29 Nov 2013

Disappointed Pokhran villagers hate promises

Promises fail to impress villagers who remain parched for water, stricken by cancer
Iftikhar Gilani @iftikhargilani

 This remote region in Rajasthan paints a clear picture of India’s contrasting reality. Basked in sun and sand, abject poverty, increasing incidences of cancer, shrinking grazing lands and an acute scarcity of water plagues villages around Pokhran, which once showcased to the world India’s strides in the nuclear arena. Today, candidates contesting the Pokhran seat for the December 1 Assembly election are battling voters’ indifference that they’ll actually resolve the multitude of day-to-day problems that villagers face here.
Chacha village, a few kilometres from Pokhran, greets you with the noise of wailing women and children; a detonation at the nuclear testing site nearby caused a tremor, which cracked the village’s water tank just a couple of hours earlier. “The water we had collected is gone,” says a sobbing Teja Ram, pointing at the receptacle which was thus far their source of water.
The water tank is a lifeline. Water is a prized, precious resource here. Habibullah knows this all too well. He had give away a tin of ghee to buy water, required for his wife’s delivery. “There was a tremor and all the water we had stored was gone,” Habibullah tells dna. “Water is costlier than ghee, and I had to go to a nearby Bishnoi village to get water.”
Frequent tremors in the Thar desert due to the regular testing of missiles and other state-of-the-art armaments has been disrupting life in villages in the region. Water tanks and homes develop cracks and crumble at alarming frequency. The closest village from the testing site, Khetloi, is replete with crumbled concrete homes and hutments. “We received compensation after the 1998 tests. But that was too little, and some of the villages received no compensation,” says village head Banjaram. In the last assembly elections, BJP was humbled due to the issue of compensation. Villages in the area around the testing site are also increasingly reporting fatalities due to cancer. “This village alone has reported 12 deaths over the past one year,” says Gomad village sarpanch Manzoor Meher. “And many more have been detected with this deadly disease.”
Little wonder then that the BJP’s candidate here, Shaitan Singh, is promising an oncology centre at the local hospital. Villagers take the promise with a pinch of salt. “We were promised relief and a cancer centre when five nuclear tests shook the desert here in May 1998. But everybody has forgotten us,” says Manzoor, who blames Shaitan Singh’s
rival ad sitting Congress MLA Saleh Mohammad for being indifferent to the need of a special oncology centre.
The lone doctor at the Pokhran hospital, on condition of anonymity, admits that incidents of blood, skin and throat cancer have been increasing. The cattle too is frequently detected with body sores. Whether the increasing incidences of cancer are linked to testing is not yet known and no scientific study has been undertaken to understand the the long-term effects of nuclear testing on health in the region. The doctor admits this is a matter for scientific scrutiny.
Sikandar, an electrician, who remembers the 1998 tests says they were evacuated from their houses early morning on the day of the tests. “We saw the desert turn white and the blasts hurled up a mound of earth. Doctors descended on our village for a few days and gave iodine tablets to everyone,” says Sikandar. “They advised us not to consume milk and water from open tanks and cisterns.”
Evacuations are all too common even today. Villagers in Khetloi and Odania say they are asked to evacuate at short notices to enable long-range missile tests. “On an average, villages are vacated twice a month and pushed to the forests,” says Meher Ali, an aide of the local MLA. “They are given Rs 50 per person in compensation.”
Frequent tremors in the Thar desert due to the regular testing of missiles and other state-of-the-art armaments has been disrupting life in villages in the region.

(Courtesy DNA )

25 Nov 2013

तलहका प्रकरण : ताकि बची रहे उम्मीद

जेब अख्तर

तहलका प्रकरण कई ऐसे पत्रकारों के लिए एक धक्के तरह है जो पत्रकारिता में अब भी प्रोफेशन नहीं पैशन के तहत टिके हुए हैं। और उन युवा पत्रकारों के लिए बहुत गहरे पीड़ा की तरह है जो तहलका जैसे संस्थान में काम करने का सपना संजोए पत्रकारिता में आ रहे हैं। यह एक तरह से एक उम्मीद का टूटना है। गोवा के होटल की लिफ्ट में जो कुछ भी हुआ, फिर इसके बाद तरुण तेजपाल ने जिस तरह से उस महिला पत्रकार से माफी मांगी और खुद को गुनाहगार मानते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया- यहां तक तरुण के साथ एक खटास के साथ ही सही, हमदर्दी बन रही थी। वह हमदर्दी भी इसलिए बन रही थी कि शायद इसी तरह से वैल्यू वाली पत्रकारिता का एक स्तंभ बचा रहे। देश में ऐसे स्तंभ अब उंगलियों पर गिने जाने लायक ही बचे हैं। इसलिए तहलका का बचे रहना भी उतना ही जरूरी है जितना कि तरुण तेजपाल को इसकी सजा मिलना। जिसके लिए शुरू में वे तैयार दिखे। लेकिन अब इसमें वकील आ गए हैं। जिससे तरुण की खुद को सजा देने की नीयत पर शक होने लगा है। आम आदमी की पहुंच से दूर रहने वाले ये महंगे वकील अब हर वो कानूनी हथकंडा अपनाएंगे जो तरुण को बचाने में मददगार होगा। यानी काली चादर पर एक और काली चादर। बेहतर यही होता कि तरुण अपने-आपको कानून के हवाले करते और उसे अपने तरीके से काम करने देते। सीधे शब्दों में ये तरुण का अपनी स्वीकारोक्ति से पीछे हटना है। अरुधती राय ने इस मामले में सही कहा है कि ये एक और बलात्कार है।
और ये गोवा में हुई गुनाह से अधिक बड़ा गुनाह है। जिसकी भरपाई शायद जनसरोकार की पत्रकारिता को चुकानी पड़ेगी। दूसरे,  तरुण के इस कदम से उन सांप्रदायिक ताकतों को भी उंगली उठाने का मौका मिल गया है जिसके खिलाफ तहलका ने मुहिम चला रखी है। ये ताकतें अब इस पूरे मामले को सियासत की कीचड़ में लपेट कर सियासी रंग देंगी। जिसका खमियाजा भी अंतत: तरुण तेजपाल या तहलका से अधिक उस उम्मीद को चुकाना पड़ेगा जो पत्रकारिता को हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।
             खबर ये भी है कि गोवा में तहलका के जिस थिंक फेस्ट के दौरान ये घटना घटी, उस फेस्ट का प्रायोजक वे कोयला कंपंनियां है जो छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में आदिवासियों का दमन कर रही हैं। विकास के नाम पर मरदों को गोली मारी जा रही है और औरतों का बलात्कार किया जा रहा है। दूसरे शब्दों में जिस फेस्ट के दौरान यह बलात्कार जैसी घटना घटी वह बलात्कारियों द्वारा ही प्रायोजित था। यानी अवसान की यह यात्रा बहुत पहले से शुरू हो चुकी थी। उफ् सच्चाई कितनी विद्रूप हो सकती है, इसे तहलका के इस प्रकरण से समझा जा सकता है। अगर ये सही है तो तरुण तेजपाल की जिम्मेदारी इस घटना के बाद और बढ़ जाती है। लेकिन लगता है अब वे भाग रहे हैं। जुर्म कबूल भी कर रहे हैं तो एक शर्त के साथ। नाप-तौल के साथ। कि देखो मैने इतनी माफी मांग ली, अगर तुम माफी नहीं देती हो तो मेरे पास माफी लेने के ये-ये तरीके हैं। तुम जाओगी कहां। अंतत: एक पौरुष, पद और पावर का दंभ। बहरहाल कामना यही की जानी चाहिए कि दूध का दूध और पानी का पानी जल्दी हो। ताकि इससे होने वाला नुकसान, जो तय हो चुका है- वो कम से कम हो।

21 Nov 2013

गरम हवा के बनने की कहानी



एम एस सथ्यू
-अजय ब्रह्मात्मज
    विभाजन के बाद देश जिस त्रासदी से गुजरा, उसका धर्म से सीधा रिश्ता नहीं है। हम सभी समान मुख्यधारा के हिस्से हैं। भले ही किसी समुदाय, जाति या धर्म के हों। जरूरी है कि मुख्यधारा का हिस्सा बनें। ‘गर्म हवा’ में सलीम मिर्जा के जरिए यही सरल संदेश दिया गया है। अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक की तरह नहीं देखें। वे मुख्यधारा का हिस्सा हैं।
    हम फिर से फिल्म को रिलीज करना चाहते हैं। हम ने फिल्म को रीस्टोर किया है। इसे डिजीटली रीस्टोर किया गया है। साउंड भी डॉल्वी डिजिटल में कंवर्ट किया गया है। जल्दी ही फिल्म और डीवीडी रिलीज करेंगे। अभी जो भी डीवीडी बाजार में या निजी संग्रह में हैं, वे सभी पायरेटेड हैं। फिल्म का प्रिंट इंग्लैंड या खाड़ी देशों में भेजते ही पायरेटेड हो जाते हैं। हम कुछ भी नहीं कर पाते।
    मैंने बहुत कम पैसों में फिल्म बनाई थी। मुझे केवल 2 लाख 49 हजार रुपए मिले थे। इतने ही पैसों में हम ने शूटिंग पूरी की। सिर्फ एक कैमरा और एक लेंस था हमारे पास। हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि आगरा में शूटिंग के दौरान साउंड रिकॉर्ड कर सकें। पूरी फिल्म मेरे एडीटर चक्रवर्ती ने सायलेंट फिल्म की तरह एडिट की। एडीटिंग के बाद हमलोगों ने आर के स्टूडियो में फिल्म डब की। आर के स्टूडियो के महान रिकॉर्डिसट अलाउद्दीन साहब ने इसकी डबिंग रिकॉर्ड की। वे अभी नहीं हैं। ‘टीपू सुल्तान’ की शूटिंग के समय मैसूर में सेट पर लगी आग में उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने स्टूडियो में ही फिल्म के माहौल का सृजन किया। यह सीधी डबिंग नहीं थी। अगर किरदार चल रहे हैं तो उन्होंने उन्हें स्टूडियो में चलवाया। ताकि उसकी तरह का साउंड मिल सके। अगर फिल्म को गौर से देखें तो उन बारीकियों पर ध्यान दे सकते हैं।
    मेरे कैमरामैन ईशान आर्या प्रोड्यूसर भी थे। हिंदू लडक़ी से शादी करने के बाद उन्होंने नाम बदला था। वे हैदराबाद के थे और इप्टा के सदस्य थे। उन्होंने एटीफ्लेक्स कैमरे से शूट किया। वह कैमरा सबसे पहले भारत आया था। इतना पुराना था। एक ही जूमलेंस था। डॉली-ट्रॉली कुछ भी नहीं था हमारे पास। वास्तव में हम ने शूटिंग बजट में शूटिंग की। बहुत ही कम बजट था। हम पैशन से काम करते रहे। हमें एकजुट होकर एक ईमानदार फिल्म बनानी थी। हमें बिल्कुल एहसास नहीं था कि हमलोग कोई महान फिल्म बना रहे हैं। हमारी कोशिश सिर्फ एक ईमानदार फिल्म बनाने की थी और वह आपने देखी।
    ‘गर्म हवा’ के बाद कई फिल्में इस से प्रेरित होकर बनीं। हिंदी में मुसलमान समुदाय पर अनेक फिल्में बनी हैं। ‘गर्म हवा’ में पहली बार मुसलमान किरदार वास्तविक रूप में दिखे। वे ‘पाकीजा’, ‘मेरे महबूब’ आदि जैसे किरदार नहीं थे, जहां हर व्यक्ति शायरी कर रहा हो। फिल्म में सभी का स्वाभाविक अभिनय था। सभी बलराज साहनी से प्रेरित थे। उनकी शैली से सभी वाकिफ हैं। बलराज साहनी ‘गर्म हवा’ नहीं देख पाए थे। इस फिल्म का अंतिम संवाद डब करने के अगले दिन उनकी मौत हो गई। बलराज साहनी को नेशनल अवार्ड मिलना चाहिए था। बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ के समय यह पुरस्कार मिल जाना चाहिए था। उन्हें पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया कि वे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर थे। ‘गर्म हवा’ के बाद पुरस्कार नहीं देने का यह तर्क था कि मृत्योपरांत क्यों दें? उन्हें यह भारत से यह प्रतिष्ठा नहीं मिली। यही संजीव कुमार के साथ हुआ। वे भी कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा के सदस्य थे। ‘कोशिश’ करने के बाद सभी खामोश हो गए और उन्हें अवार्ड मिला।
    बलराज साहनी के प्रति मैं बहुत क्रूर रहा। आमना की आत्महत्या का दृश्य उनकी जिंदगी से मिलता-जुलता है। उनकी बेटी शबनम ने आत्महत्या कर ली थी। वे इंदौर के पास कहीं चुनाव प्रचार कर रहे थे। बहुत मुश्किल से हमलोगों ने उन्हें खोजा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने उन्हें अपना हवाई जहाज दिया। एयरपोर्ट से उन्हें लेकर मैं ही घर गया था। घर में लोग भरे थे। वे समझ गए थे कि क्या हुआ है? वे सीढिय़ां चढ़ कर शबनम के कमरे में गए। दरवाजा खोला और वहीं खड़े रहे। मैंने इस फिल्म में वही किया। इसलिए मैं कह रहा था कि मैं काफी क्रूर रहा।
    वे इतने संवेदनशील एक्टर थे। मैंने यह नहीं कहा था कि आप की बेटी की मौत हो गई है। मैंने कहा कि गीता मर चुकी है। आप आकर उसे देखते हैं और आप की आंखों में आंसू नहीं आते। उन्होंने ऐसा ही किया। उन्हें मालूम था कि मैं उनसे वही अभिनय करवा रहा हूं, जो उनकी जिंदगी में हो चुका था। दुर्लभ हैं ऐसे अभिनेता। मुझे ऐसा मौका मिला कि मैंने उन्हें स्टेज और फिल्म में डायरेक्ट किया। ऐसे बड़े कलाकारों के साथ काम करना किसी भी डायरेक्टर के लिए प्रेरक अनुभव हो सकता है। आप अच्छी फिल्म बना सकते हैं, लेकिन कोई प्रेरित तो करे। इस फिल्म में बलराज साहनी ने हम सभी को प्रेरित किया।
    अच्छी फिल्में इत्तफाक से बन जाती है। अक्सर यही होता है। बुरी फिल्में तो हमेशा बनती रहती हैं। उस जमाने में एनएफडीसी को एफएफसी कहा जाता था। करांजिया उसके चेयरमैन थे। मैंने उनके पास स्क्रिप्ट भेजी। वे फायनेंस भी करना चाहते थे, लेकिन उन्हें स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई। उन्होंने मुझ से कहा सथ्यू दूसरी स्क्रिप्ट लेकर आओ। यह स्क्रिप्ट घर में पड़ी धूल खा रही थी। शमा जैदी ने इसे तैयार किया था। उन्होंने इस्मत चुगताई से यह अप्रकाशित कहानी सुनी थी। ‘गर्म हवा’ की बूढ़ी महिला वाली घटना इस्मत चुगताई के परिवार में हुई थी। सारी चीजें उसी आधार पर गढ़ी गई थी। करांजिया को यह स्क्रिप्ट पसंद आई। उन्होंने ढाई लाख रुपया देने का वादा किया। मुझ से बजट बनाने में चूक हो गई। मैंने एक हजार कम का बजट बना दिया। उन्होंने फिर 2 लाख 49 हजार ही दिए। उन दिनों हजार रुपया भी बहुत होता था।
    इस फिल्म के सभी कलाकारों को बहुत छोटी रकम दी गई थी। बलराज साहनी को मैंने केवल पांच हजार रुपए दिए थे। फारूख शेख का 750 रुपए मिले थे। फारूख को तो मैंने पंद्रह सालों के बाद पैसे दिए। रिलीज के समय प्रिंट वगैरह बनाने में कुल मिला कर 12 लाख रुपए खर्च हो गए थे। एफएफसी दिए गए कर्ज पर 15 प्रतिशत सालाना इंट्रेस्ट ले रही थी। एफएफसी के पैसे चुकाने के बाद अलग-अलग स्रोतों से आमदनी होने के बाद मैंने कलाकारों के पैसे दिए। मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैंने एफएफसी और एनएफडीसी के सारे पैसे वापस किए। हमारे समय में अनेक निर्देशक पैसे लौटाने में असमर्थ रहे। क्योंकि उनकी फिल्मों से कोई आमदनी नहीं हुई। उस समय ढेर सारे अच्छी फिल्में बनीं, लेकिन उन्हें मुनाफा नहीं मिला। एनएफडीसी ने उनके कर्ज माफ कर दिए। मैं तो फिर भी एनएफडीसी को धन्यवाद दूंगा कि उनकी कोशिशों से ढेर सारी अच्छी फिल्में बनीं। सिनेमा के 100वें साल में हमें यह नहीं भूलना चाहिए। संयोग से यह साल बलराज साहनी की भी जन्म शताब्दी है।
    हम सभी की जिंदगी में हास्य-विनोद की खास जगह होती है। अपनी मुश्किलों और हादसों के बावजूद जिंदगी में हंसी बची रहती है। ‘गर्म हवा’ जैसी दुखद और उदास फिल्म में ऐसे हास्य-विनोद की जगह बढ़ जाती है। कैफी साहब ने भावपूर्ण संवाद लिखे थे। बहुत कम शायरों और गीतकारों ने संवाद लिखने का काम किया है। इसके बाद उन्होंने केवल ‘हीर रांझा’ के काव्यात्मक संवाद लिखे। कव्वाली भी उन्होंने लिखी थी जिसे हैदराबाद के अजीज वारसी ने गाया था। बहुत सालों बाद मैं फतहपुर सिकरी गया था तो वहां मजार पर यही कव्वाली चल रही थी। शूटिंग के दरम्यान ही बाजार में ‘गर्म हवा’ चूड़ी आ गई थी।
 
    मैं नहीं कहूंगा कि ऐसी फिल्में बननी बंद हो गई है। सीमित बजट की फिल्में बन रही हैं। एनएफडीसी अब सहनिर्माता बनता है। मलयालम, तमिल और कन्नड़ में ढेर सारी स्वतंत्र फिल्में बन रही हैं। आठवें और नौवें दशक में जरूर एक साथ कई फिल्मकार सक्रिय हुए। उनकी फिल्मों से एक अभियान सा चला। अफसोस की बात है उपयुक्त मार्केटिंग के अभाव में वे फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच सकी। आज मल्टीप्लेक्स की वजह से यह संभव हो गया है। कारपोरेट कंपनियां बड़े स्टार और बड़े नाम के पीछे जाती है। अगर वे छोटी फिल्मों को फायनेंस और मार्केट करें तो बहुत अच्छा होगा। मुख्यधारा की फिल्में बहुत जरूरी है। उनके बगैर फिल्म इंडस्ट्री की सुविधा और संरचना कायम नहीं रह सकती। इंफ्रास्ट्रक्चर रचने में मुख्यधारा की फिल्मों की बड़ी भूमिका होता है। स्वतंत्र सिनेमा बनता रहेगा और यह पूरी ताकत के साथ वापस लौटेगा।
इस फिल्म की बूढ़ी महिला को लेकर जिज्ञासाएं होती है। हमलोग उस भूमिका में बेगम अख्तर को लेना चाहते थे। हमलोग लोकेशन पर पहुंच गए थे। तब उनका संदेश आया कि वह काम नहीं कर सकतीं। क्योंकि उनके पति नहीं चाहते थे। इधर बलराज साहनी बेचैन होते जा रहे थे कि मेरी मां कहां है? वे हमेशा यही सवाल पूछते थे कि मेरी मां कहां है? एक दिन इरशाद के साथ मैं माथुर साहब से मिलने गया। माथुर साहब उस हवेली के मालिक थे। जहां ‘गर्म हवा’ शूट हुई। माथुर साहब के पास अनेक किस्से थे। वे बताते थे कि हवेली के आंगन में कितने बड़े-बड़े जलसे हुए हैं। मेरे दादाजी के जमाने में तवायफें आ कर नाचती-गाती थीं। मेरे दादाजी बहुत बड़ी रसिक थे। मैंने माथुर साहब से ही पूछा कि उन तवायफों में कुछ तो जीवित होंगे? उनसे आग्रह किया कि किसी तवायफ के पास ले चलें। रात के 11 बजे हमलोग तीन फूट की संकरी सी गली में घुसे। वहां दरवाजा खटखटाया तो अंदर से आवाज आई - कौन है? जाओ घर पर कोई नहीं है। माथुर साहब ने कहा कि मैं माथुर हूं। मेरे साथ बंबई से दो लोग आए हैं। वे मिलना चाहते हैं। अंदर से फिर आवाज आई  -आज नहीं हो सकता। उन्हें लगा कि माथुर कोई ग्राहक लेकर आए हैं। उसने आगे कहा - सब लड़कियों को पुलिस उठा कर ले गई है। छापे में आठ लड़कियों पुलिस ले गई थी। हमने बाहर से कहा -हम आप से मिलने आए हैं। दरवाजा खुला और हम सीढिय़ों से ऊपर गए। मैंने अपनी टूटी-फूटी उर्दू में उन से कहा कि हम एक फिल्म शूट कर रहे हैं। माथुर साहब की हवेली में ही शूटिंग चल रही है। क्या आप एक्टिंग करेंगी? यह सुनते ही वह रोने लगी। मुझे लगा मुझ से कोई गलती हो गई। शायद मैंने सही भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कहा सोलह साल की उम्र में मैं अपने भाई के साथ बंबई गई थी। मुझे फिल्म स्टार बनना था। स्टूडियो-दर-स्टूडियो भटकने के बावजूद मुझे काम नहीं मिला। किसी को मेरी जरूरत नहीं थी। जब मेरे पैसे खत्म हो गए तो मैंने एक्सट्रा का भी काम किया। छह दिनों के काम के बाद मिले पैसों से हम आगरा लौट गए। और आज आप मेरे दरवाजे पर आ कर मुझे फिल्म दे रहे हैं। मैं आपको ना कैसे कह सकती हूं। यह आम बात है कि बाहर से आई लड़कियों को काम नहीं मिलता है। अभी स्थितियां थोड़ी बदली हैं। दूसरे जरियों से लोग आने लगे हैं। मैं खुद चार साल तक बंबई में बेरोजगार रहा हूं। 
चेतन आनंद ने मेरे कुछ काम स्टेज पर देखे थे। मैंने उनके साथ 1964 में ‘अंजली’ फिल्म में सहयोगी का काम किया। उनके साथ चार-पांच फिल्में करने के बाद मैं तंग आ गया। काम छोड़ कर मैं दिल्ली चला गया। वहां जाकर मैं थिएटर करने लगा। पैसों के लिए पैट्रियॉंट अखबार की डिजाईनिंग करता था। उनकी एक पत्रिका लिंक थी। वह भी देखता था। वह वामपंथी ग्रुप था। भारत-चीन युद्ध के बाद चेतन आनंद ने ‘हकीकत’ प्लानिंग की और मुझे बुलाया। उस फिल्म में मैं चीफ असिस्टेंट और आर्ट डायरेक्टर के साथ प्रोडक्शन का भी काम देखता था। उस फिल्म में कैफी आजमी और मदनमोहन ने बहुत अच्छी रचनाएं की थी।
                                                                                                  (चवन्नी छाप से कॉपी पेस्ट)