मातम छाया हुआ था। हमारे साथी कह रहे थे कि जब तक हमारी लड़कियां वापस नहीं आतीं, हम कोई कार्यक्रम नहीं होने देंगे। नौबत पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने की आ गयी थी। हम सबको देखकर सबके चेहरे खिल गये। पर ऑटो वाले की शामत आ गयी। लड़कों ने उसे पीटना शुरू किया। किसी तरह उसको वहां से हटाया गया। बाद में पता चला कि उसने समझा ही नहीं कि हमें कहां जाना है।
जिंदगी के अनुभव सिर्फ रसीले नहीं होते। दुख व सुख के अनुभवों से ही जीवन पूर्ण होता है। इसकी खूबसूरती उसी में है। मैं वहां से दो चीजें लेकर आयी। हैदराबाद का मोती। दूसरा श्‍याम बेनगल के हाथों से लिखा एक कागज का पुर्जा। जिस पर उन्होंने लिखा – प्यारी निवेदिता के लिए।
ये भूली हुई यादें हैं, जिन पर वक्त की गर्द की गहरी पर्त जम गयी थी, अब उन्हें एक एक कर के याद कर रही हूं। कहानियां अलग-अलग हैं, मगर दिल में धंसा तीर अभी तक निकला नहीं है। रात तारों भरी है, जिसके बीच चांद पसरा हुआ है।


 

( कई फेलोशिप और लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित निवेदिता झा सामाजिक सरोकार वाली पत्रकार रही हैं। उनसे niveditashakeel@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है)